SSP लेडी ऑफिसर मौत के करीब थी, लेकिन जेल में जो हुआ उसे देखकर डॉक्टर भी हैरान रह गए…
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“एसएसपी लेडी ऑफिसर मौत के करीब थी, लेकिन जेल में जो हुआ उसे देखकर डॉक्टर भी हैरान रह गए”
मुम्बई की रातें हमेशा हलचल से भरी रहती हैं। कभी ट्रैफिक का शोर, तो कभी बंदरगाह के हॉर्न, और कभी पुलिस के सायरन की आवाज़। लेकिन उस रात कुछ अलग ही था। पुलिस मुख्यालय से कुछ दूरी पर एक सुनसान गली में, बहादुर और निडर पुलिस ऑफिसर अंजलि वर्मा अपनी टीम के साथ गश्त पर थी।
अंजलि वर्मा, जो 34 साल की उम्र में ही अपने साहस और ईमानदारी के कारण पूरे विभाग में एक आदर्श के रूप में जानी जाती थी। उसकी आंखों में वही जोश और ताकत थी, जो नए-नए भर्ती हुए पुलिस वालों में देखने को मिलती है। वह रिश्वत नहीं लेती थी, ताकतवर अपराधियों से नहीं डरती थी और अपने देश और जनता की सेवा में अपनी जान भी न्योछावर कर सकती थी।
उस रात भी वह अपनी सफेद जीप में पुलिस की नीली घूमती लाइट के साथ गश्त कर रही थी। उसके साथ कांस्टेबल राजेश कुमार था, जो उसकी सबसे भरोसेमंद टीम का हिस्सा था। दोनों कॉलोनियों की गलियों में जाकर जांच कर रहे थे। तभी अचानक, वे एक सुनसान सड़क पर पहुंचे।
अंजलि ने अपना सिर पकड़ लिया, जैसे उसे तेज दर्द हुआ हो। उसके चेहरे पर अचानक पीला पड़ गया। कांस्टेबल राजेश घबरा कर बोला, “मेडम, आप ठीक हैं? कुछ हो गया क्या?” जवाब देने की बजाय, वह झटका खाकर बाहर गिरने लगी। जैसे ही वह कुछ कदम आगे बढ़ी, उसके शरीर में तेज कमकपी शुरू हो गई। उसके पैर जवाब दे गए और वह जमीन पर गिर पड़ी।
राजेश का दिल धड़कने लगा। उसने तुरंत रेडियो पर कॉल किया, “ऑफिसर डाउन! ऑफिसर डाउन! तुरंत एंबुलेंस भेजो!” उसकी आवाज़ में डर और चिंता थी। कुछ ही मिनटों में, एंबुलेंस की siren की आवाज़ सुनाई देने लगी।
अंजलि को सावधानी से स्ट्रेचर पर लिटाया गया। उसके होंठ नीले पड़ चुके थे, सांस टूट-टूट कर आ रही थी, और दिल की धड़कन बेकाबू थी। राजेश बार-बार कह रहा था, “मेडम, हिम्मत रखिए! आपको कुछ नहीं होगा।” लेकिन उसकी आंखें बंद हो चुकी थीं।
अस्पताल पहुंचते ही, पूरे इमरजेंसी वार्ड में हलचल मच गई। सरकारी अस्पताल की गलियों में शोरगुल मच गया। एक वरिष्ठ नर्स चिल्लाई, “बेस्ट स्पेशलिस्ट को तुरंत बुलाओ! यह केस सामान्य नहीं लगता।”
कुछ ही देर में, बड़े-बड़े डॉक्टर वहां इकट्ठा हो गए। डॉक्टर सिंह, जो कार्डियोलॉजिस्ट थे, डॉक्टर मीना, न्यूरोलॉजिस्ट, डॉक्टर राहुल शर्मा, जो टॉक्सिकोलॉजिस्ट थे, और कई अन्य विशेषज्ञ। सभी मशीनें चलने लगीं। ईसीजी मॉनिटर लगातार बीप कर रहा था। उसके चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क लगा दिया गया।
डॉक्टर मीना ने चिंता से कहा, “दिल की धड़कन बहुत अनियमित है। लेकिन हार्ट अटैक का कोई संकेत नहीं दिख रहा।”
डॉक्टर शर्मा ने रिपोर्ट देखते हुए कहा, “ब्लड वर्क नॉर्मल है। कोई जहर या विषाक्त पदार्थ भी नहीं मिला।”
डॉक्टर सिंह झुंझलाकर बोले, “यह कैसे संभव हो सकता है? एक स्वस्थ पुलिस अधिकारी अचानक मौत के कगार पर क्यों पहुंच जाए और हम कुछ समझ ही न पाए?”

तभी, अस्पताल की ऊपरी मंजिल पर, जहां आम मरीजों का इलाज नहीं होता, एक अलग ही वार्ड था—जेल वार्ड। यह एक खास जगह थी, जहां गंभीर अपराधियों का इलाज होता था। वहां हमेशा पुलिस गार्ड तैनात रहते थे।
उस जेल वार्ड में एक कैदी था—यूसुफ खान। उसकी शख्सियत सबके लिए एक पहेली थी। वह सामान्य कैदियों जैसा नहीं था। उसकी आंखों में एक अजीब सी शांति थी, जैसे वह दुनियावी हलचल से ऊपर उठ चुका हो। उसकी कहानी भी अलग थी।
यूसुफ एक पूर्व पैरामेडिक था। मुंबई के बड़े अस्पतालों में इमरजेंसी ड्यूटी करता था। हादसों और आपदाओं के बीच वह सबसे आगे रहता था। उसकी मदद के बिना कोई भी मरीज नहीं बचता था। मगर किस्मत ने उसे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। झूठी गवाही और षड्यंत्र में फंसाकर।
लोग उसे अपराधी समझते थे। लेकिन जो लोग उसके करीब थे, वे जानते थे कि वह असली में एक इंसानियत का पुजारी है। उसकी आंखों में एक ऐसी शांति थी, जो किसी भी रोगी को सुकून दे सकती थी।
उस रात, जब अस्पताल में अंजलि वर्मा का केस चल रहा था, उस समय, ऊपर जेल वार्ड में एक नर्स थी—पटेल। उसकी चिंता उस वक्त बहुत बढ़ गई थी। वह जानती थी कि उसकी आंखें उस समय बहुत कुछ कह रही हैं।
उसने अपने साथी को कहा, “देखो, ऊपर अंजलि वर्मा की हालत बहुत नाजुक है। कहीं कुछ तो है, जो हम देख नहीं पा रहे।”
उसने अपने अनुभव से कहा, “मुमकिन है कि उसकी हालत किसी जहरीले पदार्थ का असर हो।”
डॉक्टरों ने जांच शुरू की। जब उन्होंने उसकी गाड़ी का निरीक्षण किया, तो सब हैरान रह गए। उसकी जीप का एग्जॉस्ट सिस्टम फटा हुआ था और जहरीला धुआं सीधे अंदर आ रहा था।
यह जानकर, अस्पताल में हलचल मच गई। डॉक्टरों ने तुरंत फैसला किया कि इस जहरीले धुएं का असर उसके शरीर पर पड़ा है।
अंजलि की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। उसकी सांसें फड़फड़ा रही थीं। डॉक्टरों ने हर संभव कोशिश की, लेकिन उसकी हालत गंभीर होती गई।
इसी बीच, यूसुफ खान ने अपने अनुभव और ज्ञान का इस्तेमाल किया। उसने कहा, “मुझे पता है कि यह जहरीला पदार्थ है। यह गाड़ी पिछले कई हफ्तों से इस तरह चल रही थी।”
उसने कहा, “यह हवा अंदर से जहरीली हो रही है। यह कोई सामान्य बीमारी नहीं है। यह किसी माहौल का असर है।”
डॉक्टरों को पहली बार यूसुफ की बात में सच्चाई नजर आई। उन्होंने तुरंत उस गाड़ी को बंद करवाया। और जब उसकी जांच की गई, तो पता चला कि एग्जॉस्ट सिस्टम फटा हुआ था और जहरीला धुआं सीधे अंदर आ रहा था।
इस खुलासे ने पूरे अस्पताल को हिला कर रख दिया। डॉक्टरों ने समझा कि यह कोई सामान्य मामला नहीं बल्कि एक बड़ा खतरा है।
अंजलि की हालत अब भी नाजुक थी, लेकिन उसकी सांसें धीरे-धीरे बेहतर होने लगीं। डॉक्टरों ने तुरंत उसकी लाइफ सपोर्ट मशीन हटा दी। उसकी आंखें धीरे-धीरे खुलने लगीं।
उसकी मां, सावित्री देवी, जो अस्पताल पहुंची थी, रोते-रोते फूट पड़ी। उसने कहा, “मेरी बेटी को बचा लो। मैं कुछ भी कर सकती हूं।”
डॉक्टर भी हैरान थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इस घटना का कारण क्या है। न कोई जख्म, न कोई जहर, फिर भी उसकी हालत इतनी नाजुक क्यों हो गई?
वह रात, अस्पताल का माहौल एकदम बदल गया। उस रात, जब सारी मशीनें चल रही थीं, और डॉक्टर अपनी-अपनी रिपोर्ट देख रहे थे, तब यूसुफ खान ने एक और बात कही—”मुझे पता है कि यह सब कैसे हुआ। यह जहरीला धुआं किसी माहौल का असर है।”
उस रात, जब सब कुछ ठीक हो गया, तो डॉक्टरों ने कहा, “यह चमत्कार है।” लेकिन वह चमत्कार था या फिर उस छोटे से इंसान की सूझबूझ का परिणाम, यह तो वक्त ही बताएगा।
अंजलि वर्मा, जो उस रात मौत के करीब थी, अब ठीक हो चुकी थी। उसकी आंखें खुल गई थीं। उसने अपने परिवार को देखा। उसकी मां का चेहरा खुशी से चमक रहा था। और उसकी आंखों में एक नई उम्मीद जागी थी।
वह रात, जब उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा खतरा टल गया, तो उसने अपने दिल में ठाना—अब वह सिर्फ एक पुलिस ऑफिसर नहीं, बल्कि इंसानियत का प्रतीक बनेगी। उसने तय किया कि वह अपने अनुभव और ज्ञान का इस्तेमाल कर, समाज में नई रोशनी फैलेगी।
उस रात, अस्पताल में एक नई शुरुआत हुई। उस छोटी-सी घटना ने साबित कर दिया कि इंसानियत का असली मतलब क्या है। और उस छोटे से कैदी ने, जिसने अपनी जिंदगी को बदला, पूरे अस्पताल को नई दिशा दी।
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