‘बाबा अगर आपके अकाउंट में पैसे हुए तो मै आपको दुगुने दूंगा ,, बैंक मैनेजर ने मज़ाक में बुजुर्ग से

“सम्मान की कीमत: नेशनल बैंक का सबक”

भूमिका

क्या होता है जब आंखों देखी पर यकीन करना मुश्किल हो जाए? जब गरीबी के पीछे दौलत का समंदर छुपा हो? और जब घमंड में चूर इंसान को उसकी हेकड़ी पर ऐसा तमाचा पड़े कि सारी अकड़ एक पल में हवा हो जाए?
यह कहानी है दिल्ली के लाजपत नगर की एक बैंक शाखा की, जहां एक बुजुर्ग के मैले कपड़ों और कमजोर कदमों ने हर किसी को उनका मजाक उड़ाने का मौका दिया।
लेकिन एक शर्त ने सब कुछ बदल दिया—इंसानियत, दौलत और घमंड का अनोखा नाटक, जिसका अंत किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था।

दिल्ली की रफ्तार और बैंक का माहौल

दिल्ली शहर—जहां सुबह की पहली किरण के साथ लाखों जिंदगियां अपनी-अपनी दौड़ में शामिल हो जाती हैं। कहीं ऊंची इमारतों में करोड़ों के सौदे होते हैं, तो कहीं झुग्गियों में दो वक्त की रोटी का संघर्ष।
इसी शहर के लाजपत नगर की सेंट्रल मार्केट के पास नेशनल बैंक की एक बड़ी शाखा थी।
शीशे के दरवाजे, एयर कंडीशन की ठंडी हवा, कंप्यूटरों की खटपट और पैसों के लेन-देन में उलझे लोगों की भीड़।
बैंक की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठते थे मिस्टर आलोक वर्मा—40 साल के, कड़क शर्ट, महंगी टाई, सोने के फ्रेम वाला चश्मा, चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान।
उनके लिए बैंक आने वाला हर ग्राहक सिर्फ एक अकाउंट नंबर था। ग्राहक की हैसियत उसके कपड़ों और बात करने के अंदाज से तय होती थी।
गरीब या साधारण दिखने वाले लोगों को वह अक्सर नजरअंदाज करते या रूखेपन से बात करते।

बुजुर्ग का आगमन

उस दिन बैंक में रोज से ज्यादा भीड़ थी।
महीने की शुरुआत थी—लोग सैलरी निकालने, पेंशन लेने या बिल जमा करने आए थे।
हर काउंटर पर लंबी कतारें थीं। कर्मचारी भी व्यस्त थे, लेकिन उनके चेहरे पर काम के बोझ से ज्यादा ऊब और चिड़चिड़ाहट थी।

तभी बैंक के शीशे वाले दरवाजे को धकेलकर एक बुजुर्ग अंदर दाखिल हुए।
उम्र 70 के पार, शरीर दुबला, थोड़ा झुका हुआ।
पुराना, कई जगह से उधड़ा हुआ सूती कुर्ता, मैली धोती, टूटी हुई रबड़ की चप्पलें।
चेहरे पर गहरी झुर्रियां, आंखों पर मोटे शीशे वाला सस्ता सा चश्मा।
हाथ में कपड़े का पुराना सा थैला।
धीरे-धीरे, शायद घुटनों के दर्द की वजह से थोड़ा लंगड़ाते हुए पूछताछ काउंटर की तरफ बढ़े।

बैंक की ठंडी हवा और चमकदार फर्श शायद उनकी दुनिया से बहुत अलग थी।
वो थोड़ा सहमे हुए लग रहे थे।
काउंटर पर बैठी क्लर्क मिस रीटा अपने कंप्यूटर में व्यस्त थी।
उन्होंने बुजुर्ग की तरफ देखा तक नहीं।
“हां बाबा, क्या काम है?” रीटा ने बिना नजरें उठाए पूछा।

बुजुर्ग ने धीरे से कहा, “बेटी, मुझे अपने खाते से कुछ पैसे निकालने थे।”
रीटा ने झुंझलाकर सिर उठाया, “खाता आपका है यहां?”
“जी बेटी, बहुत पुराना खाता है, शायद 25 साल पुराना। पेंशन इसी में आती थी।”
बुजुर्ग ने अपनी जेब से एक मुड़ी-तड़ी पुरानी पासबुक निकाली।
पासबुक की हालत भी उनके कपड़ों जैसी थी।
रीटा ने नाक सिकोड़ते हुए पासबुक ली, “कितने पैसे निकालने हैं?”
“₹5000,” बुजुर्ग ने धीरे से कहा।

रीटा मन ही मन हंसी, उसे शक था कि इस खाते में ₹500 भी होंगे या नहीं।
पासबुक मशीन में नहीं जा रही थी। “बाबा, यह पासबुक तो मशीन ले नहीं रही है, विड्रॉल स्लिप भरनी पड़ेगी। काउंटर नंबर तीन पर जाइए।”
पासबुक फेंकते हुए कहा।
बुजुर्ग ने झुककर पासबुक उठाई।
काउंटर नंबर तीन पर लंबी लाइन थी।
वह धीरे-धीरे चलकर लाइन के आखिर में लग गए।

अपमान और मजाक

बैंक में मौजूद कई लोग उनकी तरफ देख रहे थे।
कुछ लोग कानाफूसी कर रहे थे।
एक अमीर महिला ने नाक पर रुमाल रख लिया, जैसे उन्हें देखकर कोई बदबू आ गई हो।
दो नौजवान लड़के हंस रहे थे, “लगता है बाबा आज अपनी पूरी जायदाद निकालने आए हैं।”
बुजुर्ग चुपचाप खड़े रहे।
शायद यह सब सुना, पर चेहरे पर कोई भाव नहीं आया।
बस अपनी बारी का इंतजार करते रहे।

आधे घंटे से ज्यादा गुजर गया।
लाइन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
बुजुर्ग खड़े-खड़े थक गए थे।
कभी घुटनों को सहलाते, कभी दीवार का सहारा लेकर खड़े हो जाते।

तभी मैनेजर आलोक वर्मा अपने केबिन से बाहर निकले।
उनकी नजर लाइन में लगे बुजुर्ग पर पड़ी।
“ए बाबा, तुम यहां लाइन में क्यों खड़े हो?”
बुजुर्ग ने उनकी तरफ देखा, “जी, पैसे निकालने थे।”
“पैसे? तुम्हें क्या लगता है, यह कोई धर्मशाला है? तुम्हारे जैसे लोगों के लिए बैंक नहीं बने हैं। जाओ कहीं और जाकर भीख मांगो।”
आलोक वर्मा ने सबके सामने अपमान किया।
बुजुर्ग की आंखों में एक पल के लिए दर्द झलका, लेकिन फिर शांत हो गए।
“साहब, मेरा खाता है यहां। मुझे बस अपने ही पैसे निकालने हैं। भीख नहीं मांग रहा।”
“खाता है तुम्हारा?”
आलोक वर्मा जोर से हंसे।
बैंक के कुछ कर्मचारी और ग्राहक भी हंसने लगे।
“अच्छा, कितने पैसे हैं तुम्हारे खाते में? 100, 200 या पूरे 500?”
मजाक उड़ाते हुए कहा, “चलो मान लो, तुम्हारे खाते में पैसे हुए भी तो कितने होंगे? 1000, 2000। सुनो बाबा, आज मेरा मूड अच्छा है। चलो एक शर्त लगाते हैं। अगर तुम्हारे खाते में सच में पैसे निकले, तो जितने भी निकलेंगे, मैं अपनी जेब से तुम्हें उतने ही और दूंगा। दुगने पैसे। बोलो, मंजूर है?”

आलोक वर्मा ने बात इतने जोर से और मजाकिया अंदाज में कही कि आसपास खड़े सब लोग जोर-जोर से हंसने लगे।
उन्हें यकीन था कि यह बुजुर्ग भिखारी ही है और उसके खाते में फूटी कौड़ी भी नहीं होगी।
यह बस मैनेजर साहब का एक मजाक था।

बुजुर्ग ने एक पल के लिए आलोक वर्मा की आंखों में देखा, फिर धीरे से मुस्कुराए, “ठीक है साहब, अगर आपकी यही मर्जी है तो मंजूर है।”
यह सुनकर आलोक वर्मा और भी चौंक गए।
यह बुजुर्ग तो शर्त मान भी गया।
जरूर इसके दिमाग में कुछ खराबी है।
“चलो,” उन्होंने अपने कैशियर सुरेश को आवाज दी, “सुरेश, जरा इन बाबा का खाता चेक करो। देखें कितने लाखपति हैं ये।”

सच्चाई का खुलासा

सुरेश जो थोड़ा नेक दिल इंसान था, बुजुर्ग को अपने काउंटर पर ले गया।
बाकी सब लोग मैनेजर समेत वहीं खड़े तमाशा देखने लगे।
“बाबा, अपनी पासबुक दीजिए,” सुरेश ने नरमी से कहा।
बुजुर्ग ने पासबुक दी।
सुरेश ने कंप्यूटर में खाता नंबर डालने की कोशिश की।
खाता बहुत पुराना था, सिस्टम उसे आसानी से नहीं ढूंढ पा रहा था।
“क्या हुआ सुरेश? पैसे मिले या नहीं?” आलोक वर्मा ने मजाक उड़ाते हुए पूछा।
“सर, खाता बहुत पुराना है, ढूंढ रहा हूं।”
सुरेश ने कुछ और कोशिश की।
बैंक में अब सब लोग उत्सुकता से देख रहे थे।
हंसी और फुसफुसाहट जारी थी।

तभी सुरेश की आंखें कंप्यूटर स्क्रीन पर फटी की फटी रह गईं।
उसका मुंह आश्चर्य से खुला रह गया।
वह अपनी कुर्सी से लगभग उछल पड़ा।
“क्या हुआ सुरेश?” किसी ने पूछा।
सुरेश कुछ बोल नहीं पा रहा था, बस स्क्रीन को घूर रहा था जैसे उसने कोई भूत देख लिया हो।
“अरे, बोलता क्यों नहीं सुरेश?” आलोक वर्मा ने डांटा, “कितने पैसे हैं? ज़ीरो?”
“नहीं, नहीं सर। आप खुद देख लीजिए। मुझे यकीन नहीं हो रहा।”

आलोक वर्मा को थोड़ा अजीब लगा।
वह चलकर सुरेश के काउंटर के पीछे गए।
स्क्रीन पर नजर डाली और स्क्रीन पर लिखे नंबर को देखते ही आलोक वर्मा के होश उड़ गए।
उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।
चेहरा सफेद पड़ गया।
स्क्रीन पर श्री रामनाथ शर्मा के खाते का बैलेंस था—₹50,00,000।
पूरे पचास लाख रुपए।

एक पल के लिए बैंक में मौत जैसा सन्नाटा छा गया।
जिन लोगों की हंसी अब तक गूंज रही थी, उनके मुंह खुले रह गए थे।
जिन आंखों में मजाक था, उसमें अब हैरानी और अविश्वास था।
आलोक वर्मा कांप रहे थे।
वो कभी स्क्रीन को देखते, कभी उस मैले कुचैले बुजुर्ग को, जो अभी भी शांत भाव से काउंटर के पास खड़े थे।

घमंड का पतन

“ये… ये कैसे हो सकता है?” वर्मा हकलाते हुए बोले, “जरूर कोई गलती हुई है। सुरेश, ठीक से चेक करो।”
“सर, मैंने तीन बार चेक कर लिया। यही बैलेंस है—पचास लाख।”

अब सब लोगों की नजरें उस बुजुर्ग पर थीं।
वही बुजुर्ग जिसे वे भिखारी समझ रहे थे।
वह लखपति निकला।
मामूली नहीं बल्कि शायद कोई बहुत बड़ा आदमी था जो जानबूझकर ऐसे कपड़ों में आया था।

आलोक वर्मा को चक्कर आने लगे।
उसने मजाक में शर्त लगाई थी।
₹50 लाख मतलब अब उसे अपनी जेब से ₹50 लाख और देने पड़ेंगे।
यह तो उसकी कई सालों की तनख्वाह थी।
वह बर्बाद हो जाएगा।
वो लगभग दौड़ते हुए बुजुर्ग के पास गया।
चेहरे से सारी अकड़ गायब हो चुकी थी, आंखों में डर और गिड़गिड़ाहट थी।

“बाबा जी, मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैंने आपको पहचाना नहीं। वो शर्त तो मैंने बस मजाक में…”
बुजुर्ग ने उसे बीच में ही रोक दिया।
उनकी आवाज अब भी उतनी ही शांत थी, लेकिन उसमें एक वजन आ गया था।
“मजाक साहब, गरीबी मजाक नहीं होती। किसी की लाचारी पर हंसना मजाक नहीं होता। और हां, शर्त तो शर्त होती है। आपने सबके सामने कहा था।”

आलोक वर्मा उनके पैरों पर गिरने ही वाले थे।
“बाबा जी, मेरी इज्जत, मेरी नौकरी सब दांव पर लग जाएगी। मुझ पर रहम कीजिए। मेरे बीवी-बच्चे हैं।”
बुजुर्ग ने उन्हें नीचे गिरने से रोका, “उठिए मैनेजर साहब। मुझे आपके पैसे नहीं चाहिए।”
आलोक वर्मा ने अविश्वास से उन्हें देखा, “क्या?”
“हां, मुझे सिर्फ ₹5000 चाहिए थे अपनी पोती के स्कूल की फीस भरने के लिए। सुरेश बेटा, तुम मुझे ₹5000 निकाल दो।”

सुरेश ने जल्दी से कैश गिना और बुजुर्ग के हाथ में रख दिया।
“और हां, मैनेजर साहब, वो जो शर्त के ₹50 लाख थे, वो आप अपनी जेब से जरूर निकालिएगा।”
आलोक वर्मा का दिल फिर बैठ गया।
“लेकिन मुझे देने के लिए नहीं।”
बुजुर्ग ने अपनी बात पूरी की, “उन पैसों से आप बैंक के बाहर एक शेड बनवा दीजिएगा, जहां धूप और बारिश में मेरे जैसे बुजुर्ग और आम लोग आराम से खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर सकें। और हां, पीने के साफ पानी का भी इंतजाम करवा दीजिएगा। यही मेरा शर्त का इनाम होगा।”

इंसानियत का सबक

यह सुनकर आलोक वर्मा की आंखों में आंसू आ गए।
वो कुछ बोल नहीं पा रहे थे, बस हाथ जोड़े खड़े थे।
बुजुर्ग ने बैंक में मौजूद लोगों की तरफ देखा।
“भाइयों और बहनों, इंसान की पहचान उसके कपड़ों से नहीं, उसके कर्मों से होती है। किसी को छोटा समझने की गलती कभी मत करना।”

यह कहकर बुजुर्ग रामनाथ शर्मा—जिन्होंने आज सिर्फ पैसे नहीं निकाले थे, बल्कि इंसानियत का एक बड़ा सबक भी सिखाया था—धीरे-धीरे बैंक से बाहर चले गए।
बैंक में अब भी सन्नाटा था, पर अब यह हैरानी का नहीं, शर्मिंदगी का सन्नाटा था।

बदलाव की लहर

आलोक वर्मा अपनी कुर्सी पर गुमसुम बैठे थे।
उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक आज उन्हें एक ऐसे इंसान से मिला था, जिसे वह कुछ देर पहले भीख मांगने को कह रहे थे।
पता चला कि श्री रामनाथ शर्मा शहर के एक बहुत बड़े रिटायर्ड बिजनेसमैन थे।
उन्होंने अपना सारा कारोबार अपने बेटों को सौंप दिया था और अब वे अपनी पत्नी के साथ एक सादा जीवन जी रहे थे।
उन्हें दिखावा पसंद नहीं था।
अक्सर ऐसे ही साधारण कपड़ों में निकल पड़ते थे।
आज वे सिर्फ अपनी पोती की फीस के पैसे निकालने आए थे।

उस दिन के बाद नेशनल बैंक की वह शाखा बदल गई।
आलोक वर्मा अब पहले जैसे मैनेजर नहीं रहे।
वह हर ग्राहक से, चाहे अमीर हो या गरीब, इज्जत से बात करते।
बैंक के बाहर एक सुंदर सा शेड बन गया, पानी का कूलर लग गया।
मजाक उड़ाने वाले कर्मचारी अब हर बुजुर्ग को सम्मान की नजरों से देखते थे।
एक मजाक ने माहौल बदल दिया था।
एक बुजुर्ग की शांति ने घमंड को आईना दिखा दिया था।

संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि कभी किसी को उसके बाहरी रूप से नहीं आंकना चाहिए।
हर इंसान सम्मान का हकदार होता है, चाहे वह अमीर हो या गरीब।
रामनाथ शर्मा जी ने आलोक वर्मा को जो सबक सिखाया, वह हम सबके लिए एक सीख है।

उपसंहार

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ है, तो इसे दूसरों तक जरूर पहुंचाएं।
इंसानियत और सम्मान का यह संदेश हर किसी तक पहुंचे, यही इस कहानी का मकसद है।
क्योंकि असली दौलत कपड़ों, गहनों या बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि दिल के सम्मान में होती है।

समाप्त