प्रेम बाईसा के पिता ही निकले असली कातिल? पुलिस की लाठी पड़ते ही उगला सच। Sadhvi Prem Baisa Case
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साध्वी प्रेम बाईसा केस: क्या पिता ही हैं असली कातिल?
आस्था के केंद्र से संदेह के घेरे तक, जोधपुर में हिल गई व्यवस्था
जोधपुर:
राजस्थान के जोधपुर शहर में साध्वी प्रेम बाईसा के निधन के बाद जो घटनाक्रम सामने आया है, उसने न सिर्फ पुलिस प्रशासन बल्कि समाज को भी गहरे सवालों के सामने खड़ा कर दिया है। एक ऐसा आश्रम, जो कुछ दिन पहले तक भक्ति, श्रद्धा और अनुशासन का प्रतीक माना जाता था, आज जांच एजेंसियों का केंद्र बन चुका है। साध्वी प्रेम बाईसा की रहस्यमयी मौत अब सामान्य जांच का विषय नहीं रही, बल्कि यह मामला आस्था, भरोसे और व्यवस्था की परीक्षा बन गया है।
मामला कैसे शुरू हुआ
28 जनवरी से पहले तक आरती नगर स्थित यह आश्रम पूरी तरह सामान्य बताया जा रहा था। रोज़ाना की तरह सुबह पूजा-पाठ होता था, सीमित लोगों की आवाजाही थी और साध्वी प्रेम बाईसा की मौजूदगी से एक नियंत्रित माहौल बना रहता था। आश्रम से जुड़े लोगों का कहना है कि उस दिन तक साध्वी की तबीयत को लेकर कोई गंभीर चिंता सामने नहीं आई थी।
जब अचानक यह खबर फैली कि साध्वी प्रेम बाईसा की तबीयत बिगड़ गई है, तो शुरुआत में इसे एक सामान्य स्वास्थ्य समस्या माना गया। परिवार और आश्रम से जुड़े लोगों ने भी यही संकेत दिए कि स्थिति गंभीर नहीं है। लेकिन कुछ ही घंटों में जब उनके निधन की सूचना सामने आई, तो जोधपुर में जैसे सन्नाटा छा गया।
बढ़ते सवाल और पुलिस की एंट्री
साध्वी प्रेम बाईसा का व्यक्तित्व सिर्फ एक धार्मिक चेहरा नहीं था। उनके प्रवचन और विचारों की पहचान जोधपुर से निकलकर पूरे राजस्थान तक फैली हुई थी। ऐसे में उनकी अचानक मौत ने लोगों को हैरान कर दिया। आश्रम के बाहर भीड़ बढ़ने लगी और सवाल उठने लगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि हालात संभाले नहीं जा सके।

शुरुआत में परिवार और आश्रम की ओर से मामला सामान्य दिखाने की कोशिश की गई। लेकिन जैसे ही पुलिस ने औपचारिक जांच शुरू की, तस्वीर बदलने लगी। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया मेडिकल बोर्ड के जरिए कराई गई, जिससे यह साफ हुआ कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से ले रहा है।
पुलिस कमिश्नर और एफएसएल की सक्रियता
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस कमिश्नर ओम प्रकाश खुद मौके पर पहुंचे। उनके साथ फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की टीम भी मौजूद थी। पूरे आश्रम परिसर की बारीकी से जांच की गई—कमरे, रसोई, आसपास के हिस्से और दैनिक उपयोग की वस्तुओं को खंगाला गया।
पुलिस कमिश्नर ने साफ कहा कि जांच में कोई भी पहलू नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। एफएसएल टीम की मौजूदगी ने यह संकेत दे दिया कि मामला सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ेगा।
सीसीटीवी और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
जांच के दौरान एक अहम सवाल यह उठा कि आश्रम में लगे सीसीटीवी कैमरे और उनके तार अपनी जगह पर क्यों नहीं मिले। किसी भी धार्मिक या सामाजिक संस्थान में सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था का अचानक कमजोर पड़ना संदेह पैदा करता है। जांच एजेंसियों के लिए यह बिंदु बेहद अहम बन गया।
यहीं से यह तय किया गया कि मामले की जांच विशेष टीम करेगी। इसके बाद एसआईटी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) के गठन का फैसला लिया गया, ताकि जांच पर किसी भी तरह का दबाव या प्रभाव न पड़े।
पिता बीरमनाथ से पूछताछ
एसआईटी की निगरानी में जांच आगे बढ़ी और इसी कड़ी में साध्वी प्रेम बाईसा के पिता बीरमनाथ से गहन पूछताछ की गई। सूत्रों के अनुसार, पूछताछ के बाद पुलिस को उम्मीद जगी है कि इस पूरे घटनाक्रम की परतें अब धीरे-धीरे खुल सकती हैं।
हालांकि पुलिस ने आधिकारिक तौर पर किसी को आरोपी घोषित नहीं किया है, लेकिन पिता से पूछताछ ने इस मामले को एक नया मोड़ जरूर दे दिया है। यही कारण है कि यह सवाल अब खुलकर उठने लगा है—क्या साध्वी के सबसे करीबी रिश्ते ही इस मौत की गुत्थी से जुड़े हैं?
मोबाइल फोन बना जांच की अहम कड़ी
जांच के दौरान साध्वी प्रेम बाईसा का मोबाइल फोन जब्त किया गया। शुरू में इसे एक औपचारिक प्रक्रिया बताया गया, लेकिन फोन के पासवर्ड को लेकर जो असहजता सामने आई, उसने जांच एजेंसियों का ध्यान खींचा।
पुलिस ने फोन को सार्वजनिक नहीं किया और उसे सुरक्षित रखा गया, ताकि जांच प्रभावित न हो। माना जा रहा है कि आने वाले समय में डिजिटल सबूत इस केस में अहम भूमिका निभा सकते हैं। आखिरी कॉल, मैसेज, लोकेशन और ऑनलाइन गतिविधियां—ये सभी बिंदु अब जांच के दायरे में हैं।
इलाज या भोजन? दो बड़े एंगल
एसआईटी ने जांच को तीन मुख्य दिशाओं में आगे बढ़ाने का फैसला किया—
इलाज से जुड़ा एंगल
भोजन और रोजमर्रा के रूटीन में बदलाव
उस दिन मौजूद लोगों के बयान
इलाज से जुड़े पहलू में एक कंपाउंडर की भूमिका सामने आई, जिससे विस्तार से पूछताछ की गई। उससे उसकी शैक्षणिक योग्यता, इलाज की वैधानिक अनुमति और आश्रम में बुलाए जाने के कारणों को लेकर सवाल किए गए।
वहीं, भोजन और रूटीन से जुड़े एंगल में सेवादार सुरेश का बयान महत्वपूर्ण साबित हुआ। उसने बताया कि भोजन रोज़ की तरह ही तैयार किया गया था, लेकिन उस दिन भोजन कमरे तक पहुंचाने का तरीका अलग था। यही बिंदु जांच टीम के लिए अहम बन गया।
आमने-सामने पूछताछ और विरोधाभास
ड्राइवर और केयरटेकर से भी अलग-अलग पूछताछ की गई। जब उनके बयानों को मिलाया गया, तो समय और घटनाक्रम को लेकर कुछ अंतर सामने आए। इन्हीं अंतरों को स्पष्ट करने के लिए एसआईटी ने तीनों को आमने-सामने बैठाकर पूछताछ की।
जांच टीम ने सिर्फ बयानों पर निर्भर रहने के बजाय एफएसएल को दोबारा मौके पर बुलाया और नए सैंपल इकट्ठा किए, ताकि कोई तकनीकी संकेत छूट न जाए।
हाई प्रोफाइल केस और सामाजिक असर
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, यह मामला हाई प्रोफाइल बन गया। यह अब सिर्फ एक साध्वी की मौत का मामला नहीं रहा, बल्कि धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करने लगा।
आसाराम और राम रहीम जैसे पुराने मामलों की याद दिलाते हुए लोग पूछने लगे कि क्या फिर से आस्था की आड़ में सच्चाई दबाने की कोशिश हो रही है?
आस्था बनाम जवाबदेही
इस केस ने समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या सिर्फ भगवा पहन लेने से कोई सवालों से ऊपर हो जाता है? आज लोग प्रवचन के साथ-साथ आचरण भी देखना चाहते हैं।
धार्मिक संस्थानों से अब यह उम्मीद की जाती है कि वे सिर्फ आध्यात्मिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जिम्मेदारी भी दिखाएं। बंद दरवाजों के पीछे लिए गए फैसले अब स्वीकार्य नहीं हैं।
निष्कर्ष
साध्वी प्रेम बाईसा का मामला अभी जांच के अधीन है और किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना तय है कि यह केस सिर्फ एक मौत की जांच नहीं, बल्कि उस भरोसे की परीक्षा है जो समाज धार्मिक संस्थानों पर करता आया है।
एसआईटी की जांच, मेडिकल रिपोर्ट, एफएसएल के नतीजे और डिजिटल सबूत—इन सबके सामने आने के बाद ही सच्चाई पूरी तरह स्पष्ट होगी। फिलहाल जोधपुर की निगाहें इसी सवाल पर टिकी हैं कि क्या सच सामने आएगा या यह मामला भी समय के साथ धुंधला पड़ जाएगा।
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