कूड़ा बीनने वाले लड़के ने भूखे साधु को खिलाई आख़िरी रोटी… सच जानकर अमीर आदमी शर्म से झुक गए
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कूड़ा बीनने वाले लड़के ने भूखे साधु को खिलाई आख़िरी रोटी… सच जानकर अमीर आदमी शर्म से झुक गए
वाराणसी, घंटियों की गूंज, मंत्रों की आवाज और काशी विश्वनाथ मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे एक भूखे साधु ने उस दिन एक ऐसा दृश्य देखा, जिसने न केवल उसकी भूख को मिटाया, बल्कि सैकड़ों अमीरों को शर्मिंदा कर दिया। यह कहानी न केवल दान और इंसानियत की है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाती है कि असली मूल्य पैसे से नहीं, दिल से होता है।
भिखारी साधु की हालत:
काशी विश्वनाथ मंदिर के बाहर हर दिन की तरह भारी भीड़ थी। सैकड़ों लोग मंदिर के दर्शन करने आए थे। कुछ लोग अपनी मनोकामनाओं के साथ पहुंचे थे, तो कुछ सिर्फ दान देने के लिए। लेकिन मंदिर के मुख्य द्वार के दोनों तरफ लंबी सीढ़ियां थीं, जिन पर कई भिखारी, साधु और अपाहिज लोग बैठे थे। इनमें से एक साधु बाबा दयाशरण थे, जो काशी के प्रसिद्ध बाबा थे। उनका शरीर कांप रहा था, और उनकी लंबी सफेद दाढ़ी और सूखी आंखें उनकी उम्र और संघर्ष की गवाही दे रही थीं। कभी वे बाबा लोगों से आशीर्वाद लेते थे, लेकिन अब वे तीन दिनों से भूखे थे।
आज उनका हाल और भी खराब था। होठ सूख चुके थे, आंखों में अंधेरा सा छा रहा था। उन्होंने धीरे से हाथ उठाया और एक गुजरते आदमी से कहा, “बेटा, कुछ खाने को दे दो।” आदमी ने सुना, लेकिन उसे अनसुना कर दिया और आगे बढ़ गया। इस दौरान उसी भीड़ में से थोड़ा दूर, मंदिर के पीछे वाली गली में एक लड़का कूड़े में कुछ ढूंढ रहा था। वह लड़का अर्पित था, जिसकी उम्र मुश्किल से 17 या 18 साल थी।

अर्पित का जीवन संघर्ष:
अर्पित दुबला-पतला था, उसके कपड़े पुराने थे, और उसके पैरों में टूटी चप्पलें थीं। उसकी तीन पहियों वाली रिक्शा के पास वह कूड़ा छांटने में व्यस्त था। उसका जीवन कठिन था। उसके पास घर नहीं था, न ही कोई परिवार था। फुटपाथ ही उसका बिस्तर था और आसमान ही उसकी छत। लेकिन इस कठिनाई के बावजूद, अर्पित की आंखों में डर नहीं था। उसकी जिंदगी के संघर्षों ने उसे एक मजबूत और आत्मनिर्भर इंसान बना दिया था।
उस दिन अर्पित को कूड़े में एक सूखी रोटी मिली। उसके चेहरे पर चमक आ गई, क्योंकि तीन दिनों से उसने भी पेट भरकर खाना नहीं खाया था। उसने रोटी को झाड़ा, कपड़े से साफ किया और मंदिर की दीवार से टिक कर बैठ गया। जैसे ही वह पहला निवाला तोड़ने लगा, उसकी नजर सामने पड़ी। सीढ़ियों पर बैठे बाबा दयाशरण पर, जिनकी हालत बहुत खराब थी। बाबा का हाथ कांपते हुए उठ चुका था। वे रोटी की भीख मांग रहे थे।
रोटी का टुकड़ा:
अर्पित का हाथ रोटी के टुकड़े पर था, लेकिन उसकी नजरें बाबा की तरफ गईं। बाबा का शरीर कांप रहा था, होठ सूख चुके थे, और आंखों में दर्द और थकान साफ दिख रही थी। रोटी का टुकड़ा अर्पित के हाथ में था, लेकिन उसका ध्यान अब रोटी पर नहीं, बल्कि बाबा पर था। उसके दिल में इंसानियत और भूख के बीच की लड़ाई शुरू हो गई।
उसने रोटी की तरफ देखा और फिर बाबा की तरफ। एक अजीब सी लड़ाई उसके मन में चल रही थी। पेट बनाम दिल, भूख बनाम इंसानियत। उसने रोटी को अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया, लेकिन फिर उसे महसूस हुआ कि अगर उसने रोटी खा ली, तो बाबा की भूख का दर्द हमेशा उसके साथ रहेगा। उसने गहरी सांस ली और रोटी के टुकड़े को अपने मुंह तक ले जाने के बजाय धीरे से उठकर बाबा के पास बढ़ गया।
दान का फैसला:
अर्पित ने कांपते हाथों से रोटी बाबा की तरफ बढ़ा दी। बाबा ने रोटी की तरफ देखा, फिर अर्पित की तरफ। उनकी आंखों में आंसू थे। उन्होंने रोटी को लिया और मुंह में डाल लिया। जैसे ही पहला कौर उनके मुंह में गया, उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। अर्पित चुपचाप वहां खड़ा रहा। पेट में भूख मरोड़ रही थी, लेकिन दिल में एक अजीब सी शांति थी। वह जानता था कि उसने जो किया, वह किसी कीमत पर नहीं बदला जा सकता।
विक्रम मल्होत्रा का दान और शर्म:
मंदिर में उस दिन एक और बड़ा दान हुआ था। विक्रम मल्होत्रा, जो एक अमीर उद्योगपति थे, अपनी चमचमाती कार से मंदिर पहुंचे। वह दान देने के लिए प्रसिद्ध थे और हमेशा मीडिया के सामने फोटो खिंचवाने के लिए आते थे। उन्होंने मंदिर के पंडित हरिदास से माला पहनाई, दान का चेक दिया और फोटो खिंचवाया। भीड़ ताली बजा रही थी, लेकिन किसी ने देखा नहीं कि मंदिर की सीढ़ियों पर एक साधु भूखा बैठा था। विक्रम को यह दृश्य दिखाई दिया। उन्होंने देखा कि एक लड़का, जो खुद कूड़ा बिनने वाला था, उसी साधु को रोटी खिला रहा था।
विक्रम ने कुछ पल तक यह दृश्य देखा और फिर धीमे से पूछा, “यह क्या हो रहा है?” पास खड़े एक आदमी ने बताया, “यह लड़का कूड़ा बिनता है, लेकिन अपनी रोटी इस साधु को दे दी।” विक्रम का चेहरा बदल गया। वह समझ गए कि उनके लाखों का दान उस एक सूखी रोटी के सामने कुछ भी नहीं था। विक्रम ने धीरे-धीरे उस लड़के के पास जाकर अपनी जेब से नोट निकाले और उसे देने की कोशिश की। लेकिन अर्पित ने हाथ पीछे कर लिया और कहा, “नहीं साहब, मैंने बाबा को दे दिया। बस वही ठीक था।”
बाबा दयाशरण का संदेश:
बाबा ने अर्पित की ओर देखा और उसके सिर पर हाथ रखा। फिर उन्होंने विक्रम मल्होत्रा की ओर देखा और कहा, “बेटा, तूने आज मुझे रोटी नहीं, जीवन दिया है।” विक्रम मल्होत्रा की आंखों में आंसू थे। वह समझ गए कि असली दान किसी के पैसे से नहीं, दिल से होता है। बाबा ने सभी को एक गहरी सीख दी, “दान से बड़ा धर्म भूखे को रोटी देना है।”
अंतिम सीख और बदलाव:
कुछ महीनों बाद मंदिर में भोजन सेवा शुरू हो गई। विक्रम मल्होत्रा ने अपनी गलती सुधारते हुए अब न केवल पैसे से, बल्कि दिल से दान देना शुरू किया। उन्होंने कूड़ा बिनने वाले लड़के अर्पित को एक नया जीवन दिया। अब अर्पित खाना बांटने का काम करता था और लोग उसे सम्मान से “बाबा का सेवक” बुलाते थे।
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि असली अमीरी पैसे में नहीं, इंसानियत में है। शिवा जैसे छोटे से लड़के ने हमें दान का असली अर्थ समझाया।
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