कहानी: एक गुब्बारा, एक नाम, और एक मां

दिल्ली की भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर हर दिन लाखों गाड़ियाँ दौड़ती हैं, मगर कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो ट्रैफिक सिग्नल की भीड़ के बीच भी अपनी राह बना लेती हैं। यह कहानी भी ऐसी ही एक सुबह शुरू होती है, जब आदित्य और अनन्या अपने ऑफिस के लिए निकलते हैं। वे रोज़ बदरपुर बॉर्डर से नेहरू प्लेस की ओर अपनी कार में जाते थे। रास्ते में अक्सर रेड सिग्नल पर कुछ गरीब बच्चे उनकी गाड़ी को घेर लेते—कोई शीशा साफ करता, कोई गुलाब के फूल बेचता, और कोई सिर्फ एक नज़र में दया माँगता। लेकिन उन सभी बच्चों में एक था जो अनन्या को बार-बार अपनी मासूमियत से छू जाता। वह बच्चा कभी गुब्बारे बेचता, कभी पेन, कभी फूल। उसका नाम शिवांश था। उम्र मुश्किल से 10 साल। आँखों में चमक, बातों में मिठास और चेहरे पर एक ऐसी मासूमियत जो अनन्या के दिल को झकझोर देती थी।

अनन्या उस समय छह महीने की गर्भवती थी। एक दिन जब वह गुब्बारा लेकर आई, तो शिवांश ने कहा—”आंटी, गुब्बारा ले लीजिए।” अनन्या हँसी, “जब मेरा बच्चा इस दुनिया में आएगा तब तक तो ये फट जाएगा।” शिवांश बोला—”नहीं आंटी, अगर आप इसे छोड़ेंगे नहीं तो ये कभी नहीं फटेगा।” उस एक वाक्य ने अनन्या को भीतर तक छू दिया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके अंदर छिपे मातृत्व को पुकारा हो। उसने दो गुब्बारे लिए और शिवांश को एक सौ रुपये का नोट पकड़ाया। सिग्नल हरा हुआ और गाड़ी आगे बढ़ गई, लेकिन उस दिन अनन्या के दिल में कुछ बदल गया था।

समय बीतता गया और अनन्या और शिवांश के बीच एक अजीब-सा रिश्ता बनने लगा—बिना नाम का, बिना संबंध का, मगर बहुत गहरा। कभी पेन, कभी फूल, कभी सिर्फ मुस्कुराहट के बहाने। अनन्या उसे सौ-दो सौ रुपये दे देती, लेकिन बिना दिखावे के, बिना अफसोस के। वह खुद नहीं समझ पाई कि वह बच्चे से क्यों जुड़ती जा रही है। मगर एक दिन वह नहीं आया। रेड सिग्नल पर गाड़ी रुकी मगर वो लड़का कहीं नहीं था। तभी दो बच्चे दौड़ते हुए आए और बोले, “आंटी, आप शिवांश को ढूंढ रही हो ना? उसका एक्सीडेंट हो गया है।”

अनन्या का दिल बैठ गया। उसने काँपती आवाज़ में पूछा, “कहाँ है वो? हालत कैसी है?” बच्चों ने बताया कि उसके सिर में गहरी चोट आई है और हालत गंभीर है। अनन्या ने आदित्य से कहा कि वह उसे वहीं उतार दे। एक बच्चा उसे संगम विहार की झुग्गियों तक ले गया। वहाँ एक बूढ़ी औरत बैठी थी—और अनन्या को देखते ही रोने लगी। “मैं तेरे बेटे को नहीं बचा पाई,” वो बड़बड़ाई। अनन्या ठिठक गई। “क…क्या?” उसकी आवाज़ काँप गई। “क्या कहा आपने?” “वो तेरा ही बेटा था,” उस औरत ने कहा।

ज़मीन खिसक गई। अनन्या की आँखों के सामने अंधेरा छा गया। वह चिल्लाई, “मेरा बेटा…? क्या वो… मेरा शिवांश…?” आँसू बहते रहे, साँस अटकती रही, और यादें उमड़ती चली गईं। आठ साल पहले की वो रात जब अनन्या ने मजबूरी में अपना बच्चा पीछे छोड़ दिया था, सिर्फ इसलिए कि समाज, परिवार और परिस्थितियों ने उसे उस मोड़ पर ला खड़ा किया था जहाँ उसे अपना दिल फाड़कर एक माँ से एक ‘बेटी’ बनना पड़ा।

समर… उसका पहला प्यार। उससे शादी करके अनन्या ने दुनिया की परवाह नहीं की थी, लेकिन कुछ रिश्ते सिर्फ प्यार पर नहीं टिकते। समर एक गैंगस्टर था, और एक दिन उसे गोली मार दी गई। अनन्या अकेली रह गई। उसका बेटा, शिवांश, उसकी दुनिया बन गया। लेकिन तब उसके माता-पिता ने वापस आकर उसे एक और विकल्प दिया—नई शादी, नई ज़िंदगी—but one condition—बच्चा छोड़ना होगा। और तब, आँसुओं के सैलाब में, माँ की छाती पर पत्थर रखकर, उसने अपना शिवांश उसकी दादी को सौंप दिया था।

अब वो दादी उसके सामने बैठी थी। “मैंने उसे दिल्ली ले आया,” दादी बोली, “ताकि तुझसे दूर होकर जी सके। लेकिन किस्मत को देख, आज वही बच्चा तेरी गाड़ी के पास भीख मांग रहा था। और तू उसे पहचान भी नहीं पाई।” अनन्या की आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे। “मैं उसे देखना चाहती हूँ,” उसने रोते हुए कहा। और वो अस्पताल पहुँची।

ICU में शिवांश मशीनों से जुड़ा था, चेहरे पर पट्टियाँ, होंठ सूखे हुए, मगर साँसें चल रही थीं। डॉक्टर ने कहा—”अगर होश आ गया, तो बच जाएगा।” तीन दिन की तड़प के बाद शिवांश ने आँखें खोलीं। अनन्या दौड़ती हुई उसके पास पहुँची। उसने मुस्कराकर कहा—”आंटी… आप आ गईं?” अनन्या का दिल टूट गया। उसने उसका हाथ पकड़ा और कहा—”बेटा, मैं आंटी नहीं… मैं तुम्हारी माँ हूँ।” और आँसू बहते रहे…

आदित्य को ये सब नहीं पता था। जब उसे सच्चाई पता चली, तो उसने अनन्या को छोड़ दिया। “तुमने मुझसे सब छुपाया। हमारा रिश्ता यहीं खत्म होता है।” मगर कुछ रिश्ते भगवान के बनाये होते हैं। दस दिन बाद आदित्य अपनी माँ और बहन के साथ वापस आया। उसकी माँ ने अनन्या को गले लगाते हुए कहा, “बेटी, चलो घर चलते हैं। तुम्हारा बेटा भी, और अब हमारा पोता भी।”

शिवांश धीरे-धीरे ठीक हुआ। अनन्या और आदित्य ने उसे अपनाया। कुछ ही महीनों बाद, अनन्या ने एक और बेटे को जन्म दिया। फिर एक बेटी हुई। आज शिवांश, उसका छोटा भाई और बहन एक साथ खेलते हैं, हँसते हैं, और कहते हैं—”माँ, आप दुनिया की सबसे अच्छी माँ हो।”


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“एक बच्चा अपनी माँ की आँखों में सिर्फ दूध नहीं, पूरा ब्रह्मांड ढूँढता है।”