करोड़पति के बच्ची के सामने खड़ा था एक कूड़ा बीनने वाला लड़का फिर जो हुआ उसने सबको रुला दिया 😢
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कहानी का आरंभ: दुर्घटना की घड़ी
मुंबई के अंधेरी इलाके की मुख्य सड़क पर, दोपहर का समय था। धूप तेज नहीं थी, लेकिन हवा भारी लग रही थी। अचानक एक काली, चमचमाती कार तेज रफ्तार में फुटपाथ के डिवाइडर से टकरा गई और घूमते हुए सड़क के किनारे रुक गई। कार के शीशे टूट चुके थे, आगे का हिस्सा पूरी तरह से पिचक गया था, और अंदर बैठे लोग दर्द से कराह रहे थे। सड़क पर चल रहे लोग रुक गए, लेकिन कोई पास नहीं आया, क्योंकि सब जानते थे कि यह एक्सीडेंट पुलिस केस बन सकता है और कोई भी झंझट में नहीं पड़ना चाहता था।
उसी सड़क के किनारे एक दुबला-पतला 12 साल का लड़का अपनी तीन पहियों वाली साइकिल जैसे रिक्शा के पास खड़ा कूड़ा छांट रहा था। उसका नाम अर्पित था। उसके कपड़े पुराने थे, चेहरे पर धूल और पसीने की लकीरें साफ दिख रही थीं, लेकिन उसकी आंखों में डर नहीं था। उसने कार से आती दर्द भरी आवाजें सुनी और बिना कुछ सोचे अपनी रिक्शा वहीं छोड़कर कार की तरफ दौड़ पड़ा।

विक्रम और शालिनी की हालत
कार के अंदर एक व्यक्ति गंभीर हालत में था, उसका नाम राघव मल्होत्रा था, जो मुंबई के जाने-माने करोड़पति उद्योगपति थे। उसका सिर फट चुका था, शरीर में कई जगह चोटें थीं, लेकिन उसकी आंखें अपनी पत्नी पर टिकी थीं। उसकी पत्नी शालिनी मल्होत्रा गर्भवती थी और दर्द से बुरी तरह तड़प रही थी। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था, सांस उखड़ रही थी और वह बार-बार पेट पकड़ रही थी।
अर्पित ने देखा कि शालिनी की हालत बहुत गंभीर है। उसने राघव से कहा कि वह डरे नहीं, वह मदद करेगा। राघव ने कांपती आवाज में बस इतना कहा, “किसी भी तरह मेरी पत्नी को बचा लो।” अर्पित ने धीरे-धीरे कार का दरवाजा खोला और अपनी पूरी ताकत लगाकर शालिनी को बाहर निकालने लगा ताकि पेट पर झटका ना लगे। सड़क पर खड़े लोग यह सब देख रहे थे, लेकिन कोई आगे नहीं बढ़ा। किसी ने एंबुलेंस भी नहीं बुलाई। अर्पित ने अपने कंधे पर शालिनी का वजन लिया, उसे एक पल के लिए सड़क किनारे बैठाया और अपनी तीन पहियों वाली कूड़ा बिनने की रिक्शा पास ले आया।
रिक्शा में शालिनी को अस्पताल ले जाना
रिक्शा न बिजली से चलती थी, न उसमें कोई सुविधा थी, लेकिन उस वक्त वही एकमात्र सहारा थी। अर्पित ने शालिनी को रिक्शा में बैठाया और उसके सिर को सहारा दिया। राघव इतनी हालत में भी खड़ा होने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अर्पित ने उससे कहा कि वह वहीं रहे, पहले शालिनी को अस्पताल पहुंचाना जरूरी था। रिक्शा सड़कों पर डगमगाते हुए आगे बढ़ रही थी, अर्पित बार-बार पीछे मुड़कर देखता कि शालिनी बेहोश तो नहीं हो रही। शालिनी के होंठ कांप रहे थे, आंखें आधी खुली थीं और उसके मुंह से हल्की सी आवाज निकल रही थी। अर्पित लगातार उसे बोलते रहने को कह रहा था ताकि वह होश में बनी रहे।
करीब 20 मिनट की मशक्कत के बाद अर्पित उसे सरकारी अस्पताल के इमरजेंसी गेट तक ले आया। जैसे ही रिक्शा रुकी, अर्पित चिल्लाया और मदद मांगी। वार्ड बॉय और डॉक्टर दौड़कर आए। शालिनी को गोद में उठाया गया, स्ट्रेचर पर लिटाया गया और बिना एक पल गंवाए उसे सीधे ऑपरेशन थिएटर की तरफ ले जाया गया। अर्पित भी उनके पीछे-पीछे भागा। किसी ने उसे रोका नहीं। शायद इसलिए कि उसकी आंखों में डर नहीं बल्कि जिम्मेदारी थी।
अर्पित की उम्मीद और राघव का दुःख
ऑपरेशन थिएटर के बाहर अर्पित और राघव दोनों बिना एक शब्द बोले दरवाजे को देखते रहे, जैसे अंदर से कोई चमत्कार निकल आएगा। समय बहुत धीरे बीत रहा था, दो घंटे गुजर गए। ऑपरेशन थिएटर का दरवाजा खुला और डॉक्टर बाहर आए। डॉक्टर का चेहरा गंभीर था। उसने राघव को बताया कि शालिनी ने बच्चे को जन्म दिया है, लेकिन अत्यधिक चोट और खून बहने के कारण उसकी जान नहीं बच सकी। डॉक्टर ने यह भी कहा कि नवजात शिशु ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और उसे मृत घोषित किया गया है। यह सुनते ही राघव के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी आंखें सुनी हो गई, आवाज गले में अटक गई और वह कुर्सी से फिसलते हुए नीचे बैठ गया। उसकी पूरी दुनिया एक ही पल में उजड़ गई थी।
अर्पित यह सब सुन रहा था, लेकिन उसकी नजर ऑपरेशन थिएटर के कांच के दरवाजे के अंदर थी। उसने देखा कि शालिनी के पास एक छोटा सा बच्चा रखा है। कुछ ऐसा था जो उसे अजीब लगा। बच्चे का रंग बदला नहीं था, सीना बहुत हल्का सा हिलता हुआ उसे महसूस हुआ। अर्पित का दिल जोर से धड़कने लगा। उसे अपने माता-पिता की याद आ गई जो 4 साल पहले एक कार हादसे में मारे गए थे। वे दोनों डॉक्टर थे। उसने उन्हें कई बार नवजात बच्चों के बारे में बात करते सुना था। उसे पूरा यकीन हो गया कि बच्चा मरा नहीं है।
अर्पित का आत्मविश्वास और डॉक्टरों की मदद
अर्पित ने ऑपरेशन थिएटर का दरवाजा जोर से धक्का दिया और अंदर चला गया। डॉक्टर और नर्स उसे रोकने के लिए आगे बढ़े, लेकिन उसकी आवाज में ऐसी बेचैनी थी कि सब ठिठक गए। उसने कहा कि बच्चा जिंदा है और अभी भी उसे बचाया जा सकता है। राघव ने यह सब देखा लेकिन वह कुछ बोल नहीं पाया। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, जैसे अब उसे किसी चमत्कार पर भरोसा ही नहीं रहा हो। अर्पित बिना डरे बच्चे के पास पहुंचा और धीरे से बच्चे को उठाया, बहुत सावधानी से, जैसे जरा सी गलती से सब टूट जाएगा। उसने महसूस किया कि बच्चा ठंडा नहीं बल्कि अस्वाभाविक रूप से सुन्न है। उसे अपने पिता की बातें याद आईं कि कई बार शरीर ठंड से नहीं मरता बल्कि डर और झटके से खुद को बंद कर लेता है।
अर्पित का जादू और डॉक्टरों की मदद
डॉक्टरों ने आपत्ति की, कहा कि बच्चा पहले से ही ठंडा है। लेकिन अर्पित ने पहली बार जोर से बोला, “यही समस्या है। शरीर गर्मी को दुश्मन समझ रहा है। अगर हम उसे जबरदस्ती गर्म करेंगे तो वह और ज्यादा बंद हो जाएगा। पहले उसे ठंड को स्वीकार करने देना होगा ताकि उसका शरीर शांत हो सके।”
अर्पित ने बर्फ मंगाने को कहा। यह सुनते ही कुछ डॉक्टर भड़क गए लेकिन किसी ने उसे रोका नहीं। ऑपरेशन थिएटर में एक बड़ा धातु का बर्तन लाया गया जिसमें साफ बर्फ रखी गई। अर्पित ने बच्चे को सीधे बर्फ में नहीं डाला बल्कि उसे एक कपड़े में लपेटकर बर्फ के ठीक ऊपर रखा ताकि ठंड चारों तरफ बराबर फैले। उसने अपना हाथ बच्चे की छाती पर रखा और उसकी सांसों को महसूस करता रहा। उसका पूरा ध्यान बच्चे पर था, जैसे दुनिया में और कुछ बचा ही ना हो। वह बुदबुदाते हुए बोल रहा था, जैसे बच्चे से बात कर रहा हो, उसे भरोसा दिला रहा हो कि डरने की जरूरत नहीं है।
बच्चे की जिंदगी का पहला जवाब
कमरे में मौजूद हर इंसान खामोश था। कुछ मिनट बीते। मशीनों पर दिख रहा तापमान गिरना बंद हो गया। वह स्थिर हो गया। यही वह संकेत था जिसका अर्पित इंतजार कर रहा था। उसने डॉक्टरों की तरफ देखा और कहा, “अब शरीर ठंड से लड़ नहीं रहा है। अब वह सुन रहा है। अब अगला कदम गलत हुआ तो सब खत्म हो सकता है।” अर्पित ने बच्चे को धीरे से उठाकर पहले से तय की गई हल्की गर्म सतह पर रखा। यह तेज गर्मी नहीं थी, बस सामान्य से थोड़ा ज्यादा। उसने साफ कहा, “तापमान धीरे-धीरे बढ़ेगा। एक झटके में नहीं। अगर शरीर को धक्का लगा तो दिल बंद हो सकता है।”
अर्पित ने बच्चे को धीरे से रगड़ा ताकि खून का बहाव सही रहे। हर हरकत बहुत सोच-समझकर की जा रही थी। अचानक बच्चे के मुंह से एक बहुत हल्की सी आवाज निकली। वह रोना नहीं था, लेकिन जीवन का पहला जवाब था। पूरे कमरे में जैसे बिजली दौड़ गई। डॉक्टर एक दूसरे की तरफ देखने लगे। यह वही बच्चा था जिसे कुछ देर पहले मृत घोषित किया जा चुका था। अर्पित की आंखों से आंसू बहने लगे, लेकिन उसके हाथ अब भी स्थिर थे। उसने धीमी आवाज में कहा, “अब वह लड़ रहा है। अब वह जिंदा है।”
राघव की उम्मीद और परिवार की खुशियाँ
कमरे में खामोशी टूट गई और धीरे-धीरे उत्साह फैलने लगा। बच्चे के पिता राघव, जो अभी तक बाहर कांच के दरवाजे से गिरते-पड़ते अंदर आए, उनकी आंखों में अविश्वास और उम्मीद एक साथ थे। इलाज चलता रहा। यह सिर्फ एक नवजात की लड़ाई नहीं थी, यह उस ज्ञान की जीत थी जो किताबों में नहीं बल्कि संघर्ष और यादों में जिंदा रहता है।
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