10 साल बाद मां को रेड सिग्नल पर मिला अपना खोया हुआ बेटा

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लाल सिग्नल की ममता: एक खोए हुए अंश की दास्तां

भाग 1: शहर की भागदौड़ और एक मासूम चेहरा

मुंबई जैसे महानगर में, जहाँ समय किसी के लिए नहीं रुकता, वंशिका की ज़िंदगी एक सधे हुए ढर्रे पर चल रही थी। वह एक संपन्न परिवार की बहू थी। उसके पति, हरीश, हिल रोड मार्केट में एक बड़ी मोबाइल शॉप के मालिक थे। वंशिका अक्सर हरीश के साथ कार में बैठकर ऑफिस या बाजार जाया करती थी। एसी कार के शीशों के पीछे से दुनिया बहुत धुंधली और तेज दिखती थी, लेकिन एक जगह ऐसी थी जहाँ वंशिका की दुनिया ठहर जाती थी—शहर का वह व्यस्त ट्रैफिक सिग्नल

जब भी उनकी कार उस लाल सिग्नल पर रुकती, छोटे-छोटे बच्चों का एक हुजूम गाड़ियों को घेर लेता। कोई धूल झाड़ने वाला कपड़ा लिए होता, तो कोई सस्ते खिलौने बेचता। इन्हीं बच्चों के बीच एक लड़का था—आर्यन। करीब 10-12 साल का, बिखरे बाल, फटे लेकिन साफ कपड़े, और आँखों में एक ऐसी चमक जो गरीबी के बोझ तले भी दबी नहीं थी।

एक दिन आर्यन ने वंशिका की खिड़की थपथपाई। “आंटी, गुब्बारा ले लो न! लाल वाला आपके सूट से मैच कर रहा है।” वंशिका मुस्कुरा दी। “बेटा, मैं इन गुब्बारों का क्या करूँगी? मेरे घर में तो कोई बच्चा नहीं है।” आर्यन ने मासूमियत से कहा, “तो खुद के लिए ले लो आंटी। उड़ता हुआ गुब्बारा देखकर सबको खुशी मिलती है।” वंशिका ने गुब्बारा खरीद लिया। धीरे-धीरे यह रोज़ का सिलसिला बन गया। कभी वह फूल बेचता, तो कभी किताबें। वंशिका को उस बच्चे से एक अनजाना जुड़ाव महसूस होने लगा था। वह अक्सर उसे फल या कुछ अतिरिक्त पैसे दे देती, जिसे पाकर आर्यन की मुस्कान पूरे सिग्नल को रोशन कर देती थी।


भाग 2: अतीत के काले बादल (2015 की यादें)

वंशिका की ममता उस बच्चे के लिए क्यों उमड़ती थी, इसका राज उसके अतीत में छिपा था। साल 2015 में, 19 साल की वंशिका ने विजय नाम के लड़के से प्यार किया था। विजय से शादी करने के लिए उसने अपने परिवार के खिलाफ जाकर घर छोड़ दिया। उन्होंने एक छोटी सी गृहस्थी बसाई और उनके जीवन में आर्यन का जन्म हुआ।

लेकिन खुशियाँ अल्पकालिक थीं। वंशिका को पता चला कि विजय गलत संगत में है और अपराध की दुनिया से जुड़ चुका है। एक दिन विजय की हत्या कर दी गई और वंशिका सड़क पर आ गई। उसके माता-पिता उसे वापस ले जाने को तैयार थे, लेकिन एक शर्त पर—उसे अपने बेटे को छोड़ना होगा। मजबूरी और समाज के डर से, भारी मन से वंशिका ने अपने कलेजे के टुकड़े को उसके दादा-दादी को सौंप दिया और खुद एक नई ज़िंदगी शुरू करने के लिए हरीश से शादी कर ली। हरीश एक नेक इंसान था, लेकिन उसे वंशिका के इस अतीत के बारे में कुछ नहीं बताया गया था।


भाग 3: हादसे का दिन और कड़वा सच

एक सुबह, जब वंशिका की कार उसी सिग्नल पर रुकी, तो वहां आर्यन नहीं था। सड़क किनारे उसकी कुछ किताबें बिखरी हुई थीं। वंशिका का दिल किसी अनहोनी की आशंका से बैठने लगा। उसने दूसरे बच्चों से पूछा, तो पता चला कि एक तेज रफ़्तार कार आर्यन को टक्कर मारकर भाग गई है और उसे पास के सरकारी अस्पताल ले जाया गया है।

वंशिका बदहवास होकर अस्पताल पहुँची। वहाँ उसने एक बुजुर्ग महिला को रोते हुए देखा। उस महिला को देखते ही वंशिका के पैरों तले जमीन खिसक गई—वह कोई और नहीं, विजय की माँ यानी आर्यन की दादी थी।

दादी ने वंशिका को पहचान लिया। “देख ले बेटी, जिसे तूने पालने के लिए हमें दिया था, आज वह मौत से लड़ रहा है। तेरा बेटा आर्यन…” वंशिका वहीं फर्श पर बैठ गई। जिसे वह रोज़ सिग्नल पर ‘गुब्बारे वाला लड़का’ समझकर दया दिखाती थी, वह उसका अपना ही खोया हुआ बेटा था। नियति ने उसे वहीं लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ से उसने भागने की कोशिश की थी।


भाग 4: संघर्ष और स्वीकारोक्ति

अगले 72 घंटे वंशिका के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। आईसीयू के बाहर वह हर पल ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी। इधर हरीश परेशान था कि उसकी पत्नी कहाँ गायब है। जब हरीश अस्पताल पहुँचा, तो वंशिका ने और अधिक झूठ बोलना मुनासिब नहीं समझा। उसने रोते हुए अपने अतीत की पूरी सच्चाई हरीश के सामने रख दी।

हरीश पहले तो स्तब्ध रह गया। उसे लगा जैसे उसके विश्वास की नींव हिल गई हो। उसने गुस्से में कहा, “तुमने मुझसे इतना बड़ा सच छुपाया? आज से हमारा रिश्ता खत्म!”

लेकिन जैसे ही आर्यन को होश आया और उसने धुंधली आँखों से वंशिका को देखकर “आंटी” पुकारा, वंशिका ने उसका हाथ थाम कर कहा, “बेटा, मैं आंटी नहीं, तेरी माँ हूँ।” उस दृश्य ने वहाँ खड़े हर शख्स की आँखें नम कर दीं।


भाग 5: एक नई शुरुआत

कहानी का अंत निराशाजनक नहीं रहा। हरीश जब घर गया और उसने ठंडे दिमाग से सोचा, तो उसे अहसास हुआ कि वंशिका ने जो किया वह एक मजबूर माँ की बेबसी थी। उसकी माँ (हरीश की माँ) ने भी उसे समझाया कि ममता से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।

10 दिन बाद, हरीश अपने परिवार के साथ आर्यन के घर पहुँचा। उसने वंशिका का हाथ थामा और कहा, “वंशिका, मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूँ। और अगर यह तुम्हारा बेटा है, तो आज से यह मेरा भी बेटा है। हम इसे अकेला नहीं छोड़ेंगे।”

हरीश ने न केवल वंशिका को अपनाया, बल्कि आर्यन और उसकी दादी को भी अपने घर ले आया।

इस कहानी का समापन केवल एक बिखरे हुए परिवार के मिलन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं और क्षमा की एक नई मिसाल बन गया। जब हरीश ने अपनी माँ के साथ आर्यन के घर कदम रखा, तो वंशिका के मन में खोने का डर और ममता की तड़प के बीच एक द्वंद्व चल रहा था। उसे लगा था कि शायद उसे अपने बेटे या अपने सुहाग में से किसी एक को चुनना होगा, लेकिन हरीश की उदारता ने उस सारे डर को ढोल दिया। हरीश ने जब झुककर आर्यन की दादी के पैर छुए और आर्यन को अपने सीने से लगाया, तो वहाँ मौजूद हर आँख छलक उठी। वह पल एक ऐसी गवाही था कि रिश्ते केवल खून के नहीं, बल्कि अपना लेने के हौसले से बड़े होते हैं।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा और वंशिका की सूनी गोद खुशियों से भर गई। कुछ वर्षों के अंतराल में आर्यन को एक छोटा भाई और एक छोटी बहन मिली। वह घर, जो कभी केवल ऐशो-आराम की निर्जीव वस्तुओं से सजा था, अब बच्चों की खिलखिलाहट और दादी की कहानियों से जीवंत हो उठा। वंशिका जब भी अपनी खिड़की से बाहर देखती, उसे वह रेड सिग्नल याद आता, जिसने उससे उसका अतीत छीना भी था और एक नए रूप में उसे वापस भी लौटा दिया। उसे अब समझ आया कि नियति के खेल भले ही क्रूर हों, लेकिन यदि हृदय में सच्ची ममता और धैर्य हो, तो भाग्य के बंद दरवाजे भी खुल जाते हैं।

आज आर्यन बड़ा होकर अपने पैरों पर खड़ा है, लेकिन उसके मन में अपनी माँ के लिए जो सम्मान है, वह किसी भी धन-दौलत से ऊपर है। वंशिका अब केवल एक अमीर घर की बहू नहीं, बल्कि एक ऐसे परिवार की धुरी है जिसने समाज की रूढ़ियों और अतीत की कड़वाहट को भुलाकर प्रेम का एक नया इतिहास रचा है। यह कहानी हमें इस गहरी सीख के साथ छोड़ जाती है कि जीवन में लिया गया एक गलत फैसला हमें भटका तो सकता है, लेकिन सच्ची ममता का रास्ता हमेशा देर-सवेर हमें अपनी मंजिल तक पहुँचा ही देता है।