सोच की अमीरी
शहर की सुबह हमेशा की तरह शोर से भरी थी — हॉर्न, लोगों की भागदौड़, ऊँची इमारतें और तेज रफ्तार जिंदगी।
लेकिन उसी शहर के एक छोटे से फ्लैट में खामोशी चीख रही थी।
सोफे पर बैठी थी नैना — महंगी साड़ी, हाथ में मोबाइल, चेहरे पर झुंझलाहट।
सामने खड़ा था उसका पति आरव — साधारण कपड़े, शांत आंखें, और वही धैर्य जिसे नैना अब कमजोरी समझने लगी थी।
“कब तक ऐसे ही जिएंगे हम?”
नैना की आवाज तेज थी।
“हर महीने तंगी, हर खर्च गिनकर करना… मैं थक गई हूं।”
आरव ने धीरे कहा,
“सब ठीक हो जाएगा नैना, थोड़ा वक्त—”
“बस!”
नैना चिल्लाई,
“हर साल यही सुन रही हूं। वक्त, सब्र, भरोसा… पर कुछ बदलता नहीं।”
वह उठी, अलमारी से फाइल लाई और टेबल पर पटक दी।
“तलाक के पेपर हैं। साइन कर दो।”
कमरे की हवा भारी हो गई।
आरव ने पहली बार गहराई से उसे देखा।
“तलाक क्यों?”

नैना हंसी — ठंडी, कड़वी।
“क्योंकि मैं गरीब आदमी की बीवी बनकर नहीं जी सकती।”
कुछ पल खामोशी रही।
आरव बोला,
“गरीबी पैसों की नहीं… सोच की होती है।”
नैना ने मुंह फेर लिया।
उसे यह लाइन सिर्फ बहाना लगी।
कुछ हफ्तों बाद अदालत में रिश्ता कागजों पर खत्म हो गया।
एक छुपा सच
उसी रात शहर के सबसे बड़े होटल की ऊपरी मंजिल पर बिजनेस मीटिंग चल रही थी।
काले सूट में बैठा था वही आरव।
सामने बड़े निवेशक बैठे थे।
“सर, अब आपकी असली पहचान सामने लाने का समय है,”
एक ने कहा।
आरव ने खिड़की से शहर की रोशनी देखी।
“अभी नहीं। पहले उसे अपने फैसले का जवाब खुद मिलने दो।”
उसकी आंखों में बदला नहीं, बस इंतजार था।
नैना की नई जिंदगी
तलाक के बाद नैना की जिंदगी चमकने लगी।
ब्रांडेड कपड़े, महंगे रेस्टोरेंट, इंस्टाग्राम पर तस्वीरें — Living My Best Life।
वह एक बड़ी रियल एस्टेट कंपनी में HR मैनेजर बन गई।
लोग उसके आगे-पीछे घूमते।
दोस्तों से कहती,
“मैं किसी गरीब आदमी के साथ सड़ने के लिए नहीं बनी थी।”
फिर उसकी जिंदगी में आया कबीर — बड़ा बिल्डर, महंगी कारें, बड़े संपर्क।
शादी की बातें शुरू हो गईं।
लेकिन कबीर का प्यार नहीं, हिसाब था।
एक दिन पता चला उसकी कंपनी कर्ज में डूबी है।
फिर इनकम टैक्स रेड।
और अचानक कबीर दूर हो गया।
नैना ने पहली बार सोचा —
“क्या मैंने इंसान को पैसे से तौला?”
सच्चाई का सामना
शहर की सबसे बड़ी बिजनेस मीटिंग में घोषणा हुई:
“कृपया स्वागत करें — शहर के सबसे बड़े निवेशक… आरव मल्होत्रा।”
तालियां गूंजी।
नैना का दिल रुक गया।
स्टेज पर आया वही आरव —
पर अब वह साधारण नहीं था।
सूट, आत्मविश्वास, और आंखों में ठंडा संतुलन।
उसने नैना को देखा —
बस एक पल —
जैसे पहचानता ही न हो।
मीटिंग में वह बोला:
“हम उन लोगों में निवेश करते हैं जो सोच से अमीर हों।”
हर शब्द नैना के दिल में चुभ गया।
गिरावट और सीख
नैना की कंपनी डूबने लगी।
नौकरी गई।
कबीर चला गया।
दोस्त गायब हो गए।
एक हादसे के बाद अस्पताल में अकेली लेटी नैना ने समझा:
पैसा भीड़ देता है, साथ नहीं।
उसने छोटा HR कंसल्टेंसी ऑफिस शुरू किया।
पहली बार मेहनत सीखी।
पहली बार लोगों की नियत देखी।
फिर एक मुलाकात
कई महीनों बाद उसने आरव को ईमेल लिखा:
“मैं माफी नहीं मांग रही।
बस मान रही हूं — तुम सही थे, मैं गलत।”
अगले दिन आरव ने मीटिंग फिक्स की।
एक सादे कैफे में दोनों मिले।
नैना बोली,
“मैंने तुम्हें गरीब समझकर छोड़ा…
असल में मैं अंदर से गरीब थी।”
आरव शांत था।
“मैं उस रिश्ते में वापस नहीं जा सकता
जहां मेरी कीमत बैंक बैलेंस से तय होती थी।”
नैना की आंखें भर आईं।
आरव आगे बोला,
“लेकिन अब तुम काबिल हो।
इसलिए तुम्हारी कंपनी के साथ काम करूंगा।”
नैना रो पड़ी।
पहली बार उसे उसके काम की कीमत मिली थी।
जाते-जाते उसने पूछा,
“तुमने सच पहले क्यों नहीं बताया?”
आरव मुस्कुराया:
“मैं जानना चाहता था
तुम मुझसे प्यार करती हो
या मेरी हैसियत से।”
खामोशी ने जवाब दे दिया।
अंतिम सच
कुछ रिश्ते वापस नहीं आते।
लेकिन कुछ लोग जिंदगी भर की सीख बन जाते हैं।
नैना ने आरव को खो दिया —
पर खुद को पा लिया।
और आरव जीत गया —
बिना बदला लिए।
News
देहरादून की पुकार: एक बेटी के इंसाफ की कहानी
देहरादून की पुकार: एक बेटी के इंसाफ की कहानी देहरादून की सुबह थी, लेकिन परेड ग्राउंड के बाहर माहौल सामान्य…
Ankita Bhandari को इंसाफ दिलाने के लिए देहरादून में बड़ी महापंचायत, मां-बाप किस मांग पर अड़े ?
देहरादून की पुकार: एक बेटी के इंसाफ की कहानी देहरादून की सुबह थी, लेकिन परेड ग्राउंड के बाहर माहौल सामान्य…
एसी ठीक करने गया था लड़का, विधवा करोड़पति मालकिन के साथ जो हुआ इंसानियत हिल गई…
दिल की ठंडक हल्की बारिश हो रही थी। बादल ऐसे झुके थे जैसे आसमान खुद किसी दर्द का बोझ उठाए…
आज उसकी कंपनी की दसवीं सालगिरह थी।
औकात कपड़ों से नहीं, संस्कारों से बनती है मुंबई की शाम सिंदूरी रोशनी में नहाई हुई थी। कांच और स्टील…
नेहा रसोई में खड़ी थी। दाल उबल रही थी, पर उसका ध्यान दरवाज़े पर था। हर आहट पर उसका दिल धड़क उठता।
खामोशी की दीवारें सुबह का समय था। गली में बच्चों की स्कूल बस का इंतज़ार, दूध वाले की घंटी, मंदिर…
खामोशी की दीवारें
खामोशी की दीवारें सुबह का समय था। गली में बच्चों की स्कूल बस का इंतज़ार, दूध वाले की घंटी, मंदिर…
End of content
No more pages to load





