किस्तें और खामोशियाँ: स्काइला के आत्म-सम्मान का उदय
अध्याय 1: वह चमक जो आँखों को चुभती थी
दिवाली की वह रात कहने को तो रोशनी का त्यौहार थी, लेकिन स्काइला के लिए वह अंधेरे की एक और परत थी। लखनऊ की उस पॉश गेटेड कॉलोनी में उसके माता-पिता का घर किसी राजमहल की तरह सजा था। स्काइला अपनी पुरानी छोटी कार में बैठी रही। उसके हाथों में घर के बने गुलाब जामुन का एक साधारण सा डिब्बा था।
अंदर की रोशनी इतनी तेज थी कि बाहर का सन्नाटा और भी गहरा लग रहा था। स्काइला जानती थी कि अंदर जाते ही उसे ‘अकाउंट्स वाली’ या ‘हिसाब-किताब वाली बेटी’ कहकर पुकारा जाएगा। वह परिवार की वह ‘एफडी’ (Fixed Deposit) थी जिसे सब सुरक्षित मानते थे, लेकिन कोई प्यार नहीं करता था।
जैसे ही उसने कदम अंदर रखा, उसके पिता की गूँजती आवाज़ आई, “लो, आ गई हमारी हिसाब-किताब वाली!” वह मुस्कुराई, पर वह मुस्कान एक पुराने फटे हुए कपड़े की तरह थी जिसे वह हर त्यौहार पर ओढ़ लेती थी।
अध्याय 2: मरीना—झूठ का सुनहरा नकाब
तभी घर का तापमान बदल गया। मरीना आ गई थी। स्काइला की छोटी बहन, घर की ‘स्टार’, जिसकी मुस्कान करोड़ों की लगती थी, भले ही उसका आधार दूसरों का पैसा हो। मरीना ने अपनी ब्रांडेड बैग और परफ्यूम की खुशबू से पूरे कमरे को भर दिया।
“सॉरी मम्मी, ट्रैफिक बहुत था,” मरीना ने ऐसे कहा जैसे वह कोई बहुत बड़ा उपकार कर रही हो। माँ उसके पास दौड़ी, जैसे किसी कीमती ट्रॉफी को छू रही हों। स्काइला एक कोने में खड़ी रही। उसे पता था कि मरीना के हाथ में जो महंगा बैग है, उसकी किस्त स्काइला के बैंक खाते से कटने वाली है।
डाइनिंग टेबल पर अपमान का असली खेल शुरू हुआ। मरीना ने सबके सामने वाइन का गिलास घुमाते हुए कहा, “दीदी तो हमेशा नंबर ही गिनती रहती हैं, फिर भी इनके पास पैसे हमेशा कम पड़ जाते हैं। हर महीने मुझसे उधार माँगती रहती हैं।”
उस एक झूठ ने स्काइला के भीतर कुछ तोड़ दिया। टेबल पर सन्नाटा छा गया। माँ-पापा ने अपनी नज़रें फेर लीं। किसी ने यह नहीं कहा कि मरीना झूठ बोल रही है। स्काइला को उस दिन समझ आया कि समझदार होने का मतलब केवल चुप रहना नहीं, बल्कि खुद को मिटा देना बन गया है।
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अध्याय 3: वॉशरूम का वह ऐतिहासिक फैसला
स्काइला चुपचाप उठी और वॉशरूम चली गई। उसने दरवाजा बंद किया और आइने में खुद को देखा। उसकी आँखें लाल थीं, लेकिन उनमें अब आँसू नहीं, एक नई आग थी। उसने अपना फोन निकाला और बैंक ऐप खोला।
वहाँ पाँच ऑटो-पे (Auto-Pay) निर्देश थे:
मरीना की लग्जरी कार की ईएमआई।
उसके क्रेडिट कार्ड का मिनिमम ड्यू।
एक पर्सनल लोन।
बीमा की किस्त।
उसकी क्लब मेंबरशिप की फीस।
पिछले 5 सालों से, हर महीने लगभग 75,000 रुपये स्काइला की मेहनत की कमाई से कट रहे थे। उसने बिना हिचकिचाए पहला बटन दबाया—‘Cancel’। फिर दूसरा, तीसरा, चौथा और पाँचवाँ। हर ‘Cancelled’ नोटिफिकेशन के साथ उसे लगा जैसे उसकी छाती से कोई भारी जंजीर टूट रही है। उसने चेहरे पर ठंडा पानी डाला और बाहर निकली। अब वह बैंक की एफडी नहीं, एक आज़ाद परिंदा थी।
अध्याय 4: तूफान से पहले की शांति
अगली सुबह स्काइला के फोन पर धमाका हुआ। मरीना के कॉल और मैसेज की बाढ़ आ गई। “तूने क्या किया?” “पेमेंट फेल हो गया, मेरी बेइज्जती हो रही है!” “अभी कॉल कर वरना मैं घर आ जाऊँगी!”
स्काइला ने फोन उल्टा रख दिया। उसने ऑफिस जाकर एक स्प्रेडशीट बनाई। 5 साल का हिसाब। लाखों रुपये जो उसने अपनी बहन के दिखावे की आग में झोंक दिए थे। उसने महसूस किया कि वह केवल पैसा नहीं दे रही थी, वह अपनी खुशियाँ, अपनी छुट्टियाँ और अपनी रातों की नींद दे रही थी।
शाम को माँ का फोन आया। माँ की आवाज़ में ममता नहीं, मरीना की चिंता थी। “स्काइला, तुम इतनी पत्थर दिल कैसे हो सकती हो? खानदान में बात फैल जाएगी।” स्काइला ने शांति से जवाब दिया, “माँ, खानदान में बात तब नहीं फैली जब मरीना ने झूठ बोला? परिवार गुलामी का दूसरा नाम नहीं होता।”
अध्याय 5: ऑफिस में तमाशा और नकाब का उतरना
मरीना हार मानने वालों में से नहीं थी। वह दोपहर में स्काइला के ऑफिस पहुँच गई। उसने सबके सामने चिल्लाना शुरू किया, “तुम्हें शर्म नहीं आती अपनी बहन को सड़क पर लाते हुए?”
स्काइला अपनी कुर्सी से उठी और धीरे से उसके पास जाकर बोली, “मरीना, मैंने पुलिस को बुलाने की तैयारी कर ली है। अगर तुम्हें पैसे चाहिए, तो ‘रीपेमेंट प्लान’ (Repayment Plan) पर साइन करो।” रीपेमेंट का नाम सुनते ही मरीना का चेहरा सफेद पड़ गया। उसका वह ‘स्टार’ वाला नकाब उतर गया और उसके पीछे एक डरा हुआ, लालची चेहरा सामने आया। वह वहाँ से धमकी देते हुए चली गई, लेकिन स्काइला को अब डर नहीं लग रहा था।
अध्याय 6: ईशान का रहस्योद्घाटन (नया अध्याय)
उस रात स्काइला को मरीना के पति, ईशान का फोन आया। ईशान एक सीधा-साधा आदमी था जिसे मरीना ने हमेशा अंधेरे में रखा था। “स्काइला, मुझे आज कुछ कागज़ मिले हैं। मरीना ने केवल तुमसे पैसे नहीं लिए, उसने मेरे नाम पर भी फर्जी लोन लिए हैं और शायद तुम्हारे नाम पर भी…”
स्काइला के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने अपना सिबिल (CIBIL) स्कोर चेक किया। वहाँ एक ‘लोन इंक्वायरी’ थी जिसे उसने कभी नहीं किया था। इसका मतलब था कि मरीना अब अपराध की सीमा लाँघ चुकी थी।
अध्याय 7: अंतिम फैसला – कोर्ट रूम घर के अंदर
अगले दिन पूरे परिवार की मीटिंग बुलाई गई। ईशान ने टेबल पर एक मोटा फोल्डर रखा। उसने मरीना के सारे झूठ खोल दिए। जब दादी को पता चला कि मरीना ने उनके नाम पर फर्जी ‘ट्रस्ट’ की कहानी बनाई थी, तो उन्होंने उसे थप्पड़ मार दिया।
माँ और पापा को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने स्काइला से माफी माँगी, लेकिन स्काइला ने उन्हें गले नहीं लगाया। उसने केवल इतना कहा, “माफी का मतलब यह नहीं कि मैं सब भूल जाऊँगी। अब से मेरी कमाई पर केवल मेरा हक होगा।”
मरीना को अपनी कार बेचनी पड़ी और एक साधारण नौकरी शुरू करनी पड़ी। स्काइला ने उसके लिए एक सख्त भुगतान चार्ट बनाया।
अध्याय 8: एक साल बाद—नई सुबह (विस्तारित अंत)
एक साल बीत गया। दिवाली फिर आई। इस बार स्काइला के पास अपना खुद का नया घर था, जिसे उसने अपनी बचत से खरीदा था। उसने मरीना को घर बुलाया। मरीना अब साधारण कपड़ों में थी, उसके चेहरे पर वह कृत्रिम चमक नहीं थी, लेकिन वह पहली बार ‘इंसान’ लग रही थी।
“दीदी, यह महीने की किस्त,” मरीना ने एक लिफाफा थमाया। स्काइला ने उसे लिया और उसे अपनी अलमारी में रख दिया। उसने मरीना को माफ नहीं किया था, लेकिन उसने खुद को उस बोझ से आज़ाद कर लिया था।
निष्कर्ष: यह कहानी हर उस व्यक्ति के लिए है जो ‘परिवार’ के नाम पर शोषण सहता है। अपनी सीमाएं तय करना कोई पाप नहीं है। जिस दिन आप ‘Auto-Pay’ बंद करेंगे, उसी दिन आपकी अपनी जिंदगी का ‘Auto-Play’ शुरू होगा।
अध्याय 9: पहचान की चोरी और कानूनी चक्रव्यूह
ईशान के फोन के बाद स्काइला के लिए अगली सुबह किसी युद्ध के मैदान जैसी थी। बैंक से आए ‘लोन अलर्ट’ ने उसकी रातों की नींद उड़ा दी थी। वह समझ चुकी थी कि मरीना ने केवल उसके वर्तमान के पैसे नहीं छीने, बल्कि उसके भविष्य के नाम पर ‘पहचान की चोरी’ (Identity Theft) की थी।
स्काइला ने सबसे पहले अपने ऑफिस के कानूनी सलाहकार से बात की। “मैडम, अगर आपके पैन कार्ड और आधार का गलत इस्तेमाल हुआ है, तो यह केवल परिवार का मामला नहीं, यह एक संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) है,” वकील ने उसे आगाह किया।
स्काइला के पास दो रास्ते थे—या तो चुप रहकर अपनी क्रेडिट हिस्ट्री बर्बाद होने दे, या फिर अपनी ही बहन के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराए। उस रात स्काइला ने वह ‘मनीला फोल्डर’ खोला जो ईशान ने उसे दिया था। उसमें मरीना के जाली हस्ताक्षरों के नमूने थे। मरीना ने स्काइला के नाम पर एक ‘कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन’ लिया था ताकि वह अपने घर के लिए सात लाख का होम थिएटर सिस्टम खरीद सके।
अध्याय 10: वह कड़वी पारिवारिक पंचायत
अगले दिन दोपहर के 2 बजे। घर में सन्नाटा था, पर ऐसा सन्नाटा जो किसी तूफान के आने से पहले होता है। स्काइला जब पहुँची, तो उसने देखा कि मरीना सोफे पर बैठी नाखून चबा रही थी। माँ और पापा ऐसे देख रहे थे जैसे स्काइला कोई बाहरी हमलावर हो।
“स्काइला, ईशान ने हमें सब बताया। पर क्या इसे घर में हल नहीं किया जा सकता?” पापा ने कांपती आवाज़ में पूछा। “पापा, घर में हल करने का वक्त तब था जब उसने पहली बार झूठ बोला था। अब मेरे नाम पर बैंक के नोटिस आ रहे हैं,” स्काइला ने मेज पर कानूनी नोटिस पटकते हुए कहा।
माँ चिल्लाई, “तो क्या तुम अपनी बहन को जेल भेजोगी? लोग क्या कहेंगे?” स्काइला ने माँ की आँखों में आँखें डालकर कहा, “लोग तो यह भी कहेंगे कि आपकी एक बेटी ने दूसरी की जिंदगी गिरवी रख दी। माँ, आपकी ममता आज भी केवल उसी के लिए क्यों जागती है जो गलत कर रही है?”
अध्याय 11: मरीना का टूटता हुआ साम्राज्य
मरीना अचानक खड़ी हुई और चिल्लाने लगी, “हाँ! किया मैंने! क्योंकि मुझे तुम सबकी तरह बोरिंग जिंदगी नहीं चाहिए थी। मुझे स्टार बनना था, मुझे बड़ा दिखना था! तुमने हमेशा मुझे ‘स्पेशल’ महसूस कराया, तो मैंने उसे सच मान लिया!”
ईशान ने शांत भाव से कहा, “स्टार बनने के लिए मेहनत चाहिए होती है मरीना, चोरी नहीं।” उसने एक कागज़ निकाला—तलाक के कागज़ात। “मैं अब इस झूठ का हिस्सा नहीं रह सकता। मैं घर बेच रहा हूँ ताकि लेनदारों का पैसा चुका सकूँ। तुम अब अपने रास्ते हो।”
मरीना के पैर लड़खड़ा गए। उसका वह महल, जो उसने स्काइला और ईशान की मेहनत की ईंटों से बनाया था, ताश के पत्तों की तरह ढह रहा था।
अध्याय 12: स्काइला का नया आकाश
अगले कुछ महीने स्काइला के लिए ‘शुद्धिकरण’ के महीने थे। उसने एक-एक करके सारे विवादित लोन सुलझाए। उसने बैंक को मरीना के जाली हस्ताक्षरों के सबूत दिए। बैंक ने मरीना पर ‘फ्रॉड’ का मामला दर्ज करने की चेतावनी दी, लेकिन स्काइला ने बीच का रास्ता निकाला—मरीना को अपनी कार और गहने बेचकर वह पैसा तुरंत बैंक में जमा करना पड़ा।
स्काइला ने अपनी वह ‘स्प्रेडशीट’ बंद कर दी। उसने अपनी बहन से एक रुपया भी ब्याज नहीं माँगा, बस अपना मूल धन वापस लिया।
माँ-पापा अब स्काइला के फ्लैट पर आते थे, पर अब वे ‘हिसाब’ नहीं पूछते थे। वे अब उसके लिए चाय बनाते थे और उसकी थकान के बारे में पूछते थे। परिवार में शक्ति का संतुलन बदल चुका था। ‘समझदार’ होने का मतलब अब ‘दबना’ नहीं, बल्कि ‘नेतृत्व’ करना था।
अध्याय 13: कर्मा का चक्र और पश्चाताप (The Climax)
दो साल बाद। दिवाली की शाम। स्काइला अपने नए घर की बालकनी में खड़ी थी। उसने देखा कि मरीना नीचे एक स्कूटी से उतरी। वह अब एक कॉल सेंटर में काम करती थी और शाम को बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी। वह थक गई थी, उसके चेहरे पर अब वह ‘ग्लो’ नहीं था, पर उसकी आँखों में पहली बार ‘सच्चाई’ थी।
मरीना ऊपर आई। उसके हाथ में एक छोटा सा लिफाफा था—इस महीने की किस्त। “दीदी, यह आखिरी किस्त है। इसके बाद मेरा और आपका हिसाब बराबर हो जाएगा,” मरीना ने धीमे से कहा। स्काइला ने लिफाफा लिया और उसे अपनी मेज पर रख दिया। “हिसाब पैसों का बराबर हुआ है मरीना, भरोसे का नहीं। पर मुझे खुशी है कि तुम अब अपने पैरों पर खड़ी हो।”
मरीना मुड़ी और जाने लगी, तभी स्काइला ने उसे पुकारा, “मरीना… खाना खाकर जाना।” मरीना रुकी, उसके कंधों से जैसे सालों का बोझ उतर गया। वह रो पड़ी। यह रोना किसी चाल का हिस्सा नहीं था, यह पश्चाताप का आँसू था।
अध्याय 14: समापन – स्वतंत्रता का असली अर्थ
स्काइला ने उस रात अपने डायरी में लिखा: “रिश्ते तब नहीं टूटते जब आप ‘ना’ कहते हैं। रिश्ते तब टूटते हैं जब आप अपने आत्म-सम्मान की बलि देकर उन्हें बचाए रखने का नाटक करते हैं। मैंने अपना पैसा खोया, पर खुद को पा लिया।”
उसने अपने फोन का ‘Auto-Pay’ फीचर फिर से ऑन किया, लेकिन इस बार वह केवल उसके अपने सपनों, उसकी अपनी म्यूचुअल फंड्स और उसके अपने माता-पिता की दवाइयों के लिए था। उसने ‘हिसाब-किताब’ करना नहीं छोड़ा, पर अब वह हिसाब उसकी अपनी खुशियों का था।
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