स्टेशन की मासूम सोनू और पिता का पुनर्मिलन
भीड़भाड़ वाले रेलवे स्टेशन पर शाम का वक्त था। प्लेटफार्म नंबर तीन पर एक छोटी सी बच्ची बैठी थी, नाम था सोनू। उसके हाथों में जूते पॉलिश करने का डिब्बा और ब्रश था। फटे पुराने कपड़े, टूटे-फूटे चप्पल, धूल से सना चेहरा, लेकिन आंखों में मासूमियत और मुस्कान थी। वह हर आने-जाने वाले से कहती—”साहब, जूते पॉलिश करा लो, सिर्फ ₹5 लगेंगे।”
कुछ लोग उसे नजरअंदाज कर आगे बढ़ जाते, कुछ दुत्कार देते, लेकिन सोनू हर ठोकर के बाद भी मुस्कुराने की कोशिश करती। स्टेशन ही उसका घर था, फर्श ही उसका बिस्तर और आसमान उसकी छत।
एक दिन उसी स्टेशन पर एक बड़ी सी Fortuner कार आकर रुकी। उसमें से सूट-बूट पहने एक अमीर आदमी उतरा—अरुण मल्होत्रा, शहर के मशहूर उद्योगपति। सोनू ने सोचा, “अगर इनके जूते पॉलिश करूंगी तो अच्छे पैसे मिलेंगे।” वह दौड़कर अरुण के पास गई, “साहब, आपके जूते पॉलिश कर दूं, सिर्फ ₹5 दे देना।”
अरुण ने जब सोनू को देखा, तो चौंक गए। उसकी आंखों में वही मासूमियत, वही चमक थी जो उन्होंने कहीं देखी थी। अरुण के दिल में हलचल मच गई, वे कुछ देर तक सोनू को निहारते रहे।
उन्होंने पूछा, “बेटी, तू यह काम क्यों कर रही है? तेरे मां-बाप कहां हैं?”
सोनू ने उदास होकर जवाब दिया, “मुझे नहीं पता साहब। जब से याद है, यहीं हूं। स्टेशन ही मेरा घर है।”
अरुण के हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी—अपनी खोई हुई बेटी अनाया की। सालों पहले एक बरसात की रात उनकी बेटी मंदिर के बाहर भीड़ में कहीं खो गई थी। अरुण और उनकी पत्नी संध्या ने उसे बहुत ढूंढा, पुलिस में रिपोर्ट की, लेकिन अनाया का कोई सुराग नहीं मिला। उस हादसे ने अरुण और संध्या दोनों को तोड़ दिया, रिश्तों में दरार आ गई, वे अलग हो गए। अरुण के पास दौलत थी, लेकिन दिल खाली था।
कुछ दिनों बाद अरुण फिर स्टेशन पर आए। उन्होंने सोनू को फिर देखा—वही मासूम चेहरा, वही मुस्कान। इस बार अरुण ने अपने जूते आगे बढ़ा दिए। सोनू झुककर पॉलिश करने लगी।
अरुण ने पूछा, “बेटी, तेरा नाम क्या है?”
सोनू ने मुस्कुरा कर जवाब दिया, “सोनू।”
अरुण ठिठक गए, अनाया को भी प्यार से यही बुलाते थे।
“बेटा, तुम्हारा नाम सोनू किसने रखा?”
“पता नहीं साहब, जब से होश संभाला है, सब मुझे सोनू ही कहते हैं।”

अरुण की आंखों से आंसू छलक आए। उन्होंने पूछा, “क्या तुम्हारे पास कोई पुरानी चीज़ है, कोई निशानी?”
सोनू ने अपने पैरों की पायल दिखाई, “बस यह पायल है, बचपन से पहन रखी है।”
अरुण ने देखा, वही चांदी की पायल जो उन्होंने अपनी बेटी अनाया के पहले जन्मदिन पर बनवाकर पहनाई थी।
अरुण फूट-फूटकर रो पड़े, “हे भगवान, यह मेरी अनाया है!”
उन्होंने सोनू को गले लगा लिया, “बेटा, तू मेरी खोई हुई गुड़िया है। देख, यह पायल तेरे पैरों में मैंने खुद पहनाई थी।”
सोनू डर गई, पीछे हट गई, “नहीं साहब, आप गलती कर रहे हो। मैं अनाया नहीं हूं, मैं तो बस सोनू हूं। रेल के डिब्बों में जूते चमकाकर ही पेट भरती हूं। मेरी तो कोई मां-बाप भी नहीं है।”
अरुण ने हाथ जोड़कर कहा, “बेटा, तू मुझे पहचान नहीं रही, लेकिन मैं तुझे अपनी रग-रग से पहचानता हूं। तेरी मासूमियत मेरी आंखों में बसी है।”
भीड़ इकट्ठा होने लगी, लोग तमाशा देखने लगे।
सोनू ने हाथ छुड़ाया, “नहीं, मुझे जाने दो। आप भी सब जैसे हो। पहले सब प्यार जताते हैं, फिर मारते-पीटते हैं। मुझे अपने हाल पर छोड़ दो।”
सोनू भीड़ में गुम हो गई, अरुण जमीन पर बैठ गए, उनके होंठों से बस एक ही नाम निकल रहा था—अनाया।
अगले दिन अरुण फिर स्टेशन पहुंचे। सोनू को ढूंढने लगे। कुछ देर बाद देखा, वही बच्ची कोने में बैठी थी।
अरुण दौड़कर उसके पास पहुंचे, “अनाया बेटा!”
सोनू ने डर के साथ अरुण को देखा, “फिर आप आ गए? क्यों पीछा कर रहे हो मेरा? मैंने कहा ना, मैं आपकी बेटी नहीं हूं।”
अरुण ने हाथ जोड़कर कहा, “बेटा, एक बार मेरी बात मान ले। अगर तू मेरी अनाया नहीं निकली, तो मैं तुझे कभी परेशान नहीं करूंगा। डीएनए टेस्ट करवा लेते हैं।”
सोनू चुप हो गई, उसकी आंखों में थकान थी, “मुझे तो अपना असली नाम तक नहीं पता। जिन लोगों ने मुझे पाला, उन्होंने बस यही कहा कि मुझे रेलवे प्लेटफार्म पर अकेला पड़ा पाया था। शायद मेरे मां-बाप मुझे छोड़कर चले गए।”
अरुण की आंखों में आंसू आ गए, “नहीं बेटा, तेरे मां-बाप तुझसे बहुत प्यार करते थे। तुझे कभी छोड़ नहीं सकते थे। तू गुम हो गई थी और आज तक मैं तुझे ढूंढ रहा हूं।”
अरुण ने कहा, “अगर तू चाहती है तो हम टेस्ट करवा सकते हैं। डीएनए टेस्ट से सब साबित हो जाएगा। अगर तू मेरी बेटी नहीं निकली, तो मैं तुझसे कभी कुछ नहीं कहूंगा। लेकिन अगर तू मेरी अनाया निकली, तो मैं तुझे इस नरक से निकालकर अपने घर ले जाऊंगा।”
सोनू के दिल में हलचल मच गई। उसने कांपती आवाज में कहा, “अगर मैं आपके साथ गई और आप झूठे निकले, तो मैं फिर कहां जाऊंगी?”
अरुण ने उसका चेहरा थाम कर कहा, “बेटा, भगवान की कसम, मैं तुझे कभी धोखा नहीं दूंगा। अगर तू मेरी बेटी नहीं भी निकली, तो भी मैं तुझे अपनी बेटी बनाकर रखूंगा।”
सोनू की आंखें भर आईं, पहली बार किसी ने उसे अपनेपन से देखा था।
अरुण सोनू को अस्पताल ले गए, डीएनए टेस्ट करवाया। रिपोर्ट आई—डॉक्टर ने कहा, “बधाई हो, यह बच्ची सचमुच आपकी ही बेटी है।”
अरुण की आंखों से आंसू बह निकले, उन्होंने सोनू को गले से लगा लिया, “अनाया मेरी गुड़िया, तू सच में मेरी बेटी है।”
सोनू भी रोते हुए अरुण के सीने से लिपट गई, “पापा, सच में मेरे पापा!”
अरुण ने सबसे पहले संध्या को फोन किया, “संध्या, अनाया मिल गई है।”
संध्या दौड़कर अस्पताल पहुंची, बेटी को देखकर पागलों की तरह गले से लगा लिया।
“मम्मा, मुझे लगा आप मुझे छोड़ गई थीं।”
“नहीं गुड़िया, हम तो तुझे हर दिन ढूंढ रहे थे।”
अरुण, संध्या और अनाया—तीनों बरसों बाद एक साथ खड़े थे। अस्पताल में सब भावुक हो गए।
अनाया ने दोनों का हाथ कसकर पकड़ लिया, “अब हम कभी अलग नहीं होंगे, है ना पापा?”
अरुण और संध्या ने एक साथ कहा, “कभी नहीं बेटा, कभी नहीं।”
कभी-कभी जिंदगी हमें परखती है, बिछड़ाकर आंसू देती है। लेकिन सच्चा प्यार और अपनेपन का रिश्ता वक्त के साथ फिर जुड़ जाता है।
अरुण, संध्या और अनाया की कहानी यही साबित करती है कि खून के रिश्ते और दिल का प्यार किसी भी दूरी, किसी भी गलतफहमी से बड़े होते हैं।
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