“जिंदा माँ को मरा बताकर बेटों ने बेच दिया घर | लेकिन माँ लौट आई… और फिर जो हुआ…

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विश्वासघात की राख से न्याय की मशाल: प्रोफेसर रीना की गाथा

अध्याय 1: बनारस की गलियों में एक सिसकी

बनारस की सुबह हमेशा की तरह शंखनाद और गंगा की लहरों की कलकल से गूँज रही थी। मैं, रतिका मिश्रा, और मेरे पति मुकेश, आज बहुत प्रसन्न थे। हमारे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि हमारे सामने खड़ी थी—एक चमचमाती हुई सफेद कार। मध्यमवर्गीय परिवार के लिए कार सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि बरसों के त्याग और बचत का प्रतीक होती है। हम बाबा विश्वनाथ और महाकाल के दर्शन कर अपनी इस नई उपलब्धि का आशीर्वाद लेने आए थे।

मंदिर के प्रांगण में पूजा चल रही थी। पंडित जी मंत्रोच्चार कर रहे थे, लेकिन तभी मेरे कानों में एक ऐसी आवाज़ पड़ी जिसने मेरे भीतर तक झकझोर दिया। वह किसी के रोने की आवाज़ थी, पर सामान्य नहीं। उस रुदन में ऐसी बेबसी और पीड़ा थी जैसे कोई रूह तड़प रही हो।

“क्यों किया ऐसा मेरे सोनू? क्यों छोड़ गया अपनी माँ को?”

वह आवाज़ मंदिर के पिछले हिस्से से आ रही थी। मेरा ध्यान पूजा से भटक गया। जैसे ही आरती समाप्त हुई, मैंने मुकेश से कहा, “एक मिनट रुकिए, मुझे उधर जाना है।” मुकेश थोड़े असहज थे, शायद वह उस दुखद माहौल से दूर रहना चाहते थे, लेकिन मेरे कदम रुक नहीं रहे थे।

वहाँ कोने में, फटे-पुराने कपड़ों में लिपटी एक वृद्ध महिला बैठी थी। बाल बिखरे हुए, चेहरा धूल से अटा हुआ और आँखों में एक ऐसा सूनापन जिसे देख कलेजा मुँह को आ जाए। लेकिन जैसे ही मैंने उनके चेहरे को ध्यान से देखा, मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

वे कोई साधारण भिखारिन नहीं थीं। वे प्रोफेसर रीना गुप्ता थीं। वही प्रोफेसर रीना, जिनके अंग्रेजी के लेक्चर सुनने के लिए हम कॉलेज में कतारें लगाते थे। जिनकी कड़क आवाज़ और शानदार व्यक्तित्व (Personality) के सामने अच्छे-अच्छे छात्र अपनी रीढ़ सीधी कर लेते थे। आज वे इस हाल में थीं?

अध्याय 2: स्मृतियों का धुंधलका और कड़वा सच

मैं उन्हें पहचान चुकी थी, पर वे मुझे नहीं। उनकी आँखों में पहचान की एक किरण तक नहीं थी। वे बस पागलों की तरह चिल्ला रही थीं, “तू कौन है? मेरा सोनू कहाँ है? मेरी बहू कहाँ है?”

मुझे समझ आ गया कि मामला सिर्फ गरीबी का नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य का है। डॉक्टरों ने बाद में पुष्टि की कि उन्हें अल्जाइमर (Alzheimer’s) है। वे पल भर में सब भूल जाती थीं। मुकेश पहले हिचकिचाए, लेकिन जब मैंने उन्हें याद दिलाया कि इसी महिला ने कॉलेज के दिनों में गुपचुप तरीके से मेरी और कई गरीब बच्चों की फीस भरी थी, तो वे पिघल गए। हम उन्हें अपने साथ अपने घर ले आए।

अगले पाँच महीने हमारे लिए किसी तपस्या से कम नहीं थे। उनकी सेवा, इलाज और पोषण ने धीरे-धीरे असर दिखाया। और फिर एक दिन, उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और धीमी आवाज़ में कहा, “रतिका…”

मेरी आँखों में आँसू आ गए। उनकी याददाश्त लौट आई थी, लेकिन उसके साथ जो कहानी बाहर आई, उसने मानवता पर से विश्वास उठा दिया।

अध्याय 3: ममता का निवेश और स्वार्थ का प्रतिफल

रीना जी ने बताया कि उनके दो बेटे थे—सुनील (सोनू) और अर्पित (आरु)। उन्होंने और उनके पति महेश ने अपनी पूरी ज़िंदगी उन बच्चों के लिए झोंक दी थी। “हमने कभी खुद के लिए नए कपड़े नहीं खरीदे ताकि उन्हें अच्छे स्कूल में भेज सकें,” उन्होंने सिसकते हुए कहा।

जब उनके पति महेश का निधन हुआ, तो असली खेल शुरू हुआ। महेश जी ने पूरी संपत्ति—भोपाल का वह आलीशान घर जिसकी एक-एक ईंट रीना जी ने खुद चुनी थी—रीना जी के नाम कर दी थी। यह बात उनके बेटों और बहुओं को खटकने लगी।

“रतिका, जिस घर को मैंने प्यार से सींचा था, उसी घर में मैं अचानक ‘फालतू’ हो गई। बहुएं खाना ऐसे देती थीं जैसे किसी जानवर के आगे परोस रही हों। बेटे कमरे में झाँकते तक नहीं थे।”

अल्जाइमर की बीमारी के शुरुआती लक्षणों ने उनके बेटों को एक क्रूर मौका दे दिया। एक रात रीना जी ने पानी पीने के बहाने बाहर आकर सुना कि उनके बेटे उनकी मौत की दुआ माँग रहे थे ताकि प्रॉपर्टी का बँटवारा हो सके। सुनील को कनाडा जाना था और अर्पित को बिजनेस के लिए पैसे चाहिए थे। उनकी माँ उनके रास्ते का काँटा बन गई थी।

अध्याय 4: बनारस का षडयंत्र

धोखे की पराकाष्ठा तब हुई जब बेटों ने उन्हें ‘बाबा विश्वनाथ के दर्शन’ के बहाने बनारस लाने का नाटक किया। रीना जी को लगा कि उनके बच्चों का हृदय परिवर्तन हो गया है। वे खुश थीं, उन्होंने अपने पुराने सहेज कर रखे हुए सूट निकाले। उन्हें क्या पता था कि वे अपनी अंतिम विदाई की यात्रा पर जा रही हैं।

भीड़भाड़ वाले मंदिर में, सुनियोजित तरीके से बेटों ने उनका हाथ छोड़ दिया। उनकी दवाइयाँ पहले ही बदल दी गई थीं ताकि उनका दिमाग काम करना बंद कर दे। वे उन्हें वहाँ एक लावारिस की तरह छोड़कर भाग गए।

“मैं वहाँ सीढ़ियों पर बैठी रही, यह सोचकर कि मेरा सोनू आता ही होगा। पर वह नहीं आया। उसने अपनी माँ को एक पुराने अखबार की तरह रद्दी में फेंक दिया था।”

अध्याय 5: प्रतिशोध और न्याय का शंखनाद

कहानी सुनते समय मेरी मुट्ठियां बिंच गई थीं। मुकेश ने कहा, “मैम, अब आप अकेली नहीं हैं। हम भोपाल चलेंगे।”

जब हम भोपाल पहुँचे, तो नज़ारा और भी भयावह था। रीना जी के अपने ही घर के बाहर एक बड़ी सी फोटो लगी थी, जिस पर फूलों की माला चढ़ी थी। उनके बेटों ने उन्हें आधिकारिक रूप से ‘मृत’ घोषित कर दिया था और उस दिन घर की नीलामी (Auction) चल रही थी।

सुनील माइक पर घड़ियाली आँसू बहा रहा था, “हमारी माता जी के जाने का हमें बहुत दुख है, इसीलिए हम यह घर बेचकर उनकी याद में कुछ करना चाहते हैं…”

तभी भीड़ को चीरते हुए रीना जी की आवाज़ गूँजी, “रुको! मैं अभी जिंदा हूँ!”

पूरा सन्नाटा छा गया। सुनील और अर्पित के चेहरे ऐसे सफेद पड़ गए जैसे उन्होंने कोई भूत देख लिया हो। रीना जी एक शेरनी की तरह आगे बढ़ीं। उन्होंने बिना कुछ कहे अपने दोनों बेटों को भरी सभा में जोरदार तमाचे जड़े। यह तमाचा सिर्फ उन बेटों को नहीं, बल्कि समाज की उस हर कुरीति को था जो बुजुर्गों को बोझ समझती है।

अध्याय 6: एक नई सुबह

पुलिस बुलाई गई। जालसाजी, धोखाधड़ी और अपनी माँ को छोड़ने के जुर्म में उन चारों (दोनों बेटे और बहुओं) को गिरफ्तार किया गया। वे पैरों में गिरकर माफी माँगने लगे, “माँ, हम आपके बच्चे हैं, हमें माफ कर दो।”

लेकिन उस दिन रीना जी ने ममता को किनारे कर ‘न्याय’ को चुना। उन्होंने कहा, “मैंने तुम्हें जन्म दिया था, लेकिन आज मैं उस माँ का गला घोंट रही हूँ क्योंकि तुम मेरे बेटे कहलाने के लायक नहीं हो।”

आज रीना जी हमारे साथ रहती हैं। उन्होंने अपनी उस 50 करोड़ की संपत्ति को एक ट्रस्ट में बदल दिया है। वहाँ अब एक भव्य ‘वृद्धाश्रम’ और ‘अनाथालय’ साथ-साथ चलते हैं। वे कहती हैं, “जहाँ अपनों ने साथ छोड़ा, वहाँ अब मुझे सैकड़ों नए बच्चे और भाई-बहन मिल गए हैं।”


निष्कर्ष और संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि खून के रिश्ते हमेशा वफादार नहीं होते, लेकिन इंसानियत के रिश्ते कभी हारते नहीं हैं। बुढ़ापा कोई अभिशाप नहीं है, और किसी भी बुजुर्ग का आत्मसम्मान उसकी संपत्ति से बड़ा होता है।

 

सपनों की रेल और इंसानियत का टिकट: जब नौकरी की तलाश में जा रहे बेबस लड़के के सामने रो पड़ी महिला टीटीई

प्रस्तावना: दिल्ली की दौड़ और फटे जेब के सपने भारतीय रेल सिर्फ लोहे की पटरियों पर दौड़ती एक मशीन नहीं है, बल्कि यह करोड़ों सपनों, उम्मीदों और कभी-कभी बेबसी की गवाह भी है। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव से दिल्ली की ओर जा रही ‘श्रमजीवी एक्सप्रेस’ में हाल ही में एक ऐसी घटना घटी, जिसने सोशल मीडिया पर ‘इंसानियत’ की एक नई परिभाषा लिख दी। यह कहानी है एक ऐसे लड़के की जिसकी आँखों में माँ के इलाज और घर की तंगहाली को दूर करने का सपना था, लेकिन जेब में ट्रेन का टिकट लेने तक के पैसे नहीं थे।

अध्याय 1: आर्यन – एक अधूरा सफर और टूटी चप्पल

आर्यन (बदला हुआ नाम) बिहार के एक सुदूर जिले का रहने वाला है। घर में बूढ़ी माँ है जो पिछले छह महीने से बिस्तर पर है और एक छोटी बहन जिसकी पढ़ाई पैसों की कमी के कारण छूट चुकी है। आर्यन के पास ग्रेजुएशन की डिग्री तो थी, लेकिन गाँव में काम नहीं था। किसी तरह पड़ोसियों से 500 रुपये उधार लेकर वह दिल्ली में एक सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के इंटरव्यू के लिए निकला था।

हड़बड़ी और डर के मारे उसने जनरल टिकट लेने की कोशिश की, लेकिन खिड़की पर लंबी लाइन और ट्रेन छूटने के डर से वह बिना टिकट ही स्लीपर कोच में चढ़ गया। उसे लगा कि शायद कोई उसे नहीं टोकेगा, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

अध्याय 2: वर्दी का सख्त चेहरा और छिपा हुआ दर्द

ट्रेन ने रफ्तार पकड़ी और तभी कोच में महिला टीटीई ‘अंजलि सिंह’ दाखिल हुईं। अंजलि अपनी सख्त ड्यूटी और अनुशासन के लिए जानी जाती थीं। जब वे आर्यन के पास पहुँचीं और टिकट माँगा, तो आर्यन का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने कांपते हाथों से अपनी खाली जेबें दिखाईं और फूट-फूट कर रोने लगा।

अंजलि ने पहले तो उसे सख्त लहजे में डांटा और जुर्माना भरने को कहा। लेकिन जैसे ही आर्यन ने अपनी माँ के इलाज के पर्चे और दिल्ली जाने का असली कारण बताया, अंजलि की सख्ती जैसे मोम की तरह पिघल गई।

अध्याय 3: जब कानून से बड़ा हो गया ‘कर्म’

आर्यन ने बताया कि अगर वह आज दिल्ली नहीं पहुँचा, तो उसका इंटरव्यू छूट जाएगा और उसके पास वापस जाने के भी पैसे नहीं हैं। उसने यहाँ तक कह दिया, “मैडम, आप मुझे जेल भेज दीजिए, कम से कम वहाँ रोटी तो मिलेगी।” ये शब्द सुनकर कोच में सन्नाटा छा गया। अंजलि सिंह, जो खुद एक साधारण परिवार से संघर्ष करके इस मुकाम पर पहुँची थीं, अपनी आँखों के आँसू नहीं रोक पाईं। उन्होंने न केवल आर्यन का जुर्माना खुद अपनी जेब से भरा, बल्कि उसे एक कंफर्म सीट भी दिलाई।

अध्याय 4: टिफिन की रोटी और एक नया हौसला

इंसानियत यहीं नहीं रुकी। अंजलि ने देखा कि आर्यन ने सुबह से कुछ नहीं खाया है। उन्होंने अपना घर से लाया हुआ टिफिन खोला और आर्यन को जबरदस्ती खाना खिलाया। उन्होंने उसे 1000 रुपये और दिए ताकि दिल्ली पहुँचने के बाद उसे शुरुआती दो-तीन दिन दिक्कत न हो।

स्लीपर कोच के अन्य यात्री यह मंजर देखकर दंग थे। जो लोग पहले आर्यन को ‘बिना टिकट का चोर’ समझ रहे थे, वे अब अंजलि की महानता को सलाम कर रहे थे।

अध्याय 5: दिल्ली का जंक्शन और एक नई शुरुआत

जब ट्रेन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँची, तो आर्यन ने अंजलि के पैर छुए। अंजलि ने बस इतना कहा— “बेटा, जब तुम बड़े आदमी बन जाओ, तो बस किसी एक जरूरतमंद की ऐसे ही मदद कर देना। मेरा टिकट का पैसा वसूल हो जाएगा।”

आज आर्यन दिल्ली के एक प्रतिष्ठित फर्म में काम कर रहा है। उसने अपनी पहली सैलरी से अपनी माँ का इलाज कराया और अंजलि को एक धन्यवाद पत्र लिखा, जिसे पढ़कर आज भी अंजलि की आँखें नम हो जाती हैं।

निष्कर्ष: वर्दी के पीछे का इंसान

अक्सर हम पुलिस या टीटीई जैसे वर्दीधारियों को ‘कठोर’ समझते हैं, लेकिन यह कहानी हमें याद दिलाती है कि नियमों की किताबों से ऊपर एक ‘इंसानियत का कानून’ भी होता है। अंजलि सिंह ने साबित कर दिया कि एक छोटा सा दयालु कार्य किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है।

लेखक का संदेश: ज़िंदगी में सफलता पाना बड़ी बात है, लेकिन सफल होकर अपनी जड़ों और दूसरों के दर्द को समझना उससे भी बड़ी बात है। आर्यन की मेहनत और अंजलि की ममता ने मिलकर यह साबित कर दिया कि दुनिया आज भी अच्छी है।


इस लेख की मुख्य विशेषताएं:

कथात्मक गहराई: पाठक को ट्रेन के उस डिब्बे में होने का अहसास कराने के लिए गहन शब्दों का उपयोग।

सामाजिक संदेश: बेरोजगारी के संघर्ष और सरकारी कर्मचारियों के प्रति एक सकारात्मक नजरिया।

दृश्य चित्रण: [Image of…] टैग्स के माध्यम से वीडियो या आर्टिकल के लिए विजुअल्स का सुझाव।

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