आर्मी की बहन को सबके सामने बेइज्जत किया.. फिर आर्मी ने जो किया

वर्दी का गुरूर और फौजी का इंसाफ
अध्याय 1: विदाई की घड़ी और घर की यादें
हवाओं में हल्की ठंडक थी और सूरज अभी पूरी तरह निकला भी नहीं था। बिहार के एक छोटे से गाँव में हलचल तेज थी। घर के आंगन में खड़ी अनीता अपनी आँखों में आंसू लिए अपने बड़े भाई, विजय को देख रही थी। विजय भारतीय सेना में एक जांबाज ऑफिसर था और उसकी छुट्टियां खत्म हो चुकी थीं।
“भैया, जल्दी घर आना। आपके बिना ये पूरा घर सूना-सूना हो जाएगा,” अनीता ने रुंधे हुए गले से कहा।
विजय ने मुस्कुराते हुए अपनी छोटी बहन के सिर पर हाथ रखा और कहा, “अरे पगली, तू क्यों रो रही है? मैं कोई साल भर के लिए थोड़े ही जा रहा हूँ। एक महीने बाद फिर से छुट्टी लेकर आऊँगा। और सुन, इस बार जब आऊँगा न, तो तेरे लिए शहर का सबसे महंगा और खूबसूरत लहंगा लेकर आऊँगा।”
पास ही खड़ी उनकी बूढ़ी माँ की आँखों में भी ममता के आंसू थे। उन्होंने विजय को गले लगाया और कहा, “बेटा, अपना ख्याल रखना। तुझे तो पता है, अनीता और मैं इस घर में अकेले रहते हैं। जैसे ही छुट्टी मिले, भागकर घर आना।”
विजय ने माँ के पैर छुए, अपना बैग उठाया और मुस्कुराते हुए विदा ली। उसे क्या पता था कि चंद घंटों बाद उसकी बहन पर दुखों का पहाड़ टूटने वाला है।
अध्याय 2: नाकेबंदी और भ्रष्ट इरादे
विजय के जाने के बाद घर में सन्नाटा पसर गया था। माँ रसोई में गई तो देखा कि सब्जियां खत्म हो चुकी हैं। उन्होंने अनीता को बुलाया और कहा, “बेटा, घर में सब्जी नहीं है। एक काम कर, बाजार जाकर थोड़ी सब्जी ले आ।”
अनीता ने अपनी स्कूटी की चाबी उठाई और कहा, “ठीक है माँ, मैं जल्दी जाकर आती हूँ।”
उधर शहर के मुख्य चौराहे पर हवलदार विनोद और उसके साथी पुलिसकर्मी खड़े थे। विनोद का मिजाज आज बहुत खराब था। सुबह से कोई ‘बड़ी मछली’ फंसी नहीं थी और उसकी जेब खाली थी।
“साला आज कोई आ ही नहीं रहा। इतनी देर से खड़े हैं, कोई मिल ही नहीं रहा। क्या लगता है विनोद, आज बोहनी होगी?” विनोद के साथी ने पूछा।
विनोद ने गुस्से में कहा, “आज जो भी फँसेगा, उसे अच्छे से सबक सिखाऊंगा। मेरा मूड पहले ही खराब है।”
तभी दूर से अनीता अपनी स्कूटी पर आती दिखी। वह जल्दी में हेलमेट पहनना भूल गई थी। विनोद की आँखें चमक उठीं। उसने हाथ देकर अनीता को रुकने का इशारा किया।
अध्याय 3: कानून की आड़ में जुल्म
अनीता ने घबराकर स्कूटी रोकी। विनोद चिल्लाते हुए पास आया, “बहुत पंख निकल आए हैं तेरे? कहाँ उड़कर जा रही थी? बाप का रोड समझ रखा है? न हेलमेट है, न तमीज। अब निकाल 5000 रुपये का चालान।”
अनीता सहम गई। उसने हाथ जोड़कर कहा, “सर, मैं बस यहीं पास के बाजार जा रही थी, इसलिए जल्दी में हेलमेट भूल गई। आगे से ऐसी गलती नहीं होगी। प्लीज आज छोड़ दीजिए।”
विनोद ने उसकी बात अनसुनी कर दी। “आज किसी को नहीं छोड़ूँगा। 5000 निकाल वरना तेरी स्कूटी अभी सीज करूँगा।”
अनीता ने अपना बटुआ दिखाया, “सर, मेरे पास सिर्फ 500 रुपये हैं सब्जी के लिए। मैं इतने पैसे कहाँ से लाऊँ?”
विनोद का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने आव देखा न ताव, अनीता को धक्का दिया और उसे गालियां देने लगा। जब अनीता ने विरोध किया, तो उसने उस पर हाथ उठा दिया। एक निहत्थी लड़की पर पुलिस की वर्दी में जुल्म हो रहा था।
अध्याय 4: एक कॉल और भाई का गुस्सा
जब अनीता काफी देर तक घर नहीं लौटी, तो माँ को चिंता होने लगी। उसी वक्त विजय का फोन माँ के पास आया। विजय ने पूछा, “माँ, अनीता कहाँ है?”
माँ ने बताया कि वह बाजार गई है। विजय ने तुरंत अनीता को फोन लगाया। फोन उठाते ही अनीता की सिसकियाँ गूँजी।
“भैया… ये पुलिस वाले मुझसे बदतमीजी कर रहे हैं। 5000 रुपये मांग रहे हैं और मुझे मार रहे हैं। प्लीज बचा लो भैया!”
विजय के कानों में जब अपनी बहन की चीखें पड़ीं, तो उसका खून खौल उठा। उसने उसी वक्त अपनी गाड़ी मोड़ी और वापस गाँव की तरफ और थाने की तरफ निकल पड़ा। उसने रास्ते से ही एसपी सर को फोन लगाया, जो उसके पुराने परिचित थे।
थाने में विनोद और उसके साथियों ने अनीता को लॉकअप में डाल दिया था। विनोद हंसते हुए बोला, “तू अपने फौजी भाई को बता रही थी न? अब देख तू कैसे जेल में सड़ती है।”
अध्याय 5: शेर की आमद
थोड़ी ही देर में विजय थाने पहुँचा। वह वर्दी में नहीं था, लेकिन उसके चेहरे का तेज और चलने का अंदाज बता रहा था कि वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। उसने अंदर जाकर चिल्लाकर पूछा, “कहाँ है मेरी बहन?”
विनोद सामने आया और अकड़कर बोला, “यहाँ तुम्हारी कोई बहन नहीं है। जाओ यहाँ से वरना तुम्हें भी अंदर डाल देंगे।”
तभी अंदर से अनीता की आवाज आई, “भैया, मैं यहाँ हूँ! मुझे बचा लो!”
विजय ने विनोद की आँखों में आँखें डालकर कहा, “निकालो उसे बाहर, वरना जो होगा उसके जिम्मेदार तुम होगे।”
विनोद और उसके साथियों ने विजय का मजाक उड़ाया। “अरे, तुम क्या कर लोगे? हम कानून हैं यहाँ के।”
तभी बाहर पुलिस की गाड़ियाँ रुकीं। सायरन की आवाज से पूरा थाना गूँज उठा। खुद जिले के एसपी (SP) गाड़ी से नीचे उतरे।
अध्याय 6: इंसाफ की जीत
एसपी सर को देखते ही विनोद के हाथ-पांव फूलने लगे। वह फौरन सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया। एसपी सर सीधे विजय के पास गए और उसे गले लगाया।
“कैप्टन विजय, आप चिंता न करें। न्याय होकर रहेगा।”
एसपी सर के आदेश पर अनीता को लॉकअप से बाहर निकाला गया। उसकी हालत देखकर एसपी सर का भी गुस्सा भड़क उठा। अनीता ने रोते हुए सारी कहानी सुनाई—कैसे उसे रोका गया, कैसे पैसे मांगे गए और कैसे उस पर हाथ उठाया गया।
एसपी सर ने विनोद की तरफ देखा। विनोद का चेहरा सफेद पड़ चुका था।
“तुम्हारे खिलाफ पहले भी ऐसी शिकायतें आ चुकी हैं विनोद। लेकिन आज तुमने एक फौजी की बहन और एक आम नागरिक पर हाथ उठाकर अपनी हदें पार कर दी हैं। वर्दी कानून की रक्षा के लिए होती है, गुंडागर्दी के लिए नहीं।”
एसपी सर ने कड़क आवाज में कहा, “हवलदार विनोद और इसके साथियों को अभी के अभी सस्पेंड किया जाता है। इनके खिलाफ विभागीय जांच और मारपीट का मुकदमा दर्ज किया जाए।”
अध्याय 7: घर वापसी
विजय अपनी बहन को लेकर घर पहुँचा। माँ की आँखों में खुशी के आंसू थे। अनीता को अब महसूस हुआ कि उसका भाई वाकई उसका रक्षक है।
विजय ने एसपी सर का शुक्रिया अदा किया और अपनी बहन से कहा, “अनीता, याद रखना, वर्दी चाहे पुलिस की हो या सेना की, वह सेवा के लिए होती है। और जो अपनी शक्ति का गलत फायदा उठाते हैं, उन्हें सजा जरूर मिलती है।”
उस दिन गाँव के लोगों ने देखा कि जब एक फौजी खड़ा होता है, तो बड़े-बड़े भ्रष्ट अधिकारी भी कांपने लगते हैं। विजय वापस अपनी ड्यूटी पर चला गया, लेकिन इस बार अनीता का सिर गर्व से ऊंचा था।
लेखक का संदेश: यह कहानी उन सभी बहादुर जवानों को समर्पित है जो सीमाओं पर हमारी रक्षा करते हैं और उन ईमानदार अधिकारियों को जो समाज में न्याय बनाए रखते हैं।
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