पहचान कपड़ों से नहीं, कर्मों से होती है

सुबह के लगभग आठ बजे थे। शहर के सबसे प्रतिष्ठित निजी विद्यालय सूर्यनगरी इंटरनेशनल स्कूल के मुख्य गेट के बाहर हमेशा की तरह चहल-पहल थी। महंगी गाड़ियां आ-जा रही थीं, बच्चे नए-नए यूनिफॉर्म में चमक रहे थे और सिक्योरिटी गार्ड व्यवस्था संभाल रहे थे।

इसी भीड़ में एक महिला धीरे-धीरे स्कूल के गेट की ओर बढ़ रही थी। फीकी नीली साड़ी, किनारों से उधड़ी हुई, पैरों में साधारण चप्पलें और हाथ में एक पुराना लेदर बैग, जिस पर कभी “टीचर्स प्राइड” लिखा हुआ था—अब लगभग मिट चुका था।

वह महिला थीं सुनीता शर्मा, उम्र लगभग पचपन वर्ष। चेहरे पर सादगी, आंखों में अनुभव की गहराई और चाल में वह गरिमा, जो सिर्फ एक सच्चे शिक्षक में होती है।

जैसे ही वह गेट पर पहुंचीं, गार्ड ने उन्हें रोक लिया।
“मैडम, कहां जाना है?”

सुनीता ने शांत मुस्कान के साथ कहा,
“बेटा, स्कूल के अंदर जाना है। प्रिंसिपल मैम से मिलना है।”

गार्ड ने ऊपर से नीचे तक उन्हें देखा और उपेक्षा से बोला,
“ये कोई सरकारी दफ्तर नहीं है। बिना अपॉइंटमेंट अंदर नहीं जा सकते।”

सुनीता ने धीमे स्वर में कहा,
“मैं यहां पहले पढ़ाया करती थी।”

गार्ड हंस पड़ा।
“मैडम, ये सूर्यनगरी इंटरनेशनल है। यहां पढ़ाने के लिए डॉक्टरेट वाले लाइन में खड़े रहते हैं।”

तभी अंदर से एक आधुनिक कपड़ों में सजी महिला बाहर आई—रीना मेहता, एचआर कोऑर्डिनेटर। उसने भी सुनीता को देखकर कहा,
“ऐसे लोग रोज आते हैं। कोई खुद को पुराना टीचर बताता है, कोई डोनेशन का बहाना करता है।”

पास खड़े कुछ अभिभावक फुसफुसाने लगे—
“लगता है नौकरी मांगने आई है।”
“कपड़े देखो जरा…”

सुनीता ने कुछ नहीं कहा। बस अपने बैग को कसकर पकड़ा और चुपचाप बाहर की ओर मुड़ गईं।

तभी पीछे से एक आवाज आई—
“नमस्ते, शर्मा मैम।”

सुनीता चौंकीं। सामने एक युवक खड़ा था, वही स्कूल यूनिफॉर्म, वही बैज।
“मैं आरव हूं मैम। आपने मुझे आठवीं में मैथ्स पढ़ाया था।”

सुनीता की आंखें भर आईं।
“आरव… तुम?”

आरव मुस्कुराया।
“हां मैम। और अब मैं इसी स्कूल का वाइस प्रिंसिपल हूं।”

पूरा माहौल सन्न हो गया। गार्ड सिर झुकाकर खड़ा था। रीना के चेहरे का रंग उड़ चुका था।

आरव ने आगे बढ़कर सुनीता का हाथ थाम लिया।
“मैम, अगर मैंने आपको पहचान लिया होता तो खुद गेट तक आता।”

सुनीता ने मुस्कुराकर कहा,
“बेटा, पहचान आंखों से नहीं, नजरों से होती है।”

आरव की आंखें भी नम थीं।
“आपने ही तो सिखाया था—अच्छे नंबर नहीं, अच्छा इंसान बनो।”

उसी दिन पता चला कि वह टीचर्स डे था।

अगले दिन स्कूल के सभागार में विशेष कार्यक्रम रखा गया। मंच पर बड़े अक्षरों में लिखा था—
“गुरुज़ हू इंस्पायर जेनरेशन्स”

आरव ने माइक संभालते हुए कहा,
“आज हम जिस शिक्षिका का सम्मान कर रहे हैं, उनके बिना यह स्कूल कभी खड़ा नहीं हो पाता।”

धीरे-धीरे वही साड़ी पहने सुनीता शर्मा मंच पर आईं। पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा।

सुनीता ने माइक लिया और कहा—
“कपड़े पुराने हो सकते हैं, पर मूल्य नहीं। शिक्षक की पहचान उसके कपड़ों से नहीं, उसके पढ़ाए हुए बच्चों से होती है।”

कई आंखें नम हो गईं।

अंत में घोषणा हुई—
स्कूल की लाइब्रेरी का नाम रखा जाएगा: ‘सुनीता शर्मा ज्ञान केंद्र’।

सुनीता ने बस इतना कहा—
“अगर मेरी किताबें किसी बच्चे के काम आ जाएं, तो वही मेरी सबसे बड़ी तनख्वाह है।”

उस दिन सभी ने समझ लिया—
सम्मान पद से नहीं, प्रभाव से मिलता है।