कूड़ा बीनने वाले लड़के ने भूखे साधु को खिलाई आख़िरी रोटी… सच जानकर अमीर आदमी शर्म से झुक गए

दान और इंसानियत: काशी का वह रूहानी सबक
अध्याय 1: काशी का कोलाहल और एक मौन साधु
वाराणसी, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी जीवित नगरी कहा जाता है, जहाँ हर गली एक कहानी कहती है और हर घाट एक इतिहास। काशी विश्वनाथ मंदिर की ओर जाने वाली गलियों में भक्तों का रेला उमड़ा था। हवा में धूप-बत्ती की खुशबू और कानों में ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे गूँज रहे थे।
उसी मंदिर की मुख्य सीढ़ियों के एक अंधेरे कोने में बैठे थे बाबा दयाशरण। उनकी सफ़ेद लंबी दाढ़ी, धँसी हुई आँखें और काँपते हाथ उनकी वयोवृद्ध अवस्था और कमजोरी की गवाही दे रहे थे। बाबा कभी इसी मंदिर के जाने-माने विद्वान हुआ करते थे, लेकिन समय का चक्र ऐसा घूमा कि आज वह असहाय थे।
पिछले तीन दिनों से बाबा के पेट में अन्न का एक दाना नहीं गया था। हज़ारों लोग उनके पास से गुज़रे। किसी ने माथे पर तिलक लगवाया, किसी ने पाँच-दस के सिक्के उनकी झोली में फेंक दिए, लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि “बाबा, क्या आपने कुछ खाया है?”
दान देने वाले लोग लाखों का चेक देकर फोटो खिंचवा रहे थे, लेकिन एक रोटी देने वाली संवेदना गायब थी। बाबा ने एक राहगीर से धीमी आवाज़ में कहा, “बेटा… कुछ खाने को दे दे।” राहगीर ने उन्हें एक भिखारी समझकर अनसुना कर दिया और आगे बढ़ गया।
अध्याय 2: कूड़ा बिनने वाला ‘शिवा’
उसी मंदिर के पीछे वाली गली में, जहाँ भक्त अपनी गंदगी और जूठन फेंकते थे, एक 17 साल का लड़का कूड़ा बिन रहा था। उसका नाम था शिवा। फटी हुई मैली शर्ट, पैरों में टूटी चप्पल और कंधे पर एक पुराना जूट का बोरा। शिवा का कोई घर नहीं था, कोई परिवार नहीं था। फुटपाथ ही उसका बिछौना था और आसमान उसकी छत।
शिवा की किस्मत उस दिन थोड़ी अच्छी थी। बहुत देर तक कूड़ेदान खंगालने के बाद उसे एक सूखी, थोड़ी सख्त लेकिन पूरी रोटी मिल गई। शिवा की आँखों में चमक आ गई। वह खुद भी तीन दिनों से भूखा था। उसने उस रोटी को अपने गंदे कपड़ों से साफ किया, उसे झाड़ा और दीवार से टिक कर बैठ गया।
जैसे ही उसने पहला निवाला तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, उसकी नज़र सामने सीढ़ियों पर पड़ी।
वहाँ बैठे बाबा दयाशरण का हाथ हवा में काँप रहा था। उनकी आँखें पथराई हुई थीं, जैसे वह मौत का इंतज़ार कर रहे हों या किसी मसीहा का। शिवा का हाथ रुक गया। एक तरफ उसकी अपनी तीन दिन की भूख थी, और दूसरी तरफ उस साधु की अंतिम साँसें लेती पुकार।
अध्याय 3: पेट बनाम दिल की जंग
शिवा के मन में एक युद्ध छिड़ गया। “अगर मैंने यह रोटी दे दी, तो मैं आज फिर भूखा सोऊँगा। क्या पता कल कुछ मिले या न मिले?” उसका पेट मरोड़ उठा। लेकिन फिर उसने बाबा के सूखे होंठ देखे।
तभी वहाँ एक आलीशान काली कार रुकी। शहर के बड़े उद्योगपति विक्रम मल्होत्रा कार से उतरे। उनके साथ एक कैमरामैन था। विक्रम ने मंदिर को भारी दान दिया, पंडितों के साथ फोटो खिंचवाई और मीडिया को इंटरव्यू दिया। लाखों के दान की घोषणा हुई, तालियाँ बजीं।
शिवा यह सब देख रहा था। उसे समझ नहीं आया कि जो लोग लाखों का दान कर रहे हैं, उन्हें अपने पैरों के पास बैठा वह भूखा इंसान क्यों नहीं दिख रहा? शिवा ने अपनी सूखी रोटी की ओर देखा। उसे लगा कि उसके हाथ में रोटी नहीं, किसी की जान है।
उसने गहरी साँस ली, उठ खड़ा हुआ और नंगे पाँव सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।
अध्याय 4: एक सूखी रोटी का महादान
शिवा बाबा दयाशरण के सामने जाकर खड़ा हो गया। उसने बिना कुछ कहे अपनी वह कीमती रोटी बाबा की ओर बढ़ा दी। “बाबा, यह खा लो।”
बाबा ने अपनी धुंधली आँखों से शिवा को देखा। “बेटा… तूने खाया?” शिवा ने मुस्कुराते हुए झूठ बोल दिया, “हाँ बाबा, मैंने पेट भर खा लिया है। यह आपके लिए बचा लाया था।”
बाबा ने काँपते हाथों से वह सूखी रोटी ली। जैसे ही उन्होंने पहला निवाला खाया, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह रोटी नहीं, बल्कि शिवा का कलेजा था जो उसने काट कर दे दिया था। पास खड़े कुछ अमीर लोग यह देख रहे थे।
विक्रम मल्होत्रा भी मंदिर से बाहर निकल रहे थे। उनकी नज़र इस दृश्य पर पड़ी। एक मैला-कुचैला कूड़ा बिनने वाला लड़का, एक वृद्ध साधु को खाना खिला रहा है। विक्रम को अपनी लाखों की दान राशि छोटी लगने लगी।
अध्याय 5: वह सच जिसने सबको रुला दिया
विक्रम शिवा के पास आए और बोले, “बेटा, तुमने अपनी रोटी इसे दे दी? तुम खुद क्या खाओगे?” शिवा ने शांति से जवाब दिया, “साहब, मैं तो कल भी कूड़ा बिनूँगा, शायद कुछ मिल जाए। लेकिन बाबा कल तक नहीं बचते अगर आज यह रोटी न मिलती। दान तो आप दे रहे हैं साहब, मैं तो बस इंसानियत निभा रहा हूँ।”
विक्रम का सिर शर्म से झुक गया। तभी बाबा दयाशरण ने अपनी झोली से एक पीला पड़ चुका पुराना चेक निकाला और विक्रम की ओर बढ़ाया।
विक्रम ने जैसे ही वह चेक देखा, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह चेक विक्रम मल्होत्रा के नाम का था, जो उन्होंने 5 साल पहले एक मुसीबत के समय बाबा को (तब वे एक बड़े मठ के महंत थे) मन्नत के रूप में दिया था।
बाबा ने कहा, “बेटा विक्रम, उस रात जब तेरा कारोबार डूब रहा था, तब मैंने तुझे इसी सीढ़ी पर बैठकर ढांढस बंधाया था। तूने वादा किया था कि तू दान करेगा। तूने दान तो किया, लेकिन तू ‘इंसान’ को देखना भूल गया।”
अध्याय 6: प्रायश्चित और नया सवेरा
भीड़ में सन्नाटा छा गया। जो लोग शिवा का मज़ाक उड़ा रहे थे, उनकी आँखें नम थीं। विक्रम मल्होत्रा फूट-फूट कर रोने लगे। उन्होंने शिवा के हाथ जोड़ लिए। “बेटा, आज तूने मुझे असली धर्म सिखा दिया।”
विक्रम ने उसी क्षण फैसला किया। उन्होंने मंदिर के बाहर ‘अन्नपूर्णा सेवा’ शुरू की। लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी—”इस सेवा का सबसे पहला सेवक शिवा होगा।”
शिवा, जो कल तक कूड़ा बिनता था, अब सम्मान के साथ भूखों को खाना खिलाता है। बाबा दयाशरण कुछ महीनों बाद शांति से ईश्वर के पास चले गए, लेकिन वे काशी को एक ऐसा सबक दे गए जो सदियों तक याद रखा जाएगा।
कहानी का संदेश: दान केवल धन का नहीं होता, दान भावनाओं का होता है। अपनी भूख मारकर दूसरे को खिलाना ही सबसे बड़ा ‘महादान’ है। गरीबी इंसान की जेब में होती है, दिल में नहीं। और अमीरी अक्सर तिजोरियों में बंद होकर अपाहिज हो जाती है।
काशी की उन गलियों में आज भी शिवा खाना बाँटता है, और उसकी हर रोटी में उस दिन की सूखी रोटी की खुशबू आती है, जिसने हज़ारों अमीरों का अहंकार तोड़ दिया था।
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