करोड़पति मालकिन रोज़ जिस चाय वाले बच्चे को भीख देती थी… वो उसका ‘मरा हुआ’ सगा बेटा निकला!

ममता की पहचान: एक मां, एक बेटा और नियति का खेल

भूमिका

कहते हैं कि खून के रिश्ते कभी छुपाए नहीं छुपते, और एक मां का दिल वह सब महसूस कर लेता है जो उसकी आंखों से ओझल होता है। यह कहानी है अंजलि की, जिसकी जिंदगी में दौलत, शोहरत और एक प्यार करने वाला पति था, लेकिन उसके मन के किसी कोने में एक अजीब सा खालीपन हमेशा गूंजता रहता था। यह खालीपन क्या था, उसे खुद भी नहीं पता था। लेकिन नियति ने उसकी जिंदगी में ऐसा तूफान लाया, जिसने उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य को बदल कर रख दिया।

दिल्ली की शाम और एक टपरी

दिल्ली की व्यस्त सड़कों पर शाम के 5:00 बजे का वक्त था। रोज की तरह अंजलि अपनी लग्जरी कार को एक पुराने सड़क किनारे बने चाय के टपरे के पास रोकती थी। यह उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। घर पर महंगे किस्म की चाय मौजूद थी, लेकिन अंजलि को सुकून उसी टपरे पर मिलता था। और उस सुकून की वजह चाय नहीं बल्कि वहां काम करने वाला 10 साल का एक छोटा सा लड़का था – मुन्ना।

मुन्ना के कपड़े भले ही पुराने और मैले थे, लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर हमेशा एक प्यारी सी मुस्कान रहती थी।
“मैडम जी, आपकी स्पेशल अदरक वाली चाय?”
मुन्ना ने कार की खिड़की पर नन्हे हाथों से चाय का गिलास थमाते हुए कहा।
अंजलि ने पर्स से 100 का नोट निकाला और उसे देते हुए कहा,
“मुन्ना, बाकी पैसे तुम रख लो। कुछ खा लेना।”
मुन्ना ने स्वाभिमान से सिर हिलाया,
“नहीं मैडम जी, मेहनत के जितने बनते हैं, उतने ही लूंगा। भीख नहीं, काम करता हूं।”

उसकी यह बात अंजलि के दिल को छू गई। जाने क्यों जब भी अंजलि मुन्ना को देखती उसे अपनापन महसूस होता। ऐसा लगता जैसे कोई पुराना धागा है जो उसे इस बच्चे से जोड़ रहा है।

ममता का रहस्य

अंजलि ने अपनी शादीशुदा जिंदगी में सब कुछ पा लिया था। उसके पति समीर बहुत अच्छे थे लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। शायद इसीलिए सड़क पर काम करने वाले इस बच्चे के लिए उसके मन में ममता का एक सोता बहता था। लेकिन उस मंगलवार को कुछ अलग हुआ। अंजलि की गाड़ी टपरे पर रुकी। हॉर्न बजाया लेकिन मुन्ना दौड़ कर नहीं आया। उसकी जगह टपरे का मालिक एक बुजुर्ग आदमी बाहर आया।

“भैया, मुन्ना कहां है? आज दिखाई नहीं दे रहा?”
दुकानदार का चेहरा उतर गया।
“मैडम जी, गजब हो गया। आज सुबह सड़क पार करते वक्त एक तेज रफ्तार बाइक ने मुन्ना को टक्कर मार दी। बेचारा बहुत बुरी तरह घायल हो गया। और ये उसे पास के सरकारी अस्पताल में ले गए हैं।”

अंजलि के हाथ से चाय का कप छूटने ही वाला था। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। एक अनजान बच्चे के लिए इतनी घबराहट क्यों? उसे खुद समझ नहीं आ रहा था।
“कौन से अस्पताल में?”
“जी, वो सिटी अस्पताल में है। पर मैडम जी, उसका कोई नहीं है। बस एक बूढ़ी दादी है जो पास की बस्ती में रहती है। पता नहीं इलाज के पैसे भी होंगे या नहीं।”

अंजलि ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने तुरंत अपनी गाड़ी का गियर बदला। आज उसे किसी मीटिंग में नहीं जाना था। आज उसका दिल उसे कहीं और बुला रहा था। एक ऐसा बुलावा जिसे वह चाहकर भी अनसुना नहीं कर सकती थी।

अस्पताल का सच

सिटी अस्पताल के जनरल वार्ड में पैर रखते ही दवाइयों और फिनाइल की तीखी गंध ने अंजलि का स्वागत किया। चारों तरफ दर्द से करहाते मरीज और लाचारी का मंजर था। अपनी महंगी साड़ी और हाई हील्स में अंजलि वहां बिल्कुल बेमेल लग रही थी। लेकिन उसे दुनिया की कोई परवाह नहीं थी। उसकी नजरें बस उस 10 साल के बच्चे को ढूंढ रही थी जिसके साथ उसका कोई खून का रिश्ता ना होकर भी रूह का रिश्ता बन चुका था।

“वार्ड नंबर 12, बेड नंबर चार।”
नर्स की बात सुनते ही अंजलि उस दिशा में दौड़ी। सामने का नजारा देख उसका दिल दहल गया। मुन्ना बेहोश पड़ा था। सिर पर पट्टियां बंधी थी और उसके नन्हे हाथ में ड्रिप लगी हुई थी। जो चेहरा हमेशा मुस्कुराहट से खिला रहता था, आज वो पीला और बेजान था। अंजलि की आंखों से टपटप आंसू गिरने लगे। उसने डॉक्टर को तुरंत बुलाया।
“डॉक्टर, इस बच्चे को बेस्ट इलाज मिलना चाहिए। पैसे की चिंता मत कीजिए। मैं सब संभाल लूंगी। बस इसे बचा लीजिए।”
डॉक्टर ने उसे आश्वासन दिया,
“हम पूरी कोशिश कर रहे हैं मैम। लेकिन सिर पर चोट गहरी है। अगले 24 घंटे बहुत नाजुक हैं।”

अंजलि मुन्ना के सिरहाने बैठ गई और उसके ठंडे हाथ को अपने हाथों में थाम लिया।

अतीत का सामना

तभी उसकी नजर बेड के कोने में जमीन पर बैठी एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी। वह घुटनों में सिर दिल फूट-फूट कर रो रही थी। उसके कपड़े फटे पुराने थे और शरीर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था।
अंजलि ने खुद को संभाला और उस बुजुर्ग महिला के कंधे पर हाथ रखा,
“मां जी, आप चिंता मत कीजिए। मुन्ना ठीक हो जाएगा। मैं आ गई हूं ना।”

जैसे ही उस बूढ़ी औरत ने अपना चेहरा ऊपर उठाया, अंजलि के पैरों तले जमीन खिसक गई। समय जैसे वहीं थम गया। वो झुर्रियों वाला चेहरा, वो आंखों में डर… अंजलि उसे कैसे भूल सकती थी?
“रमदाई काकी?”
अंजलि के होठों से बमुश्किल यह शब्द निकले। यह रामदाई थी, अंजलि के पहले ससुराल की पुरानी दाई, जो घर का काम भी करती थी।

10 साल पहले जब अंजलि के पहले पति का देहांत हुआ था और उसने एक बच्चे को जन्म दिया था, तब इसी रामदाई ने उसे बताया था कि उसका बच्चा पैदा होते ही मर गया है।

रामदाई ने अंजलि को देखा और उसकी आंखों में पहचान और दहशत दोनों एक साथ तैरने लगे। वो कांपने लगी।
“बहू रानी, आप यहां?”
अंजलि का दिमाग सुन्न हो गया। एक तरफ मुन्ना मौत से लड़ रहा था और दूसरी तरफ उसके अतीत का एक हिस्सा उसके सामने जिंदा खड़ा था।
“काकी, तुम यहां कैसे? और मुन्ना तुम्हारे साथ क्या कर रहा है? तुम तो कहती थी तुम्हारा कोई नहीं है।”

रामदाई ने अंजलि के पैर पकड़ लिए और जोर-जोर से रोने लगी।
“मुझे माफ कर दो बहू रानी। मैं बहुत बड़ी पापिनी हूं। नरक में भी जगह नहीं मिलेगी मुझे। ये मुन्ना… यह कोई अनाथ नहीं है। यह… यह आपकी ही निशानी है।”

अंजलि को लगा जैसे आसमान टूट पड़ा हो।
“क्या कहा तुमने?”
उसकी आवाज गले में ही घुट गई।

सच का खुलासा

रामदाई ने सिसकते हुए वह सच उगला जिसे वह 10 सालों से अपने सीने में दफन किए बैठी थी।
“साहब… अंजलि के पहले ससुर ने झूठ बोला था। आपका बच्चा मरा नहीं था। उन्होंने मुझे हुक्म दिया था कि इस मनहूस बच्चे को अनाथालय में छोड़ आऊं क्योंकि उन्हें लगा कि इसी बच्चे की वजह से उनके बेटे, अंजलि के पहले पति की जान गई। लेकिन मेरी ममता ने मुझे ऐसा करने नहीं दिया। मैं इसे लेकर भाग आई थी।”

अंजलि पत्थर की मूरत बन गई। जिस बच्चे को वह रोज ₹10 की चाय पीकर मदद कर रही थी, वह कोई और नहीं, उसका अपना बेटा था। वो बेटा जिसके लिए उसने हजारों रातें रोते हुए गुजारी थी।

अंजलि लड़खड़ाते हुए बिस्तर की ओर बढ़ी। अब तक वह मुन्ना को एक गरीब बेसहारा बच्चा समझकर हमदर्दी जता रही थी। लेकिन अब उसे मुन्ना के चेहरे में अपनी झलक दिखाई देने लगी। उसकी वो आंखें जो बिल्कुल अंजलि के पहले पति जैसी थी और वो मुस्कान जो अंजलि की तरह थी।

उसने कांपते हाथों से मुन्ना के माथे को चूमा।
“मेरा बेटा… मेरा मुन्ना।”
उसकी सिसकियां पूरे वार्ड में गूंजने लगी।

गिल्ट और पछतावा

एक भयानक अपराधबोध ने अंजलि को घेर लिया। वह महलों में रहती रही, रेशमी बिस्तरों पर सोती रही और उसका अपना खून, उसका अपना बेटा भरी धूप और बारिश में सड़क किनारे एक-एक रुपए के लिए चाय बेचता रहा। जिन हाथों में किताबें होनी चाहिए थी, वो हाथ लोगों के झूठे गिलास उठा रहे थे। और विडंबना देखिए, वह खुद उसे ₹10 देकर महान बन रही थी।

“धिक्कार है मुझ पर। धिक्कार है।”
अंजलि चीख पड़ी।
रामदाई सिर झुकाए रोती रही।

पति का सामना

तभी वार्ड के दरवाजे पर तेज कदमों की आहट हुई।
“अंजलि, तुम यहां हो? मैं कितना परेशान हो गया था।”
यह आवाज समीर की थी। अंजलि के वर्तमान पति समीर जो एक प्रतिष्ठित बिजनेसमैन थे।
अंजलि ने फोन नहीं उठाया था, इसीलिए उन्होंने ड्राइवर से लोकेशन ट्रेस करवाई थी।

समीर ने देखा कि अंजलि एक गंदे से अस्पताल के बेड पर एक गरीब बच्चे को सीने से लगाए बैठी है और पास में एक फटे हाल बुढ़िया रो रही है।
“अंजलि, क्या हुआ है? यह बच्चा कौन है? और तुम इतना क्यों रो रही हो?”
समीर ने अंजलि के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।

अंजलि ने समीर की तरफ देखा। उसकी आंखों में अब डर नहीं, बल्कि एक मां का जुनून था। लेकिन अतीत का वह सच जिसे उसने समीर से भी छुपाया था कि उसने कभी एक बच्चे को जन्म दिया था, अब बाहर आने को बेताब था।

अंजलि ने जब समीर से शादी की थी तो उसने बताया था कि वह विधवा है। लेकिन उसने अपने मरे हुए बच्चे का जिक्र कभी नहीं किया था। यह सोचकर कि बीती बातें नई जिंदगी में क्यों लाना।

लेकिन आज सच का ज्वालामुखी फट चुका था।
“समीर, यह… यह कोई अनाथ बच्चा नहीं है। यह मेरा बेटा है। मेरे पहले पति की निशानी, जिसे मैंने मरा हुआ मान लिया था।”

समीर के पैरों तले से जमीन खिसक गई। वह दो कदम पीछे हट गया।
“क्या बकवास कर रही हो अंजलि? तुम्हारा बेटा? तुमने तो कहा था कि तुम्हारी पिछली शादी से कोई औलाद नहीं थी। तुमने कहा था तुम अकेली हो।”
अंजलि खड़ी हो गई।
“मुझे भी यही बताया गया था, समीर। मेरे ससुराल वालों ने झूठ बोला था कि बच्चा मर गया। उन्होंने इसे अनाथालय में फेंकने की कोशिश की थी। मुझे आज ही पता चला कि यह जिंदा है।”

अविश्वास और तूफान

समीर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसे अंजलि के दुख से ज्यादा अपनी ठगी महसूस हो रही थी।
“तो यह सब नाटक था? पिछले 5 सालों से हम साथ हैं अंजलि और आज अचानक तुम्हें एक बेटा मिल गया। क्या गारंटी है कि तुम सच बोल रही हो? शायद तुम मुझसे और भी बहुत कुछ छुपा रही हो।”

समीर की आवाज ऊंची हो गई। जिससे आसपास के मरीज और स्टाफ उनकी ओर देखने लगे।
“समीर, मेरा विश्वास करो।”
अंजलि ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।
समीर ने उसका हाथ झटक दिया।
“बस अंजलि, मैं धोखे बर्दाश्त नहीं कर सकता। मैं एक ऐसी औरत के साथ नहीं रह सकता जिसका अतीत हर मोड़ पर एक नया झूठ लेकर सामने आए। मुझे लगा था मैं तुम्हें जानता हूं पर शायद मैं गलत था।”

माहौल में तनाव इतना गहरा हो गया कि हवा भी भारी लगने लगी। एक तरफ मौत से लड़ता हुआ बेटा और दूसरी तरफ अविश्वास की आग में जलता हुआ पति। अंजलि बीच मजधार में फंसी थी। समीर के कदमों की आवाज गलियारे में दूर होती गई और उसके साथ ही अंजलि की उम्मीदें भी धुंधली पड़ने लगी।

मां का जुनून

अस्पताल के उस ठंडे कॉरिडोर में अब सिर्फ अंजलि सिसकती हुई, रामदाई और वेंटिलेटर की बीप-बीप की आवाज थी। अंजलि के गालों पर आंसू सूख चुके थे। एक औरत के लिए इससे बड़ी परीक्षा क्या हो सकती थी? एक तरफ वह पति था जिसने उसे नई जिंदगी दी थी और दूसरी तरफ वह बेटा जिसे उसने आज ही मौत के मुंह से वापस पाया था।

अंजलि ने एक गहरी सांस ली और अपनी साड़ी का पल्लू कस लिया। इस वक्त वह एक पत्नी नहीं, सिर्फ एक मां थी और एक मां अपने बच्चे को बचाने के लिए पूरी दुनिया से लड़ सकती है। उसने डॉक्टर का हाथ पकड़ कर कहा,
“डॉक्टर, मेरे पति क्या सोचते हैं, इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। आप बस मेरे बेटे का इलाज कीजिए। जो भी खर्चा होगा मैं दूंगी। अगर इसे खरोंच भी आई तो मैं यह अस्पताल सर पर उठा लूंगी।”

अंजलि की आंखों में वो आग थी जिसे देखकर डॉक्टर भी सहम गए। मुन्ना को तुरंत आईसीयू में शिफ्ट किया गया। ऑपरेशन की तैयारी शुरू हो गई।

रामदाई का अपराध और प्रायश्चित

बाहर बेंच पर बैठकर अंजलि ने रामदाई की ओर देखा। गुस्सा तो बहुत आ रहा था। मन कर रहा था कि रामदाई को पुलिस के हवाले कर दे। लेकिन फिर उसने सोचा कि अगर रामदाई ने दया ना दिखाई होती तो शायद 10 साल पहले ही उसके ससुराल वाले मुन्ना को मार डालते।

“काकी,” अंजलि की आवाज सख्त लेकिन शांत थी।
“तुमने मुझसे मेरा बेटा छीनकर बहुत बड़ा पाप किया। मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगी। लेकिन तुमने उसे जिंदा रखा, उसे पाल-पोस कर बड़ा किया। इसके लिए मैं तुम्हारी शुक्रगुजार भी हूं। आज अगर मुन्ना को कुछ हुआ तो याद रखना उसका जिम्मेदार वह परिवार होगा जिसने उसे फेंका था और तुम होगी जिसने सच छुपाया।”

रामदाई हाथ जोड़कर बैठी रही। उसके पास बोलने को कोई शब्द नहीं थे।

रात का इंतजार

घंटे बीतते गए। रात गहराने लगी थी। अंजलि आईसीयू के कांच के दरवाजे से मुन्ना को देख रही थी। उसके नन्हे शरीर में अनगिनत नलियां लगी थी। अंजलि को याद आया कि कैसे वह रोज उससे चाय पीती थी। कैसे वह हंसकर कहता था, “मैडम जी खुश रहा करो।” उसे क्या पता था कि वह अपनी ही मां को खुश रहने की दुआ दे रहा था।

तभी ऑपरेशन थिएटर का दरवाजा खुला। डॉक्टर बाहर आए। उनके चेहरे पर तनाव साफ झलक रहा था।
“डॉक्टर, मेरा बेटा कैसा है?”
डॉक्टर ने मास्क नीचे किया और गंभीर स्वर में कहा,
“मिस अंजलि, हमने सर्जरी तो कर दी है, अंदरूनी रक्तस्राव रुक गया है लेकिन…”

“लेकिन क्या डॉक्टर?”
“बच्चे का शरीर बहुत कमजोर है। शायद कुपोषण की वजह से उसकी रिकवरी बहुत धीमी हो रही है। उसे होश आने में वक्त लगेगा और सच कहूं तो आज की रात बहुत भारी है। अगर सुबह तक उसे होश नहीं आया तो शायद हम उसे बचा ना पाए।”

अंजलि वहीं जमीन पर बैठ गई। जिस दौलत पर उसे नाज था, आज वह दौलत भी बेअसर थी। उसका बेटा गरीबी और भूख की वजह से इतना कमजोर हो चुका था कि दवाइयां भी उस पर असर नहीं कर रही थी। यह नियति का कैसा क्रूर मजाक था। मां महलों में रहती थी और बेटा दाने-दाने को मोहताज था।

समीर की तड़प

अंजलि ने अपनी आंखें बंद की और ईश्वर से प्रार्थना करने लगी। उसे नहीं पता था कि शहर के दूसरे कोने में समीर भी अपनी कार में बैठा इसी कशमकश से गुजर रहा था। गुस्से और प्यार के बीच की जंग अभी खत्म नहीं हुई थी।

शहर की आलीशान इमारत के एक बड़े से कमरे में सन्नाटा पसरा था। समीर हाथ में व्हिस्की का गिलास लिए खिड़की के पास खड़ा बाहर की रोशनी को घूर रहा था। लेकिन उसके अंदर अंधेरा था। उसका अहंकार उसे बार-बार कह रहा था, “अंजलि ने तुमसे झूठ बोला।” लेकिन उसका दिल कुछ और ही गवाही दे रहा था। उसे याद आया कि कैसे पिछले 5 सालों में अंजलि ने उसे बेइंतहा प्यार दिया था। उसने कभी कोई मांग नहीं रखी थी। बस हमेशा दूसरों की मदद करने में सुकून ढूंढती थी।

समीर ने सोचा, अगर अंजलि धोखेबाज होती तो उस सड़क किनारे पड़े बच्चे के लिए अपनी जान नहीं छिड़कती। वो उस गरीब गंदे बच्चे को सीने से नहीं लगाती। अचानक समीर की नजर मेज पर रखी अंजलि की डायरी पर पड़ी। अनमने मन से उसने पन्ने पलटे। एक पन्ने पर आंसू के दाग थे और लिखा था –
“आज उस बच्चे मुन्ना की मुस्कान देखकर दिल को ठंडक मिली। जाने क्यों। उसे देखकर लगता है कि अगर मेरा बेटा जिंदा होता तो शायद ऐसा ही होता। भगवान मेरे बच्चे को जहां भी रखना, खुश रखना।”

डायरी पढ़ते ही समीर के हाथ से गिलास छूट कर गिर गया। कांच के टुकड़ों की तरह उसका अहंकार भी चकनाचूर हो गया।
“हे भगवान, वो तो खुद अनजान थी। उसे तो लगा था उसका बेटा मर चुका है। वह तो खुद एक पीड़ित है। उस क्रूर समाज और ससुराल वालों की साजिश की शिकार… और मैं… मैं उसका सहारा बनने की बजाय उसे छोड़ आया।”

समीर को अपने व्यवहार पर घिन आने लगी। उसने तुरंत गाड़ी की चाबी उठाई और अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा।

रिश्तों की पुनर्स्थापना

रात के 2:00 बज रहे थे। अस्पताल के आईसीयू के बाहर का मंजर दिल तोड़ने वाला था।
अंजलि ठंडी जमीन पर बैठी थी। उसका सिर दीवार से टिका था और आंखें बंद थी। जैसे वह अब भी प्रार्थना कर रही हो। थोड़ी दूर पर रामदाई सिकुड़ी हुई बैठी थी।

समीर दबे पांव वहां पहुंचा और दूर से अंजलि को देखने लगा। वह औरत जो महलों की रानी थी, अपने बच्चे के लिए एक भिखारिन की तरह जमीन पर बैठी थी। समीर को समझ आ गया कि मां शब्द का मतलब क्या होता है। खून के रिश्ते कागजों के मोहताज नहीं होते।

समीर धीरे से आगे बढ़ा और अंजलि के कंधे पर हाथ रखा।
अंजलि ने चौंक कर आंखें खोली। सामने समीर को देखकर वह सहम गई। उसे लगा समीर तलाक के कागजात या और कड़वी बातें लेकर आया है। उसने नजरें झुका ली।

“समीर, मैं जानती हूं तुम नाराज हो। तुम जो सजा दोगे मुझे मंजूर है। बस मेरे बेटे को ठीक हो जाने दो।”
समीर ने कुछ नहीं कहा। वह घुटनों के बल अंजलि के पास बैठ गया और उसे अपनी बाहों में भर लिया। अंजलि का बांध टूट गया। वह समीर के सीने से लगकर फूट-फूट कर रोने लगी।

“मुझे माफ कर दो अंजलि।” समीर की आवाज भारी थी।
“मैं अपने अहंकार में अंधा हो गया था। मैं देख नहीं पाया कि तुम अपराधी नहीं बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी साजिश की शिकार हो। जिसने 10 साल तक अपने मरे हुए बच्चे का मातम मनाया हो, उसे आज जिंदा पाकर कैसा महसूस हो रहा होगा, मैं समझ नहीं पाया।”

अंजलि ने आंसुओं के बीच समीर को देखा।
समीर ने उसके आंसू पोंछे और आंसुओं की कांच की दीवार की तरफ इशारा किया।
“देखो, वो तुम्हारा बेटा है और अब से वो मेरा भी बेटा है। हम उसे कहीं जाने नहीं देंगे। वो सड़क पर नहीं रहेगा। वो हमारे साथ हमारे घर जाएगा।”

नवजीवन की शुरुआत

तभी आईसीयू के अंदर हलचल हुई। मशीन की बीप की आवाज तेज हो गई। नर्स दौड़ती हुई बाहर आई।
“डॉक्टर, मरीज होश में आ रहा है।”
अंजलि और समीर एक झटके में खड़े हो गए। उम्मीद की एक किरण अंधेरे को चीरती हुई दिखाई दी।

आईसीयू के उस कक्ष में मशीन की आवाज अब धीमी पड़ चुकी थी और उसकी जगह एक नई धड़कन ने ले ली थी – उम्मीद की धड़कन।

डॉक्टर ने जांच करने के बाद अंजलि और समीर की ओर देखा और राहत की सांस ली।
“चमत्कार है। बच्चे की इच्छाशक्ति बहुत मजबूत है। उसने मौत को हरा दिया है। आप उससे मिल सकते हैं, लेकिन उसे ज्यादा थकान नहीं होनी चाहिए।”

अंजलि कांपते कदमों से बिस्तर के पास पहुंची। मुन्ना की आंखें आधी खुली थी। नशीली दवाओं के असर के कारण उसकी नजरें धुंधली थी। लेकिन जैसे ही उसने अपने सामने उस चेहरे को देखा जिसे वह रोज चाय देता था, उसके सूखे होठों पर एक फीकी मुस्कान तैर गई।
“मैडम जी…”
मुन्ना की आवाज इतनी धीमी थी कि बमुश्किल सुनाई दी।
“आप… यहां… मैंने चाय के पैसे नहीं काटे थे।”

मुन्ना की यह बात सुनकर अंजलि का कलेजा मुँह को आ गया। जिंदगी और मौत की जंग लड़ने के बाद भी इस बच्चे को अपनी ईमानदारी और ₹10 की चिंता थी।
अंजलि अब और संयम नहीं रख सकी। उसने झुककर मुन्ना का माथा चूम लिया।
“पैसे नहीं चाहिए मेरे बच्चे, कुछ नहीं चाहिए।”
अंजलि सिसक उठी।
“मैं मैडम जी नहीं हूं… मैं… मैं तुम्हारी मां हूं, मुन्ना। तुम्हारी असली मां।”

मुन्ना की आंखों में उलझन थी। उसने धीरे से अपना सिर घुमाया और दरवाजे पर खड़ी रामदाई को देखा।
“दादी?”
रामदाई जो अब तक दरवाजे की चौखट पर खड़ी थी, अंदर आई और मुन्ना के पैरों के पास गिर गई।
“हां, मेरे लाल, यही सच। यही तेरी यशोदा मैया है और यही तेरी देवकी। मैंने तुझसे झूठ बोला था कि तेरी मां मर गई है। मुझे माफ कर दे, मुन्ना।”

मुन्ना छोटा था। 10 साल का वनवास आज खत्म हुआ था। समीर जो अब तक पीछे खड़ा यह दृश्य देख रहा था, आगे बढ़ा। उसने अंजलि के कंधे पर हाथ रखा और मुन्ना के सिर पर प्यार से हाथ फेरा।
“बेटा, अब तुम्हें कभी धूप में खड़ा नहीं होना पड़ेगा। अब तुम्हें कभी चाय नहीं बेचनी पड़ेगी। तुम्हारा पिता आ गया है।”

मुन्ना ने समीर को देखा। उसकी आंखों में एक अनजान सुरक्षा का भाव था।

परिवार का पुनर्निर्माण

तभी रामदाई ने अपने हाथ जोड़ लिए और अंजलि की ओर मुड़ी।
“बहू रानी, मुन्ना अब ठीक है। इसे आप ले जाइए। मैं अब अपने गांव चली जाऊंगी। मेरा प्रायश्चित यही है कि मैंने अमानत असल हकदार को सौंप दी।”

वह मुड़ने लगी।
“रुको काकी।”
समीर की आवाज ने उसे रोक दिया। कमरे में सन्नाटा छा गया। अंजलि ने समीर की ओर देखा।

समीर ने गंभीरता से कहा,
“तुमने जो किया वो माफी के लायक नहीं है। तुमने एक मां को उसके बेटे से 10 साल दूर रखा। लेकिन सच यह भी है कि अगर तुम उस रात इसे लेकर नहीं भागती, तो शायद अंजलि के ससुराल वाले इसे जान से मार देते। तुमने इसे गरीबी में रखा लेकिन तुमने इसे जिंदा रखा। और सबसे बड़ी बात, तुमने इसे संस्कार दिए। यह बच्चा गरीब होकर भी चोर नहीं बना, मेहनती बना।”

समीर ने गहरा फैसला लेते हुए कहा,
“मुन्ना तुमसे प्यार करता है। अगर हमने तुम्हें इससे अलग किया तो इसका दिल फिर टूट जाएगा। हम इसे और दुख नहीं दे सकते।”

अंजलि ने समीर की आंखों में देखा और समझ गई कि उसका पति कितना विशाल हृदय रखता है।
“काकी,” अंजलि ने कहा, “अब तुम भी हमारे साथ हमारे घर चलोगी। मुन्ना की देखभाल के लिए नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह। क्योंकि इस बच्चे ने तुम्हें ही अपनी दुनिया माना है।”

रामदाई की बूढ़ी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उसे ना केवल माफी भी मिली थी, बल्कि वह सम्मान मिला था जिसकी वह हकदार नहीं थी। यह कर्मों का खेल था। उसने एक जान बचाई थी और आज बदले में उसे सहारा मिल रहा था।

सुबह की पहली किरण अस्पताल की खिड़की से अंदर आ रही थी। रात का अंधेरा छंट चुका था और एक नया सवेरा इस परिवार का इंतजार कर रहा था।

समाज को सबक

लेकिन अभी एक काम बाकी था – समाज को और उस पुराने ससुराल को यह दिखाना कि अच्छाई कभी हारती नहीं है। समय का पहिया जब घूमता है तो रंक को राजा और राजा को रंक बना देता है।

एक महीना बीत चुका था। समीर के आलीशान बंगले के बगीचे में आज एक अलग ही रौनक थी। चारों तरफ गुब्बारे सजे थे और हंसी की किलकारियां गूंज रही थी। आज मुन्ना का जन्मदिन था। शायद तारीख के हिसाब से नहीं, लेकिन नसीब के हिसाब से यह उसका असली जन्मदिन था क्योंकि इसी दिन उसे उसकी खोई हुई पहचान और परिवार वापस मिला था।

मुन्ना जो अब फटे पुराने कपड़ों में नहीं बल्कि एक सुंदर कुर्ते-पजामे में राजकुमार लग रहा था, बगीचे में दौड़ रहा था। उसके हाथ में अब चाय की केतली या झूठे गिलास नहीं थे, बल्कि एक क्रिकेट का बल्ला था। और उसे गेंद फेंकने वाला कोई और नहीं, समीर था।

समीर ने मुन्ना को सिर्फ अपनाया ही नहीं था, बल्कि उसे अपना नाम भी दिया था। अब वह अनाथ मुन्ना नहीं, बल्कि वंश समीर मल्होत्रा था।

समीर को उसके साथ खेलते देख अंजलि की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस बच्चे की एक मुस्कान देखने के लिए वह कार रोकती थी, वह उसी के आंगन का चिराग निकलेगा।

बरामदे में बैठी रामदाई यह सब देख रही थी। उसकी आंखों में अब डर नहीं, बल्कि सुकून था। उसे अपने पापों का प्रायश्चित मिल गया था। अंजलि ने उसे घर के बुजुर्ग का दर्जा दिया था।

कर्म का न्याय

लेकिन कर्म का हिसाब अब भी बाकी था। उसी शाम अंजलि को खबर मिली कि मेरठ में उसके पूर्व ससुराल वाले जिन्होंने जायदाद के लालच में उस नवजात बच्चे को मरा हुआ बताकर फिकवा दिया था, आज बहुत बुरी हालत में हैं। उनके घर में संपत्ति को लेकर झगड़े हुए और वे अब अकेलेपन और बीमारी में जी रहे हैं। उन्हें पालने वाला कोई नहीं बचा। यह वही कर्म था। उन्होंने एक मासूम को बेघर किया था और आज कुदरत ने उन्हें उनके ही घर में बेगाना कर दिया था।

ममता का सवेरा

अंजलि ने मुन्ना को पास बुलाया और उसे गले लगाते हुए समीर से कहा,
“समीर, अगर उस दिन मैं अपनी गाड़ी उस चाय की टपरी पर ना रोकती, अगर मुझे उस गरीब बच्चे पर दया ना आती, तो आज मेरी गोद खाली ही रह जाती। शायद ईश्वर मेरी परीक्षा ले रहा था।”

समीर ने मुस्कुराते हुए अंजलि के आंसू पोंछे।
“तुम सही कहती हो अंजलि। तुमने अनजान समझकर भी उस पर जो ममता लुटाई, वो बेकार नहीं गई। यह दुनिया का सबसे बड़ा सच है। जब हम निस्वार्थ भाव से किसी का भला करते हैं तो असल में हम अपना ही भविष्य संवार रहे होते हैं।”

शाम ढल रही थी लेकिन उनकी जिंदगी में सवेरा हो चुका था। उस आलीशान घर की दीवारों पर अब सन्नाटा नहीं बल्कि एक सुखी परिवार की तस्वीर थी।

अंतिम संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं। दौलत और रुतबा आज है, कल नहीं। लेकिन किसी के बुरे वक्त में दिया गया साथ और प्यार ब्याज समेत वापस लौटता है। अंजलि ने एक चाय वाले की मदद की थी और नियति ने उसे उसका बेटा लौटा दिया। सच ही कहा गया है – जो दूसरों के लिए फूल बिछाता है, उसके रास्ते अपने आप महक उठते हैं। बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों ना हो, जीत हमेशा अच्छाई और प्रेम की ही होती है।

धन्यवाद। जय हिंद।