धर्मेंद्र की अंतिम इच्छा: 40 साल बाद दो सौतनों का आमना-सामना, सनी देओल ने उठाया सबसे बड़ा क़दम

 

मुंबई, 24 नवंबर: उस रात, मुंबई का देओल मैंशन (Deol Mansion) अचानक थम-सा गया। बॉलीवुड के ‘ही-मैन’ धर्मेंद्र देओल अब इस दुनिया में नहीं थे। स्टारडम और शोहरत की चकाचौंध से परे, यह मौत अपने पीछे अनगिनत अनसुलझे सवाल छोड़ गई। आधी रात को घर में मची हलचल, परिवार के सदस्यों के अलग-अलग बयान, और एक मेगास्टार का चुपचाप अंतिम संस्कार… ये सब उनके चाहने वालों के लिए एक बड़ा सदमा था।

लेकिन इन सब सवालों के बीच, एक चमड़े की पुरानी डायरी ने जो राज़ खोला, उसने पूरे देओल परिवार को हिलाकर रख दिया।

आधी रात का सन्नाटा और अनसुलझे सवाल

 

धर्मेंद्र की मौत की ख़बर आधिकारिक तौर पर सुबह आई, लेकिन रात 11 बजे के क़रीब ही उनके घर में हलचल शुरू हो चुकी थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रात के अंधेरे में कई बड़े सितारों की एंट्री हुई, जैसे कोई बहुत बड़ा फ़ैसला लिया जा रहा हो। परिवार के सदस्यों ने मीडिया को स्वास्थ्य को लेकर जो बयान दिए, उनमें तालमेल नहीं था—एक कहता रिकवरी हो रही है, दूसरा कहता चिंताजनक है।

सबसे बड़ा सवाल था, सीसीटीवी फुटेज का ग़ायब होना। और एक लीजेंड्री स्टार का अंतिम संस्कार इतनी गुपचुप तरीक़े से क्यों किया गया? उनके फ़ैंस को यह हज़म नहीं हो रहा था कि जिस स्टार ने भारतीय सिनेमा को दशकों तक अपनी मुस्कान और दर्द से रौंदा, उसकी अंतिम यात्रा इस तरह सादगी और ख़ामोशी में निकाली जाएगी।

क्या मेडिकल रिपोर्ट में कुछ छिपाया गया था? क्या आधी रात को ही उनकी मौत हो चुकी थी? यह सब रहस्य बनकर रह गया। लेकिन इन सबके बीच, उस डायरी ने एक ऐसा रहस्य उजागर किया, जो इन सब सवालों से ज़्यादा ज़रूरी था—परिवार का बँटवारा और पिता की अंतिम इच्छा।

डायरी का वो पन्ना: “मेरी आख़िरी इच्छा है…”

 

धर्मेंद्र, जो अपनी मुस्कान के पीछे कई दर्द छिपाते थे, उनके जाने के बाद, उनके कमरे से एक पुरानी, चमड़े की डायरी मिली। यह डायरी उनके दिल के गहरे राज़ों का पिटारा थी।

परिवार के लोग सदमे में थे। सनी देओल के हाथ में जब वह डायरी आई, तो एक पन्ना अचानक उनकी निगाहों में ठहर गया। उनके चेहरे पर तनाव और सदमे के भाव साफ़ दिखने लगे।

डायरी पर धर्मेंद्र के शब्द लिखे थे, मानो वे आख़िरी बार बोल रहे हों:

“मेरी आख़िरी इच्छा है, देओल परिवार एक हो जाए।

प्रकाश (Prakash) मेरी पहली साथी… हेमा मालिनी (Hema Malini) मेरी जीवन यात्रा की दूसरी आधी। मेरी चाहत है कि दोनों परिवार एक ही छत के नीचे बैठें, बात करें। मेरे जाने के बाद, इस घर में बंटवारा नहीं, सिर्फ़ और सिर्फ़ प्यार हो।

मैंने लाख कोशिशें कीं… पर कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया। यह दायित्व अब तुम सब पर है।”

सनी देओल के चेहरे पर शॉक छा गया। आँखें चौड़ी हो गईं, हाथों में डायरी कस कर पकड़ी हुई थी। साँसें पूरी तरह से थम-सी गई थीं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या वह पिता की यह आख़िरी इच्छा पूरी करें, या उस डर का सामना करें जिसे वह 40 साल से टालते आ रहे थे।

40 साल बाद आमना-सामना

 

धर्मेंद्र की अंतिम इच्छा पूरी करने का मतलब था: पहली बार प्रकाश कौर का सामना करेगी हेमा मालिनी। 40 साल बाद, दो अलग-अलग दुनियाएँ आमने-सामने खड़ी होंगी।

1980 में धर्मेंद्र और हेमा मालिनी ने शादी की थी। तब से देओल परिवार दो हिस्सों में बँट गया था। प्रकाश कौर ने अपने बच्चों—सनी, बॉबी, और बहनों को संभाला। वहीं, हेमा मालिनी ने अपनी बेटियों—ईशा और अहाना—के साथ एक अलग दुनिया बसाई। इन दोनों दुनियाओं के बीच कभी कोई मुलाक़ात नहीं हुई, न किसी ने कोशिश की, न कोई हिम्मत कर सका।

अब सारा बोझ सनी देओल के कंधों पर था। उन्होंने डायरी बंद की। उनके चेहरे पर दो चीज़ें साफ़ दिख रही थीं: दायित्व (पिता की अंतिम इच्छा का) और डर (माँ प्रकाश कौर की तबीयत का)।

वह जानते थे कि अगर अचानक प्रकाश कौर का सामना हेमा मालिनी से हुआ, तो पुरानी यादें जागेंगी, दर्द उभरेगा, और कौन जाने उनकी सेहत कैसे प्रतिक्रिया दे। सनी सोच में डूब गए: “क्या मैं यह कर पाऊँगा? क्या मम्मी यह झटका सह पाएँगी? क्या इतना बड़ा क़दम सही होगा?”

परिवार की बैठक और बॉबी का दर्द

 

देओल परिवार की एक बैठक हुई। बॉबी देओल, अपनी बहनों—अजीता और विजिता—और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बैठे थे। सबके चेहरे पर तनाव था। एक तरफ़ पिता की अंतिम इच्छा, दूसरी तरफ़ परिवार की नाज़ुक भावनाएँ।

धीमे सुर में बॉबी ने कहा, “भाई, पापा की आख़िरी इच्छा है, पर मम्मी को चोट नहीं लगनी चाहिए।”

सनी चुप थे। बस एक ही सवाल मन में था: क्या पिता की आख़िरी बात को अनसुना कर दूँ, या सारी हिम्मत जुटाकर परिवार को एक करूँ?

सनी जानते थे कि यह केवल एक मुलाक़ात नहीं है, यह 40 साल के बँटवारे को ख़त्म करने की शुरुआत है। उन्हें यह भी पता था कि उनके पिता ने ज़िंदगी भर दोनों परिवारों को जोड़ने की लाखों कोशिशें कीं, जो कभी पूरी नहीं हो पाईं।

हेमा मालिनी का समर्पण