BJP के सीक्रेट टेप आउट, महिला सम्मान के चीथड़े उड़ा दिए । Navin Kumar

.
.

भाजपा के सीक्रेट टेप और महिला सम्मान की सच्चाई: अंकिता भंडारी केस

उत्तराखंड के ऋषिकेश में एक रिसोर्ट था—वंतारा। वहां काम करती थी 18 साल की अंकिता भंडारी, एक साधारण लेकिन सपनों से भरी लड़की। उसकी मां ने उसे बड़े प्यार से पाला था, उसे अच्छे संस्कार दिए थे, और हमेशा यही सिखाया था कि इज्जत सबसे ऊपर है। लेकिन देश की राजनीति, सत्ता और ताकतवर लोगों की हवस ने उसकी सारी उम्मीदें तोड़ दीं।

शुरुआत: एक परिवार, एक सपना

अंकिता भंडारी का परिवार बेहद साधारण था। मां ने बड़ी मुश्किलों से उसे पढ़ाया-लिखाया, ताकि बेटी अपना नाम बना सके। अंकिता ने रिसोर्ट में नौकरी शुरू की, उम्मीद थी कि कुछ पैसे आएंगे, घर चलेगा, और शायद एक दिन वह अपने सपनों को पूरा कर पाएगी।

रिसोर्ट और वीआईपी गेस्ट

वंतारा रिसोर्ट, जहां अंकिता काम करती थी, भाजपा के बड़े नेता विनोद आर्य का था। विनोद आर्य उत्तराखंड माटी कला बोर्ड का चेयरमैन था, और भाजपा सरकार ने उसे मंत्री का दर्जा दिया हुआ था। रिसोर्ट में अक्सर वीआईपी गेस्ट आते थे, जिनके लिए “एक्स्ट्रा सर्विस” की मांग की जाती थी। अंकिता को बार-बार दबाव डाला जाता था कि वह इन वीआईपी मेहमानों को खुश करे। WhatsApp चैट के मुताबिक, अंकिता ने खुद लिखा, “इस रिसोर्ट में बहुत इनसिक्योरिटी फील होती है।”

राजनीति, दबाव और हवस

एक दिन अंकिता के पास विनोद आर्य का बेटा अंकित आया और कहा, “एक वीआईपी गेस्ट आ रहे हैं, उन्हें एक्स्ट्रा सर्विस चाहिए।” एक्स्ट्रा सर्विस का मतलब क्या होता है, यह सब समझ सकते हैं। पर्दा पड़ा रहता था कि किस वीआईपी का नाम है, लेकिन बाद में ऑडियो क्लिप, फोन कॉल और चैट सामने आए। भाजपा के महासचिव दुष्यंत गौतम, राज्यसभा सांसद, और संगठन महामंत्री अजय कुमार के नाम सामने आए। आरोप था कि वे अंकिता भंडारी के साथ संबंध बनाना चाहते थे। पार्टी के भीतर ही पूर्व विधायक सुरेश राठौर ने अपनी पत्नी से फोन पर कहा, “दुष्यंत गौतम अंकिता के साथ रात गुजारना चाहता था।”

मौत और न्याय की लड़ाई

अंकिता भंडारी की हत्या हो गई। उसकी मां तीन साल से रो रही है, लेकिन अब तक कोई न्याय नहीं मिला। देश के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, पार्टी चीफ—सबके सामने महिला सम्मान की बातें होती हैं, लेकिन जब बात न्याय की आती है, तो सब चुप हो जाते हैं। अंकिता की मां कहती है, “मेरी बेटी को रौंद दिया, अब मुझे न्याय तो दे दो।” दिल्ली हाई कोर्ट के सामने महिलाएं तख्ती लेकर बैठ गईं, “मी लॉर्ड, अब हम कहां जाएं?”

सीक्रेट टेप और पार्टी की सच्चाई

ऑडियो क्लिप में भाजपा के बड़े नेता आपस में बात कर रहे हैं, “अंकिता को बिस्तर में घसीटने के लिए लंगोट उतारकर तैयार बैठे थे।” पार्टी के भीतर भी कोई सुगबुगाहट नहीं, मीडिया में कोई हल्ला नहीं। “बेटी बचाओ” का नारा देने वाली पार्टी के नेताओं पर संगीन आरोप हैं, लेकिन पार्टी बस धीरे से नेताओं को हटा देती है, छवि बचा लेती है। सीबीआई जांच भी नहीं होती, क्योंकि पार्टी के बड़े लोग फंस सकते हैं।

मां की पीड़ा और देश की बेटियां

अंकिता की मां की चिंता यह है कि जिन लोगों ने उसकी बेटी को मारा, वे इतने ताकतवर हैं कि आवाज उठाने वाली उर्मिला सनावर को भी मार सकते हैं। मां हाथ जोड़कर विनती करती है, “मेरी बेटी तो नहीं रही, लेकिन न्याय दिला दो। दुनिया की फिर कोई मां इस तरह से ना रोएं।”

राजनीति और महिला सुरक्षा

देश की राजधानी दिल्ली में इंसाफ की स्थिति खराब है, तो दूरदराज के गांवों में क्या हाल होगा? भाजपा सरकार, नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ, पुष्कर सिंह धामी—सबने मिलकर इंसाफ का कचूमर निकाल दिया है। अंकिता की मां कहती है, “अब मुझे दरिंदों को बचाने वाली भाजपा सरकार से कोई उम्मीद नहीं है। अगर थोड़ी बहुत उम्मीद है तो इस देश के नागरिकों से है।”

सत्ता, पाखंड और समाज

टूटी हुई उम्मीदों की मेड पर खड़ी मां के आंसू उन पाखंडियों को बहा ले जाएंगे जिन्होंने इस देश की यात्रा का सौदा किया है। मां की चिंता यह भी है कि आवाज उठाने वालों को सुरक्षा मिले, ताकि कोई और अंकिता इस तरह से ना मारी जाए।

सवाल और जिम्मेदारी

सोचिए, जो बात सारे जमाने को पता है वह नरेंद्र मोदी को नहीं पता, मुख्यमंत्री को नहीं पता, सीबीआई को नहीं पता। सरकार किस मुंह से महिला सुरक्षा और रामराज के नारे देती है, जब हत्यारों के साथ खड़ी नजर आती है?

निष्कर्ष: उम्मीद और चेतावनी

अंकिता भंडारी की मां की चीख पूरे देश के लिए चेतावनी है। अगर आज आवाज़ नहीं उठाई गई, तो कल कोई और बेटी इसी तरह मारी जाएगी। देश के नागरिकों की जिम्मेदारी है कि ऐसे मामलों में चुप न रहें, आवाज उठाएं, न्याय की मांग करें।

महिला सुरक्षा सिर्फ नारे नहीं, हकीकत होनी चाहिए। जब तक सत्ता, कानून और समाज मिलकर महिलाओं को सुरक्षित नहीं करते, तब तक हर मां की आंखों में डर रहेगा।