8 साल बाद ट्रेन में मिली तलाकशुदा IPS पत्नी, फिर जो हुआ उसने सब बदल दिया… | Emotional Story

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“बारिश के उस आख़िरी दिन”

मुंबई की सुबह हमेशा शोर से शुरू होती है—लोकल ट्रेन की सीटी, बसों की आवाज़, सड़कों पर भागते लोगों की रफ्तार। लेकिन उस दिन बारिश कुछ अलग थी। जैसे आसमान भी किसी को रोकना चाहता हो।

आरव खिड़की के पास खड़ा था। हाथ में चाय का कप ठंडा हो चुका था। सामने सड़क पर पानी जमा था और लोग छतरियों के नीचे भाग रहे थे। उसकी नज़र बार-बार मोबाइल पर जा रही थी। स्क्रीन पर आख़िरी मैसेज अब भी चमक रहा था—

“आज मिल सकते हो? शायद आख़िरी बार।” – नंदिनी

यह वही नंदिनी थी जिसके साथ उसने पाँच साल बिताए थे। पाँच साल—जो दोस्ती से शुरू हुए, प्यार तक पहुँचे, और फिर अचानक सवालों में बदल गए।

आरव ने गहरी साँस ली। उसने जवाब लिखा—“कहाँ?”

कुछ ही सेकंड में रिप्लाई आया—“वही पुराना कैफ़े… सी-फेस वाला।”

वही कैफ़े जहाँ उन्होंने पहली बार एक-दूसरे को अपने सपनों के बारे में बताया था।


कैफ़े समुद्र के किनारे था। बाहर लहरें तेज़ थीं। हवा में नमक और बारिश की मिली-जुली खुशबू थी। आरव पहले पहुँचा। उसने वही कोना चुना जहाँ वे हमेशा बैठते थे।

कुछ मिनट बाद दरवाज़ा खुला। नंदिनी अंदर आई। सफ़ेद कुर्ता, भीगे बाल, और चेहरे पर वही शांति जो कभी उसे आकर्षित करती थी।

दोनों कुछ पल चुप रहे।

“कैसी हो?” आरव ने पूछा।

“ठीक,” नंदिनी ने धीमे से कहा। “तुम?”

“चल रहा है।”

यह ‘चल रहा है’ उनके रिश्ते की तरह था—न पूरी तरह खत्म, न पूरी तरह जिंदा।

वेटर ने कॉफी रखी। भाप उठी। लेकिन बात शुरू नहीं हुई।

आख़िर नंदिनी ने कहा, “मुझे दिल्ली जाना है।”

आरव ने सिर उठाया। “कब?”

“अगले हफ्ते। जॉब कन्फर्म हो गया है।”

आरव जानता था कि वह पिछले एक साल से कोशिश कर रही थी। बड़ी कंपनी, बेहतर पैकेज, बड़ा मौका। उसने मुस्कुराने की कोशिश की।

“कॉन्ग्रैचुलेशन्स।”

नंदिनी ने उसकी आँखों में देखा। “तुम खुश नहीं हो।”

“मैं हूँ,” उसने कहा, “बस… सोचा नहीं था इतना जल्दी।”

नंदिनी ने कप नीचे रखा। “आरव, हमने इस बारे में बात की थी। मैं यहाँ रुक नहीं सकती थी।”

“मैंने रोका कब?” उसके शब्द थोड़े सख्त हो गए।

“रोका नहीं… लेकिन कभी साथ आने की बात भी नहीं की।”

यह वही बात थी जो महीनों से उनके बीच दीवार बनी हुई थी। आरव मुंबई में अपने पिता की छोटी सी बुकस्टोर संभालता था। वह उसे छोड़ना नहीं चाहता था। नंदिनी कॉर्पोरेट दुनिया में आगे बढ़ना चाहती थी।

दोनों सही थे। और शायद दोनों गलत भी।

“हर सपना एक शहर में नहीं जीया जा सकता,” नंदिनी ने कहा।

“और हर रिश्ता करियर की तरह प्लान नहीं होता,” आरव ने जवाब दिया।

चुप्पी फिर से उनके बीच आ बैठी।

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कुछ साल पहले…

जब वे कॉलेज में मिले थे, तब जिंदगी आसान थी। कैंटीन की चाय, देर रात की बातें, भविष्य के सपने। नंदिनी हमेशा कहती—“मैं बड़ी कंपनी में काम करूँगी।” और आरव कहता—“मैं किताबों के बीच रहूँगा।”

तब दोनों को लगता था कि प्यार सब संभाल लेगा।

लेकिन प्यार को भी जगह चाहिए—और कभी-कभी समझ भी।


कैफ़े में वापस…

“मैं चाहती थी कि तुम कहो—चलो साथ चलते हैं,” नंदिनी ने पहली बार सीधे कहा।

आरव ने आँखें झुका लीं। “और पापा? दुकान? मेरी जिम्मेदारियाँ?”

“मैंने कभी नहीं कहा कि उन्हें छोड़ दो। बस… कोशिश तो कर सकते थे।”

आरव के भीतर कुछ टूटा। “तुम्हें लगता है मैं कोशिश नहीं कर रहा था?”

“तुम कोशिश कर रहे थे… लेकिन मेरे साथ नहीं, अपनी जगह पर।”

यह सच था। वह अपने संसार में सुरक्षित था। बदलाव से डरता था। उसे लगता था नंदिनी समझ जाएगी।

“तो अब?” उसने पूछा।

नंदिनी की आँखें नम थीं, लेकिन आवाज़ स्थिर। “अब मैं जा रही हूँ। और मैं चाहती हूँ कि हम एक-दूसरे को दोष दिए बिना विदा लें।”

“विदा?” शब्द भारी था।

“हाँ। क्योंकि आधे रिश्ते ज्यादा दर्द देते हैं।”

बारिश तेज़ हो गई। बाहर लहरें दीवार से टकरा रही थीं।

आरव ने पहली बार महसूस किया कि शायद उसने कभी खुलकर नहीं कहा—“रुको।”

उसने धीरे से पूछा, “अगर मैं कहूँ… कि मैं कोशिश करूँगा?”

नंदिनी ने उसे देखा। “कोशिश मेरे जाने के डर से हो रही है या मेरे साथ भविष्य के लिए?”

वह जवाब नहीं दे पाया।


अगले कुछ दिन दोनों ने कम बात की। लेकिन भीतर तूफान था।

आरव ने पहली बार दुकान को ध्यान से देखा। किताबों की महक, पुराने ग्राहक, पापा की थकी आँखें। उसने सोचा—क्या वह सच में यहाँ बंधा है, या बस आदत है?

उस रात उसने पापा से बात की।

“अगर मैं कुछ समय के लिए दिल्ली जाऊँ तो?”

पिता ने चौंककर देखा। “नंदिनी के लिए?”

आरव चुप रहा।

पिता मुस्कुराए। “बेटा, जिंदगी में दो चीज़ें वापस नहीं आतीं—समय और सही इंसान। दुकान मैं संभाल लूँगा। तुम अपना फैसला डर से मत लेना।”

यह पहली बार था जब किसी ने उसे अनुमति नहीं, भरोसा दिया।


उधर नंदिनी अपने कमरे में पैकिंग कर रही थी। हर किताब, हर फोटो में यादें थीं। उसने खुद से पूछा—क्या वह सच में जाना चाहती है? या बस यह साबित करना चाहती है कि वह अकेले आगे बढ़ सकती है?

उसने मोबाइल उठाया। आरव का नाम स्क्रीन पर था। उसने कॉल नहीं किया।


जाने का दिन आ गया।

एयरपोर्ट पर भीड़ थी। अनाउंसमेंट की आवाज़ें गूंज रही थीं। नंदिनी अकेली खड़ी थी। उसने सोचा था आरव नहीं आएगा।

लेकिन तभी पीछे से आवाज़ आई—“फ्लाइट मिस मत कर देना।”

वह मुड़ी। आरव था।

“तुम…?”

“हाँ। और इस बार ‘चल रहा है’ नहीं कहूँगा।”

नंदिनी की आँखों में सवाल था।

आरव ने गहरी साँस ली। “मैं दिल्ली आ रहा हूँ। अभी नहीं… लेकिन कुछ महीनों में। ऑनलाइन स्टोर शुरू करूँगा। पापा ने हाँ कहा है।”

“मेरे लिए?” उसने पूछा।

“हमारे लिए,” उसने सुधारा। “अगर तुम अभी भी चाहो।”

नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले। “तुम्हें पता है मैं डर रही हूँ?”

“मैं भी,” उसने कहा। “लेकिन इस बार डर के बावजूद कोशिश करेंगे।”

कुछ पल दोनों चुप रहे। फिर नंदिनी ने कहा—“अगर कभी लगे कि हम खुद को खो रहे हैं, तो वादा करो सच बोलेंगे।”

“वादा।”

अनाउंसमेंट हुआ। बोर्डिंग शुरू हो गई।

नंदिनी ने उसे गले लगाया। “यह विदाई नहीं है, है ना?”

“नहीं,” आरव मुस्कुराया। “यह शुरुआत है।”


तीन महीने बाद…

दिल्ली की सर्द सुबह थी। नंदिनी ऑफिस के लिए तैयार हो रही थी जब दरवाज़े की घंटी बजी।

दरवाज़ा खोला—सामने आरव था। हाथ में सूटकेस और एक छोटा सा बोर्ड—

“आरव्स बुक्स – अब ऑनलाइन।”

नंदिनी हँस पड़ी। “तुम सच में आ गए।”

“हाँ। और इस बार बिना आख़िरी बार के।”

दोनों ने मिलकर छोटा सा फ्लैट सजाया। झगड़े भी हुए—किराए को लेकर, काम के समय को लेकर, थकान को लेकर। लेकिन इस बार वे चुप नहीं रहे।

एक रात नंदिनी ने कहा, “आज ऑफिस में प्रमोशन मिला।”

आरव ने खुशी से उसे गले लगाया। “मुझे तुम पर गर्व है।”

“और तुम्हारा स्टोर?” उसने पूछा।

“धीरे चल रहा है… लेकिन चल रहा है। और इस बार सच में चल रहा है।”

दोनों हँसे।


सालों बाद…

समुद्र के किनारे वही कैफ़े। इस बार दिल्ली में यमुना किनारे एक छोटा सा रेस्टोरेंट।

आरव और नंदिनी आमने-सामने बैठे थे। उनके बीच एक छोटा बच्चा था—आरुष।

नंदिनी ने कहा, “याद है वो आख़िरी दिन?”

आरव मुस्कुराया। “हाँ। अगर उस दिन हम सच नहीं बोलते, तो शायद आज यहाँ नहीं होते।”

नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ा। “प्यार सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है। साथ बदलने का भी है।”

आरव ने सिर हिलाया। “और कभी-कभी जाने देने का साहस ही वापस मिलने की शुरुआत बनता है।”

बारिश हल्की-हल्की फिर शुरू हो गई।

लेकिन इस बार वह किसी विदाई की नहीं, एक स्थायी साथ की गवाह थी।

कहानी खत्म नहीं हुई थी। जिंदगी में कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं। वे बस नए अध्याय में बदल जाती हैं।

और उस दिन आरव ने महसूस किया—

सही समय पर लिया गया साहसी फैसला, कई सालों की चुप्पी से ज्यादा ताकतवर होता है।