“हमने आपका टिकट मेरी माँ को दे दिया, बच्चे उन्हें ज़्यादा पसंद करते हैं।” |

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माँ का असली सम्मान

प्रस्तावना

दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट की भीड़ में, एक महिला – रमा देवी – अपने परिवार के साथ खड़ी थी। उसके हाथ में चमड़े का फोल्डर था, जिसमें पाँच पासपोर्ट और यात्रा के सारे दस्तावेज थे। यह यात्रा सिर्फ एक छुट्टी नहीं थी, बल्कि उसके 60वें जन्मदिन का खास तोहफा थी, जिसे उसने अपने जीवन की सारी बचत से खरीदा था।

पिछले छह महीने से वह हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रख रही थी। उसने मालदीव के एक आलीशान रिसोर्ट में बुकिंग की थी, ताकि उसका बेटा, बहू, और दो पोते-पोतियाँ उसके साथ कुछ सुकून भरे पल बिता सकें। लेकिन उस दिन एयरपोर्ट पर, सब कुछ बदल गया।

परिवार की असली तस्वीर

रमा का बेटा, अजय, हमेशा की तरह अपने मोबाइल में खोया था। उसकी बहू, प्रिया, अपनी माँ सरोज के साथ फुसफुसा रही थी। सरोज, जो रमा की समधिन थी, बड़ी तड़क-भड़क वाली महिला थी, जिसे सोने के गहनों और दिखावे का शौक था। रमा ने उसे यात्रा के लिए आमंत्रित नहीं किया था, लेकिन वह एक बड़े सूटकेस के साथ वहाँ आ गई थी।

रमा को कुछ अजीब सा महसूस हुआ। उसकी अंतरात्मा कह रही थी कि कुछ गलत हो रहा है, लेकिन उसने खुद को समझाया कि यह उसका परिवार है, उसका अपना खून है।

टिकट की चोरी

जब चेक-इन का समय आया, प्रिया ने फुर्ती से पासपोर्ट एयरलाइन कर्मचारी को थमा दिए। रमा ने देखा कि उसके पासपोर्ट की जगह सरोज का पासपोर्ट दे दिया गया था। उसने शांत स्वर में पूछा, “प्रिया, शायद तुमसे गलती हो गई है। मेरा पासपोर्ट यहाँ है, तुमने अपनी माँ का दे दिया।”

प्रिया ने नकली सहानुभूति के साथ जवाब दिया, “माँजी, हमने आपस में चर्चा की है। सबकी भलाई के लिए इस बार मम्मी का जाना सही रहेगा। आपको तो आराम चाहिए।”

अजय ने भी सिर झुका लिया, “माँ, प्रिया सही कह रही है। आपके लिए ये यात्रा थकाऊ होगी। बच्चों को नानी के साथ ज्यादा मजा आएगा।”

रमा ने महसूस किया कि उसके अपने बेटे ने उसका साथ छोड़ दिया है। उसका परिवार, जिस पर उसने अपना सब कुछ न्योछावर किया था, आज उसे एक बटुए से ज्यादा कुछ नहीं समझता।

आत्मसम्मान की आवाज

रमा ने गहरी साँस ली। उसने होटल की बुकिंग, ट्रांसफर, इंश्योरेंस के सारे दस्तावेज निकाल लिए और काउंटर पर रख दिए। “जब आपने सब तय कर लिया है, तो मैं आपके रास्ते में नहीं आऊँगी।” उसने कहा और बिना पीछे मुड़े एयरपोर्ट के बाहर निकल गई।

उसने अपना फोन निकाला और अपने पर्सनल बैंकर को कॉल किया। “अब वह समय आ गया है। मेरी संपत्ति के प्रबंधन की रणनीति बदलनी है,” उसने कहा।

परिवार की असली हालत

रमा ने अपने बेटे और बहू के बैंक कार्ड की लिमिट शून्य कर दी, रिसोर्ट की पेमेंट को विवादित घोषित कर दिया। जब अजय ने फ्लाइट में कार्ड स्वाइप किया, तो ट्रांजैक्शन रिजेक्ट हो गया। मालदीव पहुँचने पर होटल की बुकिंग रद्द थी। उन्हें साधारण कमरे मिले, और अगले दिन उन्हें होटल छोड़ना पड़ा।

सरोज ने अपने सूटकेस से पैसे निकाले, लेकिन उसने सिर्फ अपनी टिकट खरीदी और सबको छोड़कर चली गई। अजय और प्रिया छोटे से लॉज में रहने लगे, बच्चों के लिए खाना भी मुश्किल हो गया।

सच्चाई का सामना

रमा ने वीडियो कॉल पर अपने बेटे को समझाया, “पिछले दस साल में मैंने तुम पर करोड़ों रुपए खर्च किए, लेकिन सम्मान और प्यार के बदले तिरस्कार मिला।” उसने प्रिया की चोरी भी उजागर की – बच्चों के फंड से पैसे निकालकर महंगे बैग खरीदे गए थे।

अजय और प्रिया के बीच झगड़ा शुरू हो गया। सरोज ने सबको दोष देना शुरू कर दिया। बच्चे भूखे थे, और परिवार सड़क पर आ गया।

नया जीवन

दो हफ्ते बाद, रमा अपने दोस्तों के साथ इटली जा रही थी। उसका घर बिक चुका था, अजय ने किराए पर एक छोटा सा कमरा लिया, प्रिया ब्यूटी पार्लर में काम करने लगी, और सरोज ने खुद को अपने घर में बंद कर लिया।

रमा ने अपने बेटे के मैसेज का जवाब नहीं दिया। उसने अपनी आजादी और सम्मान वापस पा लिया था।

उपसंहार

रमा देवी की कहानी हमें सिखाती है कि सम्मान माँगा नहीं जाता, बल्कि अपने सीमाओं को तय करके कमाया जाता है। परिवार के नाम पर अपना आत्मसम्मान खोना कभी सही नहीं है। माँ का प्यार असीमित हो सकता है, लेकिन उसकी कीमत समझना जरूरी है।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो जरूर बताइए – क्या रमा देवी का फैसला सही था? या वह कुछ ज्यादा कठोर हो गई? आपके विचार हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं।

शिक्षा:
सम्मान और रिश्तों में संतुलन जरूरी है। माँ का प्यार सबसे बड़ा है, लेकिन उसकी उपेक्षा करना, उसे केवल एक साधन समझना, अंत में सबकुछ छीन सकता है। अपने आत्मसम्मान को कभी मत खोइए, क्योंकि वही आपकी असली पहचान है।