पहले सगी मामी से इश्क, फिर सगी चचेरी बहन से किया निकाह — सास, साला और मामा का क-त्-ल!

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बरेली का सनसनीखेज मामला: मामा की ह-त्या से लेकर सास और साले पर ह-म-ला, फिर प-पु-लर “एनकाउंटर” तक—अफसर उर्फ बोरा की पूरी कहानी

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से सामने आई एक बेहद सनसनीखेज घटना ने न सिर्फ स्थानीय लोगों को झकझोर दिया, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली, पुराने आप-रा-धिक रिकॉर्ड, पारिवारिक हि-ंसा, जबरन नि-काह और कानून की ढिलाई पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए। यह मामला एक ऐसे व्यक्ति का है, जिसका नाम अफसर खान उर्फ बोरा बताया गया, और जिसके बारे में पुलिस को 17 मार्च 2026 की सुबह सूचना मिली कि वह इज्जत नगर थाना क्षेत्र के सहारा ग्राउंड के पास छिपा हुआ है। पुलिस ने घेराबंदी की, उसे सरेंडर करने को कहा, लेकिन आरोप है कि उसने पुलिस पर फा-यरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में वह गंभीर रूप से घायल हुआ और अस्पताल ले जाते समय या अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

उसकी मौ-त की खबर सोशल मीडिया पर तेजी से फैली। हैरानी की बात यह रही कि इस मामले में आम तौर पर होने वाली बहस—क्या एनकाउंटर सही था, क्या पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया, क्या कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ—उस तरह से सामने नहीं आई। बल्कि बड़ी संख्या में लोगों ने राहत की सांस लेते हुए कहा कि “अच्छा हुआ, यह मारा गया।” वजह भी थी—उसका कथित आप-रा-धिक अतीत, परिवार पर ढाया गया जुल्म, और घटना से ठीक एक दिन पहले पंचायत के बीच सास, साले और पत्नी पर किए गए ख-ौ-फनाक ह-म-ले का आरोप।

यह पूरी कहानी किसी एक दिन की नहीं है। इसके तार साल 2004 से जुड़ते हैं, जब अफसर खान अभी किशोर अवस्था में था। बताया जाता है कि वह बरेली के इज्जत नगर थाना क्षेत्र के रहपुरा चौधरी गांव का रहने वाला था। कम उम्र में ही वह अपने मामा के घर जाया करता था, जो बिथरी चैनपुर इलाके में रहते थे। वहीं से कथित तौर पर एक ऐसा रिश्ता शुरू हुआ, जिसने बाद में एक ह-त्या का रूप ले लिया। आरोप है कि अफसर और उसकी मामी के बीच अवैध संबंध बन गए थे। परिवार को लंबे समय तक इसकी भनक नहीं लगी। लेकिन एक दिन मामा ने दोनों को आप-त्तिजनक हालत में देख लिया। इसके बाद मामा ने कथित तौर पर अफसर को सख्त चेतावनी दी कि वह दोबारा उस घर की दहलीज पर कदम न रखे।

लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। आरोपों के मुताबिक, मामी का झुकाव अपने पति की बजाय भांजे की ओर ज्यादा था। एक रात, जब मामा सो रहा था, तब मामी ने अफसर को बुलाया और दोनों ने मिलकर मामा की ग-ला रेतकर ह-त्या कर दी। मामला पुलिस तक पहुंचा, जांच हुई, और पत्नी व भांजे—दोनों की भूमिका सामने आई। दोनों को गिरफ्तार किया गया। यह साल 2004 की बात बताई जाती है। बाद में मामला अदालत पहुंचा और 2009 में निचली अदालत ने दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। 2015 में अफसर खान हाईकोर्ट पहुंचा और जमानत की मांग की। उसने यह दलील दी कि वह लंबे समय से जेल में है और उसे राहत मिलनी चाहिए। हाईकोर्ट ने उसकी अपील स्वीकार कर ली और वह जमानत पर बाहर आ गया। यहीं से घटनाओं का दूसरा, और शायद अधिक भयावह अध्याय शुरू होता है।

जेल से बाहर आने के बाद, आरोप है कि अफसर खान का व्यवहार और अधिक आक्रामक हो गया। वह गांव में रोब दिखाने लगा, लोगों को धमकाने लगा, और उसके सामने खुलकर विरोध करने की हिम्मत कम ही लोग जुटा पाते थे। वह पहले ही किशोर उम्र में ह-त्या कर चुका था, जेल जा चुका था, और अब गांव में उसकी छवि एक ख-ौ-फनाक व्यक्ति की बन चुकी थी। इसी दौरान उसकी नजर अपनी ही सगी चचेरी बहन साइमा पर पड़ी। आरोप है कि उसने साइमा से जबरन रिश्ता बनाने और बाद में नि-काह करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया।

बताया जाता है कि उसने चाचा-चाची और परिवार के अन्य लोगों को धमकी दी कि अगर शादी नहीं हुई, तो अंजाम बुरा होगा। परिवार डर गया। आखिरकार 2017 में साइमा का नि-काह उसी अफसर खान से कर दिया गया। कुछ लोग इसे “जबरन” हुआ निकाह बताते हैं, तो कुछ कहते हैं कि परिवार दबाव और बदनामी के डर में झुक गया। शादी के बाद एक बेटा पैदा हुआ, जिसका नाम फैज रखा गया, और फिर 2021 में एक बेटी आयशा हुई।

शादी के बाद का जीवन भी सामान्य नहीं रहा। आरोपों के अनुसार, अफसर खान को श-रा-ब और न-शे की बुरी लत लग चुकी थी। वह कोई स्थायी काम नहीं करता था। कभी रिक्शा चलाता, कभी ई-रिक्शा, कभी स्कूल वैन, कभी एंबुलेंस, यानी ड्राइविंग से जुड़े छोटे-मोटे काम करता था। लेकिन आय कम थी और खर्चे ज्यादा। यही बात घर में तनाव की वजह बनने लगी। आरोप है कि वह साइमा को अक्सर मा-र-पी-ट करता था, गा-लियां देता था, और न-शे में बेकाबू होकर हि-ंसा करने लगता था।

शुरुआत में साइमा ने सब कुछ सहा। शायद इसलिए कि शादी हो चुकी थी, बच्चे थे, और समाज में वापस मायके आना उसके लिए आसान नहीं था। यह भी माना जाता है कि उसे डर था कि अगर वह ज्यादा विरोध करेगी तो मां-बाप यही कहेंगे कि “जब शादी हुई थी, तभी ऐतराज करना चाहिए था।” लेकिन आखिरकार 2022 में उसने हिम्मत की और थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई कि उसका पति उसे बुरी तरह पी-टता है। पुलिस ने एफआईआर दर्ज की, लेकिन आरोप है कि बाद में मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया। अफसर ने साइमा से माफी मांगी, बच्चों की कसम खाई, और कहा कि अब वह नहीं पीटेगा। साइमा ने शिकायत वापस ले ली या मामला ठंडा पड़ गया। यही वह मोड़ माना जा रहा है, जहां पुलिस अगर गंभीरता दिखाती तो आगे की भयावह घटना शायद टल सकती थी।

कहानी फिर 14 मार्च 2026 पर पहुंचती है। आरोप है कि उस दिन अफसर खान ने साइमा को फिर बुरी तरह पी-टा। चीख-पुकार सुनकर पड़ोसियों ने साइमा की मां आसमा को खबर दी। वह दौड़ी-दौड़ी बेटी के घर पहुंची और दामाद को रोकने की कोशिश की। लेकिन आरोप है कि इस बार अफसर ने सास पर भी हाथ उठा दिया और उन्हें कई थप्पड़ मारे। यह बात आसमा को बहुत बुरी लगी, क्योंकि अब तक वह सिर्फ गा-लियां देता था, लेकिन हाथ नहीं उठाया था। वह उसी दिन साइमा को अपने साथ मायके ले आईं।

अगले दिन, 15 मार्च 2026 को, साइमा ने 112 नंबर पर फोन कर पुलिस को पूरी बात बताई। पुलिस आई, लेकिन आरोप है कि उसने इस मामले को भी गंभीरता से नहीं लिया। न कोई ठोस कार्रवाई हुई, न गिरफ्तारी, न सुरक्षा की व्यवस्था। बस साइमा के कपड़े दिलवाकर यह कह दिया गया कि कुछ दिन मायके में रहो, बाद में देखा जाएगा। यही वह पुलिसिया ढिलाई थी, जिसकी चर्चा बाद में हर जगह होने लगी।

16 मार्च 2026 को अफसर खान एक स्थानीय सपा नेता और सर्राफा व्यापारी राशिद खान के पास पहुंचा। उसने कहा कि वह अपनी पत्नी से समझौता कराना चाहता है। राशिद खान ने पहले तो मना किया, क्योंकि वह पहले भी दो बार इस मामले में दखल दे चुके थे, लेकिन फिर उन्होंने साइमा की मां आसमा से बात की। ईद नजदीक थी, बच्चे थे, और सामाजिक दबाव भी था। आखिरकार यह तय हुआ कि पंचायत बैठाकर समझौता कराया जाए।

उसी दिन करीब 11:30 बजे के आसपास पंचायत बैठी। इसमें साइमा, उसकी मां आसमा, उसका भाई आदिल और एक रिश्तेदार बबलू मौजूद थे। दूसरी ओर से अफसर खान आया। पंचायत शुरू ही हुई थी कि आरोप है, वह बीड़ी पीते हुए कमरे में दाखिल हुआ। रोजे का महीना था, इसलिए वहां बैठे लोगों ने उसे टोका। उसने माफी मांगी, बीड़ी बुझाई, बैठ गया। कुछ देर बाद उसने फिर बीड़ी जलाई। इस बार साइमा के भाई आदिल को गुस्सा आ गया। उसने कहा कि जब वह जिम्मेदार लोगों के सामने ऐसा व्यवहार कर सकता है, तो घर में बहन के साथ कितनी बदतमीजी करता होगा। कहा जाता है कि उसने गुस्से में चप्पल उठाकर अफसर पर फेंक दी।

यहीं से मामला विस्फोटक हो गया। आरोप है कि अफसर खान ने भी चप्पल उठाई, लेकिन अगले ही पल उसने पीठ पीछे छिपाकर लाया हुआ बड़ा छुरा निकाल लिया। पहले वह अपनी सास आसमा की ओर बढ़ा और उनके पेट में वार किया। हमला इतना भीषण बताया गया कि वह वहीं गंभीर रूप से घायल हो गईं। इसके बाद उसने आदिल पर वार किया और फिर अपनी पत्नी साइमा पर भी ह-म-ला कर दिया। कमरे में अफरातफरी मच गई। चारों तरफ खून फैल गया। लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले वह धमकी देता हुआ वहां से निकल गया कि जो पीछा करेगा, उसका भी यही हाल करेगा।

घायलों को निजी अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने आसमा और आदिल को मृत घोषित कर दिया। साइमा जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी। पुलिस मौके पर पहुंची। एसएसपी अनुराग आर्य, एसपी सिटी मानुष पारीक, सीओ पंकज श्रीवास्तव और अन्य अधिकारी भारी पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंचे। फॉरेंसिक टीम बुलाई गई। जहां पंचायत हो रही थी, वहां सीसीटीवी कैमरे भी लगे थे। फुटेज देखने के बाद पुलिस को यह लगा कि अफसर पहले से योजना बनाकर आया था। उसके हाव-भाव, कमरे में प्रवेश का तरीका और हमले की गति ने यही संकेत दिए कि वह समझौते के लिए नहीं, बल्कि कुछ बड़ा करने के इरादे से आया था।

इसके बाद पुलिस ने उसकी तलाश शुरू की। मोबाइल सर्विलांस, संपर्क सूत्र, मुखबिरों की सूचना—हर साधन का उपयोग किया गया। फिर 17 मार्च 2026 की सुबह सूचना मिली कि वह सहारा ग्राउंड में छिपा है। पुलिस पहुंची, घेराबंदी की, आत्मसमर्पण को कहा। आरोप है कि उसने पुलिस पर फा-यरिंग कर दी। जवाबी कार्रवाई हुई और वह घायल हो गया। अस्पताल में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

इस पूरे मामले ने कई बड़े सवाल खड़े किए हैं। पहला—क्या 2022 में साइमा की शिकायत पर पुलिस अगर सख्ती करती, तो क्या 2026 की दो ह-त्याएं टल सकती थीं? दूसरा—क्या 15 मार्च को 112 पर कॉल के बाद पुलिस ने अगर सही कदम उठाए होते, तो पंचायत की नौबत ही आती? तीसरा—क्या समाज में “समझौता” कराने की जल्दबाजी कई बार पीड़ित पक्ष के लिए और ख-तरनाक साबित होती है? और चौथा—क्या जमानत पर बाहर आए गंभीर आप-रा-धिक इतिहास वाले लोगों की निगरानी व्यवस्था पर्याप्त है?

इस घटना से यह भी स्पष्ट होता है कि घरेलू हि-ंसा को “घर का मामला” समझकर नजरअंदाज करना कितना घातक हो सकता है। साइमा ने शिकायत की, सास ने समझाने की कोशिश की, समाज ने पंचायत बिठाई, लेकिन समय रहते कानूनी सुरक्षा नहीं मिली। नतीजा—दो लोगों की मौ-त, एक महिला की गंभीर हालत, दो छोटे बच्चों का भविष्य अंधेरे में, और अंत में आरोपी की भी एनकाउंटर में मौ-त।

कानून की नजर से देखें तो यह मामला कई स्तरों पर विफलता की कहानी भी है—एक पुराना दोषी, जमानत पर रिहाई, हिंसक स्वभाव, घरेलू शिकायतें, पुलिस की ढिलाई, और फिर त्रासदी। सामाजिक नजरिए से देखें तो यह हमें बताता है कि “समझौता” हमेशा समाधान नहीं होता, खासकर तब जब सामने वाला व्यक्ति हिंसा, धमकी और ख-तरनाक आप-रा-धिक अतीत रखता हो।

आज अफसर खान उर्फ बोरा मारा जा चुका है। लेकिन उसके पीछे छूट गया है—एक टूटा हुआ परिवार, अनाथ होते बच्चे, खून से रंगा एक पंचायत का कमरा, और पुलिस व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल। यह मामला केवल एक एनकाउंटर की खबर नहीं, बल्कि उस क्रमिक लापरवाही की कहानी है, जो अगर शुरू में रोकी जाती, तो शायद अंत इतना खूनी न होता।