एक थाली की कीमत

हरी एक छोटे से ढाबे का मालिक था, जो जयपुर-दिल्ली हाईवे के किनारे चलता था। उसकी जिंदगी मुश्किलों से भरी थी—बूढ़ी मां की दवाइयों का खर्च, बेटी प्रिया की स्कूल फीस, और ढाबे पर बैंक का कर्ज। फिर भी, हरी का दिल बहुत बड़ा था। वह भूखों को कभी खाली हाथ नहीं लौटाता था, भले ही उसकी अपनी जेब खाली हो।

एक दिन, बेहद गर्मी में, एक बुजुर्ग व्यक्ति फटे कपड़ों में उसके ढाबे पर आया। वह बहुत भूखा था और उसके पास खाने के पैसे नहीं थे। हरी ने बिना कुछ सोचे, उसे गरमागरम खाना खिलाया। बुजुर्ग ने अपने पास से एक पुराना सिक्का दिया और आशीर्वाद देकर चला गया।

अगले कुछ दिन हरी पर बहुत भारी पड़े। ढाबे पर ग्राहक नहीं आए, बैंक वाले धमकी देने लगे, मां की तबीयत बिगड़ गई और प्रिया की फीस का आखिरी नोटिस भी आ गया। हरी परेशान था, सोच रहा था कि क्या उसकी भलाई का कोई फायदा है।

फिर एक सुबह, ढाबे के बाहर लग्जरी गाड़ियों का काफिला रुका। उनमें से वही बुजुर्ग उतरे, लेकिन इस बार वे देश के प्रसिद्ध उद्योगपति श्री राजेंद्र सिंह थे। उन्होंने बताया कि वे हर साल अपनी पहचान छुपाकर घूमते हैं, इंसानियत की तलाश में। हरी के ढाबे पर उन्हें सच्ची मानवता मिली।

राजेंद्र सिंह ने हरी का सारा कर्ज चुका दिया, उसके ढाबे की जगह शानदार होटल बनवाने का वादा किया, प्रिया की पढ़ाई का खर्च उठाया और मां के इलाज का जिम्मा लिया। हरी की दुनिया बदल गई। अब उसका ढाबा गरीबों के लिए भी हमेशा खुला रहता था।

हरी को एहसास हुआ कि एक छोटी सी नेकी, एक थाली मुफ्त का खाना, उसकी किस्मत बदल सकती है। इंसानियत कभी बेकार नहीं जाती।