आखिर एक पागल को आर्मी चीफ ने सैलूट क्यों किया? वजह जान कर हैरान रह जाओगे
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शहीद जो जिंदा लौट आया: मेजर विक्रम की अनकही दास्तान
अध्याय 1: घंटाघर का ‘पागल’
दोपहर के ठीक 3:00 बज रहे थे। उत्तर भारत के एक छोटे से शहर का सबसे व्यस्त इलाका, घंटाघर चौक, भट्टी की तरह तप रहा था। जून की लू ऐसी चल रही थी मानो हवा भी आग उगल रही हो। तारकोल की सड़कें पिघल रही थीं और लोग छांव ढूंढते हुए बदहवास भाग रहे थे। हर चेहरा चिड़चिड़ाहट और थकान से भरा हुआ था।
इसी चौराहे के एक कोने में, एक कूड़े के ढेर के पास, एक आदमी जमीन पर बैठा था। उसके बाल बिखरे हुए और धूल से अटे थे। शरीर पर एक फटी-पुरानी मैली कमीज थी जिसके बटन गायब थे। उसकी आंखों में एक अजीब सी खोई हुई चमक थी और वह लगातार अपने होठों पर कुछ अनजाने शब्द बुदबुदा रहा था। शहर के लोग उसे ‘पागल’ कहते थे। बच्चे उसे देखकर पत्थर मारते, और दुकानदार उसे अपनी दुकान से दूर भगाने के लिए गालियां देते।
चौराहे पर राकेश मिश्रा की फल की दुकान थी। राकेश अपने तुनकमिजाजी और गुस्से के लिए मशहूर था। गर्मी की वजह से उसका पारा सातवें आसमान पर था। तभी उसकी दुकान के पास एक सड़ा हुआ केला गिरा। उस ‘पागल’ आदमी ने, जो शायद कई दिनों से भूखा था, धीरे से अपना हाथ उस केले की तरफ बढ़ाया।
“अरे ओ पागल! पीछे हट!” राकेश की आवाज पूरे चौराहे में गूंज गई। “गंदगी फैला रहा है यहाँ, भाग यहाँ से वरना डंडा पड़ेगा!”
वह आदमी रुका। उसने डरा हुआ चेहरा नहीं बनाया, बल्कि उसकी आंखों में एक बिजली सी कौंधी। वह धीरे-धीरे सीधा खड़ा हो गया। देखते ही देखते उसकी झुकी हुई कमर तन गई, एड़ियां आपस में जुड़ गईं और हाथ माथे तक जाकर एक कड़क सैल्यूट में तब्दील हो गया।
“जय हिंद सर! दुश्मन सीमा पर है, हम पीछे नहीं हटेंगे!” उसकी आवाज में एक ऐसी दृढ़ता थी जिसने पल भर के लिए शोर को शांत कर दिया।
राकेश और आसपास के लड़के ठहाके मारकर हंस पड़े। “देखो भाई, यह तो पागल फौजी है! रोज यही ड्रामा करता है। खुद को बॉर्डर पर समझता है।” तभी एक लड़के ने सड़क से पत्थर उठाकर उसकी ओर फेंका। पत्थर सीधा उसके माथे पर लगा और खून की एक पतली लकीर बह निकली। लेकिन उस आदमी ने न तो कराह की, और न ही सैल्यूट तोड़ा। वह एक चट्टान की तरह अडिग रहा।
अध्याय 2: फटे तिरंगे की इज्जत
कुछ देर बाद वह आदमी चुपचाप वहां से हट गया और चौराहे के बीचों-बीच लगे एक बिजली के खंभे के पास चला गया। उस खंभे पर किसी ने 26 जनवरी के दिन एक छोटा सा प्लास्टिक का तिरंगा बांधा था। अब वह झंडा फट चुका था और हवा के थपेड़ों से नीचे गिरने ही वाला था।

अचानक वह आदमी दौड़ा। जैसे ही झंडा खंभे से छूटकर जमीन की तरफ गिरा, उसने दोनों हाथों से उसे बीच में ही थाम लिया। उसकी आंखों में आंसू थे। उसने अपनी फटी कमीज के सबसे साफ हिस्से से उस धूल भरे झंडे को पोंछा। उसके लिए वह केवल प्लास्टिक का टुकड़ा नहीं था, वह उसकी आत्मा थी। उसने बड़े प्यार से उस झंडे को मोड़कर अपनी फटी जेब में रख लिया।
तभी सायरनों की तेज आवाज सुनाई देने लगी। यह पुलिस की गाड़ी नहीं थी। यह भारतीय सेना का काफिला था। शहर को पता था कि आज नए लेफ्टिनेंट जनरल विनोद शर्मा का दौरा है। पुलिस ने तुरंत रास्ता खाली करवाना शुरू कर दिया।
इंस्पेक्टर राठौड़ अपनी जीप से उतरे और उनकी नजर उसी ‘पागल’ पर पड़ी। “ए पागल! दिखाई नहीं देता? बड़े साहब आ रहे हैं, उधर गटर के पास जाकर बैठ!” उन्होंने उसे जोर से धक्का दिया। वह आदमी लड़खड़ाया, लेकिन फिर से सीधा खड़ा होकर इंस्पेक्टर को सैल्यूट किया— “सर, मिशन पूरा हुआ। रिपोर्टिंग फॉर ड्यूटी, सर!”
अध्याय 3: जब समय ठहर गया
काफिला करीब आया। सबसे आगे मिलिट्री पुलिस की बुलेट और पीछे काली चमचमाती टाटा सफारी थी जिस पर तीन सितारे चमक रहे थे। गाड़ी में बैठे थे लेफ्टिनेंट जनरल विनोद शर्मा—भारतीय सेना के सबसे जांबाज और सख्त अफसरों में से एक।
जैसे ही गाड़ी उस आदमी के पास से गुजरी, उसने भीड़ को चीरते हुए एक बार फिर कड़क सैल्यूट मारा। जनरल शर्मा की नजर उस पर पड़ी। उन्होंने कुछ देखा—उस आदमी का हाथ, जिस पर एक पुराना गहरा जख्म था, और उसकी आंखों का वह जुनून जो किसी आम इंसान में नहीं हो सकता।
“गाड़ी रोको!” जनरल शर्मा ने चिल्लाकर कहा।
ब्रेक की आवाज से पूरा चौराहा दहल गया। इंस्पेक्टर राठौड़ डर गए। वे दौड़कर आए, “सर, आई एम सॉरी! यह पागल है, मैं इसे अभी हटवा देता हूँ।”
लेकिन जनरल शर्मा गाड़ी से नीचे उतर चुके थे। उनके भारी बूटों की आवाज खामोश सड़क पर गूंज रही थी। वे उस ‘पागल’ के बिल्कुल सामने जाकर खड़े हो गए। वह आदमी अब भी सैल्यूट में था।
जनरल शर्मा की आवाज कांप गई— “मेजर विक्रम?”
नाम सुनते ही उस आदमी के शरीर में जैसे करंट दौड़ गया। उसकी धुंधली यादों के जाले फटने लगे। उसने सामने खड़े अफसर को पहचाना। उसके होंठ कांपे— “कोड नेम… तूफान… मिशन लाहौर…”
अगले ही पल, देश का सबसे सख्त जनरल, जो कभी नहीं रोया था, उस ‘पागल’ को गले लगाकर फूट-फूटकर रो पड़ा। पूरी भीड़ सन्न रह गई।
अध्याय 4: 10 साल का नरक
जनरल शर्मा ने भीड़ की तरफ मुड़कर दहाड़ते हुए कहा— “तुम्हें पता है यह कौन है? यह भारतीय सेना की पैरा स्पेशल फोर्सेस के मेजर विक्रम सिंह राठौर हैं! कारगिल युद्ध के वो हीरो जिन्होंने अकेले 10 सैनिकों को मार गिराया था। हमें खबर मिली थी कि वे एक गुप्त मिशन के दौरान शहीद हो गए, लेकिन सच यह है कि वे दुश्मन की जेलों में 10 साल तक सड़ते रहे।”
जनरल की आवाज में गुस्सा और दर्द दोनों था। “10 साल तक दुश्मन ने उनके नाखून निकाले, उन्हें करंट दिया, उनका मानसिक संतुलन तोड़ दिया ताकि वे देश का राज बता दें। लेकिन मेजर विक्रम ने अपना मुंह नहीं खोला। दुश्मन ने जब देखा कि वे टूट चुके हैं और अपनी पहचान भूल गए हैं, तो उन्हें ‘पागल’ समझकर बॉर्डर पर छोड़ दिया। और मेरे देश के लोगों ने अपने ही हीरो को पत्थर मारे और उसे गटर के पास बैठने को कहा?”
पूरा चौराहा शर्म से झुक गया। पत्थर फेंकने वाले लड़के भीड़ में छिपने लगे और राकेश मिश्रा की आंखों से आंसू बहने लगे।
अध्याय 5: असली वीआईपी
मेजर विक्रम ने अपनी जेब से वह मुड़ा-तुड़ा प्लास्टिक का तिरंगा निकाला और कांपते हाथों से जनरल को दिया। “सर… झंडा गिरना नहीं चाहिए। देश बच गया ना?”
जनरल शर्मा ने उस झंडे को माथे से लगाया और मेजर विक्रम को अपनी सफारी गाड़ी की उसी सीट पर बैठाया जिस पर वे खुद बैठते थे। उन्होंने खुद उनके फटे कपड़े ठीक किए और सबके सामने उन्हें दोबारा सैल्यूट किया।
उपसंहार: एक सबक
मेजर विक्रम को मिलिट्री अस्पताल ले जाया गया, जहाँ इलाज के बाद उनकी याददाश्त धीरे-धीरे वापस आने लगी। सेना ने उन्हें पूरा सम्मान और उनका बकाया वेतन दिया। लेकिन यह कहानी हमें एक बड़ा सवाल दे गई।
क्या हमें किसी के त्याग को पहचानने के लिए उसके पद या वर्दी का इंतजार करना चाहिए? हमारे आसपास न जाने कितने ऐसे ‘मेजर विक्रम’ सड़कों पर भटक रहे होंगे, जो अपनी पहचान खो चुके हैं लेकिन उनका जमीर अब भी इस देश के लिए धड़कता है।
उस दिन के बाद, घंटाघर चौक पर एक बड़ा पोस्टर लगाया गया, जिस पर लिखा था— “सम्मान केवल वर्दी का नहीं, उस इंसान का भी करें जिसने आपके कल के लिए अपना आज कुर्बान कर दिया।”
सीख: फटे हुए कपड़ों के नीचे एक सम्राट या एक शहीद भी हो सकता है। इंसानियत का असली इम्तिहान तब होता है जब आप किसी लाचार में भी एक नायक को देख सकें।
जय हिंद!
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