शीर्षक: “वसीयत का विष: एक माँ का धर्मयुद्ध”
अध्याय १: वह फोन कॉल और एक मृत सन्नाटा
जयपुर की गुलाबी सर्दी अपनी विदाई की ओर थी। ६४ वर्षीय उर्मिला सक्सेना अपनी छोटी सी लाइब्रेरी में बैठी थीं। यह कमरा केवल किताबों का संग्रह नहीं था, बल्कि उनके दिवंगत पति एडवोकेट रमेश सक्सेना की यादों का मंदिर था। मेज पर रखी उनकी चश्मा और कलम आज भी वैसे ही सजे थे जैसे वे कल ही यहाँ से उठकर गए हों।
तभी, मेज पर रखे फोन की स्क्रीन नीलम के नाम से चमक उठी। नीलम—उर्मिला की इकलौती बहू, जो पिछले दो सालों से उनके बेटे आदित्य और उनके बीच एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ी थी।
उर्मिला ने फोन उठाया। दूसरी तरफ से नीलम की आवाज़ आई, जिसमें कोई शोक नहीं, बल्कि एक हिंसक विजय का स्वर था। “सुनिए माता जी, आपका बेटा आदित्य अभी-अभी मर गया है। हार्ट अटैक था। अंतिम संस्कार रविवार को बेंगलुरु में है। और हाँ, उसने अपनी सारी संपत्ति, और आपके इस जयपुर वाले घर का हिस्सा भी मेरे नाम कर दिया है। आपको कुछ नहीं मिलेगा।”
उर्मिला के चेहरे पर एक शिकन भी नहीं उभरी। उन्होंने एक नज़र अपने बगल में खड़े आदित्य पर डाली, जो पिछले तीन दिनों से अपनी माँ के पास गुप्त रूप से रह रहा था।
उर्मिला ने शांत स्वर में कहा, “नीलम, तुमने आदित्य के ‘मरने’ का समय क्या तय किया है? क्योंकि वह तो अभी मेरे ठीक बगल में खड़ा तुम्हारी आवाज़ सुन रहा है।”
फोन के दूसरी तरफ से एक ऐसी चीख निकली जो किसी आत्मा के टूटने जैसी थी। नीलम ने फोन काट दिया, लेकिन उर्मिला जानती थीं कि असली युद्ध अब शुरू हुआ है।
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अध्याय २: धीमे ज़हर की शुरुआत
यह कहानी उस एक फोन कॉल की नहीं थी, बल्कि ५ साल तक दिए गए उस धीमे ज़हर की थी जिसने एक सुखी परिवार को खोखला कर दिया था। उर्मिला सक्सेना महारानी कॉलेज की रिटायर्ड हेड लाइब्रेरियन थीं। ३२ साल तक उन्होंने हज़ारों किताबों और हज़ारों दिमागों को पढ़ा था। वे जानती थीं कि शब्दों के पीछे छिपे इरादे क्या होते हैं।
शादी के समय नीलम कपूर एक विनम्र और मीठी लड़की लगती थी। आदित्य, जो बेंगलुरु की एक बड़ी आईटी कंपनी में ऊंचे ओहदे पर था, नीलम के प्यार में अंधा था। उर्मिला को पहली बार शक तब हुआ जब रमेश सक्सेना के निधन के १३वें दिन ही नीलम ने जायदाद के कागजों के बारे में पूछताछ शुरू कर दी।
नीलम ने बहुत शातिर तरीके से आदित्य को अपनी माँ के खिलाफ भड़काना शुरू किया। उसने आदित्य के मन में यह बिठा दिया कि उर्मिला एक ‘कंट्रोलिंग’ माँ है जो अपनी संपत्ति किसी को नहीं देना चाहती।

अध्याय ३: लाइब्रेरियन का अवलोकन और जासूसी
जब आदित्य ने अपनी माँ का फोन उठाना बंद कर दिया और उनके जन्मदिन पर एक संदेश तक नहीं भेजा, तब उर्मिला समझ गईं कि अब प्रार्थनाओं का नहीं, प्रमाणों का समय है।
उर्मिला ने अपनी कॉलेज की सहेली और नामी वकील अर्चना से संपर्क किया। अर्चना ने सलाह दी, “उर्मिला, भावुक मत बनो। सबूत इकट्ठे करो।”
उर्मिला ने अपनी बचत का एक हिस्सा निकालकर बेंगलुरु में एक प्राइवेट डिटेक्टिव रखा। अगले दो महीनों में जो सच सामने आया, उसने उर्मिला की रूह कंपा दी। नीलम का अफेयर आदित्य के ही बिजनेस पार्टनर अमन के साथ चल रहा था। वे दोनों मिलकर आदित्य की कंपनी और उसकी पैतृक संपत्ति को हड़पने की साजिश रच रहे थे।
नीलम आदित्य को रोज़ रात खाने में ऐसी दवाइयां दे रही थी जिससे उसे लगातार थकान और मानसिक तनाव रहे। वह उसे धीरे-धीरे ‘हार्ट पेशेंट’ साबित करने की कोशिश कर रही थी ताकि उसकी ‘मौत’ स्वाभाविक लगे।
अध्याय ४: जाल बिछाना और आदित्य की वापसी (नया विस्तार)
उर्मिला ने आदित्य को सीधे फोन नहीं किया। उन्होंने एक अज्ञात ईमेल आईडी से वे सारी तस्वीरें और ऑडियो क्लिप्स आदित्य को भेज दीं जो डिटेक्टिव ने जुटाई थीं।
आदित्य के लिए वह ईमेल एक ज़ोरदार थप्पड़ की तरह था। उसने गुपचुप तरीके से अपनी पत्नी पर नज़र रखनी शुरू की और जब उसने नीलम को अमन के साथ एक होटल के कमरे में रंगे हाथों पकड़ा, तो उसकी दुनिया उजड़ गई। लेकिन नीलम हार मानने वालों में से नहीं थी। उसने आदित्य को धमकी दी कि वह उस पर घरेलू हिंसा का केस करेगी और उसे सड़क पर ले आएगी।
टूटा हुआ आदित्य आधी रात को अपनी माँ के घर पहुँचा। उर्मिला ने उसे डांटा नहीं, बस गले लगा लिया। माँ और बेटे ने मिलकर नीलम को उसके ही जाल में फंसाने की योजना बनाई। आदित्य ने दुनिया की नज़रों में ‘लापता’ होने का नाटक किया, जबकि नीलम को लगा कि वह डरकर भाग गया है या मर गया है।
अध्याय ५: रविवार का ‘अंतिम संस्कार’ और कानूनी प्रहार (नया अध्याय)
रविवार का दिन आया। नीलम ने बेंगलुरु में एक फर्जी शोक सभा रखी थी। उसने उर्मिला को वह फोन कॉल केवल अपमानित करने और घर खाली करवाने की धमकी देने के लिए किया था।
नीलम को लगा कि उर्मिला एक असहाय बुढ़िया है जो रोएगी और गिड़गिड़ाएगी। उसे नहीं पता था कि उर्मिला ने जयपुर के पुलिस कमिश्नर और अपनी वकील अर्चना के साथ मिलकर जाल बिछा रखा है।
जैसे ही नीलम शोक सभा में आदित्य के फर्जी डेथ सर्टिफिकेट और जाली वसीयत के आधार पर संपत्तियों के हस्तांतरण की घोषणा करने वाली थी, पुलिस के साथ उर्मिला और स्वयं ‘जीवित’ आदित्य वहां पहुँचे।
नीलम का चेहरा सफेद पड़ गया। उर्मिला ने आगे बढ़कर नीलम के हाथ से वह जाली वसीयत छीनी। “नीलम, तुमने किताबों के पन्ने तो पढ़े, लेकिन एक लाइब्रेरियन की आँखों को नहीं पढ़ सकीं।”
अध्याय ६: कर्म का चक्र और नई शुरुआत (नया अध्याय)
नीलम पर जालसाजी, हत्या के प्रयास (दवाइयों के माध्यम से), और धोखाधड़ी के गंभीर मामले दर्ज हुए। उसे ६ महीने की जेल हुई और अमन का बिजनेस साम्राज्य ढह गया। नीलम के माता-पिता, जो उसकी साजिश में शामिल थे, उन्हें भी कानूनी परिणाम भुगतने पड़े।
आदित्य अब वापस जयपुर आ गया है। उसने अपनी माँ के साथ मिलकर एक ‘रमेश सक्सेना मेमोरियल लीगल एंड लिटरेरी सेंटर’ खोला है, जहाँ वे उन बुजुर्गों की मदद करते हैं जिन्हें उनके बच्चे या बहू-बेटे प्रताड़ित करते हैं।
उर्मिला सक्सेना आज भी अपनी उसी पुरानी मेज पर बैठती हैं। वे आज भी लाइब्रेरियन हैं, लेकिन अब वे केवल किताबें नहीं, बल्कि उन बुजुर्गों की जिंदगी की कहानियाँ संभालती हैं जो हार मान चुके थे।
निष्कर्ष: मानवता का संदेश
यह कहानी हमें सिखाती है कि उम्र केवल एक संख्या है। बुद्धि और साहस कभी बूढ़े नहीं होते। अगर आप सच के साथ खड़े हैं और आपके पास धैर्य है, तो दुनिया की कोई भी चालाकी आपको हरा नहीं सकती। एक माँ का प्यार कोमल होता है, लेकिन जब बात उसके बच्चे और स्वाभिमान की आती है, तो वही माँ कालिका का रूप भी ले सकती है।
जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है कि अन्याय की जड़ें कितनी भी गहरी क्यों न हों, न्याय का सूरज उन्हें सुखा ही देता है।
समाप्त
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