शीर्षक: “न्याय की गर्जना” – एक फौजी का शौर्य

अध्याय १: घर की ओर एक कदम और कर्तव्य का बोझ

बॉर्डर की सर्द हवाओं और दुश्मनों की गोलियों के बीच दो साल बिताने के बाद, मेजर कविता के लिए घर जाने का दिन आखिरकार आ गया था। उनके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जो केवल एक सैनिक ही महसूस कर सकता है जब वह युद्ध के मैदान से अपने परिवार की ओर लौटता है। उन्होंने अपने सहकर्मी, सिपाही रवि से विदा ली। रवि की आँखों में आँसू थे, उसने अपनी माँ के लिए एक चिट्ठी मेजर कविता को थमाई।

“भैया, आप रोते अच्छे नहीं लगते,” कविता ने मुस्कुराते हुए कहा। “हम फौजी हैं, हम रोते नहीं, हम रुलाते हैं—दुश्मनों को।”

सफेद कुर्ते और जींस में कविता एक आम भारतीय लड़की लग रही थीं, लेकिन उनके भीतर एक चट्टान जैसी दृढ़ता थी। रेलवे स्टेशन से निकलते ही उन्हें भूख महसूस हुई। उन्होंने सड़क के किनारे एक छोटे से गोलगप्पे के स्टॉल पर रुकने का फैसला किया। उन्हें क्या पता था कि शहर की इन सड़कों पर दुश्मनों से भी खतरनाक ‘दीमक’ घूम रहे हैं।

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अध्याय २: सड़क का गुंडा और वर्दी का नशा

गोलगप्पे वाले भैया बड़े चाव से कविता को खिला रहे थे। तभी सायरन बजाती एक पुलिस जीप वहां रुकी। हवलदार और दरोगा, जिनके चेहरे पर कानून की रक्षा नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की भूख थी, नीचे उतरे।

“क्या रे गोलगप्पे वाले! मना किया था न यहाँ स्टॉल लगाने के लिए? ५००० निकाल, वरना चक्की पीसेगा!” हवलदार ने चिल्लाकर कहा।

गोलगप्पे वाला गिड़गिड़ाने लगा, “साहब, गरीब आदमी हूँ, बस रोज़ का गुजारा करता हूँ।”

कविता यह सब देख रही थीं। उनका खून खौल उठा। उन्होंने शांति से कहा, “साहब, ये गरीब है। कानून गरीबों को कुचलने के लिए नहीं, उनकी रक्षा के लिए बना है।”

दरोगा रामलाल ने कविता को ऊपर से नीचे तक देखा। उसकी आँखों में एक घिनौनी चमक थी। “बड़ी खूबसूरत माल है! हवलदार, ये हमें कानून सिखा रही है।” उसने कविता की तरफ हाथ बढ़ाया।

अगले ही पल, एक ज़ोरदार थप्पड़ की गूंज सड़क पर सुनाई दी। कविता का हाथ दरोगा के गाल पर छपा था। “साले कुत्ते! तेरे घर में माँ-बहन नहीं है क्या?”


अध्याय ३: लॉकअप की अंधेरी रात और अहंकार की हार

दरोगा रामलाल पागल हो गया। “इसे पकड़ो! इसे थाने ले चलो! आज इसकी सारी हीरोपंती निकाल दूंगा।”

कविता को जबरन गाड़ी में बैठाया गया। थाने में उन्हें एक अंधेरे लॉकअप में डाल दिया गया। दरोगा और हवलदार बाहर बैठकर शराब पी रहे थे और कविता का मज़ाक उड़ा रहे थे।

“दीदी, अब बोलो! कहाँ गई तुम्हारी बहादुरी?” हवलदार ने सलाखों के पीछे से कहा।

कविता शांत खड़ी थीं। उनकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक आने वाले तूफान की खामोशी थी। “तुम लोगों ने मुझे एक आम लड़की समझकर बंद किया है। जब तुम्हें पता चलेगा कि मैं कौन हूँ, तो तुम्हारी पतलून गीली हो जाएगी।”

दरोगा ने ठहाका लगाया। “यहाँ हमारी चलती है, पगली! कोई नहीं आएगा तुझे बचाने।”

कविता ने चुपके से अपने पास छिपे एक विशेष सैटेलाइट फोन से केवल एक मैसेज भेजा। कोड था— “इमरजेंसी: टाइगर इन केज।”


अध्याय ४: जब कमान का पहिया घूमा (नया अध्याय)

मैसेज मिलते ही दिल्ली के ‘आर्मी हेडक्वार्टर’ में हड़कंप मच गया। मेजर कविता न केवल एक फौजी थीं, बल्कि वे ‘इंटेलिजेंस यूनिट’ की प्रमुख भी थीं।

“मेजर कविता को एक स्थानीय पुलिस चौकी में अवैध रूप से रखा गया है?” कर्नल विक्रम की आवाज़ हॉल में गूँजी। “अभी के अभी १०वीं बटालियन की टुकड़ी भेजो! उन्हें एहसास होना चाहिए कि एक फौजी की मर्यादा से खिलवाड़ का अंजाम क्या होता है।”

उधर थाने में, दरोगा रामलाल कविता को प्रताड़ित करने के लिए लॉकअप की चाबी लेकर आगे बढ़ा। “चल, अब बता कौन है तेरा रक्षक?”

तभी, थाने के बाहर की जमीन कांपने लगी। दूर से भारी ट्रकों के इंजन की गूँज आने लगी।


अध्याय ५: फौजी घेराबंदी और सिस्टम का कांपना

थाने के बाहर १०० फौजी जवानों से भरा एक ट्रक और दो जिप्सियाँ रुकीं। जवानों ने १० सेकंड के भीतर पूरी पुलिस चौकी को चारों तरफ से घेर लिया। एलएमजी (LMG) और एसएलआर (SLR) राइफलों की नालें थाने की खिड़कियों की ओर थीं।

कर्नल विक्रम अंदर दाखिल हुए। दरोगा रामलाल के हाथ से चाबियाँ गिर गईं। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

“सर… सर… ये क्या है?” दरोगा हकलाने लगा।

“तुमने एक ‘सीनियर आर्मी ऑफिसर’ को बिना किसी चार्ज के बंद किया है। अपने हथियार नीचे डालो, वरना यह थाना मलबे में बदल जाएगा!” कर्नल की आवाज़ बिजली की तरह कड़की।

हवलदार ने कांपते हाथों से लॉकअप खोला। कविता बाहर आईं। कर्नल ने उन्हें ‘सैल्यूट’ किया। “जय हिंद, मेजर कविता! हमें देरी के लिए खेद है।”

दरोगा रामलाल वहीं घुटनों के बल गिर पड़ा। “मैडम… हमें माफ कर दीजिए… हमें सच में नहीं पता था।”


अध्याय ६: न्याय का तराजू (नया अध्याय)

कविता ने अपनी फटी हुई आस्तीन ठीक की और दरोगा के पास गईं। उन्होंने उसे थप्पड़ नहीं मारा, बल्कि उसकी वर्दी पर लगे ‘नाम’ को देखा।

“आज तुम मुझे देख रहे हो इसलिए डर रहे हो,” कविता ने बहुत ठंडी आवाज में कहा। “लेकिन उन हजारों लड़कियों का क्या जिनकी आवाज़ इस लॉकअप की दीवारों के बाहर नहीं जा पाती? तुमने यूनिफॉर्म पहनी है, ताकत नहीं। अगर रक्षक ही भक्षक बन जाएगा, तो आम आदमी कहाँ जाएगा?”

कर्नल ने तुरंत पुलिस कमिश्नर और डीएम (DM) को फोन किया। आधे घंटे के भीतर दरोगा रामलाल और हवलदार को निलंबित (Suspend) कर दिया गया और उन पर भ्रष्टाचार, अपहरण और छेड़खानी के गंभीर मामले दर्ज किए गए।

कविता ने गोलगप्पे वाले भैया को बुलाया, जो बाहर खड़ा रो रहा था। “भैया, अब से आपको कोई परेशान नहीं करेगा। ये रहा मेरा नंबर, कोई भी वर्दी वाला हाथ लगाए तो बता देना।”


अध्याय ७: विदाई और अटूट संकल्प (नया अध्याय)

सुबह का सूरज निकल रहा था। कविता के भाई की शादी का समय नज़दीक था।

“मैडम, क्या हम आपको घर तक छोड़ दें?” कर्नल ने पूछा।

“नहीं कर्नल,” कविता ने रवि की माँ की चिट्ठी अपनी जेब में रखी। “मैं अपनी यात्रा खुद पूरी करूँगी। लेकिन याद रहे, हमारी लड़ाई सिर्फ सरहद पार के दुश्मनों से नहीं है, हमें अपने भीतर के इन गद्दारों को भी खत्म करना होगा।”

जवानों ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए। कविता ऑटो में बैठीं और अपने गांव की ओर निकल गईं। उनके चेहरे पर अब वही शांति थी, लेकिन आँखों में एक नया संकल्प—कि वे अब सिर्फ सरहद की नहीं, बल्कि इस देश की हर दबी हुई आवाज़ की रक्षक बनेंगी।

निष्कर्ष: मानवता का संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि पद और शक्ति केवल सेवा के लिए होते हैं। वर्दी पहनने का अर्थ दूसरों को डराना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित महसूस कराना है। मेजर कविता ने साबित किया कि एक फौजी की वर्दी केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि इस देश के आत्मसम्मान की ढाल है।

इतिहास गवाह है, जब-जब किसी ने एक फौजी की मर्यादा को चुनौती दी है, तब-तब पूरा तंत्र कांप उठा है।


समाप्त