इंसानियत अभी जिंदा है
शाम का वक्त था। दिल्ली का भीड़भाड़ वाला बाज़ार, शोर-शराबा, गाड़ियों के हॉर्न और धूल के गुबार के बीच एक कमजोर बुज़ुर्ग लड़खड़ाता हुआ चल रहा था। उसके कपड़े धूल से सने थे, पैर कांप रहे थे और माथे से खून बह रहा था। शायद उसे चक्कर आया था या फिर ज़िंदगी की थकान ने उसे ज़मीन पर गिरा दिया। वह सड़क के किनारे गिर पड़ा, जहां रोज़ सैकड़ों लोग गुजरते थे।
बुज़ुर्ग ने हाथ उठाने की कोशिश की, लेकिन आवाज़ नहीं निकल पाई। आंखों में मदद की पुकार थी, मगर कोई नहीं रुका। कुछ लोगों ने नज़रें फेर लीं, कुछ ने मज़ाक बना दिया और किसी ने तो मोबाइल निकालकर फोटो तक खींच ली। बुज़ुर्ग के कांपते हाथ मानो कह रहे थे—“मैं जिंदा हूं, बस थक गया हूं।”
उसी वक्त सड़क के उस पार चौदह साल का पिंटू अपने छोटे-से चाय के ठेले पर बैठा था। दो कटोरी बिस्कुट और उधार की एक केतली ही उसकी दुनिया थी। स्कूल वह नहीं जाता था, मगर परिवार का पेट भरने के लिए सुबह से शाम तक चाय बेचता था। उसकी नज़र अचानक उस बुज़ुर्ग पर पड़ी। पहले तो उसने सोचा कि शायद नशे में होगा, मगर फिर दिल बेचैन हो उठा।
पिंटू ने ठेला छोड़कर दौड़ लगाई और बुज़ुर्ग के पास पहुंचा। “बाबा… बाबा, सुनिए… आप ठीक हैं?” उसकी आवाज़ में डर था, लेकिन अपनापन भी। उसने अपना गमछा निकालकर बुज़ुर्ग के सिर के नीचे रखा और मदद के लिए इधर-उधर देखने लगा। भीड़ अब भी तमाशा देख रही थी।
पिंटू भागकर अपने ठेले से टूटा-फूटा मोबाइल निकाला और एक ऑटो बुलाया। ऑटो वाला पहले मना कर दिया—“कौन झंझट मोल ले?” लेकिन पिंटू ने अपनी जेब से पांच सौ का नोट निकालकर कहा—“ले जा अंकल, बस क्लिनिक तक। यह मेरी पूरी कमाई है, बाबा को बचा लो।” ऑटो वाला मान गया।

बड़ी मुश्किल से पिंटू ने बुज़ुर्ग को खींच-खींचकर ऑटो में बैठाया और क्लिनिक पहुंचा। रिसेप्शन पर डॉक्टर से गुहार लगाई, मगर जवाब मिला—“कौन है यह? कोई पहचान पत्र है?” डॉक्टर ने लापरवाही से कहा—“भिखारी लगता है, घरवाले लाओ वरना इलाज नहीं होगा।”
पिंटू हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। आंखों में आंसू थे, लेकिन आवाज़ में हिम्मत—“डॉक्टर साहब, अगर आपके बच्चे सड़क पर गिरे होते और कोई उन्हें छोड़ देता तो आप भगवान को जवाब दे पाते?” डॉक्टर चुप हो गया। कुछ क्षण का सन्नाटा रहा और फिर उसने कहा—“ठीक है, अंदर ले चलो। जिम्मेदारी तुम्हारी होगी।”
तीन घंटे बाद बुज़ुर्ग की आंखें खुलीं। उन्होंने पिंटू को देखा और कांपती आवाज़ में पूछा—“कौन हो बेटा?” पिंटू ने मुस्कुराकर कहा—“मैं पिंटू हूं, चाय बेचता हूं। आपको सड़क पर देखा तो अस्पताल ले आया।” बुज़ुर्ग की आंखें भर आईं—“सब छोड़ गए, तू क्यों रुक गया?” पिंटू धीरे से बोला—“आपको देखकर दादाजी याद आ गए। मैंने वादा किया था, अगर दोबारा किसी बाबा को देखूंगा तो अकेला नहीं छोड़ूंगा।”
डॉक्टर अब सम्मान से बोला—“इलाज हो गया है। शुक्र है इस बच्चे का।” बुज़ुर्ग ने कहा—“बहादुरी इसने की है। आजकल लोग अपनों को भी छोड़ देते हैं, इसने एक अजनबी को इंसान समझा।”
अगली सुबह जब पिंटू अपने ठेले पर काम कर रहा था, तभी एक काली एसयूवी उसके सामने आकर रुकी। उसमें से वही बुज़ुर्ग उतरे, इस बार सजे-धजे कपड़ों में। सब चौंक गए जब उन्होंने कहा—“मैं श्रीनिवास राव हूं, इंडिया हेल्थ केयर फाउंडेशन का चेयरमैन और पूर्व सर्जन। कल इस बच्चे ने मेरी जान बचाई। आज से यह मेरा बेटा है। इसकी पढ़ाई और सपने अब मेरी जिम्मेदारी हैं।”
भीड़ ने ताली नहीं बजाई, बस सर झुका लिए, क्योंकि सबको याद आया कि उन्होंने भी उस बुज़ुर्ग को सड़क पर पड़ा देखा था मगर कोई नहीं रुका था।
पिंटू को नए कपड़े मिले, स्कूल का दरवाज़ा पहली बार उसके लिए खुला। श्रीनिवास जी हर रोज़ उसे समझाते—“गरीबी कभी रोक नहीं सकती बेटा, बस हिम्मत चाहिए।” धीरे-धीरे पिंटू पढ़ाई में अच्छा करने लगा और evenings में श्रीनिवास जी से इंसानियत और रिश्तों पर बातें करता।
एक दिन पिंटू ने पूछा—“बाबा, आप सड़क पर क्यों गिरे थे?” श्रीनिवास जी चुप हो गए। फिर बोले—“अपने ही लोगों ने धोखा दिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाई थी, सब छोड़ दिया। लगा कि इस दुनिया को अब मेरी जरूरत नहीं। उस दिन हार मानने ही वाला था, मगर तू आ गया और मुझे याद दिलाया कि इंसानियत अभी जिंदा है।”
समय बीतता गया। पिंटू अब स्कूल जा रहा था, नए दोस्त बने थे। एक दिन श्रीनिवास जी ने उसे एक कमरे में बुलाया। दीवार पर लिखा था—“नई रोशनी फाउंडेशन – इंसानियत जिंदा है, बस तलाश चाहिए।”
श्रीनिवास जी ने कहा—“यह संस्था हम दोनों मिलकर चलाएंगे। तू अब मेरा सहायक नहीं, उत्तराधिकारी है।”
पिंटू की आंखें नम थीं—“लेकिन बाबा, मैं तो बस एक चाय वाला था…”
श्रीनिवास जी ने कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराए—“नहीं बेटा, अब तू एक मिसाल है। इंसान को बड़ा बनने के लिए बड़ा नाम नहीं चाहिए, बड़ा दिल चाहिए।”
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