फुटपाथ से शिखर तक: एक लड़के की कहानी जिसे दुनिया ने देर से पहचाना

ठंडी शाम धीरे-धीरे शहर पर उतर रही थी।
दिल्ली की सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों की हेडलाइट्स धूल में घुलकर एक धुंधली, थकी हुई रोशनी बिखेर रही थीं। हर कोई कहीं न कहीं पहुँचना चाहता था—कोई घर, कोई दुकान, कोई चाय की टपरी। कोई बच्चे का हाथ थामे था, कोई मोबाइल में उलझा हुआ।

और उसी भीड़ में, फुटपाथ के एक कोने पर, फटे हुए कंबल में लिपटा एक दुबला-पतला लड़का बैठा था।

दो दिन से भूखा।
आँखों में थकान।
और दुनिया में कोई अपना नहीं।

लोग उसके पास से गुज़रते रहे—
किसी ने देखा नहीं,
किसी ने देखना नहीं चाहा।

पर अगर उस पल कोई थोड़ा ठहर जाता,
तो शायद पहचान लेता—

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यही वह चेहरा है,
जिसके सामने एक दिन करोड़ों लोग सम्मान से सिर झुकाएंगे।
यही वह लड़का है,
जिसे दुनिया आने वाले सालों में भारत का सबसे युवा और चमत्कारी CEO कहेगी।

लेकिन उस वक्त…
वह सिर्फ़ रोशन था—
एक बेघर बच्चा।

भूख, फुटपाथ और एक तारा

रोशन की आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
थकान के पीछे छुपी कोई जिद्दी रोशनी।

उसका रोज़ का जीवन बेहद सरल और उतना ही दर्दनाक था।
सुबह रेलवे स्टेशन के पास भीड़ को देखना,
दोपहर में होटल वालों की दया पर एक निवाला,
शाम को खाली बोतलें और कबाड़ चुनकर चिल्लर कमाना,
और रात को गत्ते के टुकड़े पर लेट जाना—
जो ठंड से कम और हकीकत से ज़्यादा बचाता था।

लेकिन हर रात सोने से पहले वह एक काम ज़रूर करता था।

वह आसमान की ओर देखता।

उसे लगता था—
ऊपर कहीं एक तारा सिर्फ़ उसका है।
और वह तारा एक दिन ज़रूर चमकेगा।

उस रात भी उसने वही किया।
आसमान की ओर देखते हुए फुसफुसाया—

“अगर सच में कोई सुन रहा है…
तो मुझे बस एक मौका दे देना।”

एक छोटा सा पल, जिसने दिशा बदल दी

उसी समय पास में एक बुजुर्ग चप्पल बेचने वाला अपना ठेला समेट रहा था।
अचानक उसका बड़ा सा बोरा फिसल गया।
चप्पलें सड़क पर बिखर गईं।

लोग आते-जाते रहे।
कुछ ने चप्पलों को लात मारकर किनारे किया।
कोई रुका नहीं।

रोशन झिझकते हुए उठा।

उसने एक-एक चप्पल उठाई।
सलीके से बोरे में रखी।

बुजुर्ग ने कांपती आवाज़ में पूछा,
“बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?”

“रोशन,” उसने धीमे से कहा।

“रोशन…
क्या कभी भगवान से कुछ मांगा है?”

रोशन हल्का सा मुस्कुराया।
“हाँ… एक मौका।”

बुजुर्ग ने अपने पुराने झोले में हाथ डाला
और एक पतली, घिसी हुई डायरी निकाली।

“यह रख ले बेटा।
मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ,
पर किसी ने कहा था—
जब किसी को ज़रूरत हो, उसे दे देना।
लगता है अब तेरी बारी है।”

डायरी के कवर पर हल्के अक्षरों में लिखा था—
“Notes of a Restless Mind”

डायरी, जो शिक्षक बन गई

डायरी के पन्ने पुराने थे,
पर उनमें लिखे शब्द सोने से ज़्यादा कीमती थे।

छोटे-छोटे विचार।
अनजाने लोगों की कहानियाँ।
अधूरे सपने।

एक पंक्ति ने रोशन को रोक लिया—

“ज़िंदगी तब भी चलती है,
जब सब कुछ टूट जाए।”

उस रात सड़कों की चुप्पी उसे डरावनी नहीं लगी।
शहर की हर आवाज़, हर परछाईं जैसे उसे कुछ सिखा रही थी।

वह डायरी उसका पहला शिक्षक बन गई।
पहली उम्मीद।
पहला संकेत—
कि शायद उसका तारा बुझा नहीं है।

सड़क: सबसे कठोर लेकिन सच्चा स्कूल

दिन बीतने लगे।

रोशन अब सिर्फ़ कबाड़ नहीं चुनता था।
वह लोगों को पढ़ने लगा था।

कौन कब दया दिखाता है।
कौन कब गुस्सा करता है।
किस समय कौन सी चीज़ की कीमत बढ़ जाती है।

उसे पता ही नहीं चला—
पर यही उसकी पहली बिज़नेस ट्रेनिंग थी।

उसने सीखा—
सही वक्त पर सही चीज़,
डबल कीमत दिला सकती है।

उसकी डायरी भरने लगी—
गलत वर्तनी में लिखे,
पर सच्चे विचारों से।

“सड़क मेरी दुश्मन नहीं…
मेरी टीचर है।”

लफ्ज़ों की ताकत

एक दिन स्टेशन पर एक थका हुआ आदमी बैठा मिला।
हाथ में मुड़ा-तुड़ा रिज़्यूमे।

“डिग्रियाँ हैं,
फिर भी काम नहीं,”
वह बुदबुदाया।

रोशन ने पहली बार रिज़्यूमे को ध्यान से देखा।
“इसमें क्या होता है?”

आदमी हँसा—
“इसमें लोग अपने बारे में झूठ लिखते हैं।”

रोशन के मन में एक विचार जम गया।

उसने पहली बार काग़ज़ खरीदा।
अपने सीखे हुए शब्दों से लिखा—
ईमानदारी, मेहनत, भरोसा।

एक बुजुर्ग क्लर्क ने पढ़ा और कहा—
“बेटा, तू लोगों को समझ सकता है।
तू लिख सकता है।”

वही उसका पहला मेंटोर था।
वही पहला पिच

रोशन से अभिषेक तक

समय बदला।

रोशन अब अभिषेक बन गया।
नाम बदला—
ताकि अतीत की छाया नए सपनों पर भारी न पड़े।

एक छोटी सी मेज।
फिर एक कोना।
फिर एक पहचान।

वह काग़ज़ नहीं लिखता था—
वह ज़रूरत लिखता था।

भरोसे का बिज़नेस

एक दिन एक स्टार्टअप वाला आया।
थका हुआ।
टूटा हुआ।

“लोग भरोसा नहीं करते,” उसने कहा।

अभिषेक ने अपनी डायरी खोली।
पुराना सबक पढ़ा—

“भूख वहीं मिटती है,
जहाँ भरोसा होता है।”

उसने सलाह दी—
“विज्ञापन नहीं,
कहानियाँ दिखाइए।”

और वही हुआ—
कंपनी चल पड़ी।

फुटपाथ से 60वीं मंज़िल तक

सालों बाद…

मुंबई की 60वीं मंज़िल।
शानदार दफ़्तर।
महंगा सूट।

पर अंदर वही रोशन था—
जो सड़क को पढ़ना जानता था।

एक दिन वही बुजुर्ग—
रहीम चाचा—
उससे मिलने आए।

“डायरी भर दी तुमने,”
उन्होंने कहा।

कहानी आगे बढ़ती है

अभिषेक ने एक लाइब्रेरी खोली।
फुटपाथ के बच्चों के लिए।

और एक दिन
एक और लड़का
उसी तरह बैठा मिला।

अभिषेक ने मुस्कुरा कर कहा—
“मैं वही हूँ,
जो कभी तुम्हारी जगह बैठा था।”

और उसने वही पुरानी डायरी
उस बच्चे को दे दी।

क्योंकि…

कुछ कहानियाँ
खत्म नहीं होतीं।

वे आगे बढ़ती हैं—
एक हाथ से दूसरे हाथ तक।

और हर बार
एक तारा
फिर से चमकने लगता है।