शामली के बावड़ी गांव की खौफनाक दुश्मनी: एक ही खानदान के 8 भाइयों ने ली एक-दूसरे की जान, 40 साल तक चलता रहा खूनी संघर्ष!

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शामली-बागपत का खूनी वंशवाद: दो सगे भाइयों की दुश्मनी कैसे तीन पीढ़ियों तक पहुंची और 11 हत्याओं की भयावह श्रृंखला में बदल गई

उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से से सामने आई एक रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पुरानी दुश्मनी, जमीनी विवाद, चुनावी रंजिश और परिवारों के बीच पनपी नफरत जब समय रहते नहीं रोकी जाती, तो उसका अंजाम कितना भयावह हो सकता है। यह मामला किसी एक हत्या, एक परिवार या एक गांव तक सीमित नहीं है। यह कहानी है एक ऐसी दुश्मनी की, जो कथित तौर पर 1980 के दशक में शुरू हुई, फिर दो सगे भाइयों के बीच तनाव में बदली, और धीरे-धीरे तीन पीढ़ियों तक फैलते हुए 11 हत्याओं की खूनी श्रृंखला में बदल गई।

यह घटनाक्रम उत्तर प्रदेश के शामली जिले के बाबड़ी गांव और उससे जुड़े इलाकों से सामने आया बताया जा रहा है। बाद की घटनाएं बागपत जिले के दोघट कस्बे तक जा पहुंचीं, जहां एक शादी समारोह के बीच हुए ताजा कत्ल ने फिर इस पुराने खूनी इतिहास को सुर्खियों में ला दिया। इस पूरी कहानी में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई हत्याएं वर्षों तक सिर्फ “बदले” के नाम पर होती रहीं, कुछ मामलों में मुकदमे चले, कुछ में सजाएं हुईं, कुछ में किशोर भी हत्यारे बने, और कुछ मामलों में भय इतना गहरा था कि पीड़ित पक्ष पुलिस तक जाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाया।

शुरुआत: जब दो सगे भाई आमने-सामने आ गए

इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें गांव की पुरानी चकबंदी और जमीनी विवादों में बताई जाती हैं। कहा जाता है कि गांव के एक किसान के चार बेटे थे—वेद सिंह, जगल, बोना और दरियाब सिंह। परिवार पहले सामान्य जीवन जी रहा था। लेकिन 1984 के आसपास गांव में चकबंदी की प्रक्रिया शुरू हुई। जैसा अक्सर ऐसे मामलों में होता है, हर किसान चाहता था कि उसकी जमीन ऐसी जगह आए जहां पैदावार भी अच्छी हो और मूल्य भी ज्यादा हो। इसी दौरान गांव में सुभाष नामक व्यक्ति की हत्या हुई। शुरुआत में यह साफ नहीं था कि हत्या किसने की, लेकिन धीरे-धीरे शक की उंगलियां परिवार के भीतर ही उठने लगीं।

यहीं से दो भाइयों—वेद सिंह और दरियाब सिंह—के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए। एक दूसरे पर हत्या का शक जताने लगे। बाकी दोनों भाई जगल और बोना ने खुद को इस विवाद से अलग रखने की कोशिश की, लेकिन वेद सिंह और दरियाब सिंह के बीच जो तनाव शुरू हुआ, वही आगे चलकर पूरे खानदान को निगल जाने वाली दुश्मनी का बीज बन गया।

यह तनाव धीरे-धीरे पारिवारिक मनमुटाव से आगे बढ़कर खुली अदावत में बदल गया। गांव के भीतर दोनों पक्ष अलग-अलग खेमों में बंटते गए। यही वह दौर था जब रंजिश की आग अंदर ही अंदर सुलग रही थी, जो अगले कुछ वर्षों में हत्याओं की श्रृंखला के रूप में फूट पड़ी।

1992: पहला बड़ा खून और खुली जंग

बताया जाता है कि 1992 में प्रधान का चुनाव आया। गांव की राजनीति और पहले से चली आ रही पारिवारिक रंजिश एक-दूसरे में मिल गई। इसी दौरान महेंद्र सिंह की हत्या हो गई, जो वेद सिंह का बेटा बताया जाता है। इस हत्या का आरोप दरियाब सिंह के बेटे देवेंद्र सिंह पर लगा। इस घटना के बाद दोनों परिवार खुलकर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए।

यह अब केवल शक या गाली-गलौज का मामला नहीं रहा था। पहली बार खून सीधे परिवार के लड़कों तक पहुंच चुका था। परिवारों के घर पास-पास थे, रिश्तेदारी एक ही गांव के भीतर थी, और अब आमने-सामने रहने वाले लोग दुश्मन बन चुके थे। गांव में तनाव का माहौल लगातार गहराता गया।

1999: पहले खून का बदला

इसके कुछ वर्षों बाद, 1999 में एक और हत्या हुई। इस बार दरियाब सिंह के बेटे जितेंद्र सिंह को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया। आरोप वेद सिंह के बेटे विवेक उर्फ विक्की पर लगा। गांव में यह माना जाने लगा कि महेंद्र की हत्या का बदला जितेंद्र की हत्या से लिया गया। अब यह दुश्मनी खुलकर बदले की परंपरा में बदल चुकी थी—एक हत्या के बदले दूसरी हत्या।

यानी अब परिवार केवल मुकदमे नहीं लड़ रहे थे, वे मौके की तलाश में थे। हर मौत अगले हमले का कारण बन रही थी। और इस तरह रंजिश का यह सिलसिला रुकने के बजाय और जटिल होता गया।

2000: सुरेश की हत्या और नई पीढ़ी का प्रवेश

इसके बाद साल 2000 आया और वेद सिंह के बेटे सुरेश मलिक की भी हत्या कर दी गई। आरोप फिर दरियाब सिंह के परिवार की ओर गया। सुरेश की मौत के बाद उसकी पत्नी बबली विधवा हो गई। परिवार ने फैसला किया कि उसे घर के भीतर ही रखा जाए और उसकी शादी अपने ही देवर विवेक उर्फ विक्की से करा दी जाए। यह कदम परिवार को जोड़े रखने और बच्चों को घर में सुरक्षित रखने के इरादे से उठाया गया बताया जाता है। लेकिन यह कोशिश भी उस खूनी इतिहास को रोक नहीं सकी, जो लगातार फैल रहा था।

सुरेश की पत्नी बबली के दो बेटे थे—सौरभ और सागर। यही दोनों आगे चलकर इस कहानी में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले थे। उस समय वे छोटे थे, लेकिन उनके जीवन की दिशा पहले ही बदल चुकी थी। उनके पिता की हत्या हो चुकी थी, और परिवार के भीतर “बदले” की मानसिकता लगातार मजबूत हो रही थी।

एक रात, तीन हत्याएं और पंचायत का समझौता

कहानी में आगे एक रात ऐसी भी आई जब तीन हत्याएं एक साथ हुईं—तेजपाल, रणवीर और एक छोटे बच्चे की मौत हुई। यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि इनकी हत्या किसने की, लेकिन दोनों परिवारों ने एक-दूसरे पर शक जताया। इस समय तक कुल छह हत्याएं हो चुकी थीं—कुछ इधर, कुछ उधर। गांव में डर और खौफ फैल चुका था।

इसी पृष्ठभूमि में पंचायतें बैठीं। ग्रामीणों और बुजुर्गों ने समझा कि यदि यह सिलसिला नहीं रोका गया तो दोनों खानदान खत्म हो जाएंगे। पंचायत ने दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने की कोशिश की। कहा गया कि पुरानी बातें भुलाकर आगे शांति रखी जाए। और कुछ समय के लिए ऐसा लगता भी है कि शांति लौट आई। लगभग साल 2000 से 2010 तक दोनों परिवारों में कोई बड़ी खूनी घटना सामने नहीं आई। लोगों को लगा कि शायद अब यह दुश्मनी खत्म हो चुकी है।

लेकिन यह शांति स्थायी नहीं थी।

2010-11: ढोल, जीत और फिर हत्या

फिर एक बार प्रधान का चुनाव आया। इस बार दरियाब सिंह का बेटा विजेंद्र सिंह जीत गया। चुनाव जीतने के बाद गांव में ढोल बजाए गए। आरोप यह भी लगाया गया कि विजेंद्र के पक्ष ने वेद सिंह के परिवार के घर के सामने आधे घंटे तक ढोल बजवाए, ताकि उन्हें नीचा दिखाया जा सके। गांव के कुछ लोगों ने भी हारे हुए परिवार को भड़काया कि यह सब जानबूझकर किया गया है। पुराना जख्म फिर हरा हो गया।

इसके ठीक छह महीने बाद, 25 जनवरी 2011 को विजेंद्र सिंह पर हमला हुआ। वह अपने भाई और अन्य लोगों के साथ एक शादी समारोह से लौट रहा था, तभी सामने से आई एक गाड़ी से विवाद की स्थिति बनी और अचानक हमलावरों ने गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। विजेंद्र सिंह की मौके पर मौत हो गई। आरोप वेद सिंह के परिवार के लोगों—सोनू, नरेश, विवेक उर्फ विक्की, चरण सिंह आदि—पर लगा। बाद में 18 दिसंबर 2021 को इस मामले में कई आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। एफआईआर विजेंद्र के भाई देवेंद्र ने दर्ज कराई थी।

यह हत्या उस समझौते को पूरी तरह तोड़ चुकी थी, जो पंचायत ने वर्षों पहले कराया था। दुश्मनी अब तीसरे चरण में प्रवेश कर रही थी।

2013: अदालत परिसर में किशोरों की हत्या

11 जुलाई 2013 को एक और सनसनीखेज घटना हुई। विजेंद्र हत्या मामले के वादी और चश्मदीद माने जाने वाले देवेंद्र सिंह मुजफ्फरनगर अदालत पहुंचे थे। अदालत परिसर में, दिनदहाड़े, दो कम उम्र के लड़के केलों की पॉलिथीन लिए उनके पास पहुंचे। उन्होंने राम-राम की और अगले ही पल एक ने गर्दन पर, दूसरे ने पेट पर तमंचा सटा दिया। फिर दोनों ने गोली चला दी। देवेंद्र सिंह की मौके पर मौत हो गई।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि दोनों हमलावर नाबालिग बताए गए। पूछताछ में उन्होंने कथित तौर पर कहा कि वे सुरेश की हत्या का बदला लेने आए थे। यानी साल 2000 में मारे गए सुरेश के बेटे—जिन्हें बचपन में ही पिता खोना पड़ा था—अब बड़े होकर “बदला” लेने की राह पर उतर चुके थे। बताया गया कि वे उस समय नाबालिग थे, इसलिए उन्हें बाल सुधार गृह भेजा गया।

यहां कहानी और भी गंभीर हो जाती है। क्योंकि अब दुश्मनी दूसरी पीढ़ी से निकलकर तीसरी पीढ़ी में प्रवेश कर चुकी थी। बच्चों के मन में भी “बदला” बोया जा चुका था।

बाल सुधार गृह से फरारी और गैंगस्टर की हत्या

कथित तौर पर यही दोनों लड़के बाद में बाल सुधार गृह से फरार हो गए। बताया जाता है कि उन्होंने वहां से भागने के बाद फिर अपराध का रास्ता चुना। इसी दौरान उन्हें यह सलाह दी गई कि दरियाब सिंह के परिवार की मदद करने वाला पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक कुख्यात गैंगस्टर विक्रांत उर्फ विक्की त्यागी है। यदि उसे रास्ते से हटा दिया जाए तो दुश्मन पक्ष कमजोर पड़ जाएगा।

इसके बाद उन लड़कों में से सागर और उसके भाई सौरभ के नाम सामने आए। आरोप है कि उन्होंने बाकायदा हथियार चलाने की ट्रेनिंग ली। फिर 16 फरवरी 2015 को मुजफ्फरनगर कोर्ट नंबर 10 में पेशी पर आए गैंगस्टर विक्की त्यागी पर हमला कर दिया। वकील के भेष में पहुंचे शूटर ने अदालत के भीतर ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं और विक्की त्यागी की हत्या कर दी। बाद की जांच में यह दावा किया गया कि इस हत्या के बदले उन्हें भारी रकम मिली थी।

अब तक कुल नौ हत्याएं हो चुकी थीं—और हर हत्या के पीछे बदले का चक्र और मजबूत होता जा रहा था।

2016: दरियाब सिंह के चौथे बेटे की हत्या

17 सितंबर 2016 को दरियाब सिंह के बेटे धर्मेंद्र उर्फ बबलू को उसके घर के सामने गोलियों से भून दिया गया। बताया गया कि हमलावरों ने 10 से 15 मिनट तक गोलीबारी की और उसे बचने का मौका ही नहीं दिया। इसके साथ ही दरियाब सिंह अपने चार बेटों—जितेंद्र, विजेंद्र, देवेंद्र और धर्मेंद्र—को खो चुका था। दूसरी ओर, वेद सिंह के परिवार में भी चार बेटों की हत्या हो चुकी थी। यानि दोनों पक्षों ने लगभग अपनी-अपनी पीढ़ी के पुरुष उत्तराधिकारियों को गंवा दिया था।

इस मामले में भी कई लोगों के नाम आए, जिनमें बबली का नाम भी शामिल बताया गया। बबली वही महिला थी, जो पहले सुरेश की पत्नी और बाद में विवेक उर्फ विक्की की पत्नी बनी थी। उसके बेटों सौरभ और सागर का नाम पहले ही पुराने हत्याकांडों से जुड़ चुका था। इस प्रकार परिवार के भीतर रिश्ते, शादियां, विरासत और दुश्मनी सब कुछ एक-दूसरे में उलझते गए।

2026: शादी समारोह में फिर खून

करीब एक दशक तक कुछ हद तक शांति दिखाई दी। लेकिन 10 मार्च 2026 की रात बागपत जिले के दोघट कस्बे में हुए एक विवाह समारोह ने इस खूनी इतिहास को फिर जगा दिया। विवेक उर्फ विक्की, जो वेद सिंह का बेटा और गांव के ही एक युवक की शादी का बिचौलिया बताया गया, बारात के दौरान वहां मौजूद था। रात करीब एक बजे वह टॉयलेट के लिए पार्किंग क्षेत्र की ओर गया। वहीं घात लगाए बैठे हमलावरों ने उस पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं। उसके सिर में चार गोलियां लगीं और उसकी मौके पर मौत हो गई।

भागते समय एक शूटर तार में फंसकर गिर पड़ा और बारातियों ने उसे पकड़ लिया। पूछताछ में उसने अपना नाम यशवीर उर्फ रजत बताया और कहा कि वह दरियाब सिंह का पोता है। कथित तौर पर उसने कहा कि उसने अपने पिता, ताऊ और चाचा की मौत का बदला लिया है।

यानी अब यह लड़ाई तीसरी पीढ़ी तक पूरी तरह पहुंच चुकी थी।

11 हत्याओं का हिसाब और प्रशासन पर सवाल

इस पूरी श्रृंखला में अब तक 11 हत्याओं का जिक्र सामने आता है। दोनों परिवारों के चार-चार करीबी सदस्य मारे गए, जबकि कुछ और लोग जो समर्थन में खड़े थे, वे भी इस खूनी संघर्ष का शिकार बन गए। कई मामलों में मुकदमे चले, कुछ में सजा हुई, कुछ में आरोपी नाबालिग थे, कुछ में बड़े गैंगस्टरों तक का नाम आया, और कुछ मामलों में लोग डर के कारण पुलिस तक नहीं गए।

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे भयावह पक्ष है। जब कानून पर भरोसा कमजोर पड़ता है और परिवार खुद ही “बदला” न्याय समझने लगते हैं, तब पीढ़ियां खत्म होने लगती हैं। इस मामले में यही दिखाई देता है। एक हत्या दूसरी हत्या की वजह बनी, फिर तीसरी, फिर चौथी—और देखते ही देखते पूरा खानदान मौत के साये में जीने लगा।

गांव के लोगों का यह भी कहना है कि अगर प्रशासन और पुलिस ने शुरूआती दौर में पूरी गंभीरता, निष्पक्षता और सख्ती से काम किया होता, तो शायद हालात यहां तक न पहुंचते। जब पहली हत्या हुई, तब गहरी जांच और स्थायी शांति की व्यवस्था होती, तो संभव है कि बाद की पीढ़ियों तक यह जहर न फैलता। लेकिन ढीली जांच, लंबी अदालतें, स्थानीय दबाव, पंचायत के अधूरे समझौते और सामाजिक भय—इन सबने मिलकर इस दुश्मनी को जीवित रखा।

निष्कर्ष

शामली और बागपत के इस खूनी घटनाक्रम की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इसमें कोई भी वास्तव में नहीं जीता। एक तरफ चार बेटों को खोने वाला परिवार है, दूसरी तरफ चार बेटों को खोने वाला दूसरा परिवार। कुछ हत्यारे जेल में हैं, कुछ मारे जा चुके हैं, और जो बचे हैं वे अगले “मौके” का इंतजार कर रहे होंगे—ऐसा गांव में डर बना हुआ है।

यह कहानी हमें बताती है कि “बदला” कभी खत्म नहीं होता, वह बस अगली पीढ़ी को सौंप दिया जाता है। और जब दुश्मनी विरासत बन जाए, तो परिवार का भविष्य कब्रिस्तान में बदलते देर नहीं लगती। इसलिए यह मामला सिर्फ अपराध कथा नहीं, बल्कि समाज और प्रशासन दोनों के लिए एक चेतावनी है—यदि समय रहते न्याय, सुरक्षा और सुलह की ठोस व्यवस्था न हो, तो निजी रंजिशें धीरे-धीरे सामूहिक विनाश का रूप ले लेती हैं।