भूंख से तडफ रहा अनाथ बच्चा करोड़पति के घर में रोटी मांगने पहुंचा, फिर आगे जो हुआ..
दिल्ली की भीड़-भाड़ वाली गलियों में एक बुज़ुर्ग दंपत्ति रहते थे – शरद बाबू और उनकी पत्नी मालती। दोनों ने जीवन में सुख-दुख सब देखा था। बड़ा घर, अच्छा कारोबार और नाम था। पर उनकी सबसे बड़ी पीड़ा थी कि उनकी कोई संतान नहीं थी।
शुरुआत में लोग कहते थे – “अरे, समय के साथ सब हो जाएगा।” पर साल दर साल बीतते गए। दवाइयाँ, पूजा-पाठ, डॉक्टर – सब कुछ आज़मा लिया गया। लेकिन भगवान ने उनके झोली में संतान का सुख नहीं डाला।
समय बीतता गया और अब दोनों की उम्र साठ से ऊपर हो चली थी। कारोबार भी बेचकर वे शांत जीवन जी रहे थे। पर उनके दिल का खालीपन बढ़ता ही जा रहा था। अक्सर मालती रातों को जागती और सोचती – “अगर मेरा भी एक बेटा होता, तो आज घर हंसी से गूंज रहा होता।”
एक अनचाही मुलाक़ात
एक शाम, जब शरद बाबू पार्क में टहल रहे थे, अचानक उन्होंने देखा कि झाड़ियों के पास एक छोटा बच्चा बैठा था। उसके कपड़े मैले थे, आंखों में थकान और चेहरे पर भूख साफ झलक रही थी। बच्चा पास आकर बोला –
“दादा जी, एक रोटी मिल जाएगी क्या? दो दिन से भूखा हूँ।”
शरद बाबू का दिल पिघल गया। वे बच्चे को घर ले आए। मालती ने भी उसे देखा और तुरंत खाना परोसा। बच्चा बड़े चाव से खाने लगा। खाते-खाते उसकी आंखों से आंसू बह निकले।
मालती ने धीरे से पूछा – “बेटा, तुम्हारा नाम क्या है? कहां रहते हो?”
बच्चा बोला – “मेरा नाम रोहन है। मैं स्टेशन के पास सोता हूँ। मां-बाप नहीं हैं। जो लोग पहले मुझे साथ रखते थे, उन्होंने मुझे छोड़ दिया। अब कोई अपना नहीं है।”
ये सुनकर दोनों दंपत्ति की आंखें भर आईं। उन्होंने एक-दूसरे की तरफ देखा। जैसे किस्मत ने खुद उनके घर में एक संतान भेज दी हो।

नई शुरुआत
धीरे-धीरे रोहन उनके साथ ही रहने लगा। वह छोटा था, पर बहुत समझदार। सुबह उठकर घर का छोटा-मोटा काम कर देता, फिर शरद बाबू के साथ टहलने जाता। मालती उसे नए कपड़े लाकर देतीं, अच्छा खाना खिलातीं।
रोहन की आदतों और मासूमियत ने उनका दिल जीत लिया। अब घर की रौनक लौट आई थी। मालती उसे प्यार से “बेटा” कहकर बुलातीं और रोहन सचमुच अपनी मां की गोद में सुकून पाता।
कुछ ही हफ्तों में उसने स्कूल जाना शुरू किया। पहली बार जब उसने किताब खोली तो आंखों में चमक आ गई। वह पढ़ाई में बहुत तेज निकला। टीचर भी उसकी मेहनत की तारीफ करने लगे।
समाज की बातें
लेकिन मोहल्ले के लोग फुसफुसाने लगे –
“देखो, कोई खून का रिश्ता नहीं है, फिर भी ऐसे पाल रहे हैं।”
“क्या पता कल को यही बच्चा इन्हें छोड़कर चला जाए।”
ये ताने मालती को चुभते, पर शरद बाबू हमेशा कहते –
“लोगों की सोच छोटी होती है। असली रिश्ता खून का नहीं, दिल का होता है।”
रोहन भी सब समझता था। उसने मन ही मन ठान लिया कि वह कभी इन्हें दुख नहीं देगा।
समय का इम्तिहान
साल बीतते गए। रोहन बड़ा हो गया। पढ़ाई में इतना अच्छा था कि स्कॉलरशिप मिल गई। कॉलेज में उसका नाम रोशन हुआ। खेलों और बहसों में भी वह आगे रहा।
एक दिन कॉलेज में प्रतियोगिता हुई – *विषय था “मेरा परिवार
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