नदी का कर्ज और इंसानियत की जीत

अध्याय 1: वह मनहूस गर्मी की दोपहर

सूरजपुर गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता था, लेकिन वहां से बहने वाली नदी जितनी शांत दिखती थी, उतनी ही खतरनाक थी। गांव के बुजुर्ग कहते थे कि नदी के भीतर गहरे भंवर (Whirlpools) हैं जो किसी को भी पलक झपकते ही लील सकते हैं।

उस दिन शहर की तपती गर्मी से बचने के लिए प्रिया, जो एक मशहूर उद्योगपति की इकलौती बेटी थी, अपनी सहेली के साथ वहां घूमने आई थी। प्रिया करोड़ों की संपत्ति की वारिस थी, ऊँचे महलों में पली-बढ़ी और उसे लगता था कि दुनिया की हर चीज़ को पैसे या हुनर से जीता जा सकता है। उसे तैरना आता था, और इसी आत्मविश्वास में उसने गांव वालों की चेतावनी को अनसुना कर दिया।

“अरे, कुछ नहीं होता! मैं नेशनल लेवल की स्विमर रही हूँ,” उसने अपनी सहेली से कहा और ठंडे पानी का आनंद लेने के लिए नदी में उतर गई।

लेकिन नदी का कानून शहर के स्विमिंग पूल से अलग था। अचानक एक भंवर उठा और प्रिया के पैर जमीन से उखड़ गए। पानी उसे पागलों की तरह नीचे खींचने लगा। उसकी चीखें पानी की गर्जना में दब गईं।

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अध्याय 2: रिक्शावाला अजय – एक फरिश्ता

उसी समय, पास के पुराने लकड़ी के पुल से अजय अपना रिक्शा लेकर गुजर रहा था। अजय एक साधारण रिक्शावाला था, जिसके फटे हुए कुर्ते और पसीने से तरबतर चेहरे पर गरीबी की लकीरें साफ दिखती थीं। उसने पुल से नीचे देखा—एक जिंदगी खत्म हो रही थी।

पुल पर खड़े अन्य लोग शोर मचा रहे थे, लेकिन डर के मारे कोई पानी में कूदने की हिम्मत नहीं कर रहा था। अजय ने एक पल भी नहीं सोचा। न अपनी जान की परवाह की, न अपनी बूढ़ी माँ की, जो घर पर उसका इंतजार कर रही थी। उसने पुल से सीधे नदी के उफनते पानी में छलांग लगा दी।

पानी की लहरें उसे पत्थरों से टकरा रही थीं, लेकिन अजय ने हार नहीं मानी। उसने पूरी ताकत झोंक दी और डूबती हुई प्रिया का हाथ पकड़ लिया। मौत और जिंदगी के बीच दस मिनट तक चले संघर्ष के बाद, अजय ने प्रिया को किनारे पर पहुँचाया। प्रिया बेहोश थी, लेकिन उसकी साँसें चल रही थीं। जब भीड़ वहां इकट्ठा हुई और एम्बुलेंस आई, अजय चुपचाप अपना भीगा हुआ रिक्शा उठाकर अंधेरे में गायब हो गया। उसने अपना नाम तक किसी को नहीं बताया।

अध्याय 3: सात साल बाद – एक नया संकल्प

समय बीत गया। प्रिया पूरी तरह ठीक हो गई और वापस अपनी करोड़ों की दुनिया में लौट गई। वह और भी सफल बिजनेसवुमन बन गई, लेकिन उस पानी की ठंडक और उस अनाम हाथ की पकड़ वह कभी नहीं भूली। उसे एक संस्था के माध्यम से पता चला कि उसे बचाने वाला कोई और नहीं, बल्कि सूरजपुर का वही रिक्शावाला अजय था।

प्रिया ने सोचा, “क्या मैं उसे कुछ लाख रुपये देकर इस कर्ज से मुक्त हो सकती हूँ?” लेकिन फिर उसे एहसास हुआ कि जिस इंसान ने अपनी जान जोखिम में डालकर उसे बचाया, उसके लिए पैसा मिट्टी के समान होगा। उसने एक गुप्त योजना बनाई।

सात साल बाद, प्रिया फिर से सूरजपुर लौटी, लेकिन इस बार वह अपनी लग्जरी कार में नहीं, बल्कि एक साधारण वेशभूषा में आई। उसने देखा कि गांव की हालत वैसी ही थी—टूटे स्कूल, कोई अस्पताल नहीं और नदी आज भी उतनी ही खतरनाक थी। अजय आज भी रिक्शा चला रहा था, और भी ज्यादा बूढ़ा और कमजोर हो गया था।

अध्याय 4: इंसानियत रो पड़ी

प्रिया ने गांव में अपना नाम गुप्त रखा और एक ट्रस्ट के जरिए काम शुरू करवाया। देखते ही देखते गांव का चेहरा बदलने लगा।

नदी के किनारे लोहे की मजबूत रेलिंग और चेतावनी बोर्ड लगाए गए ताकि फिर कोई प्रिया न डूबे।

एक आधुनिक अस्पताल बनाया गया जहाँ मुफ्त इलाज की व्यवस्था थी।

एक शानदार स्कूल बनाया गया जहाँ गांव के बच्चों के हाथ में कंप्यूटर और किताबें थीं।

अजय यह सब देख रहा था। उसे लगा कि शायद सरकार की कोई योजना है। एक शाम, वह अपने रिक्शे के पास खड़ा था जब प्रिया उसके सामने आई। अजय ने उसे नहीं पहचाना, लेकिन प्रिया की आँखों में आंसू थे।

“अजय भैया, आपने सात साल पहले जिसे बचाया था, वह मैं ही हूँ,” प्रिया ने भर्राई हुई आवाज में कहा। “मैंने यह स्कूल, यह अस्पताल आपके लिए बनवाया है। यह आपकी इंसानियत का कर्ज है।”

अजय ने शांति से मुस्कुराते हुए कहा, “बेटी, मैंने वह जान पैसों या नाम के लिए नहीं बचाई थी। मुझे तो बस यह खुशी है कि आज मेरे गांव के बच्चे सुरक्षित हैं। तुमने यह सब करके मेरा नहीं, बल्कि उन माँओं का कर्ज चुका दिया है जिनके बच्चे अब इस नदी में नहीं डूबेंगे।”

अजय की सादगी और उसकी महानता देखकर प्रिया के साथ-साथ वहां खड़े गांव वालों की आँखें भी भर आईं। पूरा गांव इंसानियत के इस मिलन को देखकर रो पड़ा।

अध्याय 5: निष्कर्ष – असली अमीरी क्या है?

प्रिया शहर लौट गई, लेकिन उसका दिल अब सूरजपुर में ही बसता था। उसने सीखा कि करोड़ों की संपत्ति आपको सफल बना सकती है, लेकिन एक निस्वार्थ कर्म आपको महान बनाता है। अजय आज भी रिक्शा चलाता है, लेकिन अब उसे गांव का ‘रक्षक’ कहा जाता है। नदी आज भी बहती है, लेकिन अब वह डराती नहीं, बल्कि सुरक्षा की रेलिंग के पीछे से सुकून देती है।

सीख: नेकी का बदला नेकी ही होता है। अगर कोई आपकी जान बचाता है, तो वह कर्ज चुकाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप दूसरों की जिंदगी जीने लायक बना दें।