10 साल बाद लौटा फौजी: राम मंदिर की सीढ़ियों पर भीख मांगती मिली पत्नी

अध्याय 1: सरयू के तट पर एक नई सुबह
अयोध्या की पावन धरती, जहाँ सरयू नदी का कलकल बहता पानी सदियों से मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की गाथा गाता आ रहा है। शाम का वक्त था, सूरज अपनी अंतिम किरणों को समेटकर क्षितिज के पीछे छिपने की तैयारी कर रहा था। आसमान में नारंगी और सिंदूरी रंग बिखरा हुआ था और पूरे शहर में मंदिरों की घंटियों की गूंज सुनाई दे रही थी। हवा में चंदन, कपूर और फूलों की खुशबू थी और हर जुबान पर बस एक ही नाम था— ‘जय श्री राम’।
इसी भीड़ में अयोध्या रेलवे स्टेशन से बाहर निकला एक शख्स, जिसकी चाल में थकान तो थी पर आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसका नाम था मेजर विक्रम सिंह। विक्रम के शरीर पर इस वक्त भारतीय सेना की वर्दी नहीं थी, वह साधारण कपड़ों में था। लेकिन उसका कड़क बदन, चौड़ी छाती और चेहरे का तेज साफ़ बता रहा था कि यह कोई आम आदमी नहीं है। उसके कंधे पर एक पुराना बैग था। वह 10 साल बाद अपने वतन, अपनी मिट्टी पर लौटा था।
10 साल… कहने को तो सिर्फ दो शब्द हैं, लेकिन विक्रम के लिए ये 10 सदियों के बराबर थे। 10 साल पहले कश्मीर के एक बर्फीले तूफान और दुश्मन की घुसपैठ के दौरान विक्रम लापता हो गए थे। सेना ने उन्हें शहीद मान लिया था, सरकारी फाइलों में उनके नाम के आगे ‘शहीद’ का ठप्पा लग चुका था। लेकिन दुश्मन की कैद में, काल कोठरी के अंधेरे में विक्रम ने सिर्फ एक ही उम्मीद के सहारे सांस ली थी— “मुझे वापस जाना है। अपनी सुमन के लिए, अपने रामलला के दर्शन के लिए।”
अध्याय 2: यादों का झरोखा और मिलन की आस
स्टेशन से बाहर निकलते ही विक्रम ने एक ऑटो वाले को रोका। “भैया, पहले हनुमानगढ़ी ले चलो, फिर राम मंदिर। 10 साल बाद आया हूँ, पहले भगवान के दर्शन करूँगा फिर घर जाकर अपनी सुमन को सरप्राइज दूँगा।”
रिक्शे पर बैठते ही विक्रम की आँखों में वह मंजर तैर गया जब वह आखिरी बार छुट्टी पर आया था। सुमन, उसकी नई-नवेली दुल्हन, लाल जोड़े में सजी, हाथों में गहरी मेहंदी लगाए। उसने विक्रम से वादा लिया था— “आप जल्दी लौटेंगे ना? मैं इसी देहरी पर दिया जलाकर आपका इंतज़ार करूँगी।”
विक्रम के होठों पर एक फीकी मुस्कान आ गई। उसने सोचा, “सुमन को तो यकीन भी नहीं होगा कि उसका विक्रम ज़िंदा है। उसे लगा होगा मैं मर चुका हूँ। आज जब मैं उसके सामने खड़ा होऊँगा, तो पगली खुशी से पागल हो जाएगी।”
हनुमानगढ़ी में बजरंगबली के दर्शन करने के बाद विक्रम नवनिर्मित और भव्य राम मंदिर की ओर बढ़ा। मंदिर की भव्यता देखकर उसकी आँखें भर आईं। जिस मंदिर के लिए पीढ़ियों ने त्याग किया, आज वह उसके सामने साकार खड़ा था। उसने माथा टेका और बुदबुदाया— “हे राम! आपने मुझे मौत के मुँह से बचाया। बस अब मेरे परिवार को खुश रखना। मेरी सुमन जहाँ भी हो, सही सलामत हो।”
अध्याय 3: नियति का क्रूर मजाक
दर्शन करके विक्रम जब मंदिर के निकास द्वार (एग्जिट गेट) की सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था, तो वहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी। एक तरफ अमीर लोग थे जो छप्पन भोग का प्रसाद चढ़ा रहे थे और दूसरी तरफ सीढ़ियों के किनारे धूल में बैठे वे बदनसीब लोग थे, जिनके लिए इस भव्यता के बीच भी पेट भरना मुश्किल था।
विक्रम का दिल हमेशा से फौजियों वाला नरम था। उसने अपनी जेब से 100-100 के कुछ नोट निकाले और कतार में बैठे गरीबों को देने लगा। “जय सियाराम बाबूजी!” “भगवान सुखी रखे बेटा!”
दुआएं मिल रही थीं, और विक्रम आगे बढ़ता गया। तभी सीढ़ियों के एकदम आखिरी कोने पर, एक खंभे की ओट में सिकुड़कर बैठी एक औरत पर उसकी नज़र पड़ी। वह बाकी भिखारियों जैसी नहीं थी। उसने किसी से पैसे नहीं मांगे, न ही कटोरा आगे किया। वह बस घुटनों में सिर दिए बैठी थी। उसके कपड़े जगह-जगह से फटे हुए थे, बाल उलझे हुए थे और चेहरा धूल से सना हुआ था।
लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि वह धीरे-धीरे कुछ गुनगुना रही थी। विक्रम के कदम अचानक ठिठक गए। उस आवाज़ में एक जाना-पहचाना दर्द था। वह औरत गा रही थी— “रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई…”
विक्रम का दिल ज़ोर से धड़का। यह चौपाई, यह धुन… यह तो वही थी जो सुमन अक्सर शादी के बाद गुनगुनाया करती थी। विक्रम ने खुद को समझाया, “नहीं, यह मेरा वहम है। मेरी सुमन तो घर पर होगी, रानी की तरह।”
लेकिन एक फौजी की छठी इंद्री कुछ और ही कह रही थी। विक्रम धीरे-धीरे उस औरत के पास गया। उसने 500 का एक नोट निकाला और उसके सामने रखे टूटे मिट्टी के बर्तन में डाल दिया। “माजी, ये पैसे रख लो, कुछ खा लेना।”
उस आवाज़ को सुनकर उस औरत के शरीर में एक सिहरन दौड़ी। उसने धीरे से अपना सिर उठाया। मंदिर की रोशनी सीधे उसके चेहरे पर पड़ी। पिचके हुए गाल, आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे, लेकिन उन आँखों का रंग… भूरा था। और बाईं आँख के ठीक नीचे वही छोटा सा तिल!
विक्रम के हाथ से उसका बैग छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। उसके पैरों तले से अयोध्या की ज़मीन खिसक गई। “सुमन…!”
अध्याय 4: पत्थर भी पिघल गए
विक्रम के गले से एक रुंधी हुई आवाज़ निकली। औरत ने उस नाम को सुना, उसकी पथराई आँखों में एक पल के लिए हलचल हुई। उसने फटी हुई नज़रों से उस शख्स को देखा। 10 साल का वक्त और चेहरे पर दाढ़ी… शायद वह पहचान नहीं पा रही थी।
विक्रम घुटनों के बल वहीं कीचड़ और धूल में बैठ गया। उसने कांपते हाथों से सुमन के कंधों को पकड़ा। “सुमन! देख मुझे… मैं हूँ, तेरा विक्रम! मैं वापस आ गया हूँ सुमन!”
सुमन ने ‘विक्रम’ नाम सुनते ही एक चीख मारी। वह डरी हुई थी, वह पीछे खिसकने लगी। “नहीं! नहीं! मुझे मत मारो… मैंने कुछ नहीं किया… साहब मुझे मत मारो!” वह हाथ जोड़कर कांपने लगी।
यह दृश्य देखकर विक्रम का कलेजा फट गया। उसकी सुमन, जो कभी तेज़ आवाज़ से डरती थी, आज अपने पति को देखकर भीख मांग रही है कि उसे मारा न जाए। विक्रम ने तड़प कर उसे अपनी छाती से लगा लिया। “कौन मारेगा तुझे? किसकी हिम्मत है? मैं आ गया हूँ सुमन, तेरा फौजी लौट आया है!”
जब विक्रम के गर्म आँसू सुमन के गालों पर गिरे, तो उसकी याददाश्त के बंद दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने कांपती उंगलियों से विक्रम का चेहरा छुआ। “विक्रम…? आप… आप तो मर गए थे…” सुमन बुदबुदाई और फिर वह दहाड़ें मारकर रोने लगी। आसपास भीड़ जमा हो गई। लोग हैरान थे कि एक फौजी अफसर जैसा दिखने वाला आदमी एक भिखारिन को गले लगाकर क्यों रो रहा है।
अध्याय 5: विश्वासघात की गाथा
विक्रम तुरंत सुमन को लेकर अस्पताल पहुँचा। डॉक्टरों ने बताया कि वह कुपोषण और गहरे सदमे में है। जब उसे होश आया, तो उसने वह काला सच उगलना शुरू किया जिसने विक्रम के भीतर के फौजी को ‘महाकाल’ बना दिया।
सुमन ने बताया, “विक्रम, आपके जाने के बाद बाबूजी सदमे में चल बसे। आपके चचेरे भाई बलवंत ने आपकी शहादत की खबर मिलते ही अपनी आँखें फेर लीं। उसने जाली वसीयत बनवाई और सारी ज़मीन जायदाद हड़प ली। उसने माँ (विक्रम की माँ) को वृद्धाश्रम में फेंक दिया और मुझे घर की नौकरानी बना दिया। जब मैंने विरोध किया, तो उसने मुझे पागल घोषित कर दिया और मारने की कोशिश की। मैं अपनी जान बचाकर यहाँ अयोध्या भाग आई और पिछले कई सालों से इसी इंतज़ार में यहाँ भीख मांगकर गुज़ारा कर रही थी कि शायद राम जी कोई चमत्कार करेंगे।”
विक्रम की आँखों में खून उतर आया। जिस भाई को उसने कंधे पर बिठाया था, उसी ने उसके परिवार को सड़क पर ला दिया?
अध्याय 6: न्याय का तांडव
विक्रम ने माँ को वृद्धाश्रम से निकाला और उन्हें सुरक्षित किया। फिर वह पहुँचा अपने गाँव। रात का वक्त था, बलवंत हवेली में जश्न मना रहा था। जैसे ही विक्रम ने हवेली का दरवाज़ा तोड़ा, बलवंत को लगा उसने भूत देख लिया है।
“विक्रम…! तू ज़िंदा है?” बलवंत का शराब का गिलास गिर गया। विक्रम ने एक शब्द नहीं बोला। बलवंत के गुंडे लाठियाँ लेकर आए, लेकिन वे भूल गए थे कि वे एक ‘पैरा कमांडो’ से भिड़ रहे थे। 5 मिनट के भीतर हवेली का आँगन चीखों से गूंज उठा। विक्रम ने बलवंत को गले से पकड़ा और ज़मीन पर पटक दिया।
“संपत्ति तो मेरी है ही बलवंत, लेकिन जो अपमान तूने मेरी माँ और पत्नी का किया है, उसका हिसाब तेरा खून चुकाएगा!” विक्रम ने उसे जान से नहीं मारा, क्योंकि मौत एक आसान सज़ा थी। उसने अपने रसूख और कानून का इस्तेमाल किया। बलवंत और उसके साथियों को पुलिस घसीटते हुए ले गई। जाली वसीयत, धोखाधड़ी और घरेलू हिंसा के केस में उनका जीवन अब जेल की सलाखों के पीछे कटना तय था।
अध्याय 7: रामराज की वापसी
अगले दिन सुबह, अयोध्या के राम मंदिर में फिर से घंटियाँ बज रही थीं। लेकिन आज नज़ारा अलग था। मंदिर की सीढ़ियों पर अब कोई भिखारिन नहीं थी। वहाँ मेजर विक्रम सिंह अपनी पूरी वर्दी में खड़े थे, उनकी छाती पर मेडल चमक रहे थे। उनके एक तरफ उनकी बूढ़ी माँ थी और दूसरी तरफ सुमन।
सुमन ने आज सुंदर साड़ी पहनी थी, माथे पर बड़ा सा सिंदूर था। विक्रम ने रामलला का प्रसाद लिया और सबसे पहले सुमन को खिलाया। मंदिर के बाहर मीडिया और भीड़ को संबोधित करते हुए विक्रम ने कहा: “देश की रक्षा करना मेरा धर्म है, लेकिन जो फौजी सरहद पर खड़ा है, उसके परिवार की रक्षा करना इस समाज का धर्म है। मेरी पत्नी का भीख मांगना मेरी नहीं, इस सिस्टम की हार थी। आज राम जी ने मुझे घर वापस भेजा है, ताकि मैं अपना रामराज खुद स्थापित कर सकूँ।”
भीड़ ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए। विक्रम ने सुमन का हाथ कसकर पकड़ा और अपनी जीप में बैठाया। जीप धूल उड़ाती हुई उनके असली घर की तरफ बढ़ गई, जहाँ अब सिर्फ खुशियाँ और सम्मान इंतज़ार कर रहे थे।
शिक्षा: अन्याय चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य और प्रेम की शक्ति के सामने उसे झुकना ही पड़ता है।
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