पिता की आखिरी इच्छा के लिए बेटा 5 दिन के लिए किराए की बीवी लाया… फिर जो हुआ |
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पाँच दिनों का रिश्ता
मुंबई शहर अपनी भागदौड़ और चमक-दमक के लिए जाना जाता है। यहाँ हर इंसान किसी न किसी सपने के पीछे भाग रहा होता है। इसी शहर में एक बड़ा व्यापारी रहता था, जिसका नाम था विनोद गुप्ता। उसके पास सब कुछ था—बड़ा कारोबार, शानदार बंगला, महंगी गाड़ियाँ और बैंक बैलेंस। लेकिन उस दिन उसकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने सब कुछ बदल दिया।
एक शाम विनोद को अस्पताल से फोन आया। डॉक्टर ने कहा कि उसके पिता श्याम गुप्ता की हालत बहुत गंभीर है और उसे तुरंत अस्पताल आना चाहिए।
विनोद घबराकर अस्पताल पहुँचा। जब वह कमरे में दाखिल हुआ तो उसने देखा कि उसके पिता ऑक्सीजन के सहारे सांस ले रहे थे। उनके चेहरे पर कमजोरी साफ दिखाई दे रही थी।
विनोद उनके पास जाकर बैठ गया और उनका हाथ पकड़ लिया।
“पापा, आप ठीक हो जाएंगे। डॉक्टर आपका इलाज कर रहे हैं,” उसने धीमी आवाज में कहा।
श्याम गुप्ता ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा।
“बेटा, डॉक्टरों ने जो कहना था कह दिया है। शायद मेरे पास ज्यादा समय नहीं है।”
यह सुनकर विनोद की आँखें भर आईं।
“ऐसी बातें मत करिए पापा।”
श्याम गुप्ता ने उसका हाथ दबाया और बोले—
“मुझे बस एक ही चिंता है। मैं मरने से पहले तुम्हारी शादी देखना चाहता हूँ। अगर पाँच दिनों के अंदर तुम शादी नहीं करते, तो मैं अपनी सारी संपत्ति दान कर दूँगा। मैं अपने परिवार का वंश अधूरा नहीं छोड़ना चाहता।”
विनोद यह सुनकर सन्न रह गया।
पाँच दिनों में शादी?
यह कैसे संभव था?
लेकिन पिता की हालत देखकर उसने हाँ कर दी।
“पापा, मैं आपकी इच्छा जरूर पूरी करूँगा।”
यह सुनकर श्याम गुप्ता की आँखों में शांति आ गई।
टूटा हुआ भरोसा
अस्पताल से निकलते ही विनोद ने अपनी मंगेतर प्रिया को फोन किया।
प्रिया और विनोद कॉलेज के दिनों से एक-दूसरे को पसंद करते थे और दोनों की सगाई भी हो चुकी थी।
फोन उठाते ही विनोद ने कहा—
“प्रिया, पापा की हालत बहुत खराब है। उनकी आखिरी इच्छा है कि हमारी शादी पाँच दिनों के अंदर हो जाए।”
कुछ पल तक फोन के दूसरी तरफ खामोशी रही।
फिर प्रिया बोली—
“विनोद, मैं इतनी जल्दी शादी के लिए तैयार नहीं हूँ। अभी मेरी नई नौकरी शुरू हुई है। मैं अभी शादी नहीं कर सकती।”
“लेकिन प्रिया, यह पापा की आखिरी इच्छा है।”
“मैं समझती हूँ, लेकिन मैं अभी फँसना नहीं चाहती।”
यह कहकर प्रिया ने फोन काट दिया।
विनोद का दिल टूट गया।
एक तरफ पिता की आखिरी इच्छा थी, और दूसरी तरफ उसका प्यार।
मजबूरी का फैसला
दो दिन तक सोचने के बाद विनोद अपने दोस्त और वकील राजेश के पास गया।
विनोद ने सारी बात बताई और कहा—
“यार, मुझे पाँच दिनों के लिए एक नकली शादी करनी होगी। बस पापा को दुल्हन दिखानी है ताकि उनकी इच्छा पूरी हो जाए।”
राजेश चौंक गया।
“यह गलत है, लेकिन तेरी मजबूरी समझ में आती है।”
कुछ देर सोचने के बाद राजेश बोला—
“मैं एक लड़की को जानता हूँ। उसका नाम मेघा शर्मा है। उसकी माँ बहुत बीमार है और उनके इलाज के लिए पैसे नहीं हैं। शायद वह तैयार हो जाए।”
अगले दिन मेघा राजेश के ऑफिस आई।
वह बहुत साधारण कपड़ों में थी। उसके चेहरे पर थकान और चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
विनोद ने सीधे-सीधे उसे सारी बात बता दी।
“यह शादी सिर्फ पाँच दिनों के लिए होगी। उसके बाद हम तलाक ले लेंगे। बदले में मैं आपकी माँ का पूरा इलाज करवा दूँगा और आपके घर का कर्ज भी चुका दूँगा।”
मेघा कुछ देर चुप रही।
फिर उसने धीमी आवाज में कहा—
“अगर इससे मेरी माँ की जान बच सकती है, तो मैं तैयार हूँ। लेकिन एक शर्त है—मेरी इज्जत को कोई ठेस नहीं पहुँचेगी।”
विनोद ने तुरंत कहा—
“मैं वादा करता हूँ।”
एक अजीब रिश्ता
उसी शाम दोनों ने कोर्ट में जाकर कागजों पर शादी कर ली।
कोई बारात नहीं, कोई मंडप नहीं, कोई शहनाई नहीं।
बस दो अजनबी लोग एक मजबूरी के रिश्ते में बंध गए।
विनोद मेघा को अपने घर ले आया और उसे गेस्ट रूम में रहने के लिए कहा।
घर में शादी जैसा कोई माहौल नहीं था।
सब कुछ शांत था।
पहले दिन दोनों के बीच ज्यादा बात नहीं हुई।
लेकिन अगले दिन जब विनोद सुबह नाश्ते के लिए आया तो उसे टेबल पर एक छोटा सा कागज मिला।
उसमें लिखा था—
“आपने मेरी माँ की जान बचाने के लिए मदद की है। मैं आपकी इस मदद को कभी नहीं भूलूँगी।”
विनोद ने वह कागज अपनी जेब में रख लिया।
उसे पहली बार लगा कि मेघा एक बहुत अलग और सच्ची लड़की है।
पिता की खुशी
जब दोनों अस्पताल पहुँचे और श्याम गुप्ता ने मेघा को देखा, तो उनके चेहरे पर खुशी छा गई।
“यह मेरी बहू है?” उन्होंने मुस्कुराकर पूछा।
मेघा ने उनके पैर छुए।
“जी पापा जी।”
श्याम गुप्ता की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।
“अब मैं चैन से मर सकता हूँ।”
उस दिन के बाद मेघा रोज अस्पताल जाकर उनकी देखभाल करने लगी।
वह उनसे बातें करती, दवाइयाँ देती और उनका मन बहलाती।
धीरे-धीरे श्याम गुप्ता की तबीयत में सुधार होने लगा।
डॉक्टर भी हैरान थे।
बदलते एहसास
घर में भी मेघा की मौजूदगी से एक अलग सा सुकून आने लगा था।
विनोद ने महसूस किया कि घर में पहले से ज्यादा शांति और गर्मजोशी है।
एक शाम दोनों बरामदे में खड़े बारिश देख रहे थे।
मेघा बोली—
“बारिश सब कुछ साफ कर देती है। दुख भी और गलतियाँ भी।”
विनोद ने उसकी तरफ देखा।
उसे महसूस हुआ कि यह लड़की सिर्फ मजबूरी में नहीं आई थी, बल्कि उसके अंदर बहुत गहराई थी।
सच्चाई का सामना
पाँचवें दिन सुबह मेघा अपना बैग पैक कर रही थी।
आज समझौते का आखिरी दिन था।
वह विनोद से बिना कुछ कहे घर से निकलने लगी।
विनोद उसे रोक नहीं पाया।
लेकिन जैसे ही वह घर से गई, विनोद को घर खाली-खाली लगने लगा।
उसका मन बेचैन हो उठा।
शाम होते-होते वह खुद को रोक नहीं पाया और मेघा के घर पहुँच गया।
मेघा आँगन में बैठी थी।
विनोद ने जेब से वह कागज निकाला जिस पर उनका समझौता लिखा था।
फिर उसने उसे फाड़ दिया।
“अब यह रिश्ता कागज पर नहीं, मेरे दिल में है,” उसने कहा।
मेघा की आँखों में आँसू आ गए।
“क्या यह सच है?”
विनोद ने कहा—
“हाँ, क्योंकि अब यह सिर्फ एक डील नहीं है। यह सच्चा रिश्ता है।”
एक नई शुरुआत
दोनों वापस अस्पताल गए।
जब श्याम गुप्ता ने मेघा को देखा तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
“बहू, तुम वापस आ गई!”
मेघा ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“अब मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी।”
श्याम गुप्ता की आँखों से आँसू बहने लगे।
एक महीने बाद विनोद ने पूरे परिवार और रिश्तेदारों को बुलाया।
सबके सामने उसने घोषणा की—
“आज से मेघा सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि दिल से मेरी पत्नी है।”
सभी ने तालियाँ बजाईं।
मेघा की आँखों में खुशी के आँसू थे।
और श्याम गुप्ता के चेहरे पर सुकून की मुस्कान।
कहानी का संदेश
यह कहानी हमें सिखाती है कि कई बार जिंदगी में बनने वाले रिश्ते शुरुआत में मजबूरी से बनते हैं।
लेकिन अगर उनमें ईमानदारी, सम्मान और सच्चा दिल हो, तो वही रिश्ते जिंदगी भर के लिए सबसे मजबूत बन जाते हैं।
कभी-कभी किस्मत हमें ऐसे लोगों से मिलाती है जिनके बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं होता।
लेकिन वही लोग हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशियाँ बन जाते हैं।
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