“Ek Zalim Betay Ne Apni Boorhi Maa Ko Old House Mein Chhor Diya 😢 Phir Kya Hua?

मां की चिट्ठी: एक घर, एक बेटे और सैकड़ों माओं की दास्तान
भाग 1: लाहौर स्टेशन का सफर
लाहौर स्टेशन पर ट्रेन आहिस्ता-आहिस्ता रुकी। डिब्बे के दरवाजे पर खड़ी शाह बीबी ने थके कदमों से प्लेटफार्म पर पैर रखा। हाथ में एक पुराना बक्स, सिर पर दुपट्टा और आंखों में हल्की सी चमक जैसे किसी अधूरे ख्वाब को लेकर वो शहर आई थी। उनके दिल में एक ही खुशी थी—अब अपने बेटे हमजा के साथ रहूंगी। घर में बच्चों की हंसी सुनूंगी और दिन फिर से रोशनी से भर जाएंगे।
सामने खड़ा था हमजा। हाथ में मोबाइल, नजरें किसी कॉल में उलझी हुई। “अरे हमजा बेटा!” शाह बीबी ने मुस्कुरा कर पुकारा। हमजा ने सर उठाया, हल्की सी मुस्कुराहट दी। “अम्मी आइए ना, गाड़ी इधर खड़ी है।” आवाज में अपनाइयत तो थी मगर वो गर्मी नहीं जो मां के लम्स से मिलती है।
रास्ते भर शाह बीबी शहर की ऊंची इमारतों, चमकती दुकानों को देखती रही। “कितना बदल गया है लाहौर। जब मैं गई थी तब यह सड़कें कच्ची थी।” वो आहिस्ता से बोली। हमजा ने बस “हूं” कहा।
भाग 2: नए घर की पुरानी दीवारें
घर पहुंची तो सामने बहु सानिया थी—स्टाइलिश लिबास में, हाथ में फोन, रस्मी मुस्कुराहट के साथ आगे बढ़ गई। शाह बीबी ने दुआ के लिए हाथ उठाया, “सदा खुश रहो बेटी।” सानिया ने सर झुका लिया, चेहरे पर ना कोई एहसास, ना अपनाइयत।
थोड़ी देर बाद शाह बीबी को एक छोटे कमरे में ले जाया गया—घर के पिछले हिस्से में, जहां पहले से कुछ पुराना सामान रखा था। “अम्मी जी, यह कमरा साफ करवा दिया है आपके लिए। बाकी आगे बच्चों का स्टडी रूम है।” सानिया बोली।
शाह बीबी ने मुस्कुरा कर कहा, “कोई बात नहीं बेटी, मुझे तो बस एक कोना चाहिए था।” कमरे की दीवारों पर नमी के दाग थे, मगर उनके दिल में उम्मीद थी। उन्होंने बिस्तर पर अपनी पुरानी चादर बिछाई और आहिस्ता से कहा, “अब तो दिन अच्छे गुजरेंगे। बेटा साथ है, घर है, क्या चाहिए और?”
भाग 3: टेबल की दूरी, दिल की दूरी
शाम को सब डाइनिंग टेबल पर बैठे। शाह बीबी भी कुर्सी खींचकर पास बैठने लगी तो सानिया बोली, “अम्मी जी आप चाहे तो पहले खा लीजिए। बच्चों की ऑनलाइन क्लास है।” “नहीं बेटी, साथ में ही खा लेंगे।” मगर बच्चों ने हेडफोन लगाकर सर हिला दिया। हमजा किसी ईमेल में मशरूफ था।
शाह बीबी ने नवाला तोड़कर मुंह में रखा, मगर नवाले से ज्यादा कड़वा जायका उनके दिल में उतरा। रात में वह खिड़की से बाहर देख रही थी। शहर की रोशनियां टिमटिमा रही थी, मगर उनके अंदर अंधेरा बढ़ता जा रहा था।
भाग 4: सुमेरा की मुस्कान, मां की तन्हाई
तभी अंदर आई काम वाली औरत सुमेरा—हाथ में झाड़ू, चेहरे पर पसीना मगर लबों पर मुस्कुराहट। “अम्मी जी, कुछ चाहिए क्या?” “नहीं बेटी, तू बैठ ना थोड़ा। गांव में तो लोग सीधी बात करते हैं। यहां सब अंग्रेजी में बोलते हैं, मुझे कुछ भी समझ नहीं आती।”
सुमेरा हंस पड़ी, “अम्मी जी, आप हैं ना इस घर में तो लगता है थोड़ी रौनक है, वरना सब तो अपने-अपने मोबाइल में गुम रहते हैं।” शाह बीबी चुप रह गई। उस रात वह देर तक जागती रही। पुराने दिनों की यादों में खोई हुई, जब सहन के पीपल के नीचे बैठकर हमजा का स्कूल से आना देखती, उसके लिए गुड़ वाली चाय रखती।
भाग 5: मां की कोशिशें, बहु की बेरुखी
सुबह सानिया की आवाज ने चौंका दिया, “अम्मी जी, चाय बना लेंगी? मेरी एक मीटिंग है।” “हां बेटी, बना दूंगी।” शाह बीबी बोली और आहिस्ता-आहिस्ता रसोई की तरफ चल पड़ी। हाथ कांप रहे थे, मगर दिल में एक सुकून था। शायद वक्त के साथ सब ठीक हो जाए।
उन्होंने चाय बनाई, ट्रे में रखी और सानिया के कमरे में ले गई। सानिया ने बगैर देखे कहा, “थैंक यू अम्मी जी।” शाह बीबी खामोशी से वापस आ गई। कमरे में आकर उन्होंने पुराना एल्बम निकाला, तस्वीरों पर उंगलियां फेरते हुए आहिस्ता से बोली, “देख बेटा, जब तू छोटा था ना, तो जब भी बुखार चढ़ता सारी रात तेरे सर पर हाथ रखकर बैठती थी। और आज तू इतना बड़ा हो गया कि तेरी मां का तनापन तुझे नजर ही नहीं आता।”
आंखों से आंसू निकले मगर होठों पर मुस्कुराहट थी।
भाग 6: घर में सन्नाटा, मां की यादें
दिन गुजरते गए। मां का दिल सुबह की धूप खिड़की से अंदर आती तो वह आहिस्ता से आंखें खोलती। नीचे से बर्तनों की आवाजें, सानिया की बुलंद आवाज, “अम्मी जी, दूध उबाल कर रख दीजिएगा। बच्चों का नाश्ता मुझे बनाना है।” “हां बेटी, अभी करती हूं।”
जब वह किचन में पहुंची तो देखा, सानिया मोबाइल पर किसी से बात कर रही थी, “हां मम्मा, वही पुरानी आदतें हैं। हर काम में दखल देती हैं। देखती हूं अब कितने दिन टिकती हैं यहां।”
शाह बीबी के हाथ रुक गए। कभी वह टीवी चलाती तो सानिया कहती, “अम्मी जी, आवाज कम कीजिए, बच्चों को डिस्ट्रैक्शन होता है।” कभी वह खिड़की खोलती तो जवाब आता, “मच्छर आ जाएंगे, बंद रखें।”
अब दीवारें बोलने लगी थीं। हर कोना कहने लगा, “यह घर तो है मगर इसमें अपनापन नहीं।”
भाग 7: इल्ज़ाम और टूटता दिल
एक दोपहर सुमेरा आई। “अम्मी जी, आज आप बहुत थकी हुई लग रही हैं।” “थकन नहीं बेटी, बस याद आ गई उन दिनों की, जब मैं खुद घर चलाती थी। हमजा कितना हंसमुख बच्चा था। एक बार बुखार में सारी रात पानी की पट्टियां रखी।”
सुमेरा ने नरमी से कहा, “अम्मी जी, बेटा बड़ा हो जाता है, मगर मां का दिल कभी बड़ा नहीं होता।” शाह बीबी ने उसकी तरफ देखा। इन आंखों में वही नरमी थी जो अब इस घर में कहीं नहीं बची थी।
शाम को जब हमजा दफ्तर से आया, शाह बीबी ने हिम्मत करके कहा, “बेटा, तेरे लिए आलू के पराठे बनाए हैं। बचपन में तुझे बहुत पसंद हैं।” हमजा ने फाइलों का ढेर रखते हुए कहा, “अम्मी, आज नहीं, बहुत थक गया हूं। नया ऑर्डर है। बाहर से कुछ मंगवा लेंगी।” “ठीक है बेटा।” वो बोली और चुपचाप अपने कमरे में लौट गई।
भाग 8: चोरी का इल्ज़ाम और मां का अपमान
अगली सुबह सानिया की आवाज एक बार फिर सुनाई दी, मगर इस बार गुस्से में, “आपने सुना, कल मैंने बैंक से ₹1 लाख निकाले थे। अलमारी में रखे थे। आज कहीं नहीं मिल रहे।” हमजा ने हैरानी से कहा, “शायद कहीं और रख दिए होंगे।” सानिया तेज लहजे में बोली, “नहीं हमजा, मुझे अच्छी तरह याद है। कल दोपहर मैंने यहीं पर रखे थे। अब साफ-साफ किसी ने निकाले हैं घर में। और है कौन?”
उसकी नजरें आहिस्ता-आहिस्ता शाह बीबी के कमरे की तरफ उठी। हमजा खामोश हो गया। जानता था सानिया क्या सोच रही है, मगर कुछ कहने की हिम्मत ना हुई।
शाह बीबी उस वक्त अपने कमरे में तस्बीह पढ़ रही थी। पीछे से सानिया और हमजा अंदर आए। “अम्मी,” हमजा की आवाज भारी थी। “हां बेटा, क्या हुआ? सब खैरियत है?” सानिया बीच में बोल पड़ी, “अम्मी जी, अलमारी से ₹1 लाख गायब हैं। आप तो घर में अकेली रहती हैं।”
“बेटी, तू क्या कह रही है? मैं… मैंने तो तुम्हारी चीजों को कभी हाथ भी नहीं लगाया।” हमजा ने धीरे से कहा, “अम्मी, हम इल्ज़ाम नहीं लगा रहे, बस पूछ रहे हैं। आपने कुछ देखा क्या?” “नहीं बेटा, कुछ भी नहीं।”
सानिया ने तंज़ी अंदाज में कहा, “अगर चोरी नहीं की तो डर किस बात का? जरा आपका बक्सा देख लूं।” “अरे बेटी, यह क्या कह रही है तू? मेरा बक्सा… इसमें तो बस मेरे कपड़े और हमजा की बचपन की तस्वीरें हैं।”
मगर सानिया ने इजाजत लिए बगैर बक्सा खोल दिया। शाह बीबी घबरा गई और अचानक दो गड्डियां नोटों की जमीन पर गिर पड़ी। लम्हा भर में कमरे में सन्नाटा छा गया। हमजा की आंखें फैल गईं। सानिया के लबों पर जहरीली मुस्कुराहट थी। “देख लिया हमजा, अब क्या सबूत है यह? यही है तुम्हारी नेक मां।”
शाह बीबी लरजती आवाज में बोली, “नहीं बेटा, यह पैसे मैं नहीं लाई। खुदा की कसम, मैंने नहीं। तू बस एक बार मेरी आंखों में देख। क्या मैं तेरे घर की इज्ज़त लूट लूंगी?” मगर हमजा के लबों पर चुप थी। उसने सिर्फ सर झुका लिया, “अम्मी, मुझे समझ नहीं आ रहा।” “समझने की जरूरत नहीं,” सानिया ने सख्त लहजे में कहा। “अब सब कुछ साफ है। घर में चोरी किसने की?”
शाह बीबी का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में जकड़ लिया और रो पड़ी। जिस बच्चे के लिए मैंने अपनी सारी जिंदगी कुर्बान कर दी, आज वही मुझसे सबूत मांग रहे हैं। आंसू उनके चेहरे पर बह रहे थे, मगर सानिया के चेहरे पर जरा सी भी नरमी ना आई।
भाग 9: घर से विदाई, मां का सफर
रात का सन्नाटा सारे घर पर छा गया। शाह बीबी अपने बिस्तर पर बैठी थी, आंखों से आंसू बह रहे थे। दिल कह रहा था, अब जाना होगा। इस घर में मेरा कुछ नहीं रहा।
बाहर ड्राइंग रूम में सानिया और हमजा धीरे-धीरे बात कर रहे थे। “यह हमारी इज्ज़त का सवाल है,” सानिया बोली। “अब तुम्हें फैसला करना होगा। या तो इन्हें गांव भिजवाओ या किसी ओल्ड होम में।” हमजा खामोश बैठा। आखिर हल्की आवाज में बोला, “सानिया, वो मेरी मां है।” सानिया ने तेज लहजे में कहा, “और मैं तुम्हारी बीवी हूं। अब एक ही छत के नीचे दोनों नहीं रह सकती।”
शाह बीबी यह सब कुछ अपने कमरे से सुन रही थी। वो उठी और आहिस्ता से बोली, “अब इस घर की रोशनी भी मेरे लिए बुझ गई है।”
रात भर वह जागती रही। सुबह जब सूरज निकला तो उनके कमरे का दरवाजा आधा खुला था। वो कुर्सी पर बैठी हुई थी, हाथ में चाय का प्याला मगर चाय ठंडी हो चुकी थी। आंखें सूजी हुई थीं, जैसे सारी रात रोती रही हो।
भाग 10: ओल्ड होम की दहलीज़
दोपहर का वक्त था। हमजा हाथ में एक छोटा सा बैग लिए मां के कमरे में आया। शाह बीबी तस्बीह पढ़ रही थी। “अम्मी,” उसने नरम लहजे में कहा। “हां बेटा, चाय लाऊं?” “नहीं अम्मी, वो आज दो-तीन दिन के लिए आपको एक जगह ले जाना है। जरा हवा बदल जाएगी तो तबीयत भी बेहतर हो जाएगी।”
शाह बीबी ने मुस्कुरा कर कहा, “अच्छा बेटा, अब मेरी तबीयत का क्या… तू कहे तो चलती हूं।” वो आहिस्ता से उठी, “अब अगर मैं वापस ना भी आई तो भी इन सबको अपनी हिफ्ज़ोमान में रखना।”
गाड़ी शहर की सड़कों पर चल रही थी, लाहौर की चमक-दमक पीछे छूट रही थी। शाह बीबी खिड़की से बाहर देख रही थी, सड़कों के किनारे वही पुराने दरख्त, वही हवा—सब कुछ यादों की तरह उनके दिल से गुजर रहा था। उन्होंने हमजा की तरफ देखा, “बेटा, कहां जा रहे हैं?” “गांव,” हमजा ने नजरें चुराई। “बेटा, अगर तू चाहता है तो मैं वहीं रह लूंगी। बस एक वादा कर, ईद या किसी त्योहार पर कभी-कभी मिलने आ जाना।”
कुछ देर बाद गाड़ी एक पुरानी इमारत के सामने रुकी। बाहर बोर्ड लगा था—”निकत आरामगाह”। हमजा ने नजरें झुका ली। “यही है वो जगह बेटा।” हमजा कुछ ना बोला। “मैं बोझ बन गई थी ना बेटा?” उसके अल्फाज़ हल्के मगर तीर की तरह लगे। “नहीं अम्मी, ऐसा मत कहें।” “फिर क्यों लाया तू मुझे यहां?”
इतने में आरामगाह की एक औरत आई। शाह बीबी का हाथ थामा और अंदर ले गई। शाह बीबी आरामगाह के बरामदे में बेंच पर बैठ गई। आंखों से आंसू बह रहे थे, मगर होठों पर एक ही जुमला था—”बेटा, मैं तेरे लिए किसी घर के किसी कोने में पड़ी रह लेती।”
भाग 11: आरामगाह की नई दुनिया
आरामगाह की दीवारों पर शाम उतर आई थी। कहीं कोई रोशनी नहीं थी, बस एक मां का टूटा हुआ दिल जो सन्नाटे में सांस ले रहा था। अगली सुबह वो एहतियात से अंदर कदम रख रही थी। सामने लान में कुछ बूढ़ी खवातीन धूप में बैठी थी। कोई अखबार पढ़ रही थी, कोई खामोश आसमान को तक रही थी।
वॉर्डन ने रजिस्टर पर दस्तखत करवाए, “अम्मी जी, यहां सब अपना ख्याल खुद रखते हैं। खाना वक्त पर मिलेगा, दवा भी। कोई तकलीफ हो तो बता दीजिएगा।” शाह बीबी ने बस सर हिला दिया और अपने नए कमरे में चली गई। एक तंग सा कमरा, एक बिस्तर, एक घड़ी, एक लोहे की अलमारी।
उन्होंने धीरे से कहा, “या अल्लाह, अब यही मेरा नया सफर है।” उनके दिल के अंदर एक ही सवाल बार-बार गूंज रहा था—काश मेरा हमजा एक बार आ जाए, बस एक बार। मगर दरवाजे पर सिर्फ हवा की सरसराहट थी।
भाग 12: सुमेरा की ममता, मां की दुआ
अगले दिन सुबह एक जानी पहचानी आवाज सुनाई दी, “अम्मी जी!” शाह बीबी चौंक गई। दरवाजे पर खड़ी थी सुमेरा—वही पुरानी काम वाली, आंखों में निदामत, हाथ में एक टिफिन। “अम्मी जी, मुझे पता चला कि आप यहां पर हैं। दिल टूट गया सुनकर। आपने मेरे लिए जो किया, मैं कभी नहीं भूल सकती।”
शाह बीबी की आंखें भर आईं, “बेटी, तू आ गई तो लगता है अल्लाह ताला ने मुझ पर अब भी करम किया है।” सुमेरा ने टिफिन खोला, “आपके लिए खिचड़ी बनाई है। आपको बहुत पसंद थी ना?” शाह बीबी मुस्कुरा दी, “हां बेटी, यहां सब कुछ अजनबी है, बस तेरे हाथ का जायका याद था।”
दोनों खामोश बैठ गए, खाने लगी। इतना प्यार, इतनी नरमी किसी अजनबी में कहां मिलती है? दिन गुजरते गए, सुमेरा हर इतवार को आती, कभी कोई फ्रूट, कभी घर का बना हुआ सालन ले आती। शाह बीबी उसी दिन का इंतजार करती। वह बेटी में ही थी, मगर हर मुलाकात मां-बेटी जैसी लगती थी।
भाग 13: आरामगाह की मां, सुमेरा की बहन
एक दिन शाह बीबी ने कहा, “बेटी, जब मैं लाहौर आई थी, ना सोचा था अपने पोतों की हंसी सुनूंगी। पर अब यहां हर दीवार मुझे मेरे अंदर का सन्नाटा सुनाती है।” सुमेरा ने आहिस्ता से उनका हाथ थामा, “अम्मी जी, अब आप अकेली नहीं है। मैं हूं ना। कभी-कभी अल्लाह ताला अपने छीने हुए रिश्ते किसी पराए के हाथ से लौटा देता है।”
अब आरामगाह की बाकी औरतें भी उन्हें मां जी कहने लगी थी। वो सबके सर पर हाथ फेरती, कभी किसी को कहती, “बेटी, खाना पूरा खा लो, नहीं तो दवा कड़वी लगेगी।” वो जैसे अपने दुख से दूसरों को मरहम देती थी।
एक दिन सुमेरा अपने छोटे बेटे अहमद को साथ लाई। “अम्मी जी, यह आपसे दुआ लेना चाहता है।” शाह बीबी के आंसू बह निकले। उन्होंने बच्चे को गोद में उठाया। वो लम्हा आरामगाह का सबसे रोशन लम्हा बन गया।
कई महीने गुजर गए, मगर अब शाह बीबी के चेहरे पर एक इत्मीनान था। उनकी आंखों की थकन कुछ कम लगने लगी थी।
भाग 14: मां की चिट्ठी, बेटे का पछतावा
एक दिन सुमेरा बोली, “अम्मी जी, मैं हमजा साहब को फोन करवा दूं। शायद आपसे बात कर लें।” शाह बीबी ने मुस्कुरा कर सर हिलाया, “नहीं बेटी, अब अगर वह आएगा तो मां के पास नहीं।” सुमेरा चुप हो गई, बस उनका हाथ थामे बैठी रही।
शाम ढली तो शाह बीबी बरामदे में बैठी हुई थी। आसमान पर सूरज आहिस्ता-आहिस्ता डूब रहा था। उन्होंने तस्वीर सीने से लगाई और मध्यम आवाज में कहा, “हमजा, मां थक गई है। मगर दिल अगर कभी पछतावे में डूबे तो आ जाना। मां फिर भी तुझे गले लगा लेगी।”
उनके चेहरे पर सुकून उतर आया, जैसे कोई टूटा दिल दोबारा दुआ बन गया हो। और निगत आरामगाह के कमरे में शाह बीबी अपनी कुर्सी पर बैठी हुई थी। सामने मेज पर एक कागज, एक कलम और उनके कपकपाते हाथ। उन्होंने आहिस्ता-आहिस्ता लिखना शुरू किया—
“मेरे बेटे हमजा, सदा खुश रहो बेटा। शायद यह मेरा आखिरी खत है। बेटा, मैं जानती हूं तू मां को चोर नहीं समझना चाहता था, मगर हालात ने तुझे वैसा सोचने पर मजबूर किया। जिस दिन तू दफ्तर गया था, उसी दिन सानिया ने तेरे पैसे मेरे बक्से में रख दिए थे। वो चाहती थी कि मुझे इस घर से निकाला जाए। मैंने किसी से कुछ नहीं कहा बेटा, क्योंकि मैं तेरा घर टूटना नहीं देख सकती थी। अगर मैं सच बताती तो तेरी जिंदगी बिखर जाती। मैं सानिया को भी कसूरवार नहीं समझती। शायद उसे कभी मां का प्यार मिला ही नहीं। मगर बेटा, अगर कभी तू किसी रिश्ते में तनहाई महसूस करे तो किसी बूढ़ी मां की आंखों में देख लेना। मेरा कसूर बस इतना है कि मैंने तुझे बहुत चाहा। तू जब यह खत पढ़ेगा, तब शायद मैं इस दुनिया में ना हूं।”
उन्होंने खत लपेटा, लिफाफे में रखा और इस पर लिखा—”मेरे बेटे हमजा के नाम।” फिर उसे मेज पर रख दिया। इसके बाद खिड़की के पास आकर बैठ गई। हवा उनके चेहरे से खेल रही थी और आहिस्ता-आहिस्ता उनकी सांसे थम गई। चेहरे पर सुकून था, जैसे कोई मां अपने आखिरी लम्हे में भी अपने बेटे को माफ कर गई हो।
भाग 15: बेटे की वापसी, पछतावे की आग
अगली सुबह स्टाफ ने दरवाजा खोला तो शाह बीबी अपनी कुर्सी पर बैठी मिली। सीने से तस्वीर लगी हुई, आंखों में बंद सुकून, मेज पर वहीं खत रखा हुआ था। अमले ने फौरन फोन किया, “सर, आपकी वालदा नहीं आई।”
हमजा का मोबाइल हाथ से छूटते-छूटते बचा। मगर उसके कानों में बस एक ही आवाज गूंज रही थी, “बेटा, तू जब बड़ा होगा ना, मां को कभी अकेला नहीं छोड़ेगा ना।” वो कुछ कहे बगैर गाड़ी लेकर भाग निकला। रास्ते भर उसकी आंखों के सामने वही मनाजिर आते रहे।
जब वो निकत आरामगाह पहुंचा, तो देखा कुछ औरतें मां के जिस्म को सफेद चादर में लपेट रही थी। चेहरे पर वही नूर, वही सुकून जो सिर्फ माफ करने वालों के चेहरों पर होती है। हमजा जमीन पर बैठ गया, मां के कदमों में सर रख दिया। “अम्मी, माफ कर दो। मैंने आपको झूठा कहा, आपके प्यार को बहुत समझा।”
उसकी आवाज कांप रही थी मगर आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। एक बुजुर्ग खातून आई, “बेटा, तुम्हारी अम्मी रोज एक ही बात कहती थी—मेरा कोई कसूर नहीं था। और यह रही उनकी आखिरी चिट्ठी।”
हमजा के हाथ लरज गए। उसने खत खोला, जैसे-जैसे पढ़ता गया, चेहरे का रंग उड़ता गया। हर लफ्ज़ तलवार की तरह दिल पर लग रहा था। हमजा ने मां की कब्र के करीब बैठकर मिट्टी को हाथ से छुआ, “अम्मी, मैं कुछ नहीं बचा सिवाय निदामत के। आपकी मोहब्बत को मैंने बोझ समझा, आपकी खामोशी को कमजोरी। अब समझ आया कि मां की खामोशी दुआ होती है, बद्दुआ नहीं।”
उसकी आंखों से मिट्टी में आंसू गए थे। हमजा ने आसमान की तरफ देखा, “अम्मी, अब आपकी दुआएं मेरी सजा बन गई हैं।”
भाग 16: घर की नई पहचान
चंद दिन गुजरे, हमजा के चेहरे पर वही वीरानी थी। घर वापस आया तो दरवाजे पर सानिया खड़ी थी। चेहरे पर मसनूई अफसोस। “क्या हुआ हमजा? इतने परेशान क्यों लग रहे हो?”
हमजा की आवाज सर्द मगर अंदर से दहकती हुई थी, “मां चली गई सानिया, हमेशा के लिए।” सानिया चौकी, “क्या मतलब? कब?” “आज सुबह निकत आरामगाह में अकेली, बस एक तस्वीर और एक चिट्ठी के साथ।”
सानिया के होठ हिले मगर आवाज ना निकली। “अल्लाह ताला उनकी मगफिरत करे।” फिर मसनूई नरमी से बोली, “हमजा, खुद को संभालो, जो होना था हो गया।”
हमजा ने तेजी से उसकी तरफ देखा, “होना था, सानिया, यह तुमने करवाया।” सानिया पीछे हटी, “क्या-क्या मतलब है तुम्हारा?” हमजा ने जेब से वह आखिरी चिट्ठी निकाली, जिस पर मां के आंसुओं के दाग अब भी नुमाया थे, “यह मां का खत है जिसमें लिखा है कि तुमने ही पैसे मेरी मां के बक्से में रखे थे ताकि उन्हें चोर बनाकर निकाल सको।”
सानिया का चेहरा जड़ पड़ गया। “हमजा, मैंने… मैंने तो सिर्फ…” “क्यों सानिया, क्यों किया तुमने यह उस मां के साथ जिसने तुम्हें अपनी बेटी कहा था?”
सानिया की आंखों से आंसू बह निकले, “मैंने सोचा वो हर वक्त तुम्हें मुझसे दूर करती है, हर बात में दखल देती है। मैं बस तुम्हारा ध्यान अपनी तरफ रखना चाहती थी… गलती हो गई, बहुत बड़ी गलती।”
हमजा की आवाज कांप गई, “गलती… तुम जानती हो ना, वह अपने आखिरी दिन तक यही कहती रही—मेरा कोई कसूर नहीं था, वो मरते दम तक मेरी एक नजर चाहती थी जो मैंने कभी ना दी।”
सानिया जमीन पर गिर गई, “हमजा, मुझे माफ कर दो।”
इतने में दरवाजे पर घंटी बजी। दरवाजा खोला तो सामने सुमेरा खड़ी थी। उसने मां जी का सुदूक हमजा के हवाले किया। उसने सानिया की तरफ देखा, “सानिया, मैं तुमसे नफरत नहीं करता। मां ने तुम्हें भी माफ कर दिया था। मगर अब तुम इस घर में नहीं रहोगी। यह घर अब उस मां की यादों का मिजार बनेगा जिसे तुमने तोड़ा था।”
सानिया ने सर झुका रोते हुए बोली, “जहां मेरी जगह नहीं, वहां मैं रह भी नहीं सकती,” और वो चली गई।
भाग 17: इंसानियत का घर
हमजा ने समीरा की तरफ रुख किया, “बहन, मां की आखिरी ख्वाहिश थी कि दूसरा घर तुम्हारे नाम कर दूं। तुमने जो किया वो एहसान नहीं, इंसानियत है। अब यही घर इंसानियत की पनाहगाह बनेगा।”
समीरा की आंखों से आंसू बहने लगे, “भाई, मैंने तो कुछ नहीं किया, बस उन्हें मां समझा था।” हमजा मुस्कुराया, “और यही दुनिया की सबसे बड़ी नेकी है—किसी गैर में अपना देखना।”
वो रात हमजा की जिंदगी का नया आगाज थी। वो बरामदे में बैठा था, हवा में मां की खुशबू थी। चांदनी आंगन में फैल रही थी। उसने आसमान की तरफ देखा, “अम्मी, अब आपकी खुशबू हर सांस में है।”
उसके हाथ में रखी शाह बीबी की तस्वीर जैसे मुस्कुरा उठी, जैसे किसी मां ने आखिरकार अपने बेटे को सच्चाई का रास्ता दिखा दिया।
भाग 18: शाह बीबी होम—हर मां का घर
यह वही घर था जिसे कभी सानिया ने झगड़ों से भर दिया था। मगर अब यहां रोज कोई ना कोई बूढ़ी औरत दरवाजे पर आती है। कोई जिसे बेटे ने छोड़ दिया, कोई जिसे बेटों ने भुला दिया।
“चलें अम्मी जी, नाश्ता तैयार है। पहले दुआ, फिर जाइए।” और वो माएं, जो बरसों बाद अपने नाम से पुकारे जाने की आदि थी, मुस्कुराती, “अल्लाह ताला तुझे खुश रखे। हमजा बेटा, तुमने खाना खाया?” दूसरी कहती, “हां भाई, आज तो पराठा बड़ा जबरदस्त है।”
हंसी की आवाजें इस घर को फिर से घर बना देती। शाम को जब धूप छत पर टिकने लगी, हमजा ऊपर गया। आसमान पर सूरज डूब रहा था। उसने मुस्कुरा कर कहा, “अम्मी, अब आपका बेटा अकेला नहीं है। अब आपकी तरह की माएं यहां हंसती हैं, जीती हैं। आपके नाम की रोशनी कभी बुझने नहीं दूंगा।”
शाह बीबी होम—जहां हर मां को मिलता है घर जैसा सुकून। नीचे तस्वीर थी, हमजा मुस्कुराता हुआ दर्जनों बुजुर्ग खवातीन के दरमियान। लोग कहते थे, “वो मां जिसने जिंदगी में तनहाई सही और उसकी याद से सैकड़ों माएं इज्ज़त पा रही हैं।”
फिर आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा, “अम्मी, अब कोई मां बेसहारा नहीं रहेगी। यह मेरा वादा है।”
रात को सब सो चुके थे। हमजा बरामदे में बैठा चांद को देख रहा था। हवा में मां की खुशबू थी। अब वह घर, जहां कभी सन्नाटा था, हर रोज हंसी और मांओं की दुआओं से गूंजता था।
हमजा अब समझ गया—मां सिर्फ जन्म देने वाली नहीं होती। मां वो दिल है जो बिना शर्त मोहब्बत करता है।
समाप्त
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