भाभी 3 साल बाद ससुराल लौटी तो देवर के बारे में सुनकर फूट-फूट कर रोने लगी और फिर||
पवित्र रिश्ता: एक देवर का /बलिदान/ और वर्दी का सपना
प्रस्तावना: समाज का नजरिया और रिश्तों की पावनता
अक्सर समाज हर रिश्ते को शक की निगाह से देखता है, लेकिन कुछ रिश्ते इतने पवित्र होते हैं कि उनके सामने दुनिया की हर /गंदगी/ छोटी पड़ जाती है। यह कहानी बिहार के मोतिहारी जिले की है, जहाँ एक देवर ने अपनी भाभी के सपनों के लिए अपनी ही नजरों में /चोर/ बनना स्वीकार किया, ताकि उसकी भाभी समाज में सिर उठाकर जी सके।
अध्याय 1: आरती के टूटे सपने और एक नई शुरुआत
मोतिहारी के एक छोटे से गांव में आरती नाम की लड़की रहती थी। वह बचपन से ही निडर थी और उसका एकमात्र सपना था—’पुलिस अफसर’ बनना। खाकी वर्दी का रुतबा और देश की सेवा का जुनून उसकी रगों में दौड़ता था। लेकिन गरीबी ने उसके पंख काट दिए। पिता ने हाथ खड़े कर दिए और उसकी शादी 25 किलोमीटर दूर रहने वाले राजू से कर दी।
शादी के बाद आरती एक आदर्श बहू बनकर रहने लगी, लेकिन उसकी आँखों की चमक खो चुकी थी। उसका पति राजू एक सीधा-साधा मजदूर था, जिसे आरती के सपनों से ज्यादा घर की दाल-रोटी की चिंता थी।
अध्याय 2: जगन—एक देवर नहीं, एक ‘लक्ष्मण’
आरती का देवर, जगन, अपनी भाभी के चेहरे की खामोश उदासी को भांप गया। एक दिन उसने एकांत में पूछ ही लिया, “भाभी, आपकी आँखों में वो खुशी क्यों नहीं है जो एक नई दुल्हन में होती है?”
आरती ने पहले तो टालना चाहा, लेकिन जगन के बार-बार पूछने पर उसने अपने दिल का राज खोल दिया। उसने बताया कि वह पुलिस बनना चाहती थी, लेकिन अब यह नामुमकिन है। जगन ने मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी, सपने देखे जाते हैं पूरे करने के लिए, दबाने के लिए नहीं। मैं आपका साथ दूंगा।”
अध्याय 3: एक ‘झूठी’ लड़ाई और सपनों की उड़ान
जगन जानता था कि घर पर रहकर आरती की पढ़ाई मुमकिन नहीं है। उसने एक मास्टर प्लान बनाया। उसने आरती को उकसाया कि वह एक छोटी सी बात पर घर में झगड़ा करे। झगड़ा इतना बढ़ा कि राजू ने गुस्से में आरती पर हाथ उठा दिया और आरती रूठकर अपने मायके चली गई।
यह सब जगन की योजना का हिस्सा था। वह चोरी-छिपे मायके पहुँचा और आरती के पिता को सारी सच्चाई बताई। उसने कहा, “भाभी शहर जाकर पढ़ाई करेंगी। आधा खर्चा आप उठाएं, आधा मैं दूंगा।” जगन ने खुद पार्ट-टाइम काम शुरू किया और घर के खर्चों में से पैसे चुराने लगा ताकि भाभी की कोचिंग की फीस भर सके।
अध्याय 4: /चोरी/ का इल्जाम और 3 साल की तपस्या
शहर में आरती दिन-रात मेहनत कर रही थी। इधर ससुराल में जगन की हालत खराब थी। जब भी घर से पैसे गायब होते, बड़ा भाई राजू और सास-ससुर जगन पर /चोरी/ का आरोप लगाते। उसे ‘बेशर्म’ और ‘/चोर/’ कहा जाता। यहाँ तक कि राजू उस पर हाथ भी उठा देता, लेकिन जगन सिर्फ मुस्कुराता। वह जानता था कि यह /चोरी/ एक नेक मकसद के लिए है।
3 साल बीत गए। आरती दो बार परीक्षा में असफल हुई, लेकिन जगन ने उसका हौसला नहीं टूटने दिया। अंततः, तीसरी बार में आरती का चयन बिहार पुलिस में हो गया।
अध्याय 5: खुशियों की वापसी और /मौत/ का मातम
वर्दी का सपना पूरा होते ही आरती सबसे पहले अपनी ससुराल पहुँची। वह सबको यह खुशखबरी सुनाना चाहती थी और जगन का शुक्रिया अदा करना चाहती थी। जैसे ही उसने घर में कदम रखा, सब उसे देखकर हैरान रह गए। आरती ने सास-ससुर के पैर छुए और माफी मांगी।
लेकिन जब उसने जगन के बारे में पूछा, तो सन्नाटा छा गया। ससुर की आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, “बेटी, जगन अब इस दुनिया में नहीं रहा। एक सड़क /हादसे/ में वह हमें छोड़कर चला गया।”
अध्याय 6: शक का जहर और /पवित्र/ सच्चाई
आरती फूट-फूट कर रोने लगी। उसे इस तरह रोते देख पड़ोसियों ने बातें बनाना शुरू कर दिया। “देवर के लिए इतना विलाप? जरूर इनके बीच कोई /अवैध/संबंध/ रहा होगा।”
आरती ने जब ये बातें सुनीं, तो उसने अपनी आँखों के आंसू पोंछे और शेरनी की तरह दहाड़ कर कहा, “थू है तुम्हारी सोच पर! मेरा देवर मेरे लिए लक्ष्मण जैसा था। आज मैं जो पुलिस अफसर बनी हूँ, वह उसी ‘/चोर/’ देवर की बदौलत हूँ जिसे तुम सब ताने देते थे।” उसने पूरी सच्चाई सबके सामने रख दी। घर वालों को जब पता चला कि जगन पैसे अपनी अय्याशी के लिए नहीं, बल्कि अपनी भाभी की पढ़ाई के लिए चुराता था, तो सबके पैरों तले जमीन खिसक गई।
उपसंहार: अधूरा सपना और अमर यादें
आरती आज पुलिस की नौकरी कर रही है, लेकिन उसकी वर्दी का हर सितारा उसे जगन के /बलिदान/ की याद दिलाता है। राजू और उसके माता-पिता आज भी अपनी उस गलती पर रोते हैं कि उन्होंने अपने सबसे अनमोल बेटे को /चोर/ समझा।
सीख: हर रिश्ता /शारीरिक/ या /गंदा/ नहीं होता। कुछ रिश्ते त्याग और निस्वार्थ प्रेम की बुनियाद पर टिके होते हैं। हमें किसी के चरित्र पर उंगली उठाने से पहले उसकी सच्चाई जानने की कोशिश करनी चाहिए।
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