पुलिस दरोगा की गलती की वजह से हुआ बहुत बड़ा हादसा/S.P साहब भी रो पड़े/
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अध्याय 1: विधवा का संघर्ष और उम्मीद की किरण
उदयपुर की अरावली पहाड़ियों के बीच बसा अलसीगढ़ गाँव अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, लेकिन इसी सुंदरता के पीछे रीतू देवी जैसी महिलाओं का कड़ा संघर्ष छिपा था। रीतू देवी, जिसके पति की मृत्यु तीन साल पहले एक दुर्घटना में हो गई थी, अब अपने दो बच्चों—प्रवीण और राखी—की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाए हुए थी।
प्रवीण 12वीं का छात्र था और राखी 10वीं में पढ़ती थी। रीतू का दिन सूरज निकलने से पहले शुरू होता। वह दूसरों के खेतों में पसीना बहाती, पत्थर ढोती और घरों में मजदूरी करती ताकि उसके बच्चों की पढ़ाई न रुके। शाम को जब वह थक-हारकर घर लौटती, तो बच्चों की मुस्कुराहट उसकी सारी थकान मिटा देती।
एक शाम, जब रीतू चूल्हे पर रोटियां सेंक रही थी, राखी उसके पास आकर बैठी और बोली, “माँ, तू अब बूढ़ी हो रही है। दूसरों के घरों में जाकर मजदूरी करना छोड़ दे। तुझे कपड़े सिलना कितना अच्छा आता है, तू घर पर ही सिलाई क्यों नहीं शुरू कर देती?”
रीतू के मन में यह बात घर कर गई। उसे सिलाई का हुनर विरासत में मिला था, लेकिन उसके पास मशीन नहीं थी। उसने अपनी जमा-पूँजी जोड़ी तो कुल ₹2000 निकले। एक अच्छी मशीन के लिए ₹2000 और चाहिए थे। रीतू ने तय किया कि वह अपनी पड़ोसन अनु से पैसे उधार मांगेगी।

अध्याय 2: दरोगा की गंदी नजर
अगली सुबह रीतू अनु के घर पहुँची। उसने दरवाजा खटखटाया, लेकिन दरवाजा अनु ने नहीं, बल्कि उसके पति जगदीश पवार ने खोला। जगदीश पवार स्थानीय पुलिस स्टेशन में दरोगा था। वह वर्दी के रौब और सत्ता के नशे में चूर रहने वाला इंसान था।
जैसे ही उसकी नजर रीतू पर पड़ी, उसके मन में पाप जाग उठा। रीतू अपनी सादगी में भी अत्यंत सुंदर थी। जगदीश ने अपनी गंदी निगाहों से उसे ऊपर से नीचे तक देखा। जब रीतू ने अनु के बारे में पूछा, तो जगदीश ने झूठ बोला, “वह किसी काम से पड़ोस में गई है, तू अंदर आकर बैठ, अभी आती होगी।”
भोली रीतू अंदर जाकर बैठ गई। थोड़ी देर बाद अनु आ गई और उसने रीतू को ₹2000 उधार दे दिए। रीतू खुश थी कि अब वह अपना काम शुरू कर पाएगी, लेकिन वह जगदीश पवार के मन में पनप रहे शैतान से अनजान थी।
अध्याय 3: वर्दी के पीछे का भेड़िया
रीतू ने सिलाई मशीन खरीदी और गाँव में एक छोटी सी दुकान किराए पर ले ली। उसकी मेहनत रंग लाई और जल्द ही गाँव की सभी महिलाएँ उसके पास कपड़े सिलवाने आने लगीं। लेकिन रीतू की यह खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं टिकी।
10 अक्टूबर 2025 की शाम। जगदीश पवार को पता चला कि अनु मायके गई है। उसने इसे एक मौके की तरह देखा। वह रीतू की दुकान पर पहुँचा और कहा, “रीतू, अनु के कुछ कपड़े सिलने हैं, लेकिन उसका नाप लेने के लिए तुझे मेरे घर आना होगा।”
रीतू ने विश्वास कर लिया। जब वह उसके घर पहुँची, तो जगदीश ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। रीतू डर गई। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती, जगदीश ने उसे दबोच लिया। उसने रीतू का मुँह कपड़े से बांध दिया और उसके हाथ-पैर अपनी पत्नी की चुन्नी से बांध दिए। उस रात एक रक्षक ही भक्षक बन गया। जगदीश ने रीतू की अस्मत को तार-तार कर दिया।
काम खत्म करने के बाद उसने रीतू को धमकी दी, “अगर तूने यह बात किसी को बताई, तो मैं तेरे दोनों बच्चों को किसी झूठे केस में फँसाकर जेल में सड़वा दूंगा या उन्हें जान से मार दूंगा।”
रीतू टूट गई। वह रोते हुए घर पहुँची, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य और जान के डर से उसने मुँह नहीं खोला। वह अंदर ही अंदर घुटने लगी।
अध्याय 4: दरिंदगी की कोई सीमा नहीं
जगदीश पवार का दुस्साहस बढ़ता ही गया। वह अक्सर रीतू को डरा-धमका कर अपने खेतों में बुलाने लगा। रीतू एक जिंदा लाश बन चुकी थी, जो केवल अपने बच्चों के लिए सांसें ले रही थी। लेकिन शैतान की भूख कभी खत्म नहीं होती।
30 अक्टूबर 2025 को जगदीश रीतू के घर राशन और कुछ कपड़े लेकर पहुँचा। उस दिन रीतू घर पर नहीं थी, उसकी 10वीं में पढ़ने वाली बेटी राखी ने दरवाजा खोला। राखी को देखते ही जगदीश की आँखों में वही वहशीपन चमक उठा जो उसने रीतू के लिए दिखाया था। उसने मन ही मन तय कर लिया कि अब उसकी अगली शिकार राखी होगी।
अध्याय 5: मासूमियत का कत्ल
8 नवंबर 2025। रीतू अपने बेटे प्रवीण के साथ शहर गई थी। राखी की तबीयत खराब थी, इसलिए वह घर पर अकेली थी। जगदीश पवार को जैसे ही पता चला कि घर में राखी अकेली है, वह वहां पहुँच गया।
उसने प्यास का बहाना बनाया। जैसे ही राखी पानी लेने अंदर गई, जगदीश पीछे-पीछे कमरे में घुस गया। उसने मासूम राखी के साथ वही किया जो उसने उसकी माँ के साथ किया था। उसने राखी का गला दबाया, उसे बांधा और उसकी रूह को जख्मी कर दिया। जाते-जाते उसे भी वही धमकी दी—“अगर किसी को बताया तो तेरे भाई और माँ को मार डालूँगा।”
अध्याय 6: आंसुओं का सैलाब और प्रतिशोध की ज्वाला
जब रीतू और प्रवीण लौटे, तो उन्होंने राखी को बेसुध पाया। राखी ने अपनी माँ के गले लगकर अपना सारा दर्द उगल दिया। रीतू के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने भी अपना सारा राज अपने बच्चों के सामने खोल दिया।
प्रवीण, जो अब तक एक शांत लड़का था, उसका खून खौल उठा। उसने अपनी माँ और बहन के आँसू पोंछे और कहा, “अब बहुत हुआ माँ। वह पुलिस वाला हमें कानून से डराता है, लेकिन अब हम उसे मौत से डराएंगे।”
तीनों ने मिलकर एक खौफनाक योजना बनाई। वे जानते थे कि कानून उस दरोगा की जेब में है, इसलिए उन्हें अपना न्याय खुद करना होगा।
अध्याय 7: न्याय की खूनी रात
22 नवंबर 2025। सर्दी की एक खामोश रात। जगदीश पवार शराब के नशे में धुत होकर रीतू के घर पहुँचा। वह हमेशा की तरह अपनी सत्ता के अहंकार में था। जैसे ही उसने कदम अंदर रखा, प्रवीण ने दरवाजा बंद कर लिया।
जगदीश कुछ समझ पाता, रीतू ने एक भारी डंडा उसके सिर पर दे मारा। वह नीचे गिर पड़ा। प्रवीण ने उसे दबोच लिया और उसके सिर पर ईंट से वार किया। जगदीश चीखना चाहता था, लेकिन प्रवीण ने उसका गला पूरी ताकत से दबा रखा था।
राखी रसोई से एक तेज धार वाला चाकू लेकर आई। उसकी आँखों में कोई डर नहीं था, केवल प्रतिशोध था। उसने उस दरिंदे के उस अंग को काट दिया जो उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी और जिसकी वजह से उसने दो जिंदगियां बर्बाद की थीं। अंत में, प्रवीण ने उसी चाकू से दरोगा का गला रेत दिया।
अध्याय 8: आत्मसमर्पण और कानून का न्याय
हत्या करने के बाद, उन्होंने लाश को छिपाने की कोशिश नहीं की। प्रवीण ने खुद पुलिस को फोन किया और सब कुछ बता दिया। जब उदयपुर के S.P. (पुलिस अधीक्षक) मौके पर पहुँचे और रीतू तथा राखी की आपबीती सुनी, तो उनके कठोर चेहरे पर भी आँसू आ गए। उन्होंने अपनी सर्विस में कई अपराधी देखे थे, लेकिन एक दरोगा की ऐसी नीचता और एक परिवार की ऐसी बेबसी पहली बार देखी थी।
पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार किया और चार्जशीट दाखिल की। कानून की नजर में उन्होंने एक हत्या की थी, लेकिन गाँव वालों की नजर में उन्होंने एक राक्षस का अंत किया था।
निष्कर्ष: समाज से एक सवाल
यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो आम आदमी कहाँ जाए? रीतू और उसके बच्चों ने जो किया, वह कानूनन गलत था, लेकिन क्या उनके पास कोई और रास्ता बचा था?
इस घटना ने राजस्थान पुलिस प्रशासन को हिलाकर रख दिया। S.P. साहब ने खुद स्वीकार किया कि यह पुलिस विभाग के माथे पर एक काला धब्बा है। रीतू, राखी और प्रवीण आज भी जेल की सलाखों के पीछे अपने मुकदमे का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अलसीगढ़ गाँव की हवाओं में अब उस दरोगा का खौफ नहीं है।
क्या आपको लगता है कि इस परिवार ने जो किया वह सही था? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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