पुलिस बनकर छोड़ा साथ, फिर जो हुआ रो पड़ोगे |

सच्चे प्रेम का बलिदान और प्रतिशोध की आग: सूरज और काजल

अध्याय 1: रामपुर की गलियां और मासूम सा प्यार

रामपुर एक छोटा सा गांव था, जहाँ वक्त की रफ़्तार शहर की चकाचौंध से कोसों दूर थी। इसी गांव के एक कोने में एक पुरानी साइकिल रिपेयरिंग की दुकान थी, जिसे ‘सूरज का गैरेज’ कहा जाता था। सूरज, एक साधारण सा युवक, जिसके पास दौलत तो नहीं थी, पर उसका दिल किसी सम्राट से कम बड़ा न था। उसकी कमीज हमेशा ग्रीस और मिट्टी से सनी रहती थी, पर उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी।

उस गैरेज के सामने से रोज काजल गुजरती थी। काजल गांव की सबसे होनहार और सुंदर लड़की थी। वह आँखों में पुलिस अफसर बनने का सपना लिए कोचिंग जाती थी। सूरज उसे छुप-छुप कर देखा करता था। उसे लगता था कि वह एक मामूली मैकेनिक है और काजल जैसी पढ़ी-लिखी लड़की उससे बात भी क्यों करेगी?

किस्मत का खेल देखिए, एक दिन काजल की साइकिल सूरज की दुकान के सामने ही खराब हो गई। काजल ने घबराकर कहा, “भैया, जल्दी ठीक कर दीजिए, मेरी कोचिंग का समय निकला जा रहा है।” सूरज ने कांपते हाथों से औजार उठाए और साइकिल ठीक कर दी। जब काजल ने पैसे देने चाहे, तो सूरज ने मना कर दिया। यहीं से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे दोस्ती और फिर गहरे प्यार में बदल गया।

अध्याय 2: वादे और तपस्या

काजल अक्सर अपनी गरीबी को लेकर रोती थी। “सूरज, मेरे पापा के पास इतने पैसे नहीं हैं कि मुझे शहर भेज सकें। मेरा पुलिस बनने का सपना शायद अधूरा रह जाएगा।” सूरज ने उसके आंसू पोंछे और वादा किया, “पगली, जब तक मैं जिंदा हूँ, तेरा सपना नहीं टूटने दूंगा।”

लेकिन वादे करना जितना आसान होता है, उन्हें निभाना उतना ही कठिन। सूरज ने काजल को शहर भेजने का फैसला किया। पर पैसे कहाँ से आते? उसने अपनी माँ के आखिरी गहने—वो सोने के कंगन जो उसने अपनी होने वाली पत्नी के लिए बचाकर रखे थे—उन्हें बेच दिया।

शहर जाने के बाद काजल की पढ़ाई का खर्च बढ़ता गया। किताबें, हॉस्टल की फीस, और कोचिंग का पैसा। सूरज ने खुद को काम की भट्टी में झोंक दिया। वह दिन में गैरेज में काम करता और रात को शहर के एक ढाबे पर जूठे बर्तन धोता। कड़ाके की सर्दी में, जब लोग रजाई में होते थे, सूरज ठंडे पानी में बर्तन साफ करता था। उसके हाथों में छाले पड़ गए थे, उंगलियां गल गई थीं, पर उसके चेहरे पर मुस्कान रहती थी क्योंकि वह काजल का भविष्य बना रहा था।

वह खुद एक बिस्किट खाकर पानी पी लेता ताकि 50 रुपये बचाकर काजल को भेज सके। जब वह काजल से फोन पर बात करता, तो अपनी भूख छुपा लेता। “हाँ काजल, मैंने खाना खा लिया, आज तो पनीर बना था,” वह झूठ बोलता ताकि वह चिंता न करे।

अध्याय 3: कामयाबी का नशा और विश्वासघात

दो साल की कड़ी तपस्या के बाद, काजल का चयन हो गया। वह पुलिस सब-इंस्पेक्टर बन गई। सूरज की खुशी का ठिकाना न था। उसे लगा कि उसके संघर्ष के दिन अब समाप्त हुए। लेकिन कामयाबी के साथ अक्सर घमंड का नशा आता है।

काजल ट्रेनिंग पर चली गई। शुरू में तो फोन आते थे, लेकिन धीरे-धीरे वे कम होने लगे। सूरज फोन करता तो जवाब मिलता, “मैं व्यस्त हूँ, बाद में बात करूंगी।” ट्रेनिंग पूरी होने के बाद काजल की पोस्टिंग पास के ही शहर में हुई।

सूरज अपनी सबसे अच्छी, पर थोड़ी फटी हुई कमीज पहनकर उससे मिलने गया। उसके हाथ में एक छोटा सा गुलाब का फूल था। जब उसने काजल को वर्दी में जीप से उतरते देखा, तो उसकी आँखें भर आईं। वह दौड़कर उसके पास गया, “काजल! देखो, तुमने कर दिखाया!”

लेकिन काजल का व्यवहार बदल चुका था। उसने सूरज को ऊपर से नीचे तक नफरत भरी नज़रों से देखा। “तुम यहाँ क्या कर रहे हो? अपनी शक्ल देखी है आईने में? तुम एक मामूली मैकेनिक हो और मैं एक पुलिस ऑफिसर। हमारा कोई मेल नहीं है।”

सूरज हकलाया, “लेकिन काजल, मैंने अपना सब कुछ बेच दिया तुम्हें पढ़ाने के लिए… माँ के कंगन, मेरा गैरेज…”

काजल ने एक जोरदार तमाचा सूरज के गाल पर मारा। “वो तुम्हारा फैसला था। मैंने भीख नहीं मांगी थी। इसे कर्जा समझो और मेरे पीए से पैसे लेकर निकल जाओ। दोबारा अपनी मनहूस शक्ल मत दिखाना।” उसने वो गुलाब का फूल छीना और ज़मीन पर फेंककर अपने बूटों से मसल दिया।

अध्याय 4: नरक से उदय

सूरज की दुनिया उजड़ चुकी थी। वह शहर की सड़कों पर पागलों की तरह भटकने लगा। वह रेलवे स्टेशन पर सोता और भीख मांगकर खाता। एक दिन तो हद हो गई, जब काजल के ही थाने के पुलिसवालों ने उसे चोर समझकर पीटा। काजल ने उसे लॉकअप में देखा, पर पहचानने से इनकार कर दिया। उसने कहा, “इसे इतना मारो कि यह शहर छोड़कर भाग जाए, यह मेरी साख खराब कर रहा है।”

उस रात लॉकअप में सूरज की पसलियां टूट गईं, खून बह रहा था। पर उसी दर्द के बीच एक प्रतिज्ञा का जन्म हुआ। “काजल, तुमने मेरे प्यार को कमजोरी समझा। अब यह सूरज ऐसी आग बनकर लौटेगा जो तुम्हारे गुरूर को खाक कर देगा।”

सूरज गायब हो गया। अगले पांच वर्षों तक किसी ने उसका नाम नहीं सुना। इधर काजल भ्रष्टाचार के दलदल में धंस गई। उसने रिश्वत लेकर करोड़ों की संपत्ति बना ली।

अध्याय 5: प्रतिशोध का दिन

पांच साल बाद, शहर में एक नए एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) चीफ की पोस्टिंग हुई—नाम था ‘सूर्यकांत’। वह एक ऐसा ऑफिसर था जिससे बड़े-बड़े अपराधी कांपते थे। एक पार्टी में काजल (जो अब डीएसपी बन चुकी थी) और सूर्यकांत का आमना-सामना हुआ।

जब सूर्यकांत ने अपना काला चश्मा उतारा, तो काजल के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह ‘सूरज’ था। लेकिन अब वह मैकेनिक सूरज नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली आईएएस ऑफिसर था। उन पांच वर्षों में सूरज ने दिन-रात पढ़ाई की, मजदूरी की और यूपीएससी की परीक्षा पास की। उसका एकमात्र मकसद था—बदला।

काजल घबरा गई और उसके बंगले पर गिड़गिड़ाने आई। “सूरज, मुझे माफ कर दो। मैं भटक गई थी। मैं आज भी तुमसे प्यार करती हूँ।”

सूरज अपनी कुर्सी पर बैठा रहा और एक फाइल मेज पर पटकी। “यह फाइल देख रही हो? इसमें तुम्हारे भ्रष्टाचार, बेगुनाहों को फंसाने और एक गरीब मैकेनिक को मरवाने की कोशिश के सबूत हैं।”

अगले दिन पूरे शहर में खबर थी—”डीएसपी काजल गिरफ्तार!” गिरफ्तारी करने वाला कोई और नहीं, खुद सूर्यकांत था। जब काजल के हाथों में हथकड़ी लगी, सूरज उसके पास गया और अपनी जेब से वही पांच साल पुराना सूखा हुआ कुचला हुआ गुलाब निकाला।

उसने वह गुलाब काजल के हाथ में थमाया और धीमी आवाज़ में कहा, “कर्जा चुकता, मैडम। यह गुलाब तुम्हारी वर्दी पर नहीं, तुम्हारी बर्बादी पर जच रहा है।”

उपसंहार

काजल को जेल हो गई। उसका घमंड और उसकी वर्दी सब मिट्टी में मिल गए। सूरज ने अपना बदला तो पूरा किया, पर उसके चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी। वह अपनी गाड़ी रोककर उसी पुराने खंडहर हो चुके गैरेज के सामने खड़ा हुआ। बदला तो पूरा हो गया था, लेकिन वो मासूम प्यार और वो मैकेनिक सूरज हमेशा के लिए मर चुके थे।

किसी के सच्चे प्यार और गरीबी का मजाक कभी नहीं उड़ाना चाहिए, क्योंकि वक्त जब तमाचा मारता है, तो उसकी गूँज पूरी दुनिया सुनती है।