ड्राइवर समझकर जिसका उड़ाया मज़ाक, वह निकला अरबपति वारिस! – अहंकार के टूटने और किस्मत के पलटने की एक अविश्वसनीय दास्तां

मुंबई… सपनों की नगरी। जहाँ हर सुबह हजारों उम्मीदें लोकल ट्रेनों के शोर और सड़कों की भीड़ में अपनी मंजिल तलाशती हैं। लेकिन जुहू की एक गगनचुंबी इमारत के नीचे खड़ी एक काली लग्जरी कार के पास पसरा सन्नाटा, शहर के शोर से कहीं ज्यादा भारी था। यह सन्नाटा समीर मल्होत्रा के सीने में दफन उस तूफ़ान की गवाही दे रहा था, जिसे उसने पिछले कई सालों से अपनी ख़ामोशी के पीछे छुपा रखा था।

सफेद वर्दी पहने, पुरानी लेकिन साफ सुथरी कमीज में समीर ने कार के रियर व्यू मिरर में अपना चेहरा देखा। कभी इसी चेहरे पर अरबों के साम्राज्य का आत्मविश्वास चमकता था, लेकिन आज वहाँ सब्र और मजबूरी की एक परत चढ़ी थी। फिर भी, आँखों में एक ऐसी चमक थी जिसे गरीबी मिटा नहीं पाई थी। उसे अपने पिता विजय मल्होत्रा के वो आखिरी शब्द याद आए— “बेटा, दौलत हाथ की मैल है, आती-जाती रहेगी। पर जिस दिन इंसान अपना स्वाभिमान खो देता है, उस दिन वो जिंदा होकर भी लाश बन जाता है।”

तभी कोठी का भारी दरवाजा खुला और माया खन्ना बाहर निकलीं। ऊँची हील्स, आँखों पर विदेशी ब्रांड का चश्मा और चेहरे पर वह क्रूर अहंकार जो अक्सर बिना मेहनत की दौलत के साथ मुफ्त मिलता है। माया के लिए इंसान की पहचान उसके चरित्र से नहीं, बल्कि उसके बैंक बैलेंस से होती थी।

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अपमान का वो घूंट

“समीर, कहाँ मर गए?” माया की तीखी आवाज़ ने समीर के ख्यालों को तोड़ा। समीर ने लपककर दरवाजा खोला, “जी मैडम, सब तैयार है।”

कार में बैठने से पहले माया ने अपनी नाक सिकोड़ी, जैसे सामने कोई इंसान नहीं, बल्कि कूड़े का ढेर हो। “उफ्फ! तुम्हारी इस सस्ती साबुन की बदबू से मेरा सिर फटने लगता है समीर। कितनी बार कहा है कि मेरे सामने आने से पहले ढंग का परफ्यूम लगाया करो। लेकिन तुम जैसे सड़क छाप लोगों से उम्मीद भी क्या की जा सकती है? तुम लोग सिर्फ सांस लेना जानते हो, सलीके से जीना नहीं।”

समीर के हाथ स्टीयरिंग पर जम गए। उसकी मुट्ठियां इतनी जोर से भिंच गईं कि नसें उभर आईं। उसका मन किया कि पलट कर कह दे— ‘मैडम, यह बदबू नहीं, मेहनत के पसीने की गंध है।’ लेकिन उसने कड़वाहट का वह घूंट पी लिया। “माफ़ कीजिये मैडम, आगे से ध्यान रखूँगा।”

गाड़ी एसी की ठंडक में दौड़ रही थी, लेकिन समीर का आत्मसम्मान गुस्से की आग में जल रहा था। पीछे बैठी माया फोन पर अपनी सहेली विनीता से बात करते हुए समीर का मज़ाक उड़ा रही थी। “छोड़ो ना डार्लिंग, ये ड्राइवर्स भी अजीब होते हैं। न शक्ल, न अकल। भगवान ने शायद इन्हें बनाया ही हमारी गुलामी के लिए है।”

समीर ने मिरर में माया की आँखों में देखा। उसे समझ आ गया था कि अब दबने का वक्त खत्म हो चुका है। पतन की ढलान पूरी हो चुकी थी, और अब बारी थी वापस उस पहाड़ पर चढ़ने की जिसे दुनिया ‘कामयाबी’ कहती है। उसने मन ही मन खुद से वादा किया— “मेरा वक्त खराब है मैडम, मेरा खून नहीं। आज आप मुझे मेरी औकात दिखा रही हैं, कल मैं आपको आपकी छोटी सोच का आईना दिखाऊंगा।”

अतीत के पन्ने: जब राजा बना रंक

दोपहर को जब माया अपनी शॉपिंग के लिए गई, समीर कार में बैठा उस पुराने दौर को याद करने लगा जब वह ‘मल्होत्रा ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज’ का वारिस था। वह यादें किसी फिल्म की रील की तरह उसकी आँखों के सामने घूमने लगीं। लंदन से एमबीए की डिग्री लेकर जब वह लौटा था, तो पिता ने कहा था, “समीर, याद रखना, बिज़नेस सिर्फ दिमाग से नहीं, साख से चलता है।”

लेकिन वो साख एक ही रात में धोखे की भेंट चढ़ गई। उनके सबसे भरोसेमंद पार्टनर ने विश्वासघात का ऐसा खंजर घोंपा कि सब कुछ राख हो गया। बैंक के नोटिस, घर की नीलामी, और पिता का दिल का दौरा। वह मंजर समीर को आज भी सिहरन से भर देता है जब माया खन्ना की ही एक करीबी दोस्त ने उनके घर से निकलते वक्त हंसते हुए कहा था— “अब सड़क पर रहने की आदत डाल लीजिये मल्होत्रा साहब।” उस सदमे ने पिता की जान ले ली और अरबों का वारिस, पेट पालने के लिए एक ड्राइवर की वर्दी पहनने पर मजबूर हो गया।

जन्मदिन की क्रूर साजिश

कुछ दिनों बाद, माया ने कार में बैठे-बैठे एक अजीब सा फरमान सुनाया। “अगले हफ्ते मेरा जन्मदिन है समीर। शहर के तमाम रईस लोग आ रहे हैं। मैं चाहती हूँ तुम भी वहां रहो।”

समीर चौंका। “मैं? पर मैडम, मैं तो सिर्फ एक ड्राइवर हूँ।”

माया के होंठों पर एक जहरीली मुस्कान तैर गई। “वही तो मैं चाहती हूँ। मेरे मेहमान देखें कि एक असली ‘गरीब’ कैसा दिखता है। तुम मेरे लिए वहां एक लाइव मनोरंजन (Live Entertainment) होगे। मैं सबको दिखाना चाहती हूँ कि वफादार कुत्ता पालना किसे कहते हैं।”

समीर ने अपमान की इस नई चाल को भांप लिया। लेकिन इस बार उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी शांति थी। उसने कहा, “जी मैडम, मैं जरूर आऊंगा। आपका यह जन्मदिन वाकई यादगार होगा।”

वह रात: गरीबी का तमाशा या स्वाभिमान की जीत?

जन्मदिन की शाम माया खन्ना की कोठी किसी दुल्हन की तरह सजी थी। शहर के सबसे अमीर और नामचीन लोग वहां मौजूद थे। माया ने समीर को बुलाया और एक पुराना, फटा हुआ और गंदा सा वेटर का कोट उसकी तरफ फेंका।

“यह पहन लो समीर। मैं चाहती हूँ आज रात मेरे रईस दोस्त देखें कि असली गरीबी कैसी दिखती है। यह शराब की पेटियां उठाओ और मेज साफ़ करो। याद रखना, अगर मैंने तुम्हें कामचोरी करते देखा तो तुम्हारी तनख्वाह काट लूँगी।”

समीर ने उस फटे हुए कोट को उठाया। उसकी आँखों में आंसू नहीं, एक आग थी। वह चुपचाप कोठी के पीछे बने सर्वेंट क्वार्टर में चला गया। वहाँ, उसने अपना पुराना संदूक खोला। धूल जमी उस लकड़ी के बक्से में उसकी माँ की आखिरी निशानी और उसका अतीत कैद था। उसने वह फटा हुआ कोट एक कोने में फेंक दिया और संदूक से मलमल के कपड़े में लिपटा अपना गहरा नीला (Navy Blue) सूट निकाला।

यह वही सूट था जिसे पहनकर उसने अपनी एमबीए की डिग्री ली थी। यह वही सूट था जिसे देखकर उसके पिता ने कहा था— “इस सूट में तुम सिर्फ एक इंसान नहीं, मल्होत्रा साम्राज्य के भविष्य लग रहे हो।” समीर ने वह सूट पहना। कफ़लिंक्स लगाए और बाल संवारे। आईने में अब कोई मजबूर ड्राइवर नहीं था। वहाँ समीर मल्होत्रा खड़ा था—घायल, लेकिन अपराजेय।

शेर की वापसी

पार्टी पूरे शबाब पर थी। माया अपनी सहेली विनीता के साथ खड़ी होकर समीर का इंतजार कर रही थी ताकि उसका तमाशा बना सके। “देखना विनीता, लोग उसे भिखारी समझकर टिप देंगे… कितना मज़ा आएगा!”

तभी, हॉल का मुख्य दरवाजा खुला। रोशनी की चकाचौंध के बीच एक शख्स दाखिल हुआ। गहरा नीला महंगा सूट, चेहरे पर गजब का तेज और चाल में वो बादशाही जिसे पैसे से नहीं खरीदा जा सकता। हॉल में सन्नाटा छा गया। संगीत रुक गया। हर निगाह उस अनजान, बेहद प्रभावशाली शख्स पर टिक गई।

माया के हाथ से शैंपेन का गिलास छूटकर ज़मीन पर चकनाचूर हो गया। उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। यह वही समीर था?

भीड़ को चीरते हुए शहर के सबसे बुजुर्ग और सम्मानित उद्योगपति, मिस्टर खन्ना (जो माया के रिश्तेदार नहीं थे) तेजी से आगे बढ़े। उनकी आँखों में नमी थी। उन्होंने समीर के कंधे पर हाथ रखा। “समीर? तुम! इतने सालों तक कहाँ थे बेटा? विजय के जाने के बाद मैंने तुम्हें कहाँ-कहाँ नहीं ढूंढा!”

पूरे हॉल में कानाफूसी शुरू हो गई। “विजय मल्होत्रा का बेटा? वो खानदान जो कभी इस शहर की धड़कन था?”

माया लड़खड़ाती हुई आगे बढ़ी, “सर, आप इसे जानते हैं? यह… यह तो मेरा ड्राइवर है।”

बुजुर्ग ने माया को ऐसी नज़रों से देखा जैसे किसी नासमझ बच्चे को देख रहे हों। “ड्राइवर? माया, जिसे तुम ड्राइवर कह रही हो, वो उस विजय मल्होत्रा का इकलौता वारिस है जिसने तुम्हें इस इंडस्ट्री में पहला मौका दिया था। यह वो खून है जिसने इस शहर को पहचान दी है।”

सच्चाई का आईना

समीर ने अपनी जेब से वह फटा हुआ वेटर का कोट निकाला जो माया ने उसे दिया था और उसे बड़ी नजाकत से एक मखमली कुर्सी पर रख दिया। फिर वह माया की ओर मुड़ा। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, बल्कि समुद्र जैसी गहराई थी।

“मैडम, आपकी जिद्द थी कि आज रात आपके रईस मेहमान मेरी ‘गरीबी’ और ‘असलीयत’ देखें। तो लीजिये, देख लिया सबने। आपने मुझे महीनों तक एक मशीन समझा, मेरी वर्दी को मेरी काबिलियत मान लिया। लेकिन आप भूल गईं कि वक्त इंसान के हालात बदल सकता है, उसका खून और संस्कार नहीं।”

समीर ने हॉल में मौजूद सभी लोगों की ओर देखा। “मेरा केस किसी अदालत में नहीं है। मेरा केस उस सोच के खिलाफ है जो इंसान के चरित्र को उसके बैंक बैलेंस से तौलती है।”

माया की आँखों से आंसू बहने लगे—पछतावे के और टूटे हुए गुरूर के। “समीर, मुझे माफ़ कर दो। मुझे नहीं पता था…”

समीर ने एक फीकी मुस्कान दी। “नाम पता होना जरूरी नहीं था मैडम, बस ‘इंसान’ होना जरूरी था। अगर मैं सिर्फ एक ड्राइवर ही होता, तो क्या मुझे इज्जत पाने का हक नहीं था?”

उसने अपनी जेब से कार की चाबियाँ निकालीं और मेज पर रख दीं। “आज से मैं आपकी नौकरी और आपके दिए हर अपमान से खुद को आज़ाद करता हूँ। मेरी माँ कहती थी—असली अमीरी तिजोरी में नहीं, इंसान के व्यवहार में होती है।”

समीर वहां से मुड़ा और बाहर निकल गया। मेहमानों की भीड़ ने अपने आप उसके लिए रास्ता बना दिया, जैसे किसी राजा के लिए बनाया जाता है। माया अपने ही आलीशान घर में आज सबसे गरीब और अकेली महसूस कर रही थी।

कर्म का चक्र

वक्त का पहिया घूमा। जिस शहर ने समीर को खामोश रहना सिखाया था, वही शहर अब उसका नाम इज्जत से लेता था। समीर ने अपनी मेहनत और पिता की पुरानी साख के दम पर ‘मल्होत्रा ग्रुप’ को फिर से खड़ा किया। बंद पड़ी फैक्ट्रियों की चिमनियाँ फिर से धुआं उगलने लगीं। समीर ने अपनी दौलत का इस्तेमाल अहंकार के लिए नहीं, बल्कि उन हजारों मजदूरों के घर चलाने के लिए किया जो उसके पिता के साथ थे।

दूसरी तरफ, माया खन्ना की दुनिया ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। उस जन्मदिन की रात ने न केवल उनकी सामाजिक साख खत्म की, बल्कि बिजनेस पार्टनर भी उनसे दूर हो गए। कर्ज़ बढ़ा, व्यापार डूबा और नौबत यहाँ तक आ गई कि उन्हें अपनी वह प्यारी कोठी बेचनी पड़ी।

आखिरी मुलाक़ात: दया ही असली बदला है

सालों बाद, मुंबई की एक तूफानी शाम। बारिश अपनी पूरी रफ़्तार में थी। समीर अपनी कार से बांद्रा की तरफ जा रहा था। ट्रैफिक सिग्नल पर उसकी नज़र एक बस स्टॉप पर पड़ी। वहाँ एक औरत बारिश से बचने के लिए टूटे हुए शेड के नीचे सिकुड़ी खड़ी थी। हाथ में पुराना थैला, चेहरे पर झुर्रियां और आँखों से वो चमक गायब थी। वो माया खन्ना थी।

समीर ने कार रोकी और शीशा नीचे किया। “मैडम?” माया ने चौंककर देखा। सामने वही समीर था। शर्म से उनकी नज़रें झुक गईं।

“बारिश बहुत तेज है। अगर आप चाहें तो मैं आपको घर तक छोड़ सकता हूँ,” समीर ने बेहद सहजता से कहा। माया कार में बैठीं, लेकिन पूरे रास्ते कुछ बोल न सकीं। जब वो अपने पुराने अपार्टमेंट के पास उतरीं, तो उनकी आँखों से आंसू छलक पड़े। “समीर, मैंने तुम्हें मिट्टी समझा था, पर तुम तो सोना निकले। मैंने तुम्हें नीचा दिखाना चाहा, पर आज उसी नीच सोच ने मुझे यहाँ ला खड़ा किया है। क्या तुम मुझे माफ़ कर पाओगे?”

समीर ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैडम, मैंने उस रात ही तय कर लिया था कि मेरा बदला, बदला लेना नहीं होगा। मेरे पिता कहते थे, जो गिरते हुए को सहारा दे, असली विजेता वही है। आज मुझे आपमें कोई दुश्मन नहीं, बस एक थका हुआ इंसान दिख रहा है।”

गाड़ी आगे बढ़ गई। समीर जानता था कि सबसे बड़ी जीत वो नहीं जहाँ दुश्मन हार जाए, बल्कि वो है जहाँ इंसान का ‘चरित्र’ जीत जाए।