बेटे को मंगलसूत्र बेचकर IAS बनाया..मां को कहा – मैं इनको नहीं जानता.. फिर जो हुआ🤔

“मां का त्याग और बेटे की भूल”
जहां बड़े-बड़े अफसर और अमीर लोग रहते थे, वहां एक शानदार बंगला था – वर्मा विला। ऊंचा गेट, चमचमाती कारें और चारों ओर फैली रौनक देखकर कोई भी समझ जाता कि यह घर किसी बड़े ओहदे वाले का है।
इसी गेट के सामने सड़क किनारे एक बूढ़ी औरत आकर ठहर गई। उसकी उम्र साठ के पार रही होगी। सिर पर एक पुरानी लेकिन साफ साड़ी का पल्लू, कंधे पर कपड़े की गठरी जिसमें शायद उसकी सारी पूंजी और जरूरत का सामान था। पैर में घिसी हुई चप्पलें और चेहरे पर थकान की गहरी लकीरें।
पर उस थकान के पीछे भी एक अजीब सी चमक थी – वो चमक जो सिर्फ मां की आंखों में होती है। कांपते हाथों से गेट पर लगी नेमप्लेट पढ़ने लगी – “अमित वर्मा, IAS कलेक्टर”।
यह नाम देखते ही उसकी आंखें भर आईं। होठों पर अनायास मुस्कान फैल गई – “मेरा बेटा, मेरा अमित, कलेक्टर साहब!”
उसकी आंखों में यादों की बाढ़ उमड़ पड़ी। जाने कितनी रातें जागकर, भूखे पेट काटकर उसने इस नाम के पीछे अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी थी। और आज वही नाम इस ऊंचे बंगले की पहचान बन गया था।
वह हिम्मत जुटाकर गेट की तरफ बढ़ी। गार्ड ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और नागभ सिकोड़ते हुए बोला,
“अरे अम्मा, कहां चली आ रही हो? यह कोई भीख देने की जगह नहीं है। समझी?”
बूढ़ी औरत ने कांपती आवाज में कहा, “बेटा, मैं यहां भीख मांगने नहीं आई। मैं तो अपने बेटे से मिलने आई हूं। यही तो उसका घर है ना?”
गार्ड ने हंसते हुए कहा, “तुम्हारा बेटा? यह कलेक्टर साहब का बंगला है। जाओ-जाओ, यहां से हटो वरना डंडा पड़ेगा।”
उसकी आंखों में आंसू छलक आए। मगर उसने हिम्मत नहीं हारी। कांपते पैरों से धीरे-धीरे चलकर वो गेट के अंदर घुस गई।
गार्ड कुछ कहता उससे पहले ही गाड़ी का हॉर्न बजा। सफेद रंग की सरकारी गाड़ी बंगले के बाहर आकर रुकी। गाड़ी से एक लंबा चौड़ा आदमी निकला – 32 साल का, कोट-पैंट पहने, चेहरे पर तेज और आंखों में आत्मविश्वास।
गार्ड ने तुरंत सलामी ठोकी – “जय हिंद साहब।”
वो शख्स और कोई नहीं बल्कि अमित वर्मा, रांची का नया कलेक्टर था।
बूढ़ी औरत ने उसे देखते ही गठरी जमीन पर रख दी और दौड़ते हुए उसके पास पहुंची। आंसू भरी आंखों से बोली,
“अमित, बेटा अमित, देख आज तेरी मां तुझसे मिलने आई है।”
उसने कांपते हाथों से अमित का चेहरा छूना चाहा। अमित ने एक पल के लिए ठिठक कर उसे देखा, फिर आंखें सिकोड़ते हुए बोला,
“कौन? कौन हो तुम? किस अधिकार से मुझे बेटा कह रही हो?”
उसकी बात सुनकर बूढ़ी औरत का दिल कांप उठा।
“बेटा, मैं तेरी मां हूं। तेरी गोमती। तेरी मां जिसने तुझे पाल-पोस कर बड़ा किया। जिसने तुझे पढ़ाया-लिखाया। तू मुझे नहीं पहचान रहा?”
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