“जज साहब, इंसाफ कितने में बिकता है?” 13 साल के बच्चे ने कोर्ट में फोड़ी गुल्लक

न्याय की गुल्लक: एक नन्हे संघर्ष की महागाथा

भाग 1: सन्नाटे में गूंजती दस्तक

शहर की सबसे बड़ी अदालत के कमरा नंबर 4 में तिल धरने की जगह नहीं थी। बाहर चिलचिलाती धूप थी, लेकिन अंदर का माहौल उससे भी ज्यादा गर्म और तनावपूर्ण था। जज श्रीवास्तव अपने चश्मे के ऊपर से फाइलों को देख रहे थे। सामने कटघरे में एक अधेड़ उम्र का आदमी, दीनानाथ, खड़ा था। उसके चेहरे पर बरसों की गरीबी और पिछले दो महीनों की पुलिसिया प्रताड़ना के गहरे निशान थे। दीनानाथ एक मामूली रिक्शा चालक था, जिस पर शहर के सबसे रसूखदार बिल्डर ठाकुर गजराज सिंह ने अपनी कीमती घड़ी और पुश्तैनी जेवर चोरी करने का आरोप लगाया था।

सब जानते थे कि यह आरोप झूठा है, लेकिन कानून गवाहों और सबूतों का गुलाम होता है। ठाकुर के पैसे और रसूख ने पुलिस की जांच, सरकारी वकील की दलीलें और चश्मदीद गवाहों को अपनी जेब में रख लिया था। आज अंतिम फैसला सुनाया जाना था। जज साहब ने अपना हथौड़ा उठाया ही था कि अचानक कोर्ट का भारी दरवाजा एक झटके के साथ खुला।

‘छन्न!’

एक तेज आवाज ने अदालत की मर्यादा को भंग कर दिया। फर्श पर मिट्टी के हजारों टुकड़े बिखर गए थे। वहां कोई अपराधी नहीं, बल्कि फटे-हाल कपड़ों में 13 साल का एक बालक खड़ा था—शंकर। उसके पैरों में चप्पल नहीं थी, धूल से सने हुए पांव और पसीने से भीगा चेहरा। लेकिन उसकी आंखों में एक ऐसी चमक थी जिसे देखकर जज साहब का हाथ हवा में ही रुक गया।

भाग 2: मासूमियत का विद्रोह

सुरक्षाकर्मी उसे पकड़ने के लिए दौड़े, “ऐ लड़के! यह क्या बदतमीजी है? बाहर निकल!”

लेकिन शंकर ने किसी की परवाह नहीं की। वह तेजी से दौड़ते हुए जज की कुर्सी के ठीक सामने जा खड़ा हुआ। उसने अपनी मुट्ठियां भींच रखी थीं। फर्श पर बिखरे हुए एक-दो रुपये के सिक्कों की खनखनाहट अभी भी कानों में गूंज रही थी।

जज श्रीवास्तव ने अपना चश्मा उतारा और भारी आवाज में पूछा, “कौन हो तुम? और यह क्या तमाशा है? क्या तुम्हें पता नहीं यह अदालत है?”

शंकर की आवाज में सिसकियां थीं, लेकिन शब्द चट्टान की तरह मजबूत थे। उसने मेज पर बिखरे सिक्कों की ओर इशारा किया और चिल्लाकर कहा, “जज साहब! गिनिए इन्हें! पूरे 843 रुपये हैं। मैंने सुना है कि यहां इंसाफ बिकता है। ठाकुर साहब ने शायद लाखों दिए होंगे मेरे बाबा को चोर साबित करने के लिए। मेरे पास बस यही है। बताइए, क्या इतने में इंसाफ मिल जाएगा? या मुझे थोड़ा और काम करना पड़ेगा?”

पूरे कोर्ट रूम में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे किसी ने सबकी सांसें रोक दी हों। कटघरे में खड़ा दीनानाथ फूट-फूटकर रोने लगा, “बेटा… चुप हो जा… यह क्या कर रहा है?”

शंकर नहीं रुका। उसने रोते हुए अदालत की ओर मुखातिब होकर कहा, “क्यों चुप रहूं बाबा? दो महीने से मैं देख रहा हूं। जो सच है वो चुप है, और जो झूठ है वो दहाड़ रहा है। वकील साहब कह रहे थे कि बड़े लोगों से लड़ने के लिए बड़ा पैसा चाहिए। मैं पिछले दो महीने से सुबह अखबार बांटता हूं, दिन भर चाय की दुकान पर जूठे गिलास धोता हूं और रात को स्टेशन पर बोझा उठाता हूं। यह उन रातों की नींद और मेरे हाथों के छालों की कीमत है।” उसने अपने नन्हे हाथ फैला दिए जो साबुन और पानी से गल चुके थे।

भाग 3: न्याय की कसौटी पर व्यवस्था

सरकारी वकील मेहता अपनी सीट से उछल पड़े, “माय लॉर्ड! यह भावनाओं का खेल है। यह लड़का कोर्ट का समय बर्बाद कर रहा है। इसे तुरंत हिरासत में लिया जाना चाहिए।”

जज श्रीवास्तव ने मेहता को शांत रहने का इशारा किया। उन्हें महसूस हुआ कि आज उनके सामने कोई मामूली केस नहीं है। आज न्याय का तराजू एक तरफ दौलत को तौल रहा था और दूसरी तरफ एक बच्चे के विश्वास को।

जज ने कोमलता से पूछा, “बेटा, तुम्हें किसने बताया कि न्याय बिकाऊ है?”

शंकर ने अपनी कमीज की आस्तीन से आंखें पोंछीं और ठाकुर गजराज सिंह की ओर उंगली उठाई, जो अगली कतार में सफेद कुर्ता-पायजामा पहने शान से बैठा था। “इनके आदमियों ने कहा था। उन्होंने कहा था कि दीनानाथ को जेल में सड़ना होगा क्योंकि उनके पास शहर के सबसे बड़े वकील हैं और पुलिस उनकी जेब में है। उन्होंने हमारी झोपड़ी मांगी थी, क्योंकि वहां मॉल बनाना है। बाबा ने मना कर दिया क्योंकि वहां मेरी मां की यादें हैं।”

जज ने गौर किया कि ठाकुर के चेहरे पर पहली बार शिकन आई थी। जज साहब ने क्लर्क को आदेश दिया, “आज की कार्यवाही को नए सिरे से शुरू किया जाए। मैं इस केस की फाइल दोबारा देखूंगा और हर गवाह का क्रॉस-एग्जामिनेशन खुद करूंगा।”

भाग 4: झूठ के महलों का ढहना

अगले चार घंटों तक अदालत में जो हुआ, वह शहर के इतिहास में दर्ज हो गया। जज साहब ने सबसे पहले उस इंस्पेक्टर को बुलाया जिसने दीनानाथ को गिरफ्तार किया था।

“इंस्पेक्टर राणे,” जज ने कड़क कर पूछा, “आपने रिपोर्ट में लिखा है कि चोरी दोपहर 2 बजे हुई और आपने दीनानाथ को 2:15 पर गिरफ्तार कर लिया। क्या आप बता सकते हैं कि 15 मिनट में आपने शिकायत दर्ज की, हुलिया पहचाना और ट्रैफिक जाम के बावजूद उसे पकड़ भी लिया? क्या आपके पास उड़ने वाला रिक्शा है?”

इंस्पेक्टर राणे हकबका गए। उनके पास कोई जवाब नहीं था। इसके बाद उस गवाह को बुलाया गया जिसने कहा था कि उसने दीनानाथ को भागते देखा था। जब जज ने उससे भागने की दिशा और दीनानाथ के रिक्शे के नंबर के बारे में बारीकी से पूछा, तो वह गवाह बुरी तरह फंस गया।

जैसे-जैसे शाम ढलती गई, ठाकुर गजराज सिंह का साम्राज्य ढहने लगा। भयभीत इंस्पेक्टर राणे ने आखिरकार हाथ जोड़ लिए, “माफ कीजिए हुजूर! मुझ पर दबाव था। ठाकुर साहब ने धमकी दी थी कि अगर दीनानाथ को अंदर नहीं किया तो मेरा तबादला किसी नक्सली इलाके में करवा देंगे।”

अदालत में मौजूद भीड़ ने तालियां बजानी शुरू कर दीं। न्याय का मंदिर अब वास्तव में जाग उठा था।

भाग 5: अंतिम फैसला और एक नई शुरुआत

जज श्रीवास्तव ने अपना अंतिम फैसला सुनाया। दीनानाथ को बाइज्जत बरी किया गया। इंस्पेक्टर राणे को निलंबित कर दिया गया और ठाकुर गजराज सिंह के खिलाफ जालसाजी, झूठे सबूत गढ़ने और एक गरीब को प्रताड़ित करने का मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया गया।

लेकिन कहानी का सबसे भावुक हिस्सा अभी बाकी था।

जज साहब अपनी ऊंची कुर्सी से नीचे उतरे। वे सीधे शंकर के पास गए। पूरा कोर्ट रूम यह देखकर हैरान था कि एक हाई कोर्ट का जज एक गरीब बच्चे के सामने झुका हुआ था। जज साहब ने अपने हाथों से फर्श पर बिखरे उन सिक्कों को बटोरना शुरू किया। वकील, क्लर्क और यहां तक कि पुलिस वाले भी इस काम में जुट गए।

सारे सिक्के एक साफ रुमाल में बांधकर जज साहब ने शंकर के हाथों में रखे। उनकी आंखों में नमी थी। उन्होंने कहा, “बेटा, आज तुमने इस बूढ़े जज को याद दिला दिया कि मैं इस कुर्सी पर क्यों बैठा हूं। तुम्हारी गुल्लक ने आज वो कर दिखाया जो कानून की बड़ी-बड़ी किताबें नहीं कर पाईं।”

उन्होंने अपनी जेब से कुछ कड़क नोट निकाले और उस रुमाल में रख दिए। “यह मेरी तरफ से तुम्हारी अगली पढ़ाई के लिए। वादा करो कि अगली बार जब तुम गुल्लक फोड़ोगे, तो वह किसी वकील की फीस के लिए नहीं, बल्कि अपनी कॉलेज की पढ़ाई के लिए होगी। मैं चाहता हूं कि तुम खूब पढ़ो और एक दिन इसी कुर्सी पर बैठो।”

भाग 6: वक्त का पहिया—15 साल बाद

पंद्रह साल का समय बीत चुका था। शहर बदल गया था, सड़कें चौड़ी हो गई थीं और पुरानी अदालत की इमारत की जगह एक आधुनिक बिल्डिंग बन गई थी। लेकिन उस दिन का किस्सा आज भी लोगों की जुबान पर था।

हाई कोर्ट में आज एक नए युवा जज का शपथ ग्रहण समारोह था। वह युवक अपनी सादगी और तेज बुद्धि के लिए जाना जाता था। जब वह मुख्य न्यायाधीश के सामने शपथ लेने के लिए खड़ा हुआ, तो दर्शक दीर्घा में एक बूढ़ा व्यक्ति बैठा था, जिसकी आंखों से गर्व के आंसू बह रहे थे। वह दीनानाथ था।

उस युवा जज का नाम था—जस्टिस शंकर दीनानाथ।

शपथ लेने के बाद, जब शंकर अपनी केबिन में गया, तो उसने अपनी मेज पर एक विशेष चीज रखी। वह कोई महंगी मूर्ति या पेपरवेट नहीं था। वह कांच के एक बक्से में रखा हुआ मिट्टी का एक पुराना टुकड़ा था—उसकी उसी पुरानी गुल्लक का एक हिस्सा, जिसने उसे न्याय का मार्ग दिखाया था।

उस दिन शंकर ने अपना पहला केस सुना। कटघरे में एक गरीब परिवार खड़ा था और सामने एक रसूखदार बिल्डर। शंकर ने अपनी कलम उठाई और न्याय का वही हथौड़ा चलाया जिसकी गूंज उसने बचपन में सुनी थी।

आज न्याय बिकाऊ नहीं था। आज न्याय के मंदिर में एक ऐसा रक्षक बैठा था जिसने खुद अपनी गुल्लक की मिट्टी से अपनी तकदीर लिखी थी।

उपसंहार

न्याय केवल कानून की धाराओं में नहीं, बल्कि उस विश्वास में होता है जो एक आम आदमी व्यवस्था पर रखता है। शंकर की कहानी हमें सिखाती है कि सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं। एक छोटी सी मिट्टी की गुल्लक ने यह साबित कर दिया कि जब साहस और ईमानदारी साथ हो, तो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को भी घुटने टेकने पड़ते हैं।

— समाप्त —