2 साल बाद बेटी आर्मी Officer बनकर लौटी तो, बूढ़ी माँ बस स्टैंड पर भीख मांग रही थी — फिर आगे जो हुआ..
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दो साल बाद बेटी आर्मी ऑफिसर बनकर लौटी… और माँ बस स्टैंड पर भीख माँग रही थी
दो साल।
पूरे दो साल बाद वह शहर फिर से उसकी आँखों के सामने था।
बस स्टैंड की वही पुरानी इमारत, वही टिकट काउंटर, वही धूल उड़ाती सड़कें और वही लगातार भागती भीड़। लेकिन इस बार हवा में कुछ अलग था। जैसे शहर खुद किसी अनहोनी का इंतज़ार कर रहा हो।
सुबह के करीब दस बजे थे। सूरज तेज़ था, रोशनी साफ़ थी, लेकिन उसी रोशनी के बीच एक कोने में बैठी एक बूढ़ी औरत का चेहरा बुझा-बुझा सा लग रहा था। फटे-पुराने कपड़े, रंग पहचान से बाहर, पैरों में चप्पल तक नहीं और हाथों में एक पुराना कटोरा—जिसे वह बिना कुछ बोले आगे बढ़ा देती थी।
लोग आते-जाते रहे।
कोई सिक्का डाल देता।
कोई नज़र चुराकर आगे बढ़ जाता।
उसके लिए यह कोई नई बात नहीं थी।
दो सालों से वह यही कर रही थी—इंतज़ार और अपमान, दोनों साथ-साथ।
लेकिन उसकी आँखों में जो दर्द था, वह सिर्फ भूख का नहीं था। वह दर्द एक माँ का था। एक ऐसी माँ, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी एक ही नाम पर टिका दी थी—अपनी बेटी पर।
वही बेटी, जिसे उसने सपनों की तरह पाला था।
वही बेटी, जिसे उसने अपने खून से सींचा था।
वही बेटी, जिसे दो साल पहले इसी बस स्टैंड से विदा किया था।
यह सोचकर कि अब उसकी तक़दीर बदलेगी।

उधर, बस स्टैंड के बाहर अचानक एक फौजी गाड़ी आकर रुकी।
इंजन बंद हुआ।
दरवाज़ा खुला।
एक नौजवान महिला नीचे उतरी।
हरी खाकी वर्दी, सीधी कमर, सधी हुई चाल और आँखों में अनुशासन की ठंडी चमक। उम्र मुश्किल से पच्चीस-छब्बीस साल, लेकिन चेहरे पर वह ठहराव था जो सिर्फ आग से गुजरकर आता है।
वह भारतीय सेना की अधिकारी थी।
उसका नाम था—अनुष्का।
दो साल पहले जब वह यहाँ से गई थी, उसकी आँखों में डर था। सपनों की बेचैनी थी और माँ को छोड़ने का अपराध-बोध था। आज वही अनुष्का लौटकर आई थी—कंधों पर सम्मान लिए हुए, लेकिन दिल में वही पुराना अधूरापन।
बस स्टैंड के अंदर कदम रखते ही उसकी धड़कन तेज़ हो गई।
उसकी नज़रें भीड़ में किसी एक चेहरे को ढूँढ रही थीं।
उसे पूरा भरोसा था—माँ यहीं होगी।
माँ हमेशा कहा करती थी,
“जब तू लौटेगी न बेटा, मैं यहीं बैठी मिलूँगी।”
अनुष्का ने चारों तरफ देखा—
चाय की दुकान,
दीवार के पास बैठे लोग,
टिकट खिड़की के पास खड़े यात्री।
लेकिन माँ कहीं दिखाई नहीं दी।
तभी एक पल के लिए उसकी नज़र उस बूढ़ी भिखारिन पर पड़ी।
नज़र पड़ी… और हट गई।
दिमाग़ ने तुरंत इंकार कर दिया।
“नहीं। यह माँ नहीं हो सकती।”
उसकी माँ ऐसी नहीं थी।
वह आगे बढ़ गई।
लेकिन कुछ कदम चलते ही उसका दिल अजीब तरह से भारी हो गया। जैसे किसी ने अंदर से पुकारा हो—एक बार और देख।
वह रुकी।
पलटी।
और इस बार ध्यान से देखा।
उसी पल बूढ़ी औरत ने भी सिर उठाया।
नज़रें मिलीं।
बस एक सेकंड के लिए।
लेकिन उस एक सेकंड में दो साल की दूरी, अनगिनत रातों का रोना, अधूरे वादे और माँ-बेटी का रिश्ता—सब कुछ उमड़ पड़ा।
कटोरा हाथ से फिसलकर ज़मीन पर गिरा।
आवाज़ गूँजी।
बूढ़ी औरत की आँखें भर आईं।
“अनु…”
आवाज़ टूट गई। जैसे गला शब्दों का बोझ सह न पाया हो।
अनुष्का के पैर वहीं जम गए।
उसके कानों में जैसे सब कुछ बंद हो गया।
दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
“नहीं… यह सच नहीं हो सकता।”
उसका शरीर काँपने लगा।
लेकिन वर्दी ने उसे थामे रखा।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी, जैसे हर कदम सच के और करीब ले जा रहा हो।
बूढ़ी औरत घिसटते हुए उठी और उसके पैरों से लिपट गई।
“मेरी बच्ची… तू आ गई…”
वह बिलख रही थी, जैसे सालों से रुका हुआ दर्द एक साथ बह निकला हो।
बस स्टैंड पर लोग रुक गए।
एक आर्मी ऑफिसर… और एक भिखारिन।
लेकिन अनुष्का को किसी की परवाह नहीं थी।
उसने माँ को थाम लिया।
वह माँ—जिसके हाथ कभी मज़बूत हुआ करते थे—आज काँप रहे थे।
“माँ… यह सब क्या है?”
अनुष्का की आवाज़ खुद से ही सवाल कर रही थी।
माँ कुछ कहना चाहती थी, लेकिन शब्द उसके आँसुओं में डूब गए।
अनुष्का माँ को बस स्टैंड की एक बेंच पर ले जाकर बिठा लाई।
शोर था, भीड़ थी, बसों की आवाज़ें थीं—लेकिन उनके बीच एक अलग ही सन्नाटा पसरा था।
ऐसा सन्नाटा, जिसमें सवाल भी डरकर खड़े रहते हैं।
माँ ने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया।
उसने बताया कि अनुष्का के जाने के कुछ महीनों बाद ही सब बदल गया।
पहले वही कमरा, वही दिनचर्या।
हर रोज़ वह इसी बस स्टैंड पर आकर बैठती—क्योंकि उसे भरोसा था कि बेटी यहीं आएगी।
लोगों से कहती,
“मेरी बेटी आर्मी में है।”
लोग सुनते, मुस्कुराते… और आगे बढ़ जाते।
फिर बीमारी आई।
अचानक एक दिन चक्कर आया और वह सड़क पर गिर पड़ी।
अस्पताल ले जाया गया।
इलाज हुआ।
लेकिन बिल बढ़ते चले गए।
पैसे खत्म होते गए।
उसने किसी से मदद नहीं माँगी।
क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि बेटी को खबर पहुँचे।
उसे लगता था—अगर अनुष्का को पता चला, तो वह अपनी ट्रेनिंग छोड़ देगी।
“मैं सह लूँगी,” माँ ने खुद से कहा था।
“पर मेरी बेटी का सपना नहीं टूटना चाहिए।”
कमरा छूट गया।
सामान बिक गया।
और एक दिन वह बस स्टैंड आ गई।
पहले दिन कटोरा हाथ में नहीं उठाया।
दूसरे दिन भूख ने ज़िद की।
तीसरे दिन कटोरा उठाना पड़ा।
माँ बोलते-बोलते रुक गई।
“मुझे डर था बेटा… कि तू लौटेगी और मुझे पहचान पाएगी या नहीं।”
अनुष्का सुन रही थी।
लेकिन हर शब्द उसके भीतर हथौड़े की तरह पड़ रहा था।
उसने माँ के पैरों की सूजन देखी।
नीली पड़ चुकी उंगलियाँ।
यह सिर्फ गरीबी नहीं थी।
यह सिस्टम की बेरुख़ी थी।
अनुष्का का गला भर आया।
वह आर्मी ऑफिसर थी।
लेकिन उस पल… वह सिर्फ एक बेटी थी।
“आपने मुझे बताया क्यों नहीं?” उसने काँपती आवाज़ में पूछा।
माँ ने सिर झुका लिया।
“क्योंकि तू देश की बेटी है… सिर्फ मेरी नहीं।”
उस एक वाक्य ने अनुष्का को तोड़ दिया।
उसने उसी पल फैसला कर लिया।
अगर आज वह चुप रही,
तो उसकी वर्दी का कोई मतलब नहीं रहेगा।
उसने माँ का हाथ थामा।
“अब आप कहीं नहीं जाएँगी।”
माँ घबरा गई।
“तेरी नौकरी… तेरा भविष्य…”
अनुष्का ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा—
“अगर यह वर्दी मुझे अपनी ही माँ के लिए खड़ा होने की ताकत नहीं देती,
तो इस वर्दी का मतलब ही क्या है?”
आगे के दिन आसान नहीं थे।
सवाल उठे।
नज़रें उठीं।
सिस्टम हिला।
लेकिन माँ ने पहली बार चैन की नींद सोई।
और अनुष्का ने समझा—
असली बहादुरी सीमा पर गोली चलाने में नहीं,
बल्कि अपनी ही माँ को भीड़ में पहचान लेने में होती है।
समाप्त
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