गुमनाम सलाम: एक “पागल” फौजी की कहानी

दोपहर के करीब दो बजे थे। मई की चिलचिलाती धूप में उत्तर भारत के एक छोटे शहर का घंटाघर चौक तप रहा था। लोग जल्दी-जल्दी अपने काम निपटाकर छांव ढूंढ रहे थे। उसी भीड़ और शोर के बीच, कूड़े के ढेर के पास एक आदमी बैठा था—उलझे बाल, महीनों से न कटी दाढ़ी, बदन पर फटे चिथड़े, और होंठों पर बड़बड़ाहट।

रोज की तरह लोग उसे देख कर नजरें फेर लेते। कुछ बच्चे हंसते, कुछ बड़े ताना मारते—
“पागल है… दूर रहो इससे।”

वह आदमी कभी हवा में हाथ उठाकर सलाम करता, कभी बुदबुदाता—
“दुश्मन सामने है… पीछे मत हटो…”

लोगों के लिए वह तमाशा था। उसके लिए शायद कोई अधूरा युद्ध।

भूख और अपमान

चौराहे पर सोहनलाल की फल की दुकान थी। सख्त मिजाज आदमी।
वह “पागल” धीरे से दुकान के पास आया और सड़े हुए केले की तरफ हाथ बढ़ाया।

सोहनलाल भड़क उठा—
“अरे हट! ग्राहकों को भगा देगा क्या?”

आदमी ठिठका… फिर अचानक सीधा खड़ा हुआ। एड़ियां मिलाईं। माथे पर हाथ रखकर जोर से बोला—
“जय हिंद, सर!”

दुकान पर खड़े लड़के हंस पड़े।
एक ने पत्थर उठाकर उसके माथे पर दे मारा।

खून की धार बह निकली।
लेकिन उसके हाथ का सलाम नहीं टूटा।

तिरंगे का सम्मान

पास लगे खंभे पर पुराना प्लास्टिक का तिरंगा लटका था, गिरने ही वाला।
वह आदमी भागकर गया, झंडे को गिरने से पहले पकड़ लिया।
अपने मैले कपड़े से साफ किया। चूमा। जेब में रख लिया।

लोग फिर हंसे—
“देखो, पागल का नया ड्रामा।”

काफिले का आगमन

तभी सायरन गूंजा।
आर्मी का काफिला शहर से गुजरने वाला था।

पुलिस ने रास्ता खाली कराया।
इंस्पेक्टर राठी ने उस आदमी को धक्का दिया—
“चल हट! बड़े साहब आ रहे हैं!”

आदमी लड़खड़ाया… फिर उसी इंस्पेक्टर को सैल्यूट मारकर बोला—
“रिपोर्टिंग फॉर ड्यूटी, सर!”