फौजी पति ने कर दिया कारनामा/पत्नी गलत रास्ते पर चल पड़ी थी/

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विश्वासघात का खूनी अंत: प्लासनी गांव की दास्तां

अध्याय 1: एक फौजी का स्वाभिमान

राजस्थान के जोधपुर जिले का प्लासनी गांव अपनी शांति के लिए जाना जाता था। यहाँ रहने वाला गुलाब सिंह भारतीय सेना का एक अनुशासित जवान था। उसने सरहद पर पसीना बहाकर अपने परिवार के लिए 6 एकड़ जमीन और एक शानदार मकान बनाया था। घर के सामने दो दुकानें उसकी भविष्य की पूंजी थीं। गुलाब सिंह स्वभाव से सीधा और मेहनती था, लेकिन उसका रंग गहरा काला था।

उसकी पत्नी शिवानी गांव की सबसे खूबसूरत महिलाओं में से एक थी। सुंदरता के घमंड और गुलाब सिंह के फौज में रहने के कारण आए अकेलेपन ने शिवानी को एक गलत रास्ते पर धकेल दिया था। वह अपने पति को पसंद नहीं करती थी और अक्सर गैर मर्दों के बारे में सोचा करती थी। उनका 10 साल का बेटा गुलशन इस सब से अनजान अपनी दुनिया में मस्त रहता था।

अध्याय 2: दिवाली के ताले और राहुल का प्रवेश

अक्टूबर 2025 में जब गुलाब सिंह दिवाली की छुट्टी पर घर आया, तो वह खुश था। उसने दुकानों के लिए शहर से मजबूत ताले खरीदे। मजाक-मजाक में उसने शिवानी से कहा, “ये तीसरा ताला तुम्हारे लिए लाया हूँ।” गुलाब का इशारा वफादारी की तरफ था, पर शिवानी ने इसे हंसी में उड़ा दिया।

तभी राहुल नाम का एक युवक दुकान किराए पर लेने आया। राहुल जवान और हैंडसम था। उसे देखते ही शिवानी का मन डोल गया। गुलाब के वापस ड्यूटी पर जाते ही, राहुल और शिवानी के बीच मर्यादा की सारी दीवारें टूट गईं। एक दिन छोटे गुलशन ने अपनी आँखों से राहुल को घर में देख लिया और चुपके से अपने पिता को फोन कर दिया।

अध्याय 3: फौजी की वापसी और नया नौकर

बेटे की बात सुनकर गुलाब सिंह बेचैन हो गया और 20 दिन की छुट्टी लेकर घर लौटा। उसने राहुल को दुकान से निकाल दिया। शिवानी ने सफाई दी कि राहुल ‘भाई जैसा’ है और बिजली ठीक करने आया था। गुलाब सिंह ने शक को दबा दिया और खेत के काम के लिए नीरज नाम के एक नए नौकर को रख लिया। नीरज मेहनती था, लेकिन वह भी शिवानी के जाल में फंस गया।

7 नवंबर 2025 की सुबह, जब गुलाब सिंह खेत पर था, नीरज बहाना बनाकर घर लौट आया। इत्तेफाक से, गुलाब सिंह अपने चाचा के साथ पैसे लेने घर पहुँचा। दरवाजा अंदर से बंद था। जब काफी देर बाद दरवाजा खुला, तो अंदर नीरज और शिवानी को संदिग्ध हालत में देखकर गुलाब सिंह की आँखों के सामने अंधेरा छा गया। उसने उस वक्त अपना गुस्सा काबू किया और दिमाग से काम लिया।

अध्याय 4: कयामत की रात (The Climax)

गुलाब सिंह ने नीरज को रात 9:30 बजे खेत में पानी देने के बहाने घर बुलाया। बेखबर नीरज जैसे ही अंदर आया, गुलाब सिंह ने मुख्य दरवाजा बंद कर लिया। उसकी आँखों में अब फौजी का वह रूप था जो दुश्मन को खत्म करने के लिए होता है।

गुलाब: “नीरज, तूने मेरे नमक और मेरी इज्जत, दोनों से गद्दारी की है।”

इससे पहले कि नीरज कुछ समझ पाता, गुलाब सिंह ने पास रखी तेज कुल्हाड़ी उठाई और एक ही वार में नीरज की गर्दन धड़ से अलग कर दी। घर की दीवारें खून से लाल हो गईं।

इसके बाद गुलाब सिंह अपनी पत्नी शिवानी के कमरे की ओर बढ़ा। शिवानी डर के मारे कांप रही थी। गुलाब ने उसे घसीटते हुए बाहर निकाला। उसने सुई और मोटा धागा उठाया। शिवानी की चीखों के बीच उसने उसके संवेदनशील अंगों की सिलाई कर दी—यह उसका अपनी पत्नी को दिया गया वह ‘तीसरा ताला’ था जिसका जिक्र उसने दिवाली पर किया था।

लेकिन गुलाब का प्रतिशोध यहीं नहीं रुका। गुस्से में पागल होकर उसने कुल्हाड़ी उठाई और अपनी पत्नी के भी टुकड़े-टुकड़े कर दिए। उसका 10 साल का बेटा गुलशन कोने में खड़ा होकर इस खौफनाक हत्याकांड का गवाह बना।

अध्याय 5: सरेंडर और कानून का शिकंजा

हत्याकांड को अंजाम देने के बाद, गुलाब सिंह ने दरवाजा खोला। बाहर पड़ोसियों की भीड़ जमा थी। वह बिना डरे सीधा थाने पहुँचा और खून से सनी कुल्हाड़ी मेज पर रख दी। उसने पुलिस को अपनी पूरी कहानी सुनाई।

पुलिस ने गुलाब सिंह को गिरफ्तार कर लिया और उस पर चार्जशीट दाखिल की। एक तरफ गांव के कुछ लोग उसे अपनी इज्जत बचाने वाला मान रहे थे, तो दूसरी तरफ कानून की नजर में वह एक अपराधी था जिसने खुद न्याय करने की कोशिश की।

अंतिम अध्याय: उजड़ा हुआ आशियाना और मासूम की सिसकियां

पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाती हुई गुलाब सिंह के घर के सामने खड़ी थीं। नीली-लाल बत्तियाँ उस आंगन को रोशन कर रही थीं जहाँ कभी खुशियों की दिवाली मनाई गई थी। पूरा प्लासनी गांव सन्नाटे में डूबा था, लेकिन वह सन्नाटा चीख-चीख कर उस रात की तबाही की गवाही दे रहा था।

हथकड़ियों में जकड़े गुलाब सिंह को जब पुलिस ले जाने लगी, तो उसकी नजर एक कोने में सिमटे गुलशन पर पड़ी। 10 साल का वह बच्चा, जिसके कपड़ों पर उसके अपने ही माता-पिता के खून के छींटे थे, पत्थर की मूरत बना खड़ा था। उसकी आँखों से आंसू भी सूख चुके थे—वह इतना डर गया था कि रोना भी भूल गया।

गुलाब सिंह के कदम ठिठक गए। एक फौजी, जिसने दुश्मनों की गोलियों के सामने कभी सिर नहीं झुकाया था, आज अपने बेटे की सूनी आँखों को देखकर फूट-फूट कर रो पड़ा। उसने भारी आवाज में कहा:

“बेटा, मुझे माफ कर देना। मैंने तेरी माँ को मार दिया और तेरे बाप को कानून ले जा रहा है। अब तेरा कोई नहीं रहा।”

गुलशन ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपने पिता के उन हाथों को देखा जिनसे कुछ देर पहले उसे प्यार मिला था और फिर उन्हीं हाथों से कत्ल हुआ था।

बिखरे हुए सपने

अगली सुबह जब सूरज निकला, तो प्लासनी गांव में मातम था। गुलाब सिंह का वह सुंदर घर, जिसे उसने अपनी मेहनत की एक-एक पाई से बनाया था, अब एक ‘क्राइम सीन’ बन चुका था। आंगन में गुलशन का वह खिलौना पड़ा था जो उसका पिता दिवाली पर लाया था, लेकिन अब वह खिलौना भी खून से सना था।

गुलशन को उसके चाचा सुंदर सिंह अपने साथ ले जाने आए। जब गुलशन घर की दहलीज पार कर रहा था, तो वह एक पल के लिए रुका और उस खाली दुकान की तरफ देखा जिसे उसके पिता ने खुशहाली के लिए बनाया था। उसने देखा कि दुकान पर वही ‘तीसरा ताला’ लटका था, जिसकी बात उसके पिता ने मजाक में की थी। वह ताला अब सिर्फ एक दुकान को नहीं, बल्कि एक बच्चे के बचपन और उसके भविष्य को हमेशा के लिए बंद कर चुका था।

एक अधूरी जिंदगी

आज वर्षों बीत चुके हैं। गुलाब सिंह जेल की सलाखों के पीछे अपनी सजा काट रहा है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी सजा जेल नहीं, बल्कि वह पछतावा है कि उसने अपनी इज्जत की खातिर अपने बेटे को अनाथ बना दिया।

गुलशन अब बड़ा हो गया है, पर वह आज भी किसी से ज्यादा बात नहीं करता। वह हर साल दिवाली पर दीये तो जलाता है, लेकिन उसके घर के कोनों में वह अंधेरा आज भी कायम है जो उस काली रात ने पैदा किया था। वह अक्सर गाँव के बाहर उस पुराने घर को देखने जाता है, जो अब खंडहर बन चुका है। लोग कहते हैं कि वह वहां अपनी माँ की ममता और पिता के स्वाभिमान की तलाश करता है, जो एक पल के गुस्से और एक पल की बेवफाई की भेंट चढ़ गए।