अनुराधा बाली हत्या मामला | यह हुआ अनुराधा बाली उर्फ़ फ़िज़ा का हाल\

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अनुराधा बाली उर्फ़ फिजा की रहस्यमयी मौत: एक प्रेम, राजनीति और आत्महत्या की कहानी

हरियाणा की धरती पर 1971 में जन्मी अनुराधा बाली, एक साधारण परिवार की सबसे बड़ी बेटी थी। उनके पिता धर्मपाल मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज में अधिकारी थे। अनुराधा ने केंद्रीय विद्यालय से पढ़ाई की और पंजाब यूनिवर्सिटी से लॉ की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के दौरान वे यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में भी सक्रिय थीं, तेजतर्रार, आत्मविश्वासी और महत्वाकांक्षी अनुराधा ने जल्द ही पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में क्रिमिनल लॉयर के रूप में पहचान बना ली।

1998 में अनुराधा ने अपने पड़ोसी बब्बर से प्रेम विवाह किया। बब्बर ट्रांसपोर्ट कारोबारी था, मगर आर्थिक रूप से कमजोर था। शादी के कुछ ही महीनों में रिश्ते में तनाव आ गया—बब्बर का नशे की लत, अनुराधा को रोकना-टोकना, और अंततः दोनों का तलाक हो गया। इस झटके के बाद अनुराधा कुछ समय डिप्रेशन में रहीं, वकालत से दूर हो गईं। लेकिन परिवार के सहयोग से वे दोबारा अपने करियर में लौटीं और 2004 तक पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की टॉप क्रिमिनल लॉयर बन गईं। 2005 में उन्हें हरियाणा सरकार की असिस्टेंट एडवोकेट जनरल नियुक्त किया गया।

इसी दौरान अनुराधा की जिंदगी में प्रवेश हुआ चंद्रमोहन का। चंद्रमोहन, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बड़े बेटे, खुद एक बड़े राजनेता थे। 2004 में पंचकूला के एक जूस शॉप पर दोनों की पहली मुलाकात हुई। चंद्रमोहन पहले से शादीशुदा थे, उनके दो बच्चे थे, लेकिन उनका वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण था। अनुराधा और चंद्रमोहन की दोस्ती धीरे-धीरे गहरे प्रेम में बदल गई। दोनों ही ऊँचे राजनीतिक पदों पर थे, इसलिए उनका रिश्ता छुपा रहा।

2008 के नवंबर में हरियाणा के उपमुख्यमंत्री चंद्रमोहन अचानक गायब हो गए। साथ ही अनुराधा बाली भी लापता हो गईं। पूरे राज्य में सनसनी फैल गई, मीडिया में खबरें छा गईं। 7 दिसंबर 2008 को दोनों एक साथ मीडिया के सामने आए। चंद्रमोहन ने घोषणा की कि वे अब चांद मोहम्मद हैं, अनुराधा अब फिजा मोहम्मद हैं—दोनों ने इस्लाम धर्म अपनाकर मेरठ में निकाह कर लिया था। यह कदम उठाने के पीछे हिंदू मैरिज एक्ट की बाध्यता थी, क्योंकि चंद्रमोहन अपनी पहली पत्नी को तलाक नहीं दे सकते थे।

इनकी शादी और धर्म परिवर्तन ने पूरे प्रदेश में तूफान मचा दिया। मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने चंद्रमोहन को उपमुख्यमंत्री पद से हटा दिया, फिजा को असिस्टेंट एडवोकेट जनरल के पद से बर्खास्त कर दिया गया। भजनलाल ने अपने बेटे को परिवार और जायदाद से बेदखल कर दिया। सत्ता, परिवार, इज्जत सब कुछ खोने के बावजूद चंद्रमोहन ने मीडिया के सामने कहा—प्यार के लिए सब कुछ कुर्बान किया है, कोई पछतावा नहीं।

मगर यह प्रेम कहानी जल्दी ही बिखरने लगी। शादी के कुछ ही दिनों बाद चंद्रमोहन फिजा के मोहाली स्थित घर से गायब हो गए। फिजा ने मीडिया को बताया कि उनके पति को उनके भाई कुलदीप विश्नोई के लोगों ने किडनैप कर लिया है। पुलिस ने जांच की, चंद्रमोहन दिल्ली में मिले। फोन पर दोनों की बातचीत में तनाव साफ था। चंद्रमोहन ने कहा—”अब जब मन करेगा तभी लौटूंगा।” फिजा ने खुदकुशी की कोशिश की, 25 नींद की गोलियाँ खा लीं, मगर समय रहते बचा ली गईं। पुलिस ने उनके खिलाफ आत्महत्या की कोशिश का केस दर्ज किया।

इसके बाद चंद्रमोहन ने मीडिया में बयान दिया कि उन्हें अपनी पहली पत्नी और बच्चों की बहुत याद आ रही है, वे घर लौटना चाहते हैं। फिजा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि चंद्रमोहन ने उन्हें फँसाया, इस्तेमाल किया और छोड़ दिया। फिजा ने चंद्रमोहन के खिलाफ धोखा, धमकी, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की शिकायत दर्ज कराई। मगर चंद्रमोहन इंडिया छोड़कर लंदन चले गए। हरियाणा पुलिस ने उन्हें सभी मामलों में क्लीन चिट दे दी।

14 मार्च 2009 को, फोन पर चांद मोहम्मद ने तीन बार “तलाक” कहकर फिजा को छोड़ दिया। शादी के सिर्फ तीन महीने बारह दिन बाद यह प्रेम कहानी खत्म हो गई। फिजा मीडिया में बार-बार बयान देती रहीं कि उन्हें चंद्रमोहन और उनके परिवार से धमकियाँ मिल रही हैं, मगर कानूनी पुष्टि कभी नहीं हुई।

चंद्रमोहन ने 28 जुलाई 2009 को हिंदू धर्म में “घर वापसी” की और फिर से चंद्रमोहन बन गए। अपनी पत्नी सीमा और बच्चों के साथ रहने लगे, परिवार में पुनः स्वीकार कर लिए गए। राजनीति में भी उनकी वापसी हुई, 2024 में पंचकूला से विधायक चुने गए।

उधर, फिजा की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। परिवार ने भी उनका शुद्धिकरण कराया, वे फिर से अनुराधा बाली बनीं। मगर डिप्रेशन, अकेलापन, रिश्तों में टूटन, और सामाजिक तिरस्कार ने उनकी मानसिक स्थिति बिगाड़ दी। 2010 में माँ की मौत, अंकल से झगड़ा, पड़ोसियों से विवाद, पुलिस की दखल—सबने उन्हें और भी अकेला कर दिया। राजनीति में भी फिजा-ए-हिंद नाम की पार्टी बनाकर वे असफल रहीं।

6 अगस्त 2012 को अनुराधा की मौत की खबर आई। पड़ोसियों ने घर से बदबू आने की शिकायत की थी। पुलिस ने दरवाजा तोड़कर देखा—बेड पर अनुराधा की डीकंपोज बॉडी पड़ी थी, आसपास बियर की बोतलें, सिगरेट, प्लेट में पकोड़े। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रैट पॉइजन (चूहा मारने की दवा) मिला। खाने-पीने की चीजों में कोई जहर नहीं था, यानी उन्होंने खुद जहर खाकर आत्महत्या की थी। पुलिस ने इसे “अननेचुरल डेथ” मानते हुए केस बंद कर दिया।

मगर अनुराधा के घर से 92.8 लाख रुपये, 1.5 किलो सोना, 800 ग्राम चांदी की ज्वेलरी मिली। बैंक लॉकर में 1.05 करोड़ कैश, गोल्ड-डायमंड ज्वेलरी। पुलिस ने जांच की, सब कुछ उनकी वकालत की कमाई थी, कोई गैरकानूनी गतिविधि नहीं। सारी संपत्ति तीनों बहनों में बराबर बाँट दी गई।

अनुराधा अक्सर कहती थी—”कभी भी मेरी हत्या हो सकती है।” वे चंद्रमोहन और उनके परिवार पर धमकी देने के आरोप लगाती थीं, मगर पुलिस को हत्या का कोई सबूत नहीं मिला। मार्च 2013 में उनके करीबी ने सीबीआई जांच की मांग की, मगर कोई नया सबूत नहीं मिला और केस बंद कर दिया गया।

आज भी लोग अनुराधा की मौत को रहस्यमयी मानते हैं। एक महत्वाकांक्षी वकील, एक बागी प्रेमिका, एक असफल राजनेता—अनुराधा बाली की कहानी प्रेम, राजनीति, सत्ता और अकेलेपन के बीच उलझी हुई है। चंद्रमोहन ने परिवार, सत्ता और इज्जत वापस पा ली, मगर अनुराधा गुमनामी और तिरस्कार में खो गईं।

समाप्ति:

अनुराधा बाली उर्फ़ फिजा की मौत आज भी सवालों में घिरी है। क्या यह आत्महत्या थी या हत्या? क्या राजनीति और प्रेम का ऐसा अंत होना चाहिए? क्या समाज ऐसे मामलों में कभी न्याय कर पाता है? अनुराधा की कहानी हमें सिखाती है—सत्ता, प्रेम और समाज का संतुलन बिगड़ जाए तो इंसान कितना अकेला और असहाय हो सकता है।
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