रोज 3 भूखे अनाथों को खाना खिलाती थी यह महिला, 25 साल बाद उसके दरवाजे पर 3 अमीर आदमियों ने दस्तक दी

राधा की रसोई – ममता, संघर्ष और इंसानियत की अमर कहानी

पहला भाग – सपनों का घर

शांतिपुर की तंग गलियों में बसा एक छोटा सा घर था, जिसके मुख्य द्वार पर चमेली की बेल लिपटी रहती थी।
यह घर राधा और हरीश का आशियाना था – राधा के लिए यह घर ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि उसके सपनों का मंदिर था।
हरीश, एक निजी दफ्तर में मामूली क्लर्क था, स्वभाव से बेहद सरल, मृदुभाषी।
शादी को पांच साल हो चुके थे।
इन वर्षों में प्रेम तो बहुत था, लेकिन घर के आंगन में वह किलकारी नहीं गूंजी थी जिसकी हसरत हर सुहागन को होती है।
राधा अक्सर शाम को खिड़की के पास बैठकर पड़ोस के बच्चों को खेलते देखती और चुपके से अपनी सूनी गोद पर हाथ रख लेती।
उसकी आंखों में एक अजीब सी वीरानी तैर जाती, जिसे वह दुनिया से छिपाए रखती थी।

इस वीरानी को और गहरा कर देती थी उसकी सास सावित्री देवी।
सावित्री देवी का व्यक्तित्व किसी सख्त चट्टान जैसा था।
उनकी कड़वाहट राधा को रोज सहनी पड़ती थी।
एक सुबह जब राधा आंगन की सफाई कर रही थी, सावित्री देवी ने ताना मारा –
“पांच साल हो गए, राधा। हरीश ने अगर किसी ऐसी लड़की से शादी की होती जो उसे वंश दे पाती, तो आज मेरी बूढ़ी आंखों को अपने पोते का मुंह देखने को मिल जाता। तू तो पत्थर की मूरत निकली, जिससे सिर्फ उम्मीदें टूटती हैं।”

राधा के हाथ से झाड़ू छूट गया। उसकी पलकें भीग गईं, पर उसने कोई जवाब नहीं दिया।
वह रसोई में चली गई और अपनी सिसकियों को आंचल में दबा लिया।

हरीश अपनी पत्नी की इस खामोश पीड़ा को समझता था।
एक रात उसने राधा का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा –
“राधा, मैं तुम्हें इस घुटन भरे माहौल से दूर ले जाना चाहता हूं। चलो कुछ दिन मनाली की वादियों में बिताते हैं।”

राधा ने मना करने की कोशिश की, पर हरीश की आंखों में छिपे प्यार को देख वह टाल न सकी।
मनाली की बर्फीली हवाओं के बीच वे दस दिन किसी जादू की तरह बीते।
वहीं एक पुराने शिव मंदिर की सीढ़ियों पर उनकी मुलाकात एक सिद्ध पहाड़ी बाबा से हुई।
बाबा की सफेद दाढ़ी और शांत आंखों ने जैसे राधा के अंतर्मन को पढ़ लिया।
राधा की व्यथा जानकर बाबा ने उसे कुछ पहाड़ी जड़ी-बूटियां दीं और सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया –
“धीरज रख बेटी, प्रकृति कभी किसी का हाथ खाली नहीं छोड़ती। अब तेरी गोद सुनी नहीं रहेगी। यह महादेव का संकेत है।”

उन शब्दों ने राधा के मन में उम्मीद की नई कोपल जगा दी।

दूसरा भाग – खुशियों की दस्तक और नियति का खेल

मनाली से लौटने के बाद राधा के दिन बदलने लगे।
उसे अक्सर थकान महसूस होती और सुबह के वक्त जी मिचलाने लगता।
एक दोपहर जब वह घर का जाला साफ कर रही थी, अचानक उसके सिर में तेज चक्कर आया और वह फर्श पर बेसुध होकर गिर पड़ी।

जब उसकी आंखें खुलीं, उसने खुद को हरीश की गोद में पाया।
हरीश के चेहरे पर गहरी चिंता थी।
वह उसे पानी पिलाते हुए बोला –
“राधा, तुम ठीक तो हो? मैं तुम्हें अभी डॉक्टर के पास ले जाता हूं।”
तभी हरीश के फोन की घंटी बजी – दफ्तर से कॉल था।
कंपनी के बड़े प्रोजेक्ट में भारी तकनीकी खराबी आ गई थी, उसका तुरंत पहुंचना अनिवार्य था।
हरीश ने मजबूरी में राधा के माथे को चूमते हुए कहा –
“राधा, मुझे ऑफिस जाना होगा। तुम टैक्सी करके पास वाले क्लिनिक चली जाओ। मैं सीधा वहीं पहुंचने की कोशिश करूंगा।”

राधा अकेले क्लिनिक पहुंची।
डॉक्टर ने कुछ टेस्ट किए और मुस्कुराते हुए फाइल उसकी ओर बढ़ाई –
“मुबारक हो राधा जी, आप मां बनने वाली हैं।”

राधा को लगा जैसे पूरी कायनात थम गई है।
उसकी आंखों से खुशी के आंसू झरझर बहने लगे।
उसने कांपते हाथों से तुरंत हरीश को फोन लगाया।
हरीश उस समय अपनी कार से तेज गति में हाईवे पर था।
जैसे ही उसने फोन उठाया, राधा ने चहकते हुए कहा –
“हरीश, सुनिए, हम मां-बाप बनने वाले हैं। बाबा का आशीर्वाद सच हो गया।”

हरीश की खुशी का ठिकाना न रहा।
लेकिन उसका वाक्य अधूरा रह गया।
फोन के दूसरी तरफ राधा को एक जोरदार चीख और फिर धातु के टकराने की भयानक आवाज सुनाई दी।
“हरीश! हरीश!”
राधा चिल्लाई, लेकिन वहां सिर्फ एक डरावना सन्नाटा था।

राधा क्लिनिक के बाहर बदहवास होकर सड़क पर दौड़ने लगी।
बार-बार कॉल मिलाती रही पर फोन नहीं लगा।
तभी उसके फोन पर एक अज्ञात नंबर से कॉल आया।
एक पुलिस अधिकारी ने पूछा –
“क्या आप हरीश जी की पत्नी हैं? हाईवे पर एक भयानक एक्सीडेंट हुआ है। आपके पति की कार एक ट्रक से टकरा गई है। हरीश जी अब इस दुनिया में नहीं रहे।”

राधा के हाथ से फोन और उसकी प्रेगनेंसी रिपोर्ट दोनों सड़क पर गिर गए।
बारिश की चंद बूंदों ने उस रिपोर्ट को गीला कर दिया।
कुछ ही पलों पहले जिसे अपनी कोख में नई जिंदगी का एहसास हुआ था, उसी पल उसकी पूरी दुनिया उजड़ चुकी थी।
वह वहीं जमीन पर बैठ गई – ना उसके पास आंसू थे, ना ही आवाज।
बस एक अंतहीन अंधेरा उसके सामने था।

तीसरा भाग – सब कुछ छिन गया

अस्पताल का वह गलियारा, जहां कुछ घंटों पहले वह मातृत्व की खुशी में झूम रही थी, अब किसी श्मशान सा भयावह लग रहा था।
हवा में फैली फिनाइल की तीखी गंध और दीवारों की सफेदी राधा की आंखों में चुभ रही थी।
वह एक बिस्तर पर निर्जीव सी पड़ी थी।
उसकी नजरें छत पर लगे पंखे की धीमी गति पर टिकी थीं।
पर उसे कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

तभी कमरे का भारी दरवाजा धीरे से खुला और डॉक्टर अंदर आए।
उनके चेहरे पर गंभीरता थी।
डॉक्टर ने राधा के पास आकर कहा –
“राधा जी, खुद को संभालिए। अत्यधिक मानसिक आघात और भारी रक्त स्राव के कारण हम आपके गर्भ को नहीं बचा सके। आपका गर्भपात हो गया है।”

यह सुनते ही राधा के भीतर जैसे कुछ टूट कर बिखर गया।
वो ना तो रोई, ना ही चिल्लाई।
बस उसकी आंखों से आंसुओं का एक सैलाब बह निकला।
एक ही दिन में नियति ने उससे उसका सब कुछ छीन लिया था – हमसफर जो उसकी ढाल था और नन्हा सपना जो अभी उसके भीतर आकार लेना शुरू ही हुआ था।

चौथा भाग – सास का तिरस्कार और समाज की बेरुखी

कमरे का दरवाजा एक झटके से खुला।
सावित्री देवी, जिनका सफेद लिबास उनके विधवा होने की गवाही दे रहा था, अंदर दाखिल हुईं।
उनकी आंखों में पुत्र के खोने का दुख था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा राधा के प्रति नफरत और जहर भरा था।

वे राधा के बिस्तर के पास पहुंचीं और उंगली उसकी ओर उठाते हुए बोलीं –
“देख लिया अपनी मनहूसियत का तमाशा? खा गई ना मेरे जवान बेटे को। मैंने तो उसी दिन कहा था कि यह लड़की हमारे घर के लिए काल है। तू सिर्फ अपशगुन है, जिसने इस घर की खुशियों को निगल लिया।”

राधा ने कांपते हाथों से अपनी सास के पैर पकड़ने की कोशिश की –
“मां जी, ऐसा मत कहिए। मेरा तो सब कुछ लुट गया। मैंने अपना बच्चा भी खो दिया।”

लेकिन सावित्री देवी का दिल जरा भी नहीं पसीजा।
उन्होंने घृणा से अपना पैर पीछे खींच लिया –
“अब यहां सहानुभूति का ढोंग मत कर। मैं एक अपशगुन औरत को अपने बेटे की कमाई को हाथ भी नहीं लगाने दूंगी। इस घर के दरवाजे तेरे लिए हमेशा के लिए बंद हैं।”

तीन दिन बाद जब राधा को अस्पताल से छुट्टी मिली, उसके पास सिर छिपाने के लिए कोई छत नहीं थी।
माता-पिता सालों पहले दुनिया छोड़ चुके थे और ससुराल वालों ने उसे कुलक्षणी कहकर धत्कार दिया था।
वह अस्पताल के गेट पर एक छोटे से थैले के साथ खड़ी थी।
चिलचिलाती धूप उसके चेहरे को झुलसा रही थी, पर उसके भीतर एक बर्फीली खामोशी छाई थी।

पांचवां भाग – फुटपाथ से नई शुरुआत

राधा के पास कुछ मुड़े हुए नोट थे – वही पैसे जो हरीश ने इमरजेंसी के लिए रखने को कहा था।
उसने उन नोटों को सीने से लगाया और सड़क के किनारे बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी।
“मैं अब कहां जाऊंगी, हरीश?”
अब उसके सामने एक लंबी धूल भरी और गुमनाम सड़क थी जिस पर उसे तन्हा ही चलना था।

समाज ने उसे अभागन का ठप्पा लगाकर गलियों में भटकने के लिए छोड़ दिया था।
वक्त अपनी चाल से चलता रहा और धीरे-धीरे राधा के जख्मों पर यादों की धूल जमने लगी।

ससुराल की चौखट से धत्कारे जाने के बाद राधा ने शहर के एक रेलवे स्टेशन के पास की बस्ती में पनाह ली।
उसके पास रहने को ईंटों की चार दीवारें और ऊपर टपकती हुई टीन की छत थी।
शुरुआती रातें उसने जमीन पर फटे कंबल और हरीश की फटी हुई कमीज को सीने से लगाकर रोते हुए काटी।

लेकिन जल्द ही उसे एहसास हो गया कि आंसू उसकी भूख नहीं मिटा सकते।
हरीश अक्सर कहता था –
“राधा, तुम्हारे हाथों के हुनर में तो साक्षात अन्नपूर्णा का वास है।”
पति के उन्हीं शब्दों को उसने अपनी ताकत बनाया।

उसने अपने बचे-खुचे गहने बेचकर एक पुराना लकड़ी का ठेला खरीदा।
सड़क के एक धूल भरे कोने पर “राधा की रसोई” का छोटा सा बोर्ड टंग गया।

छठा भाग – संघर्ष और ममता का नया घर

संघर्ष के दिन रूह कंपा देने वाले थे।
सुबह के धुंधलके में जब दुनिया सो रही होती, राधा चूल्हा सुलगाती और मसालों की खुशबू में अपना गम घोल देती।
चिलचिलाती धूप में घंटों खड़े रहकर वह मजदूरों और राहगीरों को सस्ता और शुद्ध खाना खिलाती।
कभी नगर निगम वाले ठेला हटाने आ जाते, कभी स्थानीय गुंडे मुफ्त खाने की धौंस जमाते।
पर राधा अडिग रही – “मैं अपना केस खुद लडूंगी। मुझे किसी के रहम की जरूरत नहीं है।”

एक शाम, सूरज ढल चुका था, राधा दुकान समेट रही थी।
तभी उसकी निगाह सड़क के दूसरी ओर बरगद के पेड़ के नीचे पड़ी –
तीन छोटे बालक एक-दूसरे से चिपक कर बैठे थे।
उनके फटे हुए कुर्ते, धूल से सने चेहरे उनकी गरीबी की कहानी कह रहे थे।
उनकी आंखें राधा के खाली पतीले को ऐसे निहार रही थीं जैसे उसमें उन्हें अपनी पूरी कायनात दिख रही हो।

राधा ने उन्हें पास बुलाया।
वे तीनों सहमे हुए डरे-डरे कदमों से पास आए।
राधा ने पूछा –
“बेटा, तुम यहां अकेले क्या कर रहे हो? तुम्हारे घरवाले कहां हैं?”

उनमें से एक ने कहा –
“हमारी मां मर गई और बापू हमें छोड़कर कहीं चले गए। हम तीन दिन से कचरे में खाना ढूंढ रहे हैं।”

राधा का कलेजा फटने लगा।
उसने फौरन चूल्हा फिर से जलाया और उन बच्चों के लिए गरमागरम रोटियां और दाल परोसी।
बच्चे भूखे भेड़ियों की तरह खाने पर टूट पड़े।
उन्हें निवाला लेते देख राधा की आंखों से ममता के झरने बह निकले।

जब उनका पेट भर गया, सबसे छोटे लड़के ने राधा की साड़ी का पल्ला पकड़कर पूछा –
“क्या हमें कल भी खाना मिलेगा?”
राधा ने घुटनों के बल बैठकर उन्हें अपने सीने से लगा लिया –
“हां बेटा, तुम रोज यहां आना। जब तक तुम्हारी इस मां का हाथ चल रहा है, तुम तीनों कभी भूखे नहीं सोओगे।”

उस पल राधा को लगा जैसे हरीश का अधूरा सपना और उसका खोया हुआ बच्चा इन तीन मासूमों के रूप में लौट आया है।
उसने उनका नाम रखा – सूरज, आकाश और पवन।
अब राधा के जीवन का सवेरा हो चुका था।
वो अब एक बेसहारा विधवा नहीं, बल्कि तीन अनाथ बच्चों की मां बन चुकी थी।

सातवां भाग – संघर्ष से सफलता तक

सड़क का वह कोना अब प्यार और उम्मीद का ठिकाना बन गया था।
वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहा और देखते-देखते 15 साल बीत गए।
राधा की उम्र अब ढलने लगी थी।
उसके चेहरे पर वक्त की गहरी लकीरें और झुर्रियां साफ दिखने लगी थीं।
उसके हाथ अब सख्त और काले पड़ गए थे।
लेकिन “राधा की रसोई” अब उस इलाके की पहचान और हजारों गरीबों की उम्मीद बन चुकी थी।

सूरज, आकाश और पवन अब छोटे बच्चे नहीं रहे थे।
वे जवान और काबिल हो चुके थे।
राधा ने अपनी भूख और नींद का त्याग करके उन्हें शहर के सबसे बड़े कॉलेजों तक पहुंचाया था।

एक शाम, सूरज दौड़ता हुआ आया और राधा के पैर छुए।
“मां, मेरा चुनाव हो गया है। मुझे शहर के सबसे बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में स्कॉलरशिप मिली है।”
राधा की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए।
आकाश को कानून की पढ़ाई में और पवन को व्यापार में बड़ी सफलता मिल रही थी।

आठवां भाग – साजिश और नफरत का जहर

खुशियों के इस आशियाने पर एक बार फिर पुरानी दुश्मनी की काली घटाएं छाने लगीं।
वह पुराना अमीर बिल्डर, जिसने बरसों पहले राधा को बेघर किया था, अब शहर का सबसे शक्तिशाली आदमी बन चुका था।
उसे डर था कि अगर ये तीनों लड़के इसी तरह कामयाब हुए तो वे राधा के साथ हुए अन्याय का बदला लेंगे।

उसने राधा की हिम्मत तोड़ने के लिए साजिश रची।
एक दोपहर जब राधा रोटियां सेक रही थी, बिल्डर ने गुंडे और भ्रष्ट पुलिस वालों को भेजा।
उन्होंने राधा का ठेला पलट दिया –
“ए बुढ़िया, यह जमीन अब मॉल बनाने के लिए खरीदी जा चुकी है। अपना बोरिया-बिस्तर समेट और निकल यहां से।”

राधा ने हाथ जोड़कर मिन्नतें की –
“साहब, यही मेरी रोजी-रोटी है। इन बच्चों का भविष्य इसी चूल्हे से जुड़ा है।”
लेकिन उन्होंने एक ना सुनी और उसे धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया।
राधा की तबीयत बिगड़ गई, तेज बुखार ने जकड़ लिया।

नौवां भाग – झूठ का जाल और रिश्तों की टूटन

बिल्डर ने अपनी साजिश का दूसरा हिस्सा अंजाम दिया।
वह उन तीनों भाइयों से मिला, उन्हें जाली दस्तावेज और पुरानी तस्वीरें दिखाकर उनके दिमाग में जहर भर दिया –
“तुम जिसे अपनी फरिश्ता मां समझते हो, वह तुम्हारे माता-पिता की मौत की गुनहगार है। उसने तुम्हें पाला ताकि अपने पापों का बोझ कम कर सके।”

सूरज, आकाश और पवन उस झूठ को सच मान बैठे।
उनके दिलों में बरसों से पल रहा प्यार पल भर में नफरत में बदल गया।
वे उसी रात राधा की कोठरी में पहुंचे।

राधा ने मुस्कुराकर उन्हें पास बुलाया –
“मेरे बच्चों, तुम आ गए? देखो, मां ने तुम लोगों के लिए खीर बनाई है।”
लेकिन सूरज ने गुस्से में खीर की थाली को पैर से मार दिया।
“हमें सब पता चल गया है कि आप कितनी बड़ी धोखेबाज हैं।”

राधा सन्न रह गई।
आकाश ने चिल्लाकर कहा –
“आज से हमारा और आपका रिश्ता खत्म। हमें फिर कभी अपनी शक्ल मत दिखाना।”

राधा ने रोते हुए उनका हाथ पकड़ना चाहा –
“बेटा, एक बार मेरी बात तो सुनो। मैंने तुम्हें अपनी कोख से नहीं जन्मा, पर अपनी जान से बढ़कर प्यार किया है।”

लेकिन वे उस बीमार और बेसहारा औरत को अकेला छोड़कर अंधेरी रात में निकल गए।
पवन ने जाते-जाते कहा –
“एक दिन मैं इतना बड़ा आदमी बनूंगा कि आपकी असलियत का जवाब दे सकूं।”

दसवां भाग – अकेली मां और पछताने की घड़ी

अगले दस साल राधा के लिए किसी जिंदा मौत से कम नहीं थे।
वह फिर से अकेली रह गई।
उसका शरीर और भी बूढ़ा और जर्जर हो गया।
वह एक-एक पैसे के लिए मोहताज हो गई।
बस्ती के लोग उसे पागल बुढ़िया कहने लगे।

वक्त की चक्की चलती रही और राधा की जिंदगी की शाम और भी धुंधली हो गई।
अब वह 60 साल की हो चुकी थी।
उसकी आंखों की रोशनी कम हो गई थी और वह मुश्किल से चल पाती थी।
जिस चूल्हे पर वह कभी पकवान बनाती थी, अब वहां सिर्फ एक छोटा सा मिट्टी का बर्तन रहता था।

वह अक्सर रात के सन्नाटे में बड़बड़ाती थी –
“सूरज, आकाश, क्या तुम्हें आज भी खीर पसंद है?”

उसके पास अब कुछ नहीं बचा था, सिवाय उन यादों के जो अब जहर की तरह उसे भीतर से काट रही थीं।

ग्यारहवां भाग – सच्चाई का उजाला और पुनर्मिलन

शहर में वो ताकतवर बिल्डर अब अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था।
मौत के डर ने उसके भीतर के जमीर को जगा दिया।
उसने सूरज, आकाश और पवन को बुलाया –
“मैंने तुम लोगों से बहुत बड़ा झूठ बोला था। राधा ने तुम्हारे माता-पिता को नहीं मारा था, बल्कि उसने अपनी ममता की बलि दी थी ताकि तुम लोग पढ़ सको। वह जमीन, वो घर सब मैंने धोखे से छीना था।”

बिल्डर ने अलमारी की चाबी उन्हें सौंप दी जिसमें सारे असली दस्तावेज रखे थे।

यह सुनते ही तीनों भाइयों के पैरों तले जमीन खिसक गई।
जिस औरत को उन्होंने अपशगुन और कातिल कहकर छोड़ दिया था, वह तो उनकी असली रक्षक थी।

सूरज की आंखों में खून उतर आया, आकाश सिसकने लगा, पवन ने दीवार पर हाथ मारते हुए चिल्लाया –
“हमने अपनी ही मां का गला घोट दिया।”

उनके पास अब दौलत थी, शोहरत थी, लेकिन रूह में एक ऐसा जख्म हो गया था जिसे कोई मरहम नहीं भर सकता था।

बारहवां भाग – ममता की जीत

अगले दिन उस पुरानी और धूल भरी बस्ती में एक ऐसा नजारा दिखा जो वहां के लोगों ने कभी नहीं देखा था।
तीन चमकचमाती काली गाड़ियां राधा की टूटी हुई झोपड़ी के सामने रुकीं।
गाड़ियों के दरवाजे खुले और तीन प्रभावशाली पुरुष बाहर निकले।
राधा उस वक्त अपनी झोपड़ी के बाहर पत्थर पर बैठी थी।

सूरज भागकर उसके पास पहुंचा और कीचड़ में घुटनों के बल गिर गया –
“मां, मुझे मार लो मां। मैं अपराधी हूं। मैंने अपनी मां पर शक किया।”

आकाश और पवन भी उसके बगल में कीचड़ में बैठ गए और फूट-फूट कर रोने लगे।
राधा ने अपनी कांपती हुई उंगलियों से सूरज का चेहरा छुआ –
“मैं तुम्हें कब का माफ कर चुकी थी बच्चों। पर मेरा दिल उस दिन टूट गया था जब तुमने मेरी ममता को ही झुठला दिया था। मुझे तुम्हारी गाड़ियां नहीं चाहिए थी। मुझे बस तुम्हारा यकीन चाहिए था।”

पवन ने अपना सिर राधा की गोद में रख दिया –
“मां, हम आपको वापस लेने आए हैं। अब आप इस नर्क में एक पल भी नहीं रहेंगी।”

राधा ने सबको उठाया, उनके माथे चूमे –
“मां कभी अपने बच्चों से नफरत नहीं कर सकती।”

वे तीनों उसे सहारा देकर उन आलीशान गाड़ियों की ओर ले गए।
पूरी बस्ती तमाशबीन बनी देखती रही कि कैसे एक तिरस्कृत बुढ़िया आज एक रानी की तरह विदा हो रही थी।

तेरहवां भाग – आश्रम की स्थापना और ममता का संदेश

शहर पहुंचकर उन तीनों भाइयों ने अपने सबसे बड़े बंगले का नाम “राधा निवास” रखा।
लेकिन राधा ने चैन से बैठना पसंद नहीं किया।
उसने अपने बेटों से कहा –
“अगर सच में प्रायश्चित करना चाहते हो तो मेरे नाम से एक राधा मेमोरियल आश्रम बनवाओ। जहां किसी भी अनाथ बच्चे को उसकी मां से दूर ना किया जाए और कोई भूखा ना सोए।”

आज राधा उसी आश्रम की रसोई संभालती है।
अब उसके पास हजारों बच्चे हैं और उसके तीन बेटे हर शाम उसके हाथ की वही सादी रोटी खाने आते हैं।
हरीश की वह पुरानी तस्वीर अब आश्रम के मुख्य द्वार पर लगी है – जैसे वह मुस्कुराकर कह रहे हो कि प्यार और सच्चाई कभी नहीं हारती।

अंतिम संदेश

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ममता, संघर्ष और इंसानियत की जीत को सलाम। जय हिंद।