“आर्मी बेटी की दिवाली” – एक मां का अपमान, एक देश की बेटी का जवाब।

दिवाली की सुबह थी। पूरा शहर रोशनी में नहाया हुआ था। सड़कों पर चहल-पहल थी, लोग मिठाई के डिब्बे लिए भाग रहे थे, बच्चे आतिशबाजी में मग्न थे। उसी भीड़ से कुछ दूर, सड़क के किनारे एक बूढ़ी औरत चुपचाप अपने सामने रखे टोकरों में मिट्टी के दीपक सजा रही थी। उसका नाम राधा देवी था। उम्र साठ के पार, पर चेहरे पर वही शांति थी जो किसी मां के चेहरे पर होती है जिसने पूरी जिंदगी दूसरों के लिए काट दी हो। उसके पास किसी चीज की कमी नहीं थी — उसकी दोनों बेटियाँ दीक्षा और निशा देश की सीमा पर तैनात आर्मी ऑफिसर थीं। लेकिन आज वह घर से इसलिए निकली थी कि मन को हल्का कर सके, थोड़ी रौनक देख सके, और अपने हाथों से बनाए मिट्टी के दीपक बेचकर अपने मन की संतुष्टि पा सके।
वह सड़क किनारे बैठी थी, तभी एक पुलिस इंस्पेक्टर अपनी मोटरसाइकिल से वहां आया। उसका नाम विजय शर्मा था। वह जैसे ही पास आया, बिना कुछ सोचे बोले, “अरे बुढ़िया! यहां सड़क के बीचोबीच बैठकर दीपक बेच रही है? तेरे बाप की सड़क है क्या?” उसने गुस्से में बाइक खड़ी की और लात मारकर पूरा टोकरा उलट दिया। दर्जनों दीपक फूट गए, कुछ सड़क पर बिखर गए, और कुछ गाड़ियों के नीचे आकर चूर हो गए।
राधा देवी कुछ पल तक वहीं बैठी रह गईं। आसपास के लोग तमाशा देखने लगे। कोई आगे नहीं आया, कोई रोकने की कोशिश नहीं की। भीड़ में कुछ लोग हंसने लगे, कुछ मोबाइल निकालने लगे। इंस्पेक्टर विजय शर्मा लगातार चिल्लाता रहा — “अगर दीपक बेचना है तो दुकान लगाओ, यहां नहीं बैठ सकती। समझी?” राधा देवी की आंखों से आंसू टपकने लगे, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस जमीन पर गिरे हुए दीपक एक-एक करके उठाने लगीं।
उसी भीड़ में एक लड़का था — कॉलेज का छात्र, जो सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय था। उसने पूरा दृश्य अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया। कुछ देर बाद वीडियो इंटरनेट पर डाल दिया और कैप्शन लिखा — “दिवाली पर एक बूढ़ी मां को अपमानित किया गया, सिर्फ इसलिए कि वह दीपक बेच रही थी। क्या यही हमारी इंसानियत है?”
वीडियो वायरल हो गया। कुछ ही घंटों में हजारों लोग उसे शेयर करने लगे। शहर के लोग इंस्पेक्टर की बर्बरता पर गुस्सा करने लगे। वहीं दूर बॉर्डर पर, जहां राधा देवी की छोटी बेटी निशा तैनात थी, उसने यह वीडियो देखा।
वीडियो चलते ही उसका चेहरा तमतमा उठा। आंखों में खून उतर आया। उसने तुरंत अपनी बड़ी बहन दीक्षा को वीडियो भेजा। दीक्षा, जो उस समय उत्तराखंड में पोस्टेड थी, वीडियो देखते ही फट पड़ी — “यह किसने हिम्मत की मेरी मां के साथ ऐसा करने की?”
दोनों बहनों की रगों में वही खून था, जिसने बचपन से सीखा था — अन्याय कभी सहना नहीं। दीक्षा ने तुरंत निशा को फोन किया, “तुम यहीं रहो, मैं जा रही हूं। मैं उस इंस्पेक्टर को उसके किए की सजा दिलाकर रहूंगी।”
घर पहुंचते ही उसने दरवाजा खटखटाया। राधा देवी रसोई में सब्जी काट रही थीं। आवाज सुनते ही बोलीं, “कौन है?” और तभी जवाब आया, “मैं हूं मां — दीक्षा।” राधा देवी के हाथ कांप गए। उन्होंने जल्दी से दरवाजा खोला और बेटी को देखते ही गले लगा लिया।
लेकिन उस आलिंगन में सुकून से ज़्यादा डर था। राधा देवी जानती थीं कि उनकी बेटियाँ मां के लिए कुछ भी कर सकती हैं। उन्होंने डरते-डरते पूछा, “बेटी, तुम्हें कुछ पता तो नहीं चला?” दीक्षा ने मां की आंखों में देखा और कहा, “सब पता चल गया है, मां। वीडियो देखा मैंने।”
राधा देवी ने आंसू पोंछते हुए कहा, “बेटा, छोड़ दे, वह पुलिस वाला है, जाने दे।” लेकिन दीक्षा का चेहरा कठोर था। “नहीं मां, मैं सैनिक की बेटी हूं, कानून का अपमान देखकर चुप नहीं बैठ सकती।”
अगली सुबह वह थाने पहुंची। वर्दी नहीं पहनी थी — साधारण कपड़े, लाल साड़ी, ताकि कोई पहचान न सके। थाने के अंदर एसओ अजय कुमार बैठा था। दीक्षा ने सीधा कहा, “मैं इंस्पेक्टर विजय शर्मा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाना चाहती हूं। उसने मेरी मां के साथ सड़क पर बदसलूकी की है।”
अजय कुमार ने हंसते हुए कहा, “लड़की, यह थाने का मामला नहीं है। बूढ़ी औरत सड़क पर बैठी थी, गलत तो वही थी। इंस्पेक्टर ने अपना काम किया।”
दीक्षा की आंखें गुस्से से भर गईं। उसने कहा, “आप कानून को मजाक बना रहे हैं। जनता के साथ ऐसा व्यवहार अपराध है। अगर आपने रिपोर्ट नहीं लिखी तो मैं आपको भी सस्पेंड करवाऊंगी।”
अजय कुमार हंसा, “तू कौन होती है हमें सस्पेंड करवाने वाली?”
दीक्षा ने धीरे से अपना आईडी कार्ड मेज पर रखा। उस पर लिखा था — कैप्टन दीक्षा सिंह, इंडियन आर्मी।
अजय कुमार सन्न रह गया। चेहरा सफेद पड़ गया। दीक्षा ने सख्त आवाज में कहा, “अब लिखो रिपोर्ट। वरना मैं सीधे डीएम ऑफिस जाऊंगी।”
तभी दरवाजा खुला और अंदर विजय शर्मा आया। उसने व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ कहा, “क्या हुआ मैडम? इतनी सुबह-सुबह थाने में?”
दीक्षा उसके सामने जाकर बोली, “तुमने जिस मां का अपमान किया था, वो मेरी मां है। याद रखना, दिवाली की रात जो दीपक तुमने तोड़े थे, अब वही तुम्हारे करियर को जला देंगे।”
विजय शर्मा हंसता रहा, “बहुत बोलती हो तुम, जाकर जो करना है कर लो।”
दीक्षा थाने से बाहर निकली और सीधे एसपी ऑफिस पहुंची। वहां प्रिया मेहता नाम की अधिकारी बैठी थी — सख्त, ईमानदार और संवेदनशील। दीक्षा ने पूरा वीडियो दिखाया। प्रिया मेहता ने गहरी सांस लेकर कहा, “वीडियो मजबूत सबूत है, पर हमें गवाह भी चाहिए।”
दीक्षा बोली, “मुझे मिलेगा।”
उसने उस लड़के को खोज निकाला जिसने वीडियो बनाया था। वह पहले घबराया, फिर दीक्षा की ईमानदारी देखकर तैयार हो गया। उसने बिना एडिट का वीडियो और बयान दोनों दे दिए। अब सारा सबूत तैयार था।
अगली सुबह 11 बजे जिला मुख्यालय में प्रेस मीटिंग बुलाई गई। डीएम राहुल गुप्ता, एसपी प्रिया मेहता, और मंच पर दीक्षा मौजूद थीं। हॉल खचाखच भरा था। कैमरों की चमक के बीच डीएम ने कहा, “कल सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें एक पुलिस इंस्पेक्टर ने एक बुजुर्ग महिला के साथ अमानवीय व्यवहार किया। यह कृत्य हमारे कानून और पुलिस सेवा की मर्यादा दोनों का अपमान है। हमारे पास ठोस सबूत हैं।”
फिर उन्होंने दीक्षा को मंच पर बुलाया। दीक्षा ने माइक संभाला और बोली, “मैं कैप्टन दीक्षा सिंह, इंडियन आर्मी से हूं। और जिस महिला के साथ यह घटना हुई, वह मेरी मां राधा देवी हैं।”
पूरा हॉल सन्न रह गया। हर रिपोर्टर की कलम थम गई। कुछ के चेहरे पर शर्म थी, कुछ के दिल में गर्व।
डीएम ने कहा, “तुरंत प्रभाव से इंस्पेक्टर विजय शर्मा और एसओ अजय कुमार को निलंबित किया जाता है। जांच पूरी होने तक वे किसी सरकारी कार्य में भाग नहीं लेंगे।”
तालियों की गूंज पूरे हॉल में फैल गई। पत्रकारों ने कैमरे दीक्षा की ओर घुमा दिए। हेडलाइन्स बनने लगीं — “आर्मी ऑफिसर ने मां को दिलाया इंसाफ, दिवाली पर न्याय की रोशनी।”
थाने में जब निलंबन आदेश पहुंचा, तो सन्नाटा छा गया। विजय शर्मा ने कागज जमीन पर फेंक दिया, लेकिन अब उसकी कोई सुनवाई नहीं थी। उसके सहयोगी अजय कुमार ने सिर झुका लिया — “हमसे गलती हो गई।”
उधर राधा देवी के गांव में लोग जमा हो गए। हर कोई कह रहा था, “दीक्षा ने तो कमाल कर दिया, अपनी मां के लिए पहाड़ हिला दिया।”
मीडिया वाले घर तक पहुंच गए। कैमरे और माइक सामने थे। दीक्षा ने बस इतना कहा, “यह सिर्फ मेरी मां का मामला नहीं था, यह उन सब माताओं की लड़ाई है जिनकी आवाज दबा दी जाती है।”
कुछ दिनों बाद विभागीय जांच हुई। गवाहों और सबूतों के आधार पर दोनों अफसर दोषी पाए गए। रिपोर्ट में लिखा गया — “इंस्पेक्टर विजय शर्मा ने अपने पद का दुरुपयोग किया, अनुशासन भंग किया, और आम नागरिक के साथ असभ्य व्यवहार किया।”
राज्य पुलिस मुख्यालय से आदेश आया — दोनों को बर्खास्त किया जाए और आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।
जब यह खबर राधा देवी तक पहुंची, तो वह देर तक चुप बैठी रहीं। फिर धीरे से बोलीं, “मुझे बदला नहीं चाहिए था, बस इज्जत चाहिए थी।”
दीक्षा मुस्कुराई और मां के पैर छूते हुए बोली, “मां, यही तो इंसाफ है — जहां बुराई सजा पाए और अच्छाई सम्मान।”
गांव में उस शाम असली दिवाली थी। राधा देवी के घर के आंगन में सैकड़ों दीपक जल रहे थे। पास खड़ी दीक्षा और निशा दोनों ने एक साथ कहा — “अब मां के हर दीपक की लौ कभी नहीं बुझेगी।”
आसमान में पटाखों की आवाज गूंजी, पर उससे ज़्यादा तेज़ चमक रही थी एक बेटी के साहस की रोशनी।
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उस दिन के बाद ऑफिस का पूरा माहौल बदल गया। अब कोई भी किसी की औकात या कपड़ों से तुलना नहीं करता था। सब एक-दूसरे की मदद करने लगे। अर्जुन सबसे प्रेरणा देने वाला इंसान बन गया। रिया भी अब पूरी तरह बदल चुकी थी। वह विनम्रता से छोटे काम करने लगी और धीरे-धीरे सबका विश्वास जीतने की कोशिश करने लगी।
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