जब DM मैडम ने अपने खोए हुए बेटे को समोसे बेचते देखा फिर जो हुआ…

दिल्ली में एक तेज बारिश हो रही थी। बस स्टैंड की छत पर बारिश की बूंदें बजी जा रही थीं। वहाँ एक 8 साल का लड़का, जिसका नाम रोहन था, अपनी गीली टोकरी में बचे हुए 10 समोसों को देख रहा था। वह परेशान था। शाम के 4:00 बज चुके थे और अभी तक एक भी समोसा नहीं बिका था। उसके फटे हुए कपड़े बारिश से भीग गए थे, लेकिन वह हार मानने को तैयार नहीं था।

“समोसे लो, गर्म समोसे!” वह अपनी कमजोर आवाज में चिल्लाता रहा। बस स्टैंड पर बैठे यात्री उसे देखकर नजरें फेर लेते थे। किसी को भी उस बच्चे की परवाह नहीं थी, जो अपनी बीमार अम्मा की दवाई के लिए समोसे बेच रहा था।

इसी बीच, बस स्टैंड के कोने में खड़े पांच पुलिस वालों की नजर उस बच्चे पर पड़ी। मुख्य पुलिस वाला कौशल यादव अपने चार साथियों अर्जुन राघव, विक्रम त्यागी, रणवीर और करणवीर ठाकुर के साथ बारिश से बचने के लिए वहां खड़ा था। उनकी वर्दी पर पानी की बूंदें चमक रही थीं, लेकिन उनके चेहरों पर कोई दया नहीं थी।

“देखो, यह छोटा बच्चा समोसे बेच रहा है,” कौशल यादव ने अपने साथियों से कहा। “क्यों ना इसके समोसे मुफ्त में खा लिए जाएं?” बाकी चारों पुलिस वाले शैतानी भरी हंसी-हंसने लगे।

“अरे छोटे, यहां आ,” कौशल यादव ने बच्चे को इशारा किया। बच्चे की आंखों में उम्मीद की चमक आई। वह दौड़कर उनके पास गया। “साहब, कितने समोसे चाहिए? ₹10 का एक है।” कौशल यादव ने इशारा किया और अर्जुन राघव ने पूरी टोकरी छीन ली। पांच पुलिस वालों ने आराम से सारे समोसे खत्म कर दिए। जब बच्चे ने पैसे मांगे, तो वे जोर से हंसने लगे।

“अरे छोटे, हम पुलिस हैं। हमसे पैसे मांग रहा है?” विक्रम त्यागी ने व्यंग से कहा। बच्चे की आंखों में आंसू आ गए। “साहब, मेरी अम्मा बहुत बीमार है। मुझे दवाई के लिए पैसे चाहिए,” वह रोते हुए बोला। कौशल यादव का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “अभी भी बक रहा है। चल भाग यहां से!” बच्चे ने उनके पैर पकड़े।

“साहब, आधे पैसे ही दे दो,” तभी कौशल यादव ने गुस्से में आकर बच्चे की छाती पर जोर की लात मारी। बच्चा जमीन पर गिरा। अर्जुन ने उसके कान पर थप्पड़ मारा और कहा, “चला जा यहां से, वरना जेल में डाल दूंगा।”

जिस समोसे वाले के वह समोसे बेच रहा था, उसने कहा, “साहब, यह मासूम बच्चा है। इसके पैसे दे दीजिए।” लेकिन उसे भी मार पड़ी। विक्रम त्यागी ने उसके मुंह पर थप्पड़ मारा। “तेरी हिम्मत कैसे हुई?” कौशल यादव ने आदेश दिया, “इसे पकड़ो, जेल में डाल दो।” करणवीर ठाकुर और विक्रम त्यागी ने समोसे वाले को पकड़ लिया।

बच्चे को कौशल यादव ने धमकी दी, “तू भी जेल जाना चाहता है या भागेगा?” बच्चा डर गया और रोते हुए वहां से भाग गया। लेकिन इन पुलिस वालों को क्या पता था कि जिस बच्चे को उन्होंने इतनी बेरहमी से पीटा है, वह किसी और का नहीं बल्कि जिले की डीएम शिवानी मेहता का खोया हुआ बेटा है।

6 साल पहले की घटना

6 साल पहले, जब यह बच्चा केवल 2 साल का था, तब एक मेले में अपनी मां से बिछड़ गया था। डीएम शिवानी मेहता अपने बेटे को तब से अभी तक ढूंढ रही हैं, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। आज जो बच्चा इन पुलिस वालों के सामने असहाय था, वह उसी का लाडला बेटा था जिसे वह रोज याद करती है।

अब वह जिस अम्मा के साथ रहता है, वह उसकी असली मां नहीं थी, बल्कि उसे सिर्फ पालने वाली अम्मा थी जिसने एक खोए हुए मासूम बच्चे को रोता देख सहारा दिया और अब 6 साल से पाल रही थी।

मेले का दिन

6 साल पहले की बात है। डीएम शिवानी मेहता अपने 2 साल के बेटे के साथ शहर के बाहर लगे वार्षिक मेले में गई थी। वह दिन रविवार था और डीएम शिवानी मेहता ने सोचा था कि अपने छोटे बेटे के साथ कुछ समय बिताएंगी। बच्चा अभी-अभी चलना सीखा था। उसके छोटे-छोटे कदम डगमगाते हुए लेकिन दृढ़ता से आगे बढ़ रहे थे।

मेले में तरह-तरह की रंग बिरंगी दुकानें थीं। खिलौने, मिठाइयां, कपड़े और ना जाने क्या-क्या। बच्चा हर चीज को देखकर खुश हो रहा था। उसकी छोटी उंगली अपनी मम्मी की उंगली में फंसी हुई थी। डीएम शिवानी मेहता एक खिलौने की दुकान पर रुकी। बच्चे के लिए कुछ खिलौने खरीदना चाहती थी।

दुकानदार विभिन्न खिलौने दिखा रहा था। रंग बिरंगी गेंद, छोटी कारें, भालू का खिलौना और भी बहुत कुछ। शिवानी मेहता अपने बेटे से पूछ रही थी, “क्या चाहिए बेटा, यह वाली गेंद या यह कार?” बच्चा खुशी से तालियां बजा रहा था। वह सभी खिलौने चाहता था।

खिलौने चुनने के चक्कर में डीएम शिवानी मेहता का ध्यान बंट गया। उन्होंने अपने बेटे की उंगली छोड़ दी ताकि वह दोनों हाथों से खिलौनों को उठाकर देख सकें। यह कैसी है और यह, वह दुकानदार से पूछ रही थी। बच्चा उनके पैरों के पास ही खड़ा था। वह भी खिलौनों को देख रहा था।

खोना और खोज

अचानक उसकी नजर मेले की दूसरी तरफ एक रंग बिरंगे गुब्बारे वाले पर पड़ी। गुब्बारे हवा में हिल रहे थे। बच्चे को लगा जैसे वे उसे बुला रहे हैं। 2 साल का मासूम बच्चा धीरे-धीरे अपनी मम्मी से दूर होने लगा। उसके छोटे कदम गुब्बारे वाले की तरफ बढ़ रहे थे।

डीएम शिवानी मेहता अभी भी खिलौने देख रही थी। उन्हें लगा कि बच्चा उनके पास ही है। “बेटा, यह कार कैसी है?” उन्होंने पीछे मुड़कर कहा लेकिन बच्चा वहां नहीं था। शुरू में उन्हें लगा कि बच्चा दुकान के किसी कोने में छुप गया होगा।

“बेटा, कहां हो?” वह आवाज लगाई लेकिन कोई जवाब नहीं आया। डीएम शिवानी मेहता की सांस तेज होने लगी। “बेटा!” वह जोर से चिल्लाई। दुकानदार भी परेशान हो गया। “मैडम, बच्चा कहां गया?” उन्होंने पूरी दुकान छान मारी। बच्चा कहीं नहीं मिला।

डीएम शिवानी मेहता का दिल तेजी से धड़कने लगा। वह दुकान से बाहर निकली। “बेटा, कहां हो तुम?” उनकी आवाज में डर था। मेले में हजारों लोग थे। हर तरफ भीड़ थी, शोरगुल था। डीएम शिवानी मेहता एक दुकान से दूसरी दुकान भागने लगी।

“क्या आपने एक छोटा बच्चा देखा है? दो साल का, नीली शर्ट में?” वह हर किसी से पूछ रही थी। कुछ लोग कहते नहीं, “मैडम, कुछ कहते यहां तो बहुत बच्चे हैं।” कुछ लोगों ने मदद करने की कोशिश की। “कैसा दिखता है? कब खोया?” लेकिन कोई ठोस जानकारी नहीं मिली।

घंटे बीतते गए। सूरज डूबने लगा। मेला बंद होने का समय आ रहा था। डीएम शिवानी मेहता रो रही थी। उनकी आवाज बैठ गई थी। “बेटा, मम्मी यहां है, वापस आ जाओ।” वह हर गली, हर कोना छान रही थी। मेले के अधिकारियों को सूचना दी। पुलिस को फोन किया लेकिन बच्चा गायब था। रात होने पर भी वह नहीं मिला।

उधर, दो साल का बच्चा गुब्बारे वाले के पास पहुंच गया था। गुब्बारे वाला एक बुजुर्ग आदमी था। उसने देखा कि एक छोटा बच्चा अकेले घूम रहा है। “बेटा, तुम्हारे मम्मी-पापा कहां हैं?” उसने पूछा। बच्चा बोल नहीं सकता था। वह सिर्फ रो रहा था।

गुब्बारे वाला परेशान हो गया। उसने आसपास देखा। कोई माता-पिता नहीं दिखे जो अपने बच्चे को ढूंढ रहे हों। कोई इसे ढूंढ रहा होगा। गुब्बारे वाले ने सोचा, वह बच्चे को लेकर मेले में घूमने लगा। “किसका बच्चा है? किसका बच्चा है?” वह चिल्लाता रहा लेकिन कोई नहीं आया।

अम्मा का सहारा

मेला बंद होने का समय हो गया। दुकानदार अपना सामान समेटने लगे। गुब्बारे वाले को समझ नहीं आया कि इस बच्चे का क्या करें। पास ही एक छोटी सी खिलौने की दुकान लगाने वाली बुजुर्ग महिला ने यह देखा। वह अम्मा कहलाती थी। उसका असली नाम कमला देवी था। लेकिन सभी उसे अम्मा कहते थे।

“क्या बात है भाई साहब?” अम्मा ने गुब्बारे वाले से पूछा। “यह बच्चा खो गया है। इसके मां-बाप कहीं नहीं मिल रहे,” गुब्बारे वाले ने बताया। अम्मा ने बच्चे को देखा। वह रो रहा था, भूखा था, डरा हुआ था। अम्मा का दिल भर आया।

उसके अपने कोई संतान नहीं थी। उसके पति की मृत्यु कई साल पहले हो गई थी। वह अकेली थी। मेले में छोटी सी दुकान लगाकर अपना गुजारा चलाती थी। रात हो गई है। “कल फिर ढूंढेंगे। आज इसे मेरे घर ले चलते हैं,” अम्मा ने कहा। गुब्बारे वाले को भी यही सही लगा।

अम्मा बच्चे को अपने छोटे से घर ले गई। उसने उसे खाना खिलाया, दूध पिलाया, साफ कपड़े पहनाए। बच्चा थोड़ा शांत हो गया। अम्मा ने उसे अपने बिस्तर पर सुलाया। “कल इसके मां-बाप मिल जाएंगे,” वह सोच रही थी।

डीएम शिवानी मेहता भी अपने बेटे को ढूंढने के लिए हर संभव कोशिश कर रही थी। प्राइवेट जासूस रखे। पुलिस को आदेश दिए। पूरे प्रदेश में तलाश की लेकिन दुर्भाग्य से दोनों को एक-दूसरे का पता नहीं चला। साल बीतते गए। बच्चा बड़ा होने लगा।

अम्मा का प्यार

3 साल, 4 साल, 5 साल, अम्मा ने उसे बहुत प्यार से पाला। उसे पढ़ाने की कोशिश की। अच्छे संस्कार दिए। बच्चा भी अम्मा को बहुत चाहता था। वह जानता था कि अम्मा उसकी सच्ची मां नहीं है, लेकिन उसके लिए अम्मा ही सब कुछ थी।

जब बच्चा 7 साल का हुआ, तो अम्मा की तबीयत खराब होने लगी। पहले छोटी-मोटी बीमारी थी। फिर गंभीर हो गई। डॉक्टर ने बताया कि उसे डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर है। नियमित दवाई लेनी पड़ेगी। अम्मा की छोटी सी दुकान से होने वाली आमदनी कम हो गई। दवाइयों का खर्च बढ़ गया।

8 साल का होते-होते बच्चे ने फैसला किया कि वह अम्मा की मदद करेगा। “अम्मा, मैं काम करूंगा। आपकी दवाई के पैसे लाऊंगा,” उसने कहा। अम्मा ने मना किया, “तू अभी छोटा है बेटा, पढ़ाई कर।” लेकिन बच्चा जिद कर रहा था।

आखिरकार अम्मा को मानना पड़ा। एक दिन बच्चा बाजार गया। वहां एक समोसे वाले से मिला। “चाचा जी, मुझे काम चाहिए।” समोसे वाले ने उसकी बात सुनी। “तू क्यों काम करना चाहता है?” बच्चे ने अपनी पूरी कहानी बताई।

समोसे वाले का दिल भर आया। “वो बोला, बेटा, मेरे पास तो कोई काम नहीं है। लेकिन अगर तुम चाहो, तो तुम मुझसे ₹5 का समोसा खरीद लो और पास में बस स्टैंड है, वहां तुम ₹10 का एक समोसा बेच सकते हो।”

लड़के ने कहा, “लेकिन चाचा, मेरे पास पैसे नहीं हैं।” समोसे वाले ने कहा, “ठीक है बेटा, तू मेरे समोसे ले जा और जब बिक जाए, तो मुझे आधे पैसे लाकर दे देना जो मुझे ₹5 का मिलता है। तू ₹10 में बेच दे। आधा-आधा फायदा।” बच्चा खुश हो गया।

वह रोज समोसे बेचने जाने लगा। बस स्टैंड, मार्केट, कहीं भी जाकर समोसे बेचता। जो पैसे मिलते उससे अम्मा की दवाई लाता। अम्मा को बहुत गर्व था अपने बेटे पर। “कितना समझदार है मेरा बेटा।”

बर्बरता का सामना

लेकिन आज जो कुछ हुआ था, वह बच्चे के लिए सबसे बुरा दिन था। पुलिस वालों ने उसे बुरी तरह पीटा था। समोसे खाकर पैसे नहीं दिए थे। अब वह क्या मुंह लेकर अम्मा के पास जाएगा? कैसे बताएगा कि आज दवाई नहीं ला पाया। बच्चा लड़खड़ाते हुए अपने छोटे से घर पहुंचा।

उसका शरीर दर्द से कराह रहा था। कपड़े फटे हुए थे। अम्मा अपने बिस्तर पर लेटी हुई उसका इंतजार कर रही थी। बच्चे को देखते ही वह चौंक गई। “बेटा, यह क्या हाल है तेरा?” अम्मा घबरा कर उठ बैठी। बच्चे की हालत देखकर उसकी आंखों में आंसू आ गए।

“अम्मा, आज कुछ गलत लोगों से पाला पड़ा,” बच्चे ने कमजोर आवाज में कहा। वह अम्मा से झूठ नहीं बोल सकता था। उसने पूरी घटना बताई। कैसे पुलिस वालों ने उसके समोसे खाए, पैसे नहीं दिए और फिर उसे बेरहमी से पीटा।

अम्मा सुनकर रो पड़ी और बच्चे को गले से लगाकर रोने लगी। जिस वक्त पुलिस वाले बच्चे को मार रहे थे, उसी वक्त बस स्टैंड के पास एक पत्रकार दिवाकर पांडे पूरी घटना को रिकॉर्ड कर रहा था। वह स्थानीय न्यूज़ चैनल के लिए काम करता था।

आज वह किसी और खबर के लिए बस स्टैंड आया था। लेकिन जो कुछ उसने देखा वह उसे हिला कर रख गया। उसने अपने कैमरे में पूरी घटना कैद की थी। कैसे पांच पुलिस वालों ने एक 8 साल के मासूम बच्चे के समोसे खाए। पैसे नहीं दिए और फिर उसके साथ मारपीट की।

पत्रकार की पहल

दिवाकर पांडे का दिल भर आया था। उसने बच्चे का पीछा किया था। देखा था कि बच्चा कैसे रोते हुए अपने घर गया है। यह घटना दिखानी चाहिए। उसने सोचा, लोगों को पता चलना चाहिए कि हमारी पुलिस कैसी है।

वह अगले दिन बच्चे के घर गया। अम्मा की झुग्गी देखकर दिवाकर पांडे समझ गया कि यह कितना गरीब परिवार है। अम्मा बिस्तर पर लेटी थी। बच्चा उसके पास बैठा था। “मैं दिवाकर पांडे हूं। एक पत्रकार हूं,” उसने अपना परिचय दिया। “कल आपके बेटे के साथ जो कुछ हुआ मैंने देखा है।”

अम्मा और बच्चा दोनों डर गए। “साहब, हमने कुछ गलत नहीं किया,” बच्चे ने कहा।

“नहीं बेटा, तुमने कुछ गलत नहीं किया। गलत तो उन पुलिस वालों ने किया है,” दिवाकर पांडे ने कहा। “मैं तुम्हारी मदद करना चाहता हूं।” उसने अम्मा से बात की। अम्मा ने बताया कि यह बच्चा उसका अपना नहीं है। 6 साल पहले मेले में मिला था। तब से वह इसे पाल रही है।

दिवाकर पांडे को पूरी कहानी बहुत दिलचस्प लगी। एक तरफ पुलिस की बर्बरता, दूसरी तरफ एक बुजुर्ग महिला का त्याग और बीच में एक मासूम बच्चे की संघर्ष की कहानी। यह बहुत बड़ी खबर है।

सोशल मीडिया पर वायरल

उसने सोचा, उसने पूरी घटना का विस्तृत रिपोर्ट तैयार किया। वीडियो को एडिट किया। एक प्रभावशाली शीर्षक लिखा। “8 साल का बच्चा बीमार मां की दवाई के लिए समोसे बेचता है। पुलिस ने समोसे खाकर पैसे नहीं दिए और बेरहमी से पीटा।” यह शीर्षक था।

दिवाकर पांडे ने वीडियो को सोशल मीडिया पर अपलोड किया। Facebook, Twitter, Instagram, YouTube हर जगह। वीडियो में साफ दिख रहा था कि कैसे कौशल यादव ने बच्चे को लात मारी थी। कैसे बाकी पुलिस वालों ने उसके साथ मारपीट की थी।

वीडियो अपलोड होते ही तहलका मच गया। सोशल मीडिया पर आग लग गई। कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों ने वीडियो देखा। लाइक्स, शेयर्स, कमेंट्स की बौछार आ गई। लोग गुस्से में टिप्पणियां कर रहे थे। “यह कैसी पुलिस है? शर्म की बात है। इन पुलिस वालों को तुरंत नौकरी से निकाला जाना चाहिए। यह बच्चा कितना बहादुर है। सरकार को इस पर तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए।”

1 घंटे में वीडियो को लाखों व्यूज मिले। 2 घंटे में यह ट्रेंडिंग में आ गया। मीडिया चैनलों की नजर इस पर पड़ी। हर बड़ा न्यूज़ चैनल इस खबर को दिखाने लगा। “पुलिस की बर्बरता का शिकार हुआ 8 साल का बच्चा। समोसे खाकर पैसे नहीं दिए। बच्चे को पीटा। मासूम बच्चे के साथ अमानवीयता।”

हर चैनल पर यही चर्चा हो रही थी। स्थानीय स्तर पर भी हंगामा मच गया। लोग सड़कों पर उतर आए। “हमें न्याय चाहिए। पुलिस की बर्बरता बंद करो।” नारे लग रहे थे। छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किया। महिला संगठनों ने मोर्चा निकाला। सभी का एक ही मांग था। “इन पुलिस वालों को कड़ी सजा दी जाए।”

पुलिस वालों की मुसीबत

इधर उन पांच पुलिस वालों की हालत खराब हो गई। कौशल यादव, अर्जुन राघव, विक्रम त्यागी, रणवीर और करणवीर ठाकुर को एहसास हुआ कि वे बड़ी मुसीबत में फंस गए हैं। उनके घर वालों को भी शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही थी। पड़ोसी उन्हें बुरी नजर से देख रहे थे।

मीडिया ने इन पुलिस वालों की पूरी बायोग्राफी खोज निकाली। कौशल यादव की यह पहली गलती नहीं थी। पहले भी कई शिकायतें आई हैं। भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं। मीडिया ने बताया कि यह पुलिस वाले पहले भी गरीब लोगों को परेशान करते रहे हैं। दुकानदारों से जबरदस्ती खाना खाते हैं। पैसे नहीं देते हैं।

वीडियो अब राष्ट्रीय स्तर पर वायरल हो गया था। दूसरे राज्यों के लोग भी इसे देख रहे थे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इस पर रिपोर्ट की। “इंडिया पुलिस ब्रूटैलिटी ऑन 8 ईयर ओल्ड चाइल्ड” जैसी हेडलाइंस विदेशी अखबारों में छपी। भारत की छवि खराब हो रही थी।

डीएम शिवानी की खोज

इधर डीएम शिवानी मेहता विदेश में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा ले रही थी। रात का समय था जब उनके स्टाफ ने उन्हें यह वीडियो दिखाया। वीडियो देखकर उनका खून खौल गया। “यह कैसी बर्बरता है एक आठ साल के बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार?” लेकिन जब डीएम मैडम ने आगे का वीडियो देखा तो उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।

वीडियो में अम्मा बता रही थी कि “यह मेरा बेटा नहीं है। यह तो मुझे मेले में मिला था।” जब डीएम मैडम ने यह बात सुनी, वह गुस्से से चिल्लाई। उन्होंने तुरंत अपनी टीम को फोन किया। “मैं चाहती हूं कि तुरंत उस बच्चे और उसकी मां तक पहुंचा जाए। जो भी मदद चाहिए वह की जाए।”

क्योंकि डीएम मैडम समझ गई कि हो ना हो यह उनका अपना हो सकता है जो 6 साल पहले खो गया था। अगली सुबह डीएम शिवानी मेहता की टीम तुरंत बच्चे के घर पहुंची। टीम लीडर राजेश शर्मा अम्मा की झुग्गी देखकर हैरान रह गया।

अम्मा और बच्चे का मिलन

इतनी गरीबी के बीच एक बुजुर्ग महिला और एक छोटा बच्चा कैसे गुजारा कर रहे हैं? अम्मा बिस्तर पर लेटी थी। बच्चा उसके पास बैठा था। “मैं राजेश शर्मा हूं,” डीएम मैडम की टीम से राजेश ने अपना परिचय दिया। “हमें आपकी घटना के बारे में पता चला है। डीएम मैडम ने आपकी मदद करने के लिए भेजा है।”

अम्मा और बच्चा दोनों घबरा गए। “साहब, हमने कुछ गलत नहीं किया,” बच्चे ने डरते हुए कहा।

“नहीं बेटा, तुमने कुछ गलत नहीं किया। गलत तो उन पुलिस वालों ने किया है,” राजेश ने कहा। “डीएम मैडम बहुत गुस्से में है। उन्होंने तुम्हारी मदद करने का आदेश दिया है।”

राजेश ने अम्मा की हालत देखी। वह बहुत कमजोर लग रही थी। उसने तुरंत डीएम मैडम को बताया कि अम्मा की तबीयत बहुत खराब है। डीएम मैडम ने तुरंत आदेश दिया। “अम्मा को तुरंत शहर के सबसे बड़े अस्पताल में लेकर जाओ।”

उसने कहा, “ठीक है मैडम। आंटी जी, आपको तुरंत अस्पताल ले जाना होगा।” अम्मा ने हाथ जोड़े, “साहब, हमारे पास पैसे नहीं है। अस्पताल का खर्च कैसे होगा?”

राजेश ने कहा, “आपको पैसों की चिंता करने की जरूरत नहीं। डीएम मैडम ने सब इंतजाम कर दिया है।” उन्होंने एंबुलेंस बुलाई। अम्मा को शहर के सबसे बड़े निजी अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में अम्मा का पूरा चेकअप हुआ। डॉक्टरों ने बताया कि उनकी हालत गंभीर है।

डॉक्टर ने कहा, “तुरंत इलाज शुरू करना होगा।” राजेश ने सभी पेपर वर्क करवाई। अम्मा को प्राइवेट रूम दिया गया। बेहतरीन इलाज की व्यवस्था की गई।

न्याय की मांग

डीएम मैडम का फोन आया। वह बोली, “तुरंत उन पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई हो।” उनकी टीम ने कहा, “ठीक है मैडम, फौरन उन पांच पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई।”

कौशल यादव, अर्जुन राघव, विक्रम त्यागी, रणवीर और करणवीर ठाकुर को तुरंत सस्पेंड कर दिया गया। उनके खिलाफ धारा 323 (स्वैच्छिक रूप से चोट पहुंचाना), धारा 506 (आपराधिक धमकी) और धारा 34 (सामान्य इरादे को बढ़ावा देना) के तहत मामला दर्ज किया गया।

राजेश शर्मा रोज अस्पताल आकर अम्मा का हालचाल पूछता था। “डीएम मैडम का कहना है कि आपको किसी चीज की कमी नहीं होनी चाहिए।” उसने अम्मा से बच्चे के बारे में और भी जानकारी ली।

“यह बच्चा आपको कैसे मिला था?” अम्मा ने पूरी कहानी बताई। कैसे 6 साल पहले मेले में यह बच्चा खोया हुआ मिला था। कैसे उसने इसके मां-बाप को ढूंढने की कोशिश की थी। कैसे कोई सुराग नहीं मिला था। कैसे उसने इसे अपना बेटा मानकर पाला था।

राजेश को यह कहानी बहुत दिलचस्प लगी। उसने तुरंत डीएम शिवानी मेहता को फोन किया और पूरी बात बताई। “मैडम, यह बच्चा इस महिला का अपना नहीं है। 6 साल पहले मेले में खोया हुआ बच्चा है।”

डीएम शिवानी मेहता का दिल तेजी से धड़कने लगा। “छ साल पहले कौन सा मेला?”

“मैडम, शहर के बाहर वाला वार्षिक मेला जो हर साल लगता है,” राजेश ने बताया। डीएम शिवानी मेहता ने कहा, “राजेश, तुम तुरंत उस बच्चे की एक तस्वीर भेजो और यह भी पता करो कि उसके शरीर पर कोई खास निशान है या नहीं।”

राजेश ने तुरंत बच्चे की तस्वीर डीएम शिवानी मेहता को भेजी। तस्वीर देखते ही शिवानी मेहता के होश उड़ गए। “यह वही चेहरा था जिसे वह छ साल से ढूंढ रही थी। वही आंखें, वही नाक, वही होंठ।”

लेकिन अभी भी उन्हें पूरा यकीन नहीं था। “राजेश, उसके शरीर पर कोई निशान है?” उन्होंने कांपती आवाज में पूछा।

राजेश ने अम्मा से पूछा, “आंटी जी, इस बच्चे के शरीर पर कोई जन्म का निशान है?”

अम्मा ने कहा, “हां बेटा, इसके दाहिने हाथ की हथेली में एक छोटा सा काला निशान है और माथे पर भी एक छोटा सा तिल है।”

राजेश ने तुरंत फोन पर यह बात डीएम शिवानी मेहता को बताई।

मिलन का पल

डीएम शिवानी मेहता चीख पड़ी। “यह मेरा बेटा है। यह मेरा बच्चा है।” वह रोने लगी। छ साल की तड़प, छ साल का इंतजार, छ साल की खोज आज खत्म हो गई थी। उनका बेटा मिल गया था।

लेकिन कैसी स्थिति में मिला था? एक गरीब झुग्गी में समोसे बेचते हुए, पुलिस वालों की मार खाते हुए। “राजेश, मैं तुरंत आ रही हूं। किसी को कुछ मत बताना। ना बच्चे को, ना उस महिला को। मैं खुद आकर सब कुछ संभालूंगी।”

शिवानी मेहता ने कहा और तुरंत एयरपोर्ट के लिए निकल गई। प्राइवेट जेट की व्यवस्था की। कुछ घंटों में वह अपने शहर पहुंच जाएंगी। फ्लाइट में शिवानी मेहता सिर्फ अपने बेटे के बारे में सोच रही थी।

“मेरा बच्चा इतने कष्ट झेल रहा था और मुझे पता तक नहीं था। वह समोसे बेचकर अपनी परवरिश करने वाली महिला की दवाई के पैसे जुटा रहा था। कितना संस्कारी बच्चा है।” उनकी आंखों में आंसू थे।

साथ ही वह उस बुजुर्ग महिला के बारे में भी सोच रही थी जिसने बिना किसी स्वार्थ के उनके बेटे को पाला था। “वह महिला मेरी मां से कम नहीं है। उसने मेरे बेटे को अपना बेटा मानकर पाला है। मैं उसका कैसे शुक्रिया अदा करूंगी?”

न्याय का फैसला

इधर कोर्ट में उन पांच पुलिस वालों के खिलाफ सुनवाई शुरू हो गई थी। मजिस्ट्रेट ने वीडियो का सबूत देखा। गवाहों के बयान सुने। दिवाकर पांडे ने भी अपना बयान दिया। “मैंने अपनी आंखों से देखा है कि कैसे इन पांच पुलिस वालों ने मिलकर एक 8 साल के बच्चे को बेरहमी से पीटा है।”

बचाव पक्ष के वकील ने कहा, “माय लॉर्ड, मेरे मुवकिल पुलिस वाले हैं। हो सकता है कि कुछ गलतफहमी हुई हो।” लेकिन मजिस्ट्रेट ने कहा, “वीडियो साफ है। इसमें कोई गलतफहमी नहीं है। यह स्पष्ट रूप से पुलिस की क्रूरता है।”

अभियोजन पक्ष के वकील ने कहा, “माय लॉर्ड, यह सिर्फ एक घटना नहीं है। यह हमारे सिस्टम की नाकामी है। जो लोग कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियुक्त किए गए हैं, वही कानून तोड़ रहे हैं। एक आठ साल के मासूम बच्चे के साथ इतनी क्रूरता सिर्फ इसलिए कि उसने अपनी मेहनत के पैसे मांगे।”

कोर्ट रूम में भारी भीड़ थी। मीडिया, स्थानीय लोग, एक्टिविस्ट सभी आए थे। सभी न्याय की मांग कर रहे थे। कोर्ट के बाहर भी लोगों की भीड़ थी। “इन पुलिस वालों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। न्याय देर से आए लेकिन आना चाहिए।”

एक नया अध्याय

मजिस्ट्रेट ने कहा, “यह एक गंभीर मामला है।” इधर डीएम शिवानी मेहता का जेट लैंड हो गया था। वह सीधे अस्पताल पहुंची। राजेश शर्मा उनका इंतजार कर रहा था। “मैडम, बच्चा और वह महिला प्राइवेट रूम में है।”

शिवानी मेहता के हाथ कांप रहे थे। 6 साल बाद वह अपने बेटे से मिलने जा रही थी। रूम के दरवाजे के पास पहुंचकर डीएम शिवानी मेहता रुक गई। अंदर से बच्चे की आवाज आ रही थी।

“अम्मा, अब आपको दवाई की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। डॉक्टर साहब ने कहा है कि आप जल्दी ठीक हो जाएंगी।” शिवानी मेहता की आंखों में आंसू आ गए। उनका बेटा कितना संस्कारी बन गया था।

वह धीरे से दरवाजा खोलकर अंदर गई। बच्चे ने उन्हें देखा। “आंटी जी, आप कौन हैं?” उसने पूछा। डीएम शिवानी मेहता उस बच्चे को देखकर रो पड़ी। यह वही बच्चा था जिसे वह छ साल से ढूंढ रही थी।

“बेटा,” शिवानी मेहता कुछ कह नहीं पा रही थी। अम्मा ने पूछा, “आप कौन हैं बेटी?” शिवानी मेहता ने अम्मा के पैर छुए। “मैं डीएम शिवानी मेहता हूं,” और यह वो बच्चे की तरफ देखकर रुक गई। “यह मेरा बेटा है।”

अम्मा और बच्चा दोनों हैरान रह गए। “क्या मतलब?” अम्मा ने पूछा। डीएम शिवानी मेहता ने पूरी कहानी बताई। कैसे छ साल पहले मेले में उनका बेटा खो गया था। कैसे वह उसे ढूंढती रही थी।

“आपने मेरे बेटे को अपना बेटा बनाकर पाला है। मैं आपकी कैसे शुक्रगुजारी करूं?” बच्चा अभी भी समझ नहीं पा रहा था। “आंटी जी, लेकिन मेरी अम्मा तो यह है,” उसने अम्मा की तरफ इशारा किया।

शिवानी मेहता ने बच्चे को गले लगाया। “बेटा, मैं तुम्हारी असली मां हूं लेकिन यह अम्मा तुम्हारी दूसरी मां है जिसने तुम्हें पाला है।”

अम्मा रो रही थी। “बेटी, यह बच्चा मेरी जिंदगी है। लेकिन अब जब इसकी असली मां मिल गई है तो…”

डीएम शिवानी मेहता ने उन्हें रोका। “अम्मा जी, आप भी मेरी मां हैं। आपने मेरे बेटे को 6 साल तक पाला है। अब मैं आपकी देखभाल करना चाहती हूं।”

अम्मा ने हाथ जोड़े, “बेटी, मैं एक गरीब औरत हूं। तुम्हारे घर में कैसे रहूंगी?”

“अम्मा जी, आपने मेरे बेटे को 6 साल तक पाला है। अब मैं आपकी देखभाल करना चाहती हूं,” डीएम शिवानी मेहता ने कहा। “आप मेरी मां हैं। मेरे बेटे की नानी हैं।”

निष्कर्ष

इस तरह, एक खोया हुआ बच्चा, अपनी मां और एक अम्मा के साथ एक नया जीवन शुरू करता है। डीएम शिवानी मेहता ने न केवल अपने बेटे को पाया, बल्कि एक नई मां का भी सम्मान किया।

इस कहानी ने हमें यह सिखाया कि असली रिश्ते खून से नहीं, बल्कि प्यार और त्याग से बनते हैं। आज से, रोहन ने अपनी मां और अम्मा दोनों के साथ एक नई जिंदगी जीने का फैसला किया।

सच्चे रिश्तों की ताकत कभी कम नहीं होती। चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, प्यार हमेशा जीतता है।

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