7 साल बाद IPS बना पति… रास्ते में पत्नी फटेहाल फल बेच रही थी, उसके पैरों में गिरकर रो पड़ा, फिर

त्याग की प्रतिमूर्ति: एक आईपीएस और फलवाली की महागाथा

पूरे सात साल बीत चुके थे। शहर की आबोहवा बदली थी, सड़कें चौड़ी हो गई थीं, लेकिन यादें आज भी उसी मोड़ पर खड़ी थीं जहाँ से सात साल पहले एक नौजवान अपने सपनों की पोटली बाँधकर निकला था। आज शहर का नया पुलिस कप्तान, अपनी लाल बत्ती वाली गाड़ी के सायरन की गूँज के साथ जब मुख्य बाज़ार में उतरा, तो वक्त जैसे ठहर गया। वर्दी की कड़क, कंधों पर चमकते सितारे और चेहरे पर अनुशासन का ओज—रवि को देखकर पूरा बाज़ार गर्व से भर गया। लेकिन नियति ने पर्दे के पीछे कुछ ऐसा लिख रखा था जिसकी कल्पना रवि ने कभी सपने में भी नहीं की थी।

संघर्ष की नीव और सपनों का बीजारोपण

रवि एक बेहद होनहार छात्र था। एक छोटे से गाँव के गरीब किसान परिवार में जन्मा रवि, जिसकी आँखों में हमेशा आसमान छूने की तमन्ना रहती थी। उसके पिता एक स्वाभिमानी किसान थे, लेकिन एक लंबी बीमारी ने उन्हें असमय ही छीन लिया। पिता की मौत के बाद घर की छत जैसे गिर गई। माँ बीमार रहने लगी और खेत की उपज इतनी ही थी कि दो वक्त की रोटी मुश्किल से जुट पाती थी। रवि को अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी। वह हल चलाने लगा, पसीना बहाने लगा, लेकिन रात को जब वह पुरानी किताबों के पन्ने पलटता, तो उसकी आँखों की नमी मिट्टी की महक में मिल जाती।

उसी दौरान उसकी शादी सुमन से हुई। सुमन, जो साधारण घर की लड़की थी, लेकिन उसकी समझदारी असाधारण थी। शादी के कुछ ही दिनों बाद सुमन ने रवि की आँखों के उस खालीपन को पढ़ लिया। उसने देखा कि रवि दिन भर खेत में मेहनत करता है, लेकिन रात के अंधेरे में उसकी रूह किताबों के बीच सुकून तलाशती है।

एक पूर्णिमा की रात, रवि छत पर अकेला बैठा चाँद को निहार रहा था। सुमन पास आई और धीमे स्वर में पूछा, “क्या बात है जी? आप सोते क्यों नहीं?” रवि ने एक ठंडी आह भरी, “कुछ नहीं सुमन, बस ये हल और बैल की दुनिया ही अब मेरा नसीब है। कभी सोचा था कि आईपीएस बनकर देश की सेवा करूँगा, पर अब तो माँ की दवा और घर का खर्चा ही मेरी दुनिया है।”

अगली सुबह सुमन ने वह किया जिसने इस प्रेम कहानी को एक महान गाथा में बदल दिया। उसने अपनी शादी की साड़ी पहनी और अपनी अलमारी से वह छोटी सी पोटली निकाली जिसमें उसके गहने थे—कंगन, चेन और छोटी सी अंगूठी। उसने रवि के सामने वह पोटली रख दी।

“यह क्या है सुमन?” रवि ने चौंककर पूछा। सुमन ने दृढ़ता से कहा, “यह आपके सपनों की चाबी है। आप शहर जाइए, दिल्ली जाइए। मुझे एक हारा हुआ किसान पति नहीं, बल्कि एक जीता हुआ अफसर चाहिए। गहने तो मिट्टी हैं, आपके सपने हीरा हैं।”

रवि की आँखों में आँसू आ गए, उसने बहुत मना किया, “पगली, ये गहने तुम्हारी सुरक्षा हैं, अगर मैं चला गया तो माँ का क्या होगा? खेती कौन करेगा?” सुमन ने उसके हाथ थामे और कहा, “घर की चिंता मत कीजिए। मैं खेत में काम करूँगी, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाऊँगी, पर आपकी तपस्या भंग नहीं होने दूँगी।”

दिल्ली की तपस्या और गाँव का वनवास

रवि भारी मन से दिल्ली चला गया। शुरुआत के दो साल तक सब ठीक रहा। सुमन नियमित रूप से उसे पैसे भेजती रही। रवि को लगता था कि गाँव में खेती अच्छी हो रही है। वह दिन-रात पढ़ाई में लगा रहा। लेकिन गाँव की हकीकत पत्थर पिघला देने वाली थी।

गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। कुएँ सूख गए, खेत दरक गए। सुमन ने हिम्मत नहीं हारी। उसने दूसरों के खेतों में मज़दूरी शुरू की। इसी बीच रवि की माँ की हालत बिगड़ने लगी। डॉक्टर ने कहा कि बड़े अस्पताल में ऑपरेशन होगा, वरना उन्हें बचाना मुश्किल है। सुमन के सामने दो पहाड़ थे—एक तरफ पति का सपना और दूसरी तरफ सास की जान।

उसने रवि को फोन किया, लेकिन उसकी आवाज़ में एक शिकन भी नहीं आने दी। “हाँ जी, सब ठीक है। माँ सो रही हैं, फसल बहुत अच्छी हुई है, बस आप अपनी परीक्षा पर ध्यान दो।” फोन रखते ही सुमन फूट-फूटकर रोती। उसने घर के बर्तन बेचे, अपनी आखिरी निशानी भी बेच दी, पर पैसे कम पड़ गए। गाँव के निर्दयी साहूकार ठाकुर ने उसकी बेबसी का फायदा उठाया और घर-जमीन गिरवी रखवा ली। माँ को बचाया न जा सका, और सुमन पूरी तरह अकेली हो गई।

ठाकुर ने उसे घर से निकाल दिया। सुमन अब एक टूटी हुई झोपड़ी में रहने लगी। भीषण गरीबी ने उसे तोड़ दिया, पर उसका संकल्प नहीं टूटा। उसने तय किया कि वह रवि को अपनी हालत नहीं बताएगी। “अगर उसे पता चला, तो वह सब छोड़कर आ जाएगा और उसकी सात साल की मेहनत बेकार हो जाएगी,” वह खुद से कहती। उसने शहर के बाज़ार में फलों का ठेला लगाना शुरू कर दिया। फटी साड़ी, नंगे पैर और धूप में झुलसा हुआ चेहरा—सुमन अब एक बेनाम फलवाली बन चुकी थी।

वो ऐतिहासिक मिलन: बाज़ार का दृश्य

सात साल बाद रवि का चयन हो गया। उसने पूरे देश में टॉप किया था। ट्रेनिंग खत्म होने के बाद उसकी पोस्टिंग उसी ज़िले में हुई जहाँ उसका गाँव था। रवि ने सोचा कि वह बिना बताए घर पहुँचकर सुमन को सरप्राइज़ देगा।

आज रवि का काफिला बाज़ार से गुज़र रहा था। अचानक ट्रैफिक की वजह से गाड़ी धीमी हुई। रवि की नज़र सड़क किनारे एक फटे हाल महिला पर पड़ी जो ठेले को धकेल रही थी। उसके पैरों में चप्पल नहीं थी और वह एक ग्राहक से दो रुपयों के लिए विनती कर रही थी।

“ले लीजिए भैया, सुबह से कुछ नहीं बिका, दो वक्त की रोटी का सवाल है।”

वह आवाज़! वह स्वर रवि के अंतर्मन को चीरता हुआ निकला। “सुमन?” रवि का दिल ज़ोर से धड़का। उसने फौरन गाड़ी रुकवाई। पुलिस वाले हैरान थे। रवि दौड़कर उस ठेले के पास पहुँचा। जैसे ही उसने उस महिला का चेहरा देखा, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह कोई और नहीं, उसकी सुमन थी—उसकी अर्द्धांगिनी, जिसने उसे अफसर बनाने के लिए खुद को मिटा दिया था।

वर्दी और स्वाभिमान का संगम

रवि की आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उसने बिना किसी की परवाह किए, अपनी पुलिस की टोपी उतारी और बीच बाज़ार में अपनी पत्नी के धूल भरे पैरों में अपना सिर रख दिया। पूरा शहर स्तब्ध था। एक ज़िला पुलिस कप्तान एक फलवाली के पैरों में गिरकर बच्चों की तरह रो रहा था।

“सुमन… ये क्या हाल बना रखा है? तुम तो कहती थी सब ठीक है!” रवि का गला रुंध गया था। सुमन घबरा गई, “साहब, उठिए! लोग देख रहे हैं, आपकी वर्दी गंदी हो जाएगी।”

रवि ने दहाड़ते हुए कहा, “भाड़ में जाए ऐसी वर्दी जो अपनी पत्नी के आँसू न पोंछ सके! तुमने मुझे साहब बना दिया और खुद फुटपाथ पर आ गईं?”

रवि ने अपनी पत्नी को गोद में उठाया और अपनी सरकारी गाड़ी की पिछली सीट पर बैठाया। उसने उन छालों को देखा जो सुमन के पैरों में नंगे चलने से पड़े थे। उसने अपने हाथों से उन पैरों को साफ किया। उस दिन बाज़ार ने कानून का नहीं, प्रेम का असली रूप देखा।

इंसाफ का दिन: ठाकुर का अंत

अगले दिन रवि अपनी पूरी फोर्स के साथ अपने गाँव पहुँचा। गाँव वाले दंग थे। रवि की आँखों में न्याय की आग थी। वह सीधा ठाकुर की हवेली पर पहुँचा। ठाकुर, जो रवि की ज़मीन पर कब्ज़ा किए बैठा था, पुलिस को देखकर काँपने लगा।

रवि ने उसे कॉलर से पकड़कर घसीटा और सुमन के सामने खड़ा किया। “ठाकुर, याद है जब यह तुम्हारे पास माँ के इलाज के लिए आई थी और तुमने इसे धक्का दिया था? आज देखो, इसके चरणों में गिरे हुए गिरवी कागज़ात मुझे वापस चाहिए।”

ठाकुर के हाथ से हुक्का गिर गया। उसने सुमन के पैरों में गिरकर माफी माँगी। रवि ने न सिर्फ अपना घर और जमीन वापस ली, बल्कि ठाकुर की तिजोरी से उन सभी गरीबों के कागज़ भी बरामद किए जिन्हें उसने लूटा था। रवि ने उस दिन कानून की ताकत का सही इस्तेमाल किया।

उपसंहार

रवि और सुमन वापस अपने पुराने घर में लौटे। रवि ने सरकारी बंगला छोड़कर अपनी पत्नी के साथ उसी गाँव में रहने का फैसला किया। उसने गाँव में महिलाओं के लिए एक शिक्षा केंद्र खोला जिसका नाम रखा ‘सुमन प्रेरणा केंद्र’।

यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता केवल मेहनत से नहीं, बल्कि किसी के निस्वार्थ त्याग और अटूट विश्वास से मिलती है। गरीबी इंसान को तोड़ सकती है, लेकिन अगर जीवनसाथी सुमन जैसा हो, तो वह इंसान को राख से उठाकर सितारों तक पहुँचा सकता है। आज भी उस ज़िले में रवि की ईमानदारी और सुमन के त्याग के किस्से सुनाए जाते हैं।

शिक्षा: प्रेम का अर्थ केवल साथ रहना नहीं है, बल्कि एक-दूसरे के सपनों को जीना और उन्हें पूरा करने के लिए खुद को आहुति बना देना है।

समाप्त