तलाक के 6 महीने बाद बच्चे को लौटाने पहुंची पत्नी घर की हालत देखकर रोने लगी|
अहंकार की हार और ममता की जीत: अजीत और संगीता की कहानी
1: अलीगढ़ का सुखी परिवार और खुशहाल शुरुआत
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में अजीत नाम का एक युवक रहता था। अजीत ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद एक प्रतिष्ठित कंपनी में अच्छी नौकरी हासिल कर ली थी। वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान था। अलीगढ़ में उनका अपना आलीशान मकान था और गांव में पुश्तैनी जायदाद। घर में सुख-सुविधा के तमाम साधन थे और काम के लिए नौकर-चाकर।
अजीत के माता-पिता ने उसके लिए एक सुंदर और सुशील लड़की की तलाश शुरू की। जल्द ही उनकी खोज ‘संगीता’ पर जाकर खत्म हुई। संगीता पास ही के एक गांव के किसान की बेटी थी। वह सादगी और घरेलू संस्कारों से भरपूर थी। अजीत और संगीता की शादी बड़े धूमधाम से हुई। संगीता जब पहली बार इस बड़े घर में आई, तो उसे लगा जैसे वह किसी सपने में आ गई हो। अजीत उससे बेइंतहा प्यार करता था और संगीता भी इस नए जीवन से बहुत खुश थी।
2: नन्हे मेहमान का आगमन और बदली जिम्मेदारियां
शादी के तीन साल सुख-शांति से बीत गए। एक दिन अचानक संगीता की तबीयत बिगड़ी और उसे उल्टियां होने लगीं। अजीत घबराकर उसे डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए खुशखबरी दी—”बधाई हो, आप पिता बनने वाले हैं।” यह खबर पूरे परिवार के लिए उत्सव जैसी थी।
समय बीता और संगीता ने एक सुंदर से बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया ‘यश’। यश के आने से घर की खुशियां दोगुनी हो गई थीं, लेकिन इसके साथ ही जिम्मेदारियां भी बढ़ गईं। संगीता रात-रात भर जागकर बच्चे को संभालती। अजीत भी अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर बच्चे की देखभाल में हाथ बंटाता था। हालांकि, बच्चे के जन्म के बाद संगीता का वजन थोड़ा बढ़ गया था, जो अक्सर प्रसव के बाद महिलाओं के साथ होता है।
3: एक ‘मजाक’ जो बन गया नासूर
अजीत संगीता से बहुत प्यार करता था, लेकिन कभी-कभी वह हंसी-मजाक में उसे ‘मोटी’ कहकर पुकारने लगा। शुरुआत में संगीता ने इसे नजरअंदाज किया, लेकिन जब अजीत ने बाहर के लोगों और दोस्तों के सामने भी उसे ‘मोटी’ कहना शुरू किया, तो संगीता के मन में कसक पैदा होने लगी।
एक रात यश बीमार था और संगीता पूरी रात उसे गोद में लिए टहलती रही। सुबह जब अजीत ऑफिस से आया, तो उसने सोफे पर बैठते ही कहा—”मोटी, मेरे लिए एक गिलास पानी लाओ।” यह सुनते ही संगीता के सब्र का बांध टूट गया। उसने गुस्से में कहा, “यह क्या लगा रखा है तुमने? क्या तुम्हें जरा भी शर्म नहीं है? मैं पूरी रात से जागी हुई हूँ और तुम्हें बस अपने पानी की चिंता है।”
अजीत को हैरानी हुई। उसने कहा, “मैं तो मजाक कर रहा था।” लेकिन संगीता का गुस्सा अब ज्वालामुखी बन चुका था। बहस बढ़ी और बात इतनी बिगड़ गई कि संगीता ने गुस्से में अजीत की तरफ हाथ उठाया। जवाब में अजीत ने भी उसे तमाचे जड़ दिए। यह शादी के इतिहास में पहली बार था जब बात हाथापाई तक पहुंची थी।
4: मायके की शरण और जिद की दीवार
गुस्से और अपमान से भरी संगीता ने अपना सामान पैक किया और यश को लेकर मायके चली गई। अजीत के माता-पिता ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं रुकी। मायके पहुंचकर उसने अपने माता-पिता को रो-रोकर सब बताया। संगीता के पिता ने उसे समझाया कि पति-पत्नी में झगड़े होते रहते हैं, लेकिन संगीता जिद पर अड़ गई—”जब तक वह खुद आकर माफी नहीं मांगेगा, मैं वापस नहीं जाऊंगी।”
इधर अजीत भी अपने अहंकार में चूर था। उसने सोचा कि गलती संगीता की है, इसलिए वह उसे मनाने नहीं गया। घर में यश के बिना सन्नाटा पसर गया। अजीत के माता-पिता इस गम में घुलने लगे कि उनके बेटे का घर उजड़ रहा है। इसी सदमे और बीमारी के चलते छह महीने के भीतर ही अजीत के माता-पिता इस दुनिया को छोड़कर चले गए।
5: तलाक का नोटिस और बिखरते रिश्ते
अकेलेपन और गुस्से में अजीत ने संगीता को तलाक का नोटिस भेज दिया। संगीता ने भी हार नहीं मानी और तलाक स्वीकार कर लिया। इसी बीच संगीता के पिता का भी निधन हो गया। अब संगीता अपने भाइयों के भरोसे थी। कोर्ट ने फैसला सुनाया और चूंकि यश अभी छोटा था, इसलिए उसकी कस्टडी संगीता को मिल गई।
यश को अपने पिता से अलग करना बहुत हृदयविदारक था। वह रोते हुए अपने पिता की तरफ भाग रहा था, लेकिन कोर्ट के आदेश के कारण संगीता उसे जबरदस्ती ले गई। संगीता को जो एलिमनी (गुजारे भत्ते) की रकम मिली, उसने वह अपने भाइयों को दे दी, यह सोचकर कि वह अब वहीं रहेगी।
6: अपनों का असली चेहरा
तलाक के छह महीने बीतते-बीतते संगीता को कड़वे अनुभवों का सामना करना पड़ा। उसके भाई, जिन्होंने पहले उसे बहुत सहारा दिया था, अब उसे बोझ समझने लगे। जब संगीता ने अपनी और यश की जरूरतों के लिए पैसे मांगे, तो भाई ने साफ कह दिया—”मेरे अपने भी बच्चे हैं, मैं तुम्हारा खर्च कब तक उठाऊंगा? जो पैसे तुमने दिए थे, वे खत्म हो गए।”
संगीता की मां ने उसे आईना दिखाया—”बेटी, पति का घर ही अपना घर होता है। यहाँ तू सिर्फ एक मेहमान है।” संगीता को अपनी गलती का अहसास होने लगा। उसे समझ आया कि उसका अहंकार उसे ले डूबा है। उसने सोचा कि अगर वह नौकरी करेगी, तो यश को कौन संभालेगा। अंत में उसने एक बड़ा फैसला लिया।
7: वह खटखटाहट और पुराना दरवाजा
तलाक के छह महीने बाद, एक सुबह अजीत के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। अजीत ने दरवाजा खोला तो सामने संगीता खड़ी थी, गोद में यश को लिए हुए। अजीत उसे देखता रह गया। वह बहुत कमजोर और उदास लग रही थी। संगीता ने बिना कुछ कहे यश को अजीत की गोद में थमा दिया और कहा—”यह लो अपना बच्चा, इसे तुम ही संभालो। मुझसे यह नहीं संभल रहा।”
अजीत ने उसे रोकने की कोशिश की—”अंदर तो आओ, चाय पीकर जाना।” संगीता मुड़ी और जाने लगी, लेकिन तभी पीछे से नन्हे यश की आवाज आई—”मम्मा, इधर आओ!” वह एक पुकार संगीता के कलेजे को चीर गई। उसके कदम वहीं ठहर गए।
8: खंडहर बन चुका घर और यादों की गूँज
यश की पुकार सुनकर संगीता फूट-फूटकर रोने लगी। अजीत उसे घर के अंदर ले गया। घर के अंदर का हाल देखकर संगीता की रूह कांप गई। जिस घर में कभी रौनक रहती थी, वह अब धूल और सन्नाटे से भरा था। अजीत अकेला था, उसने साफ-सफाई छोड़ दी थी। वह खुद भी बहुत कमजोर हो गया था।
अजीत ने कहा, “अब इस घर से तुम्हें क्या मतलब? यह तो मेरा घर है।” संगीता ने रोते हुए कहा, “मैं जानती हूँ यह तुम्हारा घर है, लेकिन क्या इसे ऐसे ही छोड़ दोगे?” दोनों ने बैठकर बात की। संगीता ने बताया कि कैसे भाइयों ने उसे ठुकरा दिया और अजीत ने बताया कि यश के बिना उसकी जिंदगी कितनी बेरंग हो गई थी।
9: अहंकार का अंत और पुनर्मिलन
अजीत ने धीमी आवाज में पूछा—”संगीता, क्या हम फिर से एक साथ नहीं रह सकते?” यह सुनते ही संगीता ने अजीत के पैर पकड़ लिए और माफी मांगी। अजीत ने उसे उठाकर गले लगाया और कहा, “गलती मेरी भी थी। अगर मैं अपना अहंकार छोड़ देता और तुम्हें मनाने आ जाता, तो शायद हमारे माता-पिता आज जीवित होते।”
दोनों ने अपने गिले-शिकवे मिटाए और फिर से एक होने का फैसला किया। संगीता फिर से उस घर की मालकिन बनी और वह घर दोबारा यश की किलकारियों से गूंज उठा।
निष्कर्ष: यह कहानी हमें सिखाती है कि रिश्तों में ‘मजाक’ की भी एक सीमा होती है और ‘अहंकार’ से बड़ा कोई शत्रु नहीं होता। समय रहते झुक जाना टूटने से बेहतर है।
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