“एक छोटी सी नेकी”
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“एक छोटी सी नेकी”

दिल्ली शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर इंसान अपने-अपने कामों में इतना व्यस्त था कि किसी के पास किसी और के लिए समय ही नहीं था। इसी भीड़ में रहता था आरव, एक साधारण सा लड़का। वह उत्तराखंड के एक छोटे से गांव से आया था, बड़े सपने लेकर। उसके पिता एक छोटे किसान थे और मां घर संभालती थीं। परिवार ने बड़ी मुश्किलों से उसे पढ़ाया था, और अब उम्मीदें उसी पर टिकी थीं।
आरव पिछले दो साल से दिल्ली में नौकरी की तलाश कर रहा था। कभी इंटरव्यू मिलता, कभी रिजेक्ट हो जाता। कई बार तो ऐसा हुआ कि इंटरव्यू तक जाने के लिए भी उसके पास पैसे नहीं होते थे। वह एक छोटे से किराए के कमरे में रहता था, जहां न ठीक से हवा आती थी और न ही रोशनी। लेकिन उसके अंदर उम्मीद की लौ अभी भी जल रही थी।
एक दिन की बात है। सर्दियों की सुबह थी। ठंडी हवा चल रही थी और कोहरा इतना था कि सामने कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। आरव एक कंपनी के इंटरव्यू के लिए जा रहा था। उसने अपने पुराने जूते पहने हुए थे और हाथ में एक फाइल थी जिसमें उसके सारे सर्टिफिकेट्स थे।
बस स्टॉप पर काफी भीड़ थी। लोग अपने-अपने काम पर जाने के लिए जल्दी में थे। तभी आरव की नजर एक बुजुर्ग व्यक्ति पर पड़ी। वह कांप रहे थे, उनके पास गर्म कपड़े भी नहीं थे और वे खड़े-खड़े मुश्किल से संतुलन बनाए हुए थे।
आरव के मन में एक पल के लिए विचार आया—“मुझे खुद इंटरव्यू के लिए देर हो रही है, अगर मैं रुका तो शायद मौका हाथ से निकल जाएगा।” लेकिन अगले ही पल उसके दिल ने कहा—“अगर आज मैंने इनकी मदद नहीं की, तो मेरी पढ़ाई और संस्कार किस काम के?”
आरव तुरंत उस बुजुर्ग के पास गया।
“बाबा, आप ठीक हैं?” उसने पूछा।
बुजुर्ग ने कांपती आवाज में कहा, “बेटा, ठंड बहुत लग रही है… और मुझे अस्पताल जाना है, लेकिन शरीर साथ नहीं दे रहा।”
आरव ने बिना सोचे-समझे अपना जैकेट उतारा और उन्हें पहनाया। फिर पास खड़ी एक ऑटो को रोका।
“आइए बाबा, मैं आपको अस्पताल छोड़ देता हूं,” उसने कहा।
“लेकिन बेटा, तुम्हारा काम…?” बुजुर्ग ने पूछा।
आरव मुस्कुराया, “काम तो फिर मिल जाएगा, लेकिन इंसानियत का मौका बार-बार नहीं मिलता।”
वह उन्हें अस्पताल लेकर गया, डॉक्टर को दिखाया और दवा दिलवाई। इस सब में उसे लगभग दो घंटे लग गए। जब वह वहां से निकला, तब तक इंटरव्यू का समय निकल चुका था।
आरव थोड़ा उदास जरूर हुआ, लेकिन उसे अंदर से सुकून भी था कि उसने सही काम किया।
दिन बीतते गए। नौकरी की तलाश जारी रही, लेकिन सफलता अभी भी दूर थी। कई बार उसे लगा कि शायद उसकी किस्मत ही खराब है, लेकिन उसने हार नहीं मानी।
करीब एक महीने बाद, एक दिन उसे एक बड़ी कंपनी से कॉल आया। उसे इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। इस बार उसने पूरी तैयारी की।
वह समय पर पहुंचा। ऑफिस बहुत बड़ा और शानदार था। वहां बैठे लोगों को देखकर उसे थोड़ा डर भी लगा, लेकिन उसने खुद को संभाला।
उसका नाम पुकारा गया और वह इंटरव्यू रूम में गया।
जैसे ही उसने अंदर कदम रखा, वह हैरान रह गया।
सामने वही बुजुर्ग व्यक्ति बैठे थे, जिनकी उसने उस दिन मदद की थी। लेकिन इस बार वे बहुत सुसज्जित कपड़ों में थे और उनके चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा था।
आरव थोड़ा घबरा गया।
“सर… आप?” उसने आश्चर्य से पूछा।
बुजुर्ग मुस्कुराए, “हाँ बेटा, मैं ही हूँ। उस दिन तुमने मेरी मदद की थी। दरअसल, मैं इस कंपनी का मालिक हूँ।”
आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था।
“उस दिन मैं जानबूझकर साधारण कपड़ों में था,” उन्होंने आगे कहा, “मैं लोगों की इंसानियत को परखना चाहता था। बहुत लोग आए, गए, लेकिन किसी ने मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया। सिर्फ तुम रुके।”
आरव की आंखों में हल्की नमी आ गई।
“तुमने अपना इंटरव्यू छोड़कर मेरी मदद की,” मालिक ने कहा, “और यही गुण किसी भी डिग्री से ज्यादा कीमती है।”
उन्होंने टेबल पर रखी फाइल उठाई।
“तुम्हारी योग्यता अच्छी है, लेकिन तुम्हारी इंसानियत उससे भी बड़ी है। मुझे ऐसे ही लोगों की जरूरत है।”
आरव सांस रोके सुन रहा था।
“आज से तुम इस कंपनी में काम करोगे,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “और यह नौकरी तुम्हारी है।”
आरव की आंखों से आंसू बह निकले। यह खुशी के आंसू थे। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसकी एक छोटी सी नेकी ने उसकी जिंदगी बदल दी।
“थैंक यू सर… मैं आपका भरोसा कभी नहीं तोड़ूंगा,” उसने कहा।
“मुझे पता है,” मालिक ने कहा, “और एक बात हमेशा याद रखना—अच्छे कर्म कभी बेकार नहीं जाते।”
आरव ने नौकरी जॉइन की और पूरे मन से काम करने लगा। उसकी मेहनत और ईमानदारी ने सबका दिल जीत लिया। कुछ ही समय में वह कंपनी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
उसने अपने माता-पिता की मदद करनी शुरू की, घर की हालत सुधर गई और उसकी बहन की शादी भी अच्छे से हो गई।
लेकिन सबसे खास बात यह थी कि वह आज भी वैसा ही इंसान बना रहा। वह जरूरतमंदों की मदद करता रहा, क्योंकि वह जानता था कि जिंदगी में सबसे बड़ी पूंजी पैसा नहीं, बल्कि इंसानियत होती है।
एक दिन उसने अपने एक दोस्त से कहा—
“हम नहीं जानते कि हमारी छोटी सी मदद किसकी जिंदगी बदल सकती है। इसलिए हमेशा अच्छा करना चाहिए, बिना किसी उम्मीद के।”
दोस्त ने पूछा, “क्या तुम्हें हमेशा इसका फल मिलता है?”
आरव मुस्कुराया, “शायद तुरंत नहीं… लेकिन सही समय पर जरूर मिलता है।”
सीख:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि इंसानियत सबसे बड़ी चीज है। अगर हम बिना स्वार्थ के किसी की मदद करते हैं, तो उसका फल हमें जरूर मिलता है—भले ही थोड़ी देर से क्यों न मिले।
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