शहीद बेटे की माँ के साथ अन्याय | पुलिस और MLA की योजना पर एक फौजी का जवाब | New Hindi Story
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शहीद की माँ
गाँव के बाहरी छोर पर, जहाँ पक्की सड़क खत्म होकर कच्चे रास्ते में बदल जाती थी, वहीं फैले हुए थे कुछ छोटे-छोटे खेत। उन्हीं खेतों के बीच एक पुरानी सी झोपड़ी थी। मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छत और सामने तुलसी का चौरा। उसी झोपड़ी में रहती थीं सरला देवी।
सरला देवी की उम्र लगभग सत्तर वर्ष थी। चेहरा झुर्रियों से भरा, पर आँखों में अटूट साहस। उनकी दुनिया बहुत छोटी थी—एक खेत, एक झोपड़ी और यादों से भरा एक दिल।
उनका एक बेटा था—सूरज।
सूरज बचपन से ही तेज, साहसी और देशभक्त था। गाँव के लोग कहते थे—“यह लड़का बड़ा होकर फौजी बनेगा।” और सचमुच, वह भारतीय सेना में भर्ती हुआ। माँ ने विदा करते समय उसके माथे पर तिलक लगाया था।
“माँ, मैं देश की रक्षा करूँगा,” सूरज ने कहा था।
“जा बेटा, माँ भारती की सेवा करना,” सरला देवी ने गर्व से कहा था।
कुछ वर्षों बाद, सीमा पर दुश्मनों से लड़ते हुए सूरज शहीद हो गया।
सरकार ने उसकी शहादत के सम्मान में सरला देवी को गाँव के बाहर की वह जमीन दी थी। वही जमीन अब उनकी जिंदगी का सहारा थी। वही खेत, वही फसलें, वही मिट्टी—सब कुछ सूरज की आखिरी निशानी थे।

लालच की नजर
उसी इलाके का विधायक था राघव प्रताप सिंह।
राघव प्रताप सिंह राजनीति में ताकतवर था। पैसा, पुलिस और प्रभाव—सब कुछ उसके पास था। एक दिन वह अपने मुंशी के साथ उसी सड़क से गुजर रहा था।
मुंशी बोला,
“एमएलए साहब, यह जगह पेट्रोल पंप के लिए बहुत बढ़िया है। हाईवे पास में है, आसपास कोई पंप नहीं। नोट छापने की मशीन बन जाएगी।”
राघव की नजर सरला देवी के खेत पर टिक गई।
“जमीन किसकी है?”
“पहले सरकारी थी, लेकिन अब एक बूढ़ी औरत के नाम है। उसका बेटा आर्मी में शहीद हुआ था।”
राघव हँसा—
“सरकारी जमीन हो या किसी बूढ़ी की, यहाँ पंप बनेगा तो मेरा।”
मीठी बातों का जाल
अगले दिन राघव प्रताप, अपने कुछ लोगों के साथ सरला देवी की झोपड़ी पहुँचा।
“नमस्ते माँ जी,” उसने मीठी आवाज में कहा।
सरला देवी ने सिर उठाया—
“कौन बेटा?”
“मैं आपका विधायक हूँ। आपसे जरूरी बात करनी थी।”
“कहो बेटा।”
राघव ने बनावटी सहानुभूति दिखाते हुए कहा—
“माँ जी, आप इस उम्र में यहाँ अकेली रहती हैं। शहर चलिए मेरे साथ। अच्छा घर दिलाऊँगा, राशन दूँगा।”
सरला देवी समझ चुकी थीं।
“सीधी बात करो बेटा।”
राघव बोला—
“सरकार यहाँ पेट्रोल पंप बनाना चाहती है। लोगों की सुविधा के लिए। आप जमीन छोड़ दें।”
सरला देवी की आँखें लाल हो गईं।
“यह जमीन मुझे सरकार ने मेरे शहीद बेटे की शहादत के बदले दी है। यह मेरे सूरज की आखिरी निशानी है। मैं इसे नहीं छोड़ूँगी।”
राघव की मिठास खत्म हो गई।
“एक हफ्ते में जगह खाली कर दो, वरना अच्छा नहीं होगा।”
“दफा हो जाओ,” सरला देवी ने डटकर कहा।
साजिश
राघव सीधे थाना पहुँचा।
“इंस्पेक्टर राठौर,” उसने कुर्सी पर बैठते हुए कहा, “एक काम है। जमीन खाली करवानी है। सबूत नहीं बचना चाहिए।”
राठौर मुस्कुराया—
“साहब, कल तक काम हो जाएगा।”
फसल की बर्बादी
हफ्ता पूरा होने से पहले ही पुलिस और गुंडे ट्रैक्टर लेकर खेत में घुस गए।
सरला देवी चिल्लाईं—
“भगवान के लिए मेरी फसल मत बर्बाद करो!”
पर किसे परवाह थी? हरी-भरी फसल रौंद दी गई।
फिर आदेश आया—
“झोपड़ी में आग लगा दो।”
उसी समय दूर से एक आवाज गूँजी—
“रुक जाओ!”
दोस्ती का फर्ज
वह था विक्रम—सूरज का साथी सैनिक।
सूरज की शहादत के बाद उसने सरला देवी से वादा किया था—
“माँ जी, जब तक मैं हूँ, आपको कोई हाथ नहीं लगाएगा।”
विक्रम ने इंस्पेक्टर को ललकारा—
“शर्म नहीं आती? वर्दी इसलिए पहनी है कि जुल्म करो?”
राठौर गुर्राया—
“यहाँ से दफा हो जा, वरना तेरे साथ भी यही होगा।”
विक्रम बोला—
“मैं भारतीय सेना का सिपाही हूँ। अन्याय के सामने नहीं झुकूँगा।”
पुलिस ने उसे पकड़ लिया। बंदूक उसकी छाती पर तान दी गई।
“आखिरी इच्छा?” राठौर ने हँसते हुए पूछा।
“एक फोन कॉल,” विक्रम ने शांत स्वर में कहा।
तूफान का आगमन
कुछ ही मिनटों में दूर से गाड़ियों की आवाज आई।
“इंडियन आर्मी जिंदाबाद!”
फौजी गाड़ियाँ आकर रुकीं। हथियारबंद जवान उतर आए। उनके साथ थे कर्नल साहब।
“किसकी हिम्मत हुई एक शहीद की माँ को तंग करने की?” कर्नल की आवाज गरजी।
राघव और राठौर के चेहरे पीले पड़ गए।
न्याय
कर्नल ने कहा—
“पहले ये दोनों इस खेत में काम करेंगे। इन्हें पता चले फसल उगाना क्या होता है।”
गाँव वाले इकट्ठा हो गए।
“भारत माता की जय!”
“इंडियन आर्मी जिंदाबाद!”
राघव और राठौर को सार्वजनिक रूप से माफी माँगनी पड़ी।
सरला देवी की झोपड़ी दोबारा बनाई गई। खेत की जुताई सेना ने खुद करवाई।
विक्रम ने माँ जी से कहा—
“अब कोई आपकी जमीन की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखेगा।”
सरला देवी ने आसमान की ओर देखा—
“देख सूरज, तेरे साथी आज भी तेरे वादे निभा रहे हैं।”
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