यूपी प्रतापगढ़ की इस शातिर महिला की हौसला देख खुद पुलिस भी चौंक गई ||

रिश्तों का कत्ल और ब्लैकमेल का जाल: प्रतापगढ़ की एक खौफनाक दास्तान
प्रस्तावना: एक विशाल परिवार और छिपा हुआ सच
उत्तर प्रदेश का प्रतापगढ़ जिला अपनी ऐतिहासिक पहचान के साथ-साथ कई बार ऐसी घटनाओं का गवाह बनता है जो रूह कंपा देती हैं। मंधाता थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला मिस्रपुर गाँव एक साधारण सा गाँव दिखता था, लेकिन यहाँ के पूर्व प्रधान मुस्तफा गुलशन की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं थी। 50 वर्षीय मुस्तफा न केवल राजनीति में सक्रिय थे, बल्कि उनकी निजी जिंदगी भी बहुत पेचीदा थी। उनके दो नहीं, बल्कि कुल 18 बच्चे थे। मुस्तफा ने दो शादियाँ की थीं—पहली पत्नी किस्मतुल निसा और दूसरी अंबिया बानो। दोनों पत्नियों से उनके नौ-नौ बच्चे थे। इतने बड़े परिवार के साथ वह खुशहाल दिखते थे, लेकिन मुस्तफा के व्यक्तित्व का एक दूसरा पहलू भी था जो /अत्यधिक कामुक/ और /आशिक मिजाज/ था।
अध्याय 1: एक रहस्यमयी गुमशुदगी
18 मार्च 2026 की शाम, सूरज ढल रहा था। मुस्तफा गुलशन अपनी बाइक निकालते हैं और अपने परिवार से कहते हैं, “मैं किसी जरूरी काम से प्रयागराज जा रहा हूँ, देर रात तक लौट आऊँगा।” लेकिन वह रात कभी खत्म नहीं हुई। देर रात तक जब मुस्तफा घर नहीं लौटे, तो उनके बेटों ने फोन मिलाया। फोन बंद (स्विच ऑफ) आ रहा था।
पूरी रात परिवार बेचैनी में काटता है। नाते-रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों के यहाँ फोन खटखटाए जाते हैं, लेकिन मुस्तफा का कहीं कोई पता नहीं चलता। 19 मार्च का पूरा दिन तलाश में गुजर जाता है। अंततः 20 मार्च 2026 को परिवार मंधाता थाने पहुँचता है और गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराता है। चूंकि मुस्तफा पूर्व प्रधान थे, पुलिस इस मामले को गंभीरता से लेती है।
अध्याय 2: कॉल डिटेल्स और ‘सुमन’ का रहस्य
पुलिस की तफ्तीश का पहला कदम मुस्तफा के मोबाइल की कॉल डिटेल्स (CDR) निकालना था। जब डिटेल्स सामने आईं, तो पुलिस हैरान रह गई। मुस्तफा पिछले कई सालों से एक ही नंबर पर घंटों बात करते थे। चौंकाने वाली बात यह थी कि गायब होने से ठीक पहले आखिरी कॉल भी उसी नंबर पर थी और मोबाइल का आखिरी लोकेशन भी उसी इलाके में मिला।
वह नंबर 36 वर्षीय सुमन गौतम के नाम पर था, जो बगल के जेठवारा थाना क्षेत्र के बगियापुर गाँव की रहने वाली थी। 21 मार्च 2026 को पुलिस सुमन के घर दबिश देती है। पुलिस को देखते ही सुमन का चेहरा सफेद पड़ जाता है। जब उसे थाने लाकर पूछताछ की जाती है, तो वह बिना किसी दबाव के टूट जाती है और एक खौफनाक सच उगलती है—”साहब, मुस्तफा अब इस दुनिया में नहीं है, हमने उसे मार डाला।”
अध्याय 3: प्रेम, वासना और ब्लैकमेल की शुरुआत
सुमन ने जो कहानी सुनाई, उसकी जड़ें साल 2016 में थीं। उस समय मुस्तफा पहली बार प्रधानी का चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव प्रचार के दौरान उनकी मुलाकात सुमन से हुई। मुस्तफा, जो अपनी दो पत्नियों के बावजूद /परस्त्रीगामी/ स्वभाव के थे, सुमन की ओर आकर्षित हो गए। दोनों के बीच /अवैध संबंध/ शुरू हो गए। सुमन की जरूरतों को मुस्तफा पैसों से पूरा करते थे।
वक्त बदला, सुमन की शादी कहीं और हो गई। वह अपने ससुराल चली गई और एक नई जिंदगी शुरू करनी चाही। उसने मुस्तफा से कहा, “अब मेरा घर बस गया है, हमारे बीच जो /शारीरिक रिश्ता/ था, उसे यहीं खत्म कर देते हैं।” लेकिन मुस्तफा इसके लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने सुमन को /ब्लैकमेल/ करना शुरू कर दिया। मुस्तफा के पास उनके /एकांत के पलों/ के कुछ फोटो और वीडियो थे। उन्होंने धमकी दी, “अगर तुम मुझसे मिलना बंद करोगी, तो मैं ये सब सोशल मीडिया पर डाल दूँगा।”
अध्याय 4: मजबूरी का फायदा और गहराता दलदल
सुमन डर गई। उसे लगा कि अगर वह वीडियो सार्वजनिक हो गए, तो उसका बसा-बसाया संसार उजड़ जाएगा। मजबूरी में वह मुस्तफा के बुलाने पर उनसे मिलने जाती और अपने /तन का सौदा/ करती रही। 2021 में मुस्तफा चुनाव हार गए, लेकिन उनका अहंकार और /हवस/ कम नहीं हुई। उन्होंने सुमन से कहा, “भले ही मैं प्रधान नहीं रहा, लेकिन पैसा बहुत है। तुम बस मेरे पास आती रहो।”
सुमन को समझ आ गया था कि मुस्तफा उसे कभी चैन से जीने नहीं देंगे। वह इस /नर्क/ से निकलने का रास्ता ढूंढने लगी। उसे लगा कि जब तक मुस्तफा जिंदा है, वह आजाद नहीं हो सकती।
अध्याय 5: भाई अतुल की एंट्री और साजिश का निर्माण
सुमन का भाई अतुल गौतम, जो मुंबई में नौकरी करता था, 17 मार्च 2026 को गाँव लौटा। अतुल का आपराधिक रिकॉर्ड था और उस पर पुलिस का इनाम भी था। सुमन अपने भाई के पास गई और रोते हुए सब सच बता दिया—कैसे मुस्तफा उसे /ब्लैकमेल/ कर रहा है और जबरदस्ती /शारीरिक संबंध/ बना रहा है।
अतुल का खून खौल उठा। उसने अपनी बहन को दिलासा दिया, “तुझे डरने की जरूरत नहीं है, अब मुस्तफा का अंत करीब है।” अतुल ने अपने दोस्त अरुण गौतम को इस साजिश में शामिल किया। एक सटीक प्लान तैयार किया गया। मुस्तफा को उसी जाल में फंसाने की योजना बनी जिसमें वह सुमन को फंसाता था—/कामवासना/ का जाल।
अध्याय 6: 18 मार्च की वह खूनी रात
प्लान के मुताबिक, 18 मार्च को सुमन ने मुस्तफा को फोन किया। उसने बड़ी मीठी आवाज में कहा, “मैं अपने मायके बगियापुर आई हूँ, रात में घर पर कोई नहीं है। आज रात यहीं रुक जाओ, बहुत याद आ रही है।” मुस्तफा, जो अपनी /शारीरिक भूख/ के आगे अंधा हो चुका था, बिना कुछ सोचे-समझे बाइक उठाकर निकल पड़ा। उसने घर पर झूठ बोला कि वह प्रयागराज जा रहा है।
जैसे ही मुस्तफा सुमन के घर पहुँचा, सुमन ने उसका स्वागत किया। वह उसे कमरे में ले गई। जैसे ही मुस्तफा /शारीरिक संबंधों/ के बाद थकान मिटाने के लिए बेड पर लेटा, अंधेरे में छिपे अतुल और अरुण बाहर निकल आए। उनके हाथों में लोहे की सरिया थी। इससे पहले कि मुस्तफा कुछ समझ पाता, उनके सिर पर सरिए से ताबड़तोड़ वार किए गए। मुस्तफा की चीख तक नहीं निकली और मौके पर ही उनकी मौत हो गई।
अध्याय 7: साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश
हत्या के बाद अपराधियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती लाश को ठिकाने लगाना था। उन्होंने पहले से सीमेंट की बोरियाँ मंगा रखी थीं। मुस्तफा की भारी-भरकम देह को एक बोरी में ठूसा गया और उसे मजबूती से सिल दिया गया। अतुल और अरुण ने उस बोरी को बाइक पर लादा और रात के सन्नाटे में सुमेरपुर गाँव के पास सहायक शारदा नहर में फेंक दिया।
साक्ष्य मिटाने के लिए उन्होंने मुस्तफा का मोबाइल बंद किया, उसका हेलमेट दूर झाड़ियों में फेंका और उसकी बाइक को घटनास्थल से 2 किलोमीटर दूर जंगल में लावारिस छोड़ दिया। उन्हें लगा कि उन्होंने एक ‘परफेक्ट मर्डर’ किया है, लेकिन वे मुस्तफा के कॉल रिकॉर्ड्स को भूल गए थे।
अध्याय 8: पुलिस की कार्रवाई और खुलासे
सुमन की निशानदेही पर पुलिस नहर के किनारे पहुँचती है। गोताखोरों की मदद से बोरी निकाली जाती है। जब बोरी खोली गई, तो मुस्तफा का क्षत-विक्षत शव देखकर पुलिस वाले भी कांप गए। परिवार को शिनाख्त के लिए बुलाया गया। 18 बच्चों के पिता की ऐसी दर्दनाक मौत देखकर पूरा इलाका दहल गया।
पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए अतुल गौतम को भी गिरफ्तार कर लिया, जो भागने की फिराक में था। पूछताछ में अतुल ने स्वीकार किया कि उसने अपनी बहन की /इज्जत/ बचाने के लिए मुस्तफा को रास्ते से हटाया। हालांकि, पुलिस की नजर में यह एक सोची-समझी हत्या थी।
अध्याय 9: बिखरते रिश्तों की कड़वी सच्चाई
जब सुमन के ससुराल वालों को इस /अवैध संबंध/ और हत्या के बारे में पता चला, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। जेल में सुमन से मुलाकात के दौरान उसके ससुराल वालों ने कहा, “अगर तुम इतनी बड़ी परेशानी में थीं, तो हमें एक बार बताया होता। हम कोई दूसरा रास्ता निकालते, कानून की मदद लेते, लेकिन तुम्हें अपने हाथों से /खून/ नहीं करना चाहिए था।”
आज सुमन और अतुल जेल की सलाखों के पीछे हैं। तीसरा आरोपी अरुण अभी भी फरार है। मुस्तफा का बड़ा परिवार अब बिखर चुका है और गाँव में केवल सन्नाटा और बदनामी की कहानियाँ बची हैं।
निष्कर्ष: यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे समस्या कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अपराध कभी उसका समाधान नहीं हो सकता। /अनैतिक रिश्तों/ और /वासना/ का अंत हमेशा दुखद होता है। मुस्तफा की /हवस/ ने उन्हें मौत दी, तो सुमन के /गलत निर्णय/ ने उसकी और उसके भाई की जिंदगी बर्बाद कर दी।
सावधानी: अपनी समस्याओं को साझा करें, कानून पर भरोसा रखें और आसान लेकिन गलत रास्तों से बचें।
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